मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

देश में बहती शराब की नदियाँ


डॉ. महेश परिमल
पहले कहा जाता था कि हमारे देश में दूध की नदियाँ बहती थीं। हमारे बुजुर्गो की यह बात हमें समझ में नहीं आती थीं। हमें विश्वास ही नहीं होता था कि ऐसा हो भी सकता है। आज उनकी बात कुछ-कुछ समझ में आ रही है। जब हम देख रहे हैं कि हमारे देश में दूध नहीं शराब की नदियाँ बह रहीं हैं। मेरी बात अटपटी लग सकती है, लेकिन आज जिस तरह से हमारे देश में शराब की बिक्री बेतहाशा बढ़ रही है, उससे तो यही कहा जा सकता है कि देश में भले ही दूध की नदियाँ बहती हो, पर अब शराब की नदियाँ बह रहीं हैं, तो गलत नहीं होगा।
हमारे देश में शराब की बिक्री में हर वर्ष 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है। अब तो कोई भी समारोह हो, शराब की महफिल के बिना अधूरा है। नए वर्ष की अगवानी तो बिना इसके संभव ही नहीं है। नए वर्ष के आगाज में भारत में जितनी शराब पी जाती है, उतनी तो अमेरिका और ब्रिटेन में भी नहीं पी जाती है। जिस तरह से रिश्वत को आजकल शिष्टाचार मान लिया गया है, ठीक उसी तरह शराब का सेवन अब किसी को आश्चर्य में नहीं डालता। शराब कंपनियाँ भी अब इस काम के लिए फिल्म स्टॉर्स का सहारा लेने लगी है। हाल ही में रेडिको खेतान नाम की कंपनी ने मेजिक मोमेंट्स नाम की खुद की वोदका के ? प्रचार के लिए ऋतिक रोशन का अपना ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाया है। अनु कपूर वर्षों से शराब के लिए विज्ञापन करते आए हैं। फिल्म भूल-भुलैया के नायक शाइनी आहूजा को डिएजीओ कंपनी ने वोदका का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाया है। शाहरुख और शिल्पा शेट्टी भी अब अल्कोहल के विज्ञापनों में काम करने के लिए तैयार हो गए हैं। यह सभी जानते हैं कि शराब शरीर के लिए हानिकारक है, लेकिन फिर भी लोग इसे पीने से बाज नहीं आते। सरकार ने अवश्य इसके विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा दिया है, पर जिस ब्राण्ड की शराब हो, उसी ब्राण्ड के सोडे का विज्ञापन करना गलत नहीं मानती। सरकार की इसी नासमझी के कारण ये चालाक कंपनियाँ जिस ब्राण्ड की शराब बेचती हैं, उसी ब्राण्ड के सोडे का विज्ञापन टीवी पर करती हैं, इससे उनकी शराब का विज्ञापन भी हो जाता है और कानूनी रूप से वे दोषी भी नहीं माने जाते। साँप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती, शायद इसी को कहते हैं।
अभी कुछ ही दिन पहले हमारे पंडित जी अपनी कन्या के लिए सुयोग्य वर ढूँढने के लिए निकले, उनका यह संकल्प था कि वर तो उसे ही चुनेंगे, जो युवक शराब का सेवन न करता हो। आश्चर्य इस बात का है कि पंडित जी के सारे प्रयास विफल साबित हुए, क्योंकि उन्हें अभी तक एक भी ऐसा युवक नहीं मिला, जो शराब का सेवन न करता हो। इसका आशय यही हुआ कि आज शराब का सेवन समाज में अनजाने में ही स्वीकार्य हो गया है। आज की पीढ़ी शराब के नशे में इतनी डूब गई है कि इसके बिना वे कुछ भी नया नहीं सोच सकते। आज शराब उनकी लाइफस्टाइल का एक हिस्सा बन गई है। गांधीजी ने अपनी दूरदर्शिता से यह समझ लिया था कि निश्चित रूप से देश को कोई चीज रसातल में ले जाएगी, तो वह होगी शराब। इसलिए उन्होंने जब स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी, उसमें शराब का कोई स्थान न था। गांधीजी के सपनों का भारत बनाने के लिए ही उन्हें ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता के बाद तमाम राज्यों में शराबबंदी की नीति लागू की गई। आज भी देश के सभी राज्यों में शराबबंदी विभाग है, पर यह विभाग केवल शराब के परमिट देने का ही काम करता है। और तो और गांधी के देश याने गुजरात में तो शराब बंदी केवल कागजों पर ही सिमट कर रह गई है।
शराब की नदियाँ बहने के दृश्य को याद करें, तो जब भारत ने 20-20 का मैच जीता था, तब देश के महानगरों से लेकर गाँव की गलियों में किस तरह से शराब के साथ जश्न मनाया गया था, यह हमें याद ही होगा। नए साल की अगवानी और पुराने साल की विदाई के समय तो जिस तरह से हर खुशी में शराब होती है, उससे तो यही लगता है कि भविष्य में नए साल की अगवानी बिना शराब के हो ही नहीं सकती। उस दिन बड़ी-बड़ी होटलों में जिस तरह से नशे में धुत्त लोग बेहूदा नृत्य करते हैं, उससे ही पता चल जाता है कि उनके लिए नया वर्ष नहीं, बल्कि शराब महत्वपूर्ण होती है। आज किसी भी समारोह में जाएँ, तो वहाँ अपनी खुशी का इजहार कोई हस्ती शेम्पेन की बोतल से झाग निकालकर ही करती दिखाई देगी। पीने वालों को तो पीने का बहाना चाहिए, इस तरह से आज खुशी बताने का कोई भी कार्यक्रम उत्सव की तरह आयोजित होता है, फिर आयोजन चाहे किसी के जन्म दिन का हो, शादी का हो या फिर गणेश विसर्जन का हो, लोग बिना शराब के इसे नहीं मनाते। अब तो इसमें युवतियों और महिलाओं का समावेश हो गया है, इसलिए महफिल की रंगत ही बदल गई है।
जिस तरह से क्रिकेट का खेल हमें ऍंगरेजों से विरासत में मिला है, ठीक उसी तरह यह शराब के सेवन की आदत भी हमें उन्हीं से मिली है। अपनी खुशियों को जाहिर करने के लिए शेम्पेन की बोतल से झाग निकालना भी हमने ऍंगरेजों से ही सीखा है। शराब की नदियाँ देश में बहाने के लिए देश की शराब नीति और शराब उत्पादकों की चालाकी प्रमुख है। जब भी कहीं अपराध की खबर हो, तो उसमें यही बताया जाता है कि अपराधी ने अपराध करने के पहले खूब शराब पी, उसके बाद ही वह उस कार्य में सफल हो पाया। स्पष्ट है कि अपराध का नशे से गहरा वास्ता है। नशे से जीवन ही नहीं, परिवार, समाज और पूरा देश बरबाद होता है। यह जानते हुए भी हमारी सरकार ने राजस्व के कारण लोगों को खुलेआम शराब पीने की छूट दे रखी है। लोग पी रहे है और मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।

देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है, उसी तेजी से बदल रहे हैं, जीवन मूल्य। अब लोगों के पास अनाप-शनाप धन की आवक हो रही है। सन् 2001 में हमारे देश में शेम्पेन की 3 हजार केरेट की बिक्री हुई थी, जो आज बढ़कर 20 हजार केरेट से अधिक हो गया है। आज देश भर में जितनी शराब बेची जाती है, उसका दस प्रतिशत तो केवल शेम्पेन के रूप में ही होता है। भारत के शहरों में इंडियन मेड फारेन लिकर की बिक्री में लगातार इजाफा हो रहा है। कुछ समाज तो ऐसे हैं, जहाँ ऐसा कोई युवक ही नहीं है, जो शराब पीता ही न हो। एक अंदाज के अनुसार भारत में शराब की बिक्री हर वर्ष 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। सन् 2007 में शराब की कुल बिक्री 15 करोड़ केरेट जितनी हुई। दूसरी ओर बीयर की बिक्री 13.7 करोड़ केरेट जितना हुआ। आश्चर्य इस बात का है कि बीयर को शराब में शामिल नहीं किया जाता, इसलिए लोग इसे निरापद मानकर इसका खूब सेवन करते हैं। आजकल जिस तरह से प्रतिस्पर्धा चल रही है, उसमें आज के युवा इतने खप गए हैं कि 12 से 16 घंटे तक जी-तोड़ मेहनत के बाद वे थककर बीयर का सहारा लेते हैं। धीरे-धीरे यह उनकी आदत में शामिल हो जाता है। फिर आज तो यह एक फैशन के रूप में सामने आ रहा है। आज की युवा पीढ़ी तनाव के दौर से गुजर रही है। आय बढ़ गई है, नौकरी पर खतरा हमेशा मँडराते रहता है, दूसरी कंपनियों से स्पर्धा लगातार जारी है, इस स्थिति में शराब और सिगरेट आसानी से उनसे जुड़ जाती है। युवा जब ये दोनों से बुरी तरह से जकड़ जाता है, तब ड्र्रग्स जैसी चीजें उसे आसानी से अपनी गिरफ्त में ले लेती है। आज के युवा वाइन और व्हीस्की के बदले वोदका और रम के प्रति अधिक आकर्षित होती है। ये दोनों महँगी है, लेकिन अधिक नशा प्रदान करती है। शराब उत्पादकों का मानना है कि आज 60 प्रतिशत जनसंख्या 25 साल से कम युवाओं की है, इसमें वे युवतियाँ भी शामिल हैं, जो बड़े-बड़े सपने लेकर साधारण परिवार से आती हैं, अधिक धन इन्हें ललचाता है और वे और अधिक धन की लालच में व्यसनी बन जाती हैं, ऐसी युवतियाँ ही युवकों की बरबादी का कारण बनती हैं।
शराब कंपनियाँ चुनाव के दौरान करोड़ों रुपए का चंदा देती है, जिससे राजनीतिज्ञ इनके हाथ की कठपुतली बनकर रह जाते हैं। शराब कंपनियों पर हमेशा मेहरबान रहने वाले ये राजनीतिज्ञ कभी नहीं चाहते कि लोग शराब पीना छोड़ दें। आश्चर्य इस बात का है कि शराब पीने वाले शराब को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हैं, फिर भी वे इससे बाज नहीं आते हैं। शराब कंपनियाँ अपने उत्पाद को बेचने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाती है, जिसके चंगुल में लोग आ ही जाते हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों में एक्जीक्यूटिव बिजनेस पार्टियों में मुफ्त की शराब खूब पीते हैं। कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो महँगी शराब मुफ्त में नहीं पी सकते, वे हाई सोसायटी की पार्टियों में गेट के रूप में घुस जाते हैं। कहना न होगा कि जिस तेजी से देश का आर्थिक विकास हो रहा है, उसी तेजी से लोग व्यसनी बनते जा रहे हैं। कहीं कहीं तो व्यसनी होना शिष्टाचार का प्रतीक माना जाता है। कई बार तो ऐसे लोग जो शराब नहीं पीते, उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है।
शराब के साथ एक बात और है, पहला तो अपने बचपन के मित्र से भी महत्वपूर्ण होता है, टेबल का मित्र याने साथ-साथ शराब पीने वाला साथी, दूसरी बात यह है कि व्यक्ति जब तक शराब नहीं पीता, तब तक उसे कई पिलाने वाले मिल जाएँगे, पर जब वह इसका आदी हो जाता है, तो कोई नहीं पिलाता। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी गरीब के घर का चूल्हा नहीं जलता, तो उसे शराब के लिए तो उधारी देने के लिए कई हाथ सामने आ जाएँगे, पर दाल-आटे के लिए कोई उधारी देने के लिए तैयार नहीं होता। यह शराब और उसे पीने वालों का गणित है, जिसे हर कोई समझ नहीं सकता। अब तो पत्रकारों को शराब मुफ्त में मिल ही जाती है, कई कंपनियों के एक्जीक्यूटिव भी बिजनेस पार्टियों में मुफ्त की शराब के आदी होने लगे हैं। कुछ व्यवसायों में तो शराब का होना अतिआवश्यक है। विदेश से आने वाली महँगी से महँगी शराब आजकल लोग इतनी आसानी से खरीदते हैं, मानों सब्जी बाजार में जाकर सब्जी खरीद रहे हों। मोएट नाम की विदेशी कंपनी ने हाल ही में ग्लेंमोरंगी नाम की दुर्लभ स्कॉच व्हीस्की की मात्र 100 बोतलें ही भारत आयात की, इसकी एक बोतल की कीमत 18 हजार 400 रुपए थी, आपको आश्यर्च होगा कि ये सारी बोतलें एक ही दिन में बिक गईं। इसी तरह डीएजीओ नाम की मल्टीनेशनल कंपनी की मास्टर स्ट्रोक नाम की व्हीस्की के 100 दिन में एक लाख केरेट बिक गए। इस तरह से शराब बेचने और पीने-पिलाने का सिलसिला जो हमारे देश में बेतहाशा शुरू हो गया है, सच मानो, अब यह रुकने वाला नहीं है।
शराब का समीकरण बहुत ही पेचीदा है, कई लोग तो इसे केवल पिलाने में ही अपना स्वार्थ खोजते हैं। कई लोग पार्टियाँ ही इसलिए करते हैं, क्योंकि उसमें शराब बहती है। कई लोग रहस्य खुलवाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं, कई लोग पिलाना अपनी शान समझते हैं, कई लोग अपना गम भूलने के लिए इसका सहारा लेते हैं, कई लोग इसे तनाव दूर करने का संसाधन समझते हैं। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इसे पीने के लिए कोई उचित कारण नहीं है। खुशी और गम में बराबर इसका सेवन होता है। कई लोग इसे ही जिंदगी मानकर पीते हैं और अपनी जीवन यात्रा बीच में ही पूरी कर लेते हैं।
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. बोतल और प्याला देखकर तो जी ललचा रहा है.वैसे है यह बहुत बुरी चीज.

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  2. डॉ. महेश परिमल जी जब खुशी दिल मे हो तो इन चीजो की जरुरत ही नही रहती, हमारे यहां कई बार पार्टी होती हे लेकिन शराब, शेपेन कुछ भी नही चलता,अगर किसी ने पीनी हे तो एक गिलास वियार ले लेता हे, वरना तो चाय ओर काफ़ी ही चलती हे, भारत की बात ओर हे बहां हम तरक्की जो कर रहे हे, इस लिये हर वो बात जो अंग्रेज करते हे, वो तरक्की हे तो हम क्यो ना करे ?

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  3. यह सब तो शराब की कहाँ, वाईन की नुमाईश है..काहे शराब बदनाम हो चली. :)

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