शुक्रवार, 21 मार्च 2008

तब केवल ऑंखों में ही रह जाएगा पानी.. ..


डा. महेश परिमल
22 मार्च याने विश्व जल दिवस। केवल जल दिवस। पानी गवाँने का दिन या कह लें पानी बचाने का संकल्प करने का दिन। केवल कागजों में ही बच पाता है पानी। वरना धरती की छाती पर रोज ही हजारों सूराख हो रहे हैं, कोई देखने वाला नहीं है। सूरज ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। बस अब पानी के लिए हाहाकार होने में समय नहीं है। पर पानी अब है कहाँ? चेहरे का पानी तो कब का उतर गया। केवल ऑंखों में है, जो केवल दु:ख के समय ही निकल पाता है। पानी बरबाद करते हुए हमें यह जरा भी नही लगा कि हम पानी नहीं अपना खून बरबाद कर रहे हैं। खूब बहाया है पानी। खूब किया बरबाद पानी को, अब समय आ गया है, जब ये पानी ही आपको बरबाद कर देगा। सँभल जाओ मूर्खों, नहीं तो रोने के लिए ऑंसू भी नहीं बचेंगे।
यहाँ यह जानकारी दे दूँ कि विश्व के 1.4 अरब लोगों को पीने का शुध्द पानी नही मिल रहा है। हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति जीवनदायी संपदा पानी हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारी ंजिंदगी का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है।
पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं, जिसे जानकर आपको लगेगा कि सचमुच अब हममें थोड़ा-सा भी पानी नहीं बचा। तथ्य इस प्रकार हैं :-
 मुम्बई में रोज वाहन धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
 दिल्ली, मुम्बई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वाल्व की खराबी के कारण रोज 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
 ब्रह्मपुत्र नदी प्रतिदिन 2.16 घन मीटर पानी बंगाल की खाड़ी में डाल देती है।
 भारत मेें हर वर्ष बाढ़ के कारण करीब 1529 मानव और 98 हजार पशुओं की मौत होती है।
 इजराइल में औसतन मात्र 10 सेंंटीमीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटीमीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है।
 पिछले 50 वर्षों में पानी के लिए 37 भीषण हत्याकांड हुए हैं।
 भारतीय नारी पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती है।
 पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
हमारी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलोलीटर पानी है. इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में धु्रव प्रदेशों में है, अब बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुऑं, झरना और झीलों में है., जो पीने के लायक है. इस एक प्रतिशत पानी का 60 र्वा हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है. बाकी का 40 वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं. इसलिए याद रखें कि यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है. बॉथ टब में नहाते समय धनिक वर्ग 300 से 500 लीटर पानी गटर में बहा देता है. इसके बाद मध्यम वर्ग भी कम नहीं है, वह भी नहाते समय 100 से 150 पानी लीटर बरबाद कर देता है. इस तरह से हमारे समाज में पानी बरबाद करने की जो राजसी प्रवृत्ति शुरू से रही है, उस पर अभी तक अंकुश रखने की दिशा में थोड़ी सी भी कोशिश नहीं हुई है. हकीकत में जब से देश आजाद हुआ है, तब से आज तक इस दिशा में कोई भी काम गंभीरता से नहीं हुआ है. हमारे राजनेताओं के चेहरे पर वह पानी था ही नहीं, जिससे वे इस पानी के लिए कुछ करते.
विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 व्यक्तियों को पीने का शुध्द पानी नहीं मिल पाता है, ऐसे में प्रति वर्ष 6 अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पानी का स्रोत कही जाने वाली नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोजने में लगे हुए हैं, किंतु जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाएगी, तब तक अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है।
पृथ्वी का कुल विस्तार 51 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। उसमें से 36 करोड़ वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र पानी से घिरा हुआ है। दुर्भाग्य यह है कि इसमें से पीने लायक पानी का क्षेत्र बहुत कम है। 97 प्रतिशत भाग तो समुद्र का है। बाकी के 3 प्रतिशत भाग पानी में से 2 प्रतिशत पर्वत और ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। यदि इसमें से करीब 6 करोड़ घन किलोमीटर का बर्फ पिघल जाए, तो हमारे महासागरों का तल 80 मीटर बढ़ जाएगा, किंतु फिलहाल यह संभव नहीं। पृथ्वी से अलग यदि चंद्रमा की बात करें, तो चंद्रमा के ध्रुव प्रदेशों में 30 करोड़ टन पानी होने का अनुमान है।
पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियाँ भी पानी जन्य है। आलू में और अन्नानस में 80 प्रतिशत और टमाटर में 95 प्रतिशत पानी है। पीने के लिए मानव को प्रतिदिन 3 लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए। 1 लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है। जबकि एक किलो गेहूँ उगाने के लिए 1 हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 4 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होतेी है। इस प्रकार भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलापन क्या है, हर तरफ निजीकरण की बात होने लगी। एक के बाद एक कई क्ष्ेत्र निजीकरण की भेंट चढ़ते गए। सबसे बड़ा झटका जल खेत्र के निजीकरण का मामला है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया, तब कोई बहस नहीं हुई। देश के सामने इसे एक निर्विवाद तथ्य सम्पन्न कार्य की तरह परोसा गया था। बड़े पैमाने पर बिजली गुल होने का डर दिखाकर निजीकरण को आगे बढ़ाया गया।नतीजा सबके सामने है। सरकारी तौर पर भी यह कबूला जा चुका है कि सुधर औंधे मुँह गिरे हैं और राष्ट्र को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अब पानी के क्षेत्र में ऐसी ही निजीकरण की बात की जा रही है। हम महसूस करते हैं कि इस मुद्दे पर चुप बैठना मुनासिब नहीं। किसी भी बड़े निर्णय के पहले इस मुद्दे पर व्यपाक बहस होनी चाहिए।
समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया,तो संभव है पानी केवल हमारी ऑंखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हजारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हजारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब ही गायब हो रहे हैं, तो ऐसे में यह कैसे सोचा जाएगा कि हममें पानी बचाने की प्रबृत्ति जागेगी? हमारे चेहरे का पानी तो उतर गया है, मरने के लिए अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया,पर अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है। सोचो ह रोना कैसा होगा, जब हमारी ऑंखों में ही पानी नहीं रहेगा? वह दिन दूर नहीं, जब यह सब हमारी ऑंखों के सामने ही होगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे। यह हमारी विवशता का सबसे कू्रर दिन होगा, ईश्वर से यही कामना कि वह दिन कभी नहीं आए। पर आज पानी की बरबादी को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि धीमे कदमों से एक भयानक विपदा हमारे पास आ रही है, हम सब केवल उसका इंतजार ही कर सकते हैं।
(डा. महेश परिमल

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