शनिवार, 12 अप्रैल 2008

बीमारी से भी खतरनाक है एड्स का सच


डॉ. महेश परिमल
क्या आप बता सकते हैं कि हमारे देश में कितने लोग एड्स के साथ जीते हैं और कितने लोग एड्स पर जीते हैं? बात थोड़ी अटपटी लगेगी, किंतु इसे समझ लेने के बाद आपको लगेगा कि सचमुच हम सब किस तरह से एक सोची-समझी साजिश के तहत छले जा रहे हैं। हमें इसका हल्का सा अहसास भी नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसे अभी तक हमारी सरकार ने भी सही ढंग से नहीं समझा है। समझने में काफी वक्त लगेगा पर सच तो यही है कि विदेशी बाजार हमें बहुत ही धीमा जहर दे रहा है और हम सब इसे अनजाने में ही ग्रहण भी कर रहे हैं।
शायद आपको पता न हो कि एचआईवी याने एड्स के बारे में जागृति फैलाने के लिए हमारे देश की स्वयं सेवी संस्थाओं को कितनी धनराशि प्राप्त हो रही है। इसी धनराशि को देखकर ही कई नई संस्थाएँ तैयार होती हैं, एक-दो रिपोर्ट देती हैं और धन मिलने के बाद बंद भी हो जाती हैं। आप कहेंगे कि अच्छा ही तो है कि लोग एड्स जैसी भयानक बीमारी के प्रति जागरूक तो बन रहे हैं, उसमें किसका अहित है? आपकी बात सच हो सकती है, पर यह भी सच है कि आज हमारे देश में एड्स से अधिक मौतें तो मलेरिया से होती हैं, टी.बी. से होती है। हमारे देश में प्रति मिनट एक मौत टी.बी. से होती है। याने यह बीमारी एक वर्ष में 5 लाख लोगों को अपने आगोश में ले लेती है, हमारे देश में सात करोड़ लोग हृदय रोग से और 3.2 करोड़ लोग डायबिटीस से ग्रस्त हैं, इस रोग से हर वर्ष हजारों मौतें होती हैं, तो दूसरी ओर एड्स से एक वर्ष में केवल 10 हजार मौतें ही होती हैं। फिर एड्स को लेकर ही इतनी अधिक सावधानी क्यों बरती जा रही है? देश में हर वर्ष 22 लाख लोग टी.बी. जैसे संक्रामक रोग की चपेट में आते हैं, फिर टी.बी. को लेकर इतना प्रचार-प्रसार क्यों नहीं होता? हमारे ही देश में हर वर्ष 10 लाख बच्चे अतिसार के कारण मौत का शिकार होते हैं, इसका इलाज काफी सस्ता भी है और इसे घर में ही नमक, शक्कर और पानी से बनाया जा सकता है, पर इसका भी उतना अधिक प्रचार क्यों नहीं हो पाता? दूसरी ओर एड्स से बचाव को लेकर हम अक्सर ही अखबारों में लेख पढ़ते ही रहते हैं, टीवी पर विज्ञापन भी देखते रहते हैं। यहाँ तक कि हम एड्स दिवस भी मनाते हैं। पर कभी टीबी, अतिसार या फिर अन्य रोगों के लिए सरकार इतनी चिंतित दिखाई देती है भला? आखिर एड्स के लिए ही इतनी जागरूकता की क्यों आवश्यकता पड़ी? आइए इस सच की पड़ताल करें-
सन् 2000 के बाद केंद्र सरकार ने एड्स जैसी बीमारी से लड़ने के लिए कुल 3,054 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, तो मलेरिया की रोकथाम के लिए पिछले 7 साल में 1,160 करोड़ रुपए ही खर्च किए हैं, देखा जाए तो यह राशि एड्स की तुलना में बहुत ही कम है। केंद्र सरकार द्वारा दी गई राशि में से कितनी राशि एड्स के इलाज के लिए मरीजों को दी गई है और कितनी राशि सरकारी अधिकारी हजम कर गए हैं, यह एक शोध का विषय है। एड्स की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार जितनी राशि खर्च करती है, उससे कई गुना अधिक धनराशि तो हमारे देश में डॉलर के रूप में विदेशों से आती है। यह राशि तमाम स्वयं सेवी संस्थाओं को प्राप्त होती है, जो कथित रूप से एड्स की जागरूकता के लिए काम करती है। अभी तक इन संस्थाओं को कितनी रकम प्राप्त हुई ?है, इसकी जानकारी नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन याने नार्को को भी नहीं मालूम। एड्स के सामने लड़ने का दावा करने वाली तमाम संस्थाओं के प्राप्त धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो फाइव स्टॉर होटलों में कांफ्रेंस करने और हवाई जहाज में विदेशी के टूर करने में ही खर्च हो जाता है। इन संस्थाओं के पास गाँवों में जाकर एड्स के खिलाफ जन जागरूकता फैलाने वाले कार्र्यकत्ता नहीं होते, पर थोड़ी-बहुत ऍंगरेजी जानने वाला और बढ़िया प्रोजक्ट रिपोर्ट बनाने वाले कुशल लोग होते हैं, जिससे विदेशी धन प्राप्त किया जा सके। इनकी रिपोर्ट में यही दर्शाया जाता है कि भारत में एड्स रोगी लगातार बढ़ रहे हैं, इसका इलाज आवश्यक है। ये इसकी इतनी भयावह तस्वीर पेश करते हैं कि विदेशी दवा कंपनी को अपने काम का अंजाम देने में आसानी हो जाती है। इसके बाद शुरू होता है, उन दवा कंपनियों का काम, जो एड्स की दवा बनाती हैं। ये कंपनियाँ पहले तो उन रिपोर्टो को जाहिर करती हैं कि देश में एड्स तेजी से फैल रहा है, यदि इसकी तुरंत रोकथाम न की गई तो यह महामारी के रूप में फैल सकती है। अब ये दवा कंपनियाँ पहले तो देश में मुफ्त में रक्त परीक्षण शिविर का आयोजन करती हैं, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि देश में कितने लोग एचआईवी से ग्रस्त लोग रहते हैं। इसके बाद ये अपनी दवाओं को बाजार में लाती हैं। ये मल्टीनेशनल कंपनियाँ पहले उन एचआईवी ग्रस्त लोगों को पकड़ती हैं, जिन्हें घोषित रूप से एचआईवीग्रस्त मान लिया गया है। डॉक्टर इन्हें एंटी रिट्रोवाइलर थेरेपी लेने की सलाह देते हैं। फर्र्स्ट लाइन एंटी रिट्रोवाइलर थेरेपी के नाम से पहचानी जाने वाली ये दवाएँ बाजार में 8 हजार रुपए में मिलती है। अभी एक लाख 25 हजार लोगों को यह दवाएँ मुफ्त में बाँटी जा रही हैं। मुफ्त में मिलने वाली इन दवाओं का नुकसान यह है कि इससे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। इसके बाद शुरू होती है कंपनियों की पैंतरेबाजी। पहले चरण की दवा तो मुफ्त में मिल गई और शरीर में उसका रिएक्शन भी शुरू हो गया। अब दूसरे चरण की दवा लेना आवश्यक है। गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले लोगों को तो यह दवा भी सरकार की तरफ से मुफ्त में मिल जाती है, पर दूसरों को नहीं। दूसरों को यह दवाएँ काफी महँगी मिलती है। उसके बाद तीसरे चरण की दवा तो और भी महँगी होती है। इस तरह से यह सिलसिला एक बार शुरू होता है, तो फिर रुकने का नाम नहीं लेता। मरीज को जीवनभर ये दवाएँ लेनी होती हैं। इस तरह से दवाओं का विक्रय शुरू हो जाता है और कंपनियों का लाभ भी।
यह कतई आवश्यक नहीं है कि जिन्हें एचआईवी पॉजीटिव है, वे एड्स रोगी ही हैं। यह भी साबित हो चुका है कि मात्र कुछ सावधानियों के चलते ऐसे लोग लम्बी आयु भी प्राप्त करते हैं। फिर भी ऐसे लोगों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है। फलस्वरूप लाखों लोगों का जीवन ही दूभर हो गया है। ऐसे में कई लोग आत्महत्या का भी सहारा ले लेते हैं। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं चिकित्सक, जो मरीज को डराते हैं और अपनी कमाई करते हैं। इन्हें अपनी महँगी दवाएँ बेचकर फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ अरबों रुपए कमा रहीं हैं। देखा जाए तो मलेरिया, अतिसार, मधुमेह आदि को गरीबों की बीमारी मान लिया गया है, इसलिए इसके बचाव या इलाज पर इतना अधिक बल नहीं दिया जाता। एड्स के ?प्रचार-प्रसार में सरकार का भले ही लाभ न हो, पर मल्टीनेशनल कंपनियों को लाभ ही लाभ है, इसलिए इस पर इतना अधिक ध्यान देकर खर्च किया जाता है। अरबों की कमाई कर ये कंपनियाँ करोड़ों रुपए गैर सरकारी संस्थाओं को दान में दे देती है, ताकि वह अपनी रिपोर्टों में इस बीमारी की भयावह तस्वीरें पेश करे और अपना उल्लू सीधा करे।
इस तरह से हम सब छले जा रहे हैं मल्टीनेशनल कंपनियों की सोची-समझी साजिश के तहत। आश्चर्य यह है कि इसका भान किसी को भी नहीं है, न सरकार को और न ही चिकित्सकों को और न ही हमें। ये कैसा मायाजाल है, जिसमें हम फँसते ही चले जा रहे हैं?
डॉ. महेश परिमल

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सार्थक पोस्ट है. यह जनजागृति अत्यंत आवश्यक है व साथ ही इसके खुलासे अधिक से अधिक होने चाहिएँ वरना एक ओर चारित्रिक पतन को प्रोत्साहन देने वाला विश्व -बाज़ार और दूसरी ओर उसके शमन के सामान को बेचने की ताक में खडा दूसरा. इन्हीं अजगरों के पेट में देश समाता चला जा रहा है और दूसरों का हिस्सा भी ये निगल कर उन्हें मृत्यु के मुख पर ले जाने की प्राणान्तक व तिहरी मार मार रहे हैं .

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  2. दरअसल एड्स सरकार प्रायोजित बीमारी है.

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  3. डॉ. महेश परिमल जी जिस प्रकार एड्स का भुत बना कर दिखाया जाता हे असल मे यह उतना हे नही,फ़िर हमारी नेता अपनी जेब तो भरते हे, ओर जो विदेशी दवा जेसा की आप ने लिखा मुफ़्त मिलती हे क्या यह वो दवा तो नही जिसे यह विदेशी अफ़्रीकनो ओर हमारे उपर चेक करने के लिये प्रयोग मे लाते हो, क्यो की कोई भी दवा टेस्ट करने के लिये इन दवा कम्पनियो को पहले जनवारो की फ़िर इन्सानो की जरुरत पडती हे,ओरइन के अपने देश मे ऎसे इन्सान मिल तो जाते हे,लेकिन वो लोग बहुत महगे पडते हे,ओर हमारे नेता पेसू के लिये सब कुछ कर सकते हे, एक बार एड्स का होवा दिखाया ओर टेस्ट के लिये हम तेयार

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  4. मैं कुछ और खुलासा करूँ ? यह तो सच है कि एड्स ख़तरनाक बीमारी है ।
    किंतु यह भी सच है कि फार्माक्यूटिकल घराने पूरे परिदृष्य को स्टीयर कर रहे हैं ।
    वही बिकवायेंगे, जो वह बेचना चाहते हैं , चाहे वह बर्ड फ़्लू हो या हिपेटाइटिस-बी, या सिंड्रोम एक्स ।
    हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्यनीति आज तक परिभाषित होने की प्रतीक्षा कर रही है । जहाँ पाँच वर्ष टिके रहने की सोच हो, वहाँ पचास वर्ष की कौन भकुआ सोचता है ?
    ज़मीनी सतह पर तो फ़रमान ज़ारी होता है, फ़लाँ फ़लाँ रोग,देश से उन्मूलित हो गया है , कागज़ों में दौड़ता है कि जिस भी सेन्टर से इस मर्ज़ की रिपोर्ट आयी, वह डाक्टर निलंबित होगा ।
    अब क्या करे डाक्टर ? तुलसीदास जी को याद करता है, मूँदहू आँख कतऊ कुछ नाहिं ! आप भी अँखिया मूँद लो, सर जी ।

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  5. साथियॊ
    मेरे आलेख पर आप लॊगॊं की प्रतिक्रिया जानकर अच्छा लगाऌ आप सभी इसी तरह मेरा हौसला बढ़ाते रहें मेरा विशृवास है इससे प्रभावित हॊकर मैं और भी उम्दा आलेखा दता रहूँगा(
    महेश परिमल

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  6. साथियॊ
    मेरे आलेख पर आप लॊगॊं की प्रतिक्रिया जानकर अच्छा लगाऌ आप सभी इसी तरह मेरा हौसला बढ़ाते रहें मेरा विशृवास है इससे प्रभावित हॊकर मैं और भी उम्दा आलेखा दता रहूँगा(
    महेश परिमल

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