सोमवार, 27 अगस्त 2007

ए री सखी बरखा बहार आई... ..

भारती परिमल
लो फिर से आया हरियाला सावन
पीऊ-पीऊ बोल उठा पागल मन
बादलों के पंख लगा उड़ गया रे
दूर पिया के देश में मुड़ गया रे
आज से कई वर्षों पहले कालिदास ने अपने नाटक आषाढ़ का एक दिन में एक कल्पना की थी- उनका विरही यक्ष अपनी प्रियतमा यक्षिणी को बादलों के माध्यम से प्रेम संदेश भेजता है। उस जमाने की वह कल्पना आज इंटरनेट, ई-मेल के जरिए साकार हो रही है। इस कल्पना का साकार होना अपने आपमें एक रोमांचकारी अनुभव है।
चारों ओर बारिश की फुहार से वातावरण भीगा हुआ है। मोर अपनी प्रियतमा मोरनी को रिझाने के लिए पंख पसारे हुए है। कोयल की कुहू-कुहू और पपीहे की पीऊ-पीऊ जंगल को गुंजायमान कर रही है। ऐसे में आकाश में तारों और चंद्रमा के साथ बादलों का खेल अपनेपन की एक नई परिभाषा रच रहा है। ऐसा लगता है मानों हरियाली मुस्कान के साथ सजी-धजी धरती को आकाश की प्रियतमा बनने से अब कोई रोक नहीं सकता।
बारिश तो आकाश के द्वारा धरती को लिखा गया खुला प्रेमपत्र है। धरती का अपनापन इतना गहरा है कि वह कभी रेनकोट पहन कर बारिश का स्वागत नहीं करती, वह तो इस बारिश में पूरी तरह से भीग जाने में ही अपनी सार्थकता समझती है। और भीगती है, खूब भीगती है, इतनी कि एक पल को धरती-आकाश दोनों ही एकमेव ही दिखाई देते हैं। क्या ये सार्थकता कहीं और देखने को मिल सकती है भला? हाँ जब कोई प्रिय अपनी प्रियतमा से सावन की फुहारों के बीच मिलता है, तब उनकी भावनाएँ मौन होती हैं और इसी मौन में दोनों एक-दूसरे को सब-कुछ कह देते हैं. यही है प्रेम का शाश्वत रूप। लेकिन कुछ लोग इससे अलग विचार रखते हैं, उनका मानना है कि बरसात प्रेमियों को बहकाती है और वन-उपवन को महकाती है। यही मौसम होता है जब इसे कवि अपनी आंखों से देखता है. कभी विरह की आग में जलती हुई प्रेयसी के रूप में, तो कभी अपनी प्रियतमा से मिलने को आतुर प्रेमी के रूप में। कवियों ने हर रूप में इस बरसात को देखने का प्रयास किया है, जिसे हम कविताओं के रूप में सामने पाते हैं।
आषाढ़ का पहला दिन, यदि मेरा बस चले तो इसे मैं इंडियन वेलेंटाइन डे घोषित कर दूँ। आप ही सोचें वह भला कोई प्रेमी युगल है, जिसने पहली बारिश में भीगना न जाना हो। बारिश हो रही हो, बाइक पर दोनों ही सरपट भागे जा रहे हों, ऐसे में कहीं भुट्टे का ठेला दिखाई दे जाए, धुएं में लिपटी भुट्टे की महक भला किसे रोकने के लिए विवश नहीं करती? बाइक रोककर एक ही भुट्टे का दो भाग कर जिसने नहीं खाया हो, उनके लिए तो स्वर्ग का आनंद भी व्यर्थ है। प्रेम में डूबकर कविता लिखने वाले कवियों ने तो यहाँ तक कहा है कि जो प्रेम में भीगना नहीं जानता, वह विश्व का सबसे कंगाल व्यक्ति है।
वर्षा-ऋतु प्रेम में डुबोने वाली ऋतु है। प्रेम की अभिव्यक्ति में वर्षा की बूँद बहुत ही सहायक होती हैं। हल्की फुहारें भला किसे अच्छी नहीं लगती, क्या इसमें भीगकर हम कुछ भी महसूस नहीं करते? कोयल की कू-कू और पपीहे की पी-पी से जब हमारे आसपास का वातावरण गुंजायमान हो रहा हो, तब ऐसा कौन होगा, जिसे अपने प्रेम की याद न आए। बहुत ही सोच-समझकर ही कालिदास ने बादलों को अपना क़ासिद बनाया था, वे जानते थे कि इनसे बढ़कर और कोई नहीं है, जो मेरे हृदय की संवेदनाओं को मेरी प्रेयसी तक पहुँचा सके। ये जहाँ भी बरसेंगे, मेरी प्रेयसी समझ जाएगी कि इन बादलों में ही कहीं छिपा है, मेरे उस अपने का संदेशा। ये बरस जाएँ, तो मैं समझ जाऊँगी कि उन्होंने क्या संदेशा भिजवाया है।
बादलों के माध्यम से संदेशा भिजवाना, आज के इस इंटरनेट के युग में भले ही हास्यास्पद लगता हो, किंतु क्या सिर्फ इसी सोच के कारण हृदय की संवेदनाओं को शुष्क और नीरस किया जा सकता है? आज की पीढ़ी के पास इतना वक्त नहीं है कि वह अपना संदेशा भेजने के लिए बादलों की प्रतीक्षा करे। ई-मेल और मोबाइल के रहते आज संवेदनाओं की नदियाँ सूख रही हैं। लेपटॉप का इस्तेमाल करने वाला प्रेमी भला प्रेम-पत्र की गहराई क्या जाने? बंद लिफ़ाफ़े में से निकलने वाला छोटा सा कागज अपने आप में प्रेम का साम्राज्य लिए हुए होता है। इसकी जानकारी इंटरनेटिए प्रेमी को भला कहाँ होगी?
नए जमाने का अनादर हमें नहीं करना है, परंतु आषाढ़ के पहले दिन आकाश की ओर देखते हुए बादलों से यह प्रार्थना करें कि मेरे कंप्यूटर में वाइरस का आक्रमण हो गया है, हे बादल ! जिस तरह तू कालिदास के यक्ष का संदेशा ले गया था, उसी तरह अब तू मेरा मैसेज भी ले जा। तुझे तो वाइरस का टेंशन कहाँ है मेरे प्रिय बादल!
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ , कालिदास द्वारा बादलों के माध्यम से एसएमएस करने की जो प्रणाली खोजी गई थी, उस सिस्टम में इन कमिंग और आऊट गोइंग दोनों ही टोटल फ्री है। हर प्रेमी इस सिस्टम का लाभ उठा सकते हैं।
भारती परिमल

1 टिप्पणी:

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