मंगलवार, 22 अप्रैल 2008

समाज को संवेदनहीन बनाता शोर


डा. महेश परिमल
सुप्रीमकोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि शोर को कम से कम किया जाए. रात में किसी भी प्रकार का ध्वनि प्रसारक यंत्रों का प्रयोग न किया जाए, शहरों में आने वाले वाहनों में तेज या चीखने वाले हार्न का इस्तेमाल बिलकुल भी न किया जाए, पर कोर्ट के अन्य आदेशों की तरह इस आदेश की भी खुलेआम धाियाँ उड़ाई जा रही है. शोर बढ़ता ही जा रहा है, डी जे संस्कृति में साँस लेने वाली यह पीढ़ी शायद यह नहीं जानती कि आज भले ही वे अपने माता-पिता की आवाज सुन रहे हैं, पर यही हालात रहे , तो वह दिन दूर नहीं, जब वे अपने बच्चों की आवाज नहीं सुन पाएँगे. शायद इस स्थिति को कोई स्वीकार नहीं करना चाहेगा, पर आने वाला समय तो यही कह रहा है.
हम बीसवीं सदी को शोरगुल और कोलाहल की सदी के रूप में जानते थे और अब तो इक्कीसवीं सदी की शुरुआत हो गई है लेकिन यह शोर बढ़ता ही जा रहा है. यदि इस शोरगुल, चीख-चिल्लाहट पर नियंत्रण नहीं किया गया तो निकट भविष्य में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे.
प्रत्येक व्यक्ति के लिए शोर और शोरगुल के मापदंड अलग-अलग हो सकते हैं. इसे सभी के लिए एक ही प्रकार से परिभाषित करना मुश्किल है. फिर भी गलत जगह पर, गलत अवसर पर, एकाएक, अनोखे ढंग से आने वाली आवाज को शोर कहा जा सकता है. दूसरे अर्थो में कहें, तो अनावश्यक, असुविधाजनक और निरर्थक आवाजों का जमावड़ा शोर, शोरगुल, चीख-चिल्लाहट की श्रेणी में आता है.
शोर अथवा शोरगुल का उद्भव सड़क पर दौड़ने वाले वाहनों जैसे कि कार, ट्रक, स्कूटर, ट्रेक्टर, बस, मोटर-सायकल और रेलवे ट्रेन, विमान, हेलीकॉप्टर, प्रेशर हार्न, लाऊड स्पीकर इत्यादि से होता है. मेला, प्रदर्शनी और अन्य उत्सवों में भी शोर एक गंभीर समस्या के रूप में हमारे सामने आता है. व्यस्त बाजारों, भीड़ वाले स्थानों, सब्जी मार्केट, व्यापारिक मेले आदि अनेक स्थान ऐसे हैं, जहाँ शोर सुनाई पड़ता है. फैक्ट्रियों और कारखानों में भी शोर का साम्राज्य होता है. घर, हॉटल-रेस्तराँ, सार्वजनिक स्थानों में पॉप म्यूंजिक या अन्य गीत-संगीत का शोर होता है. इसके अतिरिक्त जहाँ लोगों की भीड़ होगी वहाँ उनकी बातचीत का शोर होगा. कुल मिलाकर शोर से बचा नहीं जा सकता.
रेलवे स्टेशन, बस स्टेन्ड, एयरपोर्ट, सिनेमा-थियेटर के बाहर, मेला, बाजार, मंदिर, बरात आदि स्थानों पर होने वाला शोर जनमानस को प्रभावित करता है. किसी स्थान पर तेज आवांज में बजने वाला लाऊड स्पीकर, डी.जे. म्यूंजिक सिस्टम आदि का शोर कानों को प्रभावित करता है. रेडियो, टी.वी., वी.सी.डी. को ऊँची आवांज में चलाना भी कानों के लिए नुकसानदायक होता है. अनेक फैक्ट्रियाँ, कारखानों में मशीनों से आने वाली निरर्थक आवाजें वहाँ काम करते व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर असर करती है.

वैज्ञानिकों के अनुसार यदि इसी प्रकार ये शोर बढ़ता रहा, तो आने वाले दो-तीन दशकों में हमारे राष्ट्र में बहरे लोगों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृध्दि होगी. इतने अधिक नियंत्रण, नियम एवं कानून होने के बावजूद शहरों में शोर के प्रदूषण पर कोई कमी नहीं आ रही है. उल्टे इसमें लगातार वृध्दि हो रही है. मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कानपुर, पुणे, अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत जैसे औद्योगिक शहरों में शोर की समस्या दिन ब दिन विकराल रूप लेती जा रही है. अब तो इस शोररूपी राक्षस ने छोटे शहरों में भी अपने पाँव पसारने शुरु कर दिए हैं. कोलाहल का स्तर प्रति दस वर्षों में दोगुना हो रहा है. पिछले दस वर्षो में जिस गति से शोर बढ़ा है, उसकी गति पर यदि नियंत्रण नहीं किया गया, तो स्थिति गंभीर से गंभीरतम होती जाएगी.
विश्व आरोग्य संस्था ने स्वास्थ्य की दृष्टि से आवाज की तीव्रता को दिन में अधिक से अधिक 55 डेसिबल और रात्रि में 45 डेसिबल को उचित माना है. डेसिबल आवाज की तीव्रता मापने की इकाई है. डेसिबल मापक्रम में शून्य स्तर पर भी सामान्य व्यक्ति आवाज का अनुभव कर सकता है. सामान्य से अधिक स्तर की आवाज की तीव्रता शरीर को नुकसान पहुँचाती है. विशेषकर कानों पर इसका घातक असर होता है. आइए शोर के दुष्प्रभाव के विषय में विस्तार से जानें-
 एकाएक अत्यधिक तीव्र गति से होने वाली आवांज विशेषकर 60 डेसिबल से अधिक आवांज की तीव्रता जैसे कि जेट विमान की आवांज, बम फूटने की आवांज आदि कान के पर्दे को फाड़ सकती है. इसके कारण हमेशा के लिए बहरापन आ सकता है.
 एकाएक तेज शोर होने पर कई व्यक्तियों में कुछ घंटों के लिए बहरापन आ सकता है.
 3. शोरगुल वाले वातावरण में हमेशा रहने के कारण कान का अंदर का भाग कमजोर हो सकता है. कान का आंतरिक भाग मुख्य रूप से दो कार्य करता है- श्रवण शक्ति तथा शरीर का संतुलन बनाए रखना. हमेशा शोर के प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति में बहरापन, चक्कर आना, ऑंखों के आगे अँधेरा छाना आदि लक्षण दिखाई देते हैं. कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों एवं कर्मचारियों में ये समस्या अधिक देखने को मिलती है.
 4. जो व्यक्ति इस प्रकार के शोर वाले वातावरण में रहते हैं, उनमें ऊँचा सुनने की आदत पाई जाती है. धीमी आवाज सुनने की काबिलियत वे खो बैठते हैं. ये लोग स्वयं भी ऊँची आवांज में ही बातें करते हैं.
 5. शोर और कोलाहल की जानलेवा असर केवल कानों को ही प्रभावित नहीं करती किंतु शरीर के अन्य भागों पर भी इसका घातक असर होता है. शोर के कारण बेचैनी, घबराहट, मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, डिप्रेशन, ब्लडप्रेशर, हार्ट अटैक आदि अनेक समस्याएँ जन्म लेती हैं. हमेशा शोर वाले वातावरण में रहने के कारण मनुष्य के स्वभाव में भी परिवर्तन आता है
 6. अधिक शोर वाले वातावरण में रहने के कारण ऑंखों की पुतलियाँ भी फैल जाती है. नतीजा यह होता है कि बारीक काम करते समय ऑंखें एकाग्र नहीं हो पाती, रंग पहचानने में परेशानी होती है और रात को देखने में भी मुश्किल होती है.
 7. शाला में बच्चों पर किए गए प्रयोगों के आधार पर यह परिणाम सामने आया कि जो स्कूल अधिक कोलाहल वाले स्थानों पर होते हैं, वहाँ के बच्चों में अभ्यास में एकाग्रता नहीं आ पाती. सड़को पर होने वाले शोर का असर उनकी याददाश्त पर होता है. उनमें सिरदर्द, गुस्सा, बात-बात में लड़ाई-झगड़ा आदि बातें सामान्य हो जाती है.
 8. कारखानों में मशीनी शोरगुल के बीच काम करने वाले लोगों में मानसिक तनाव, सिरदर्द, कम सुनाई पड़ना, एकाग्रता का अभाव, कार्यक्षमता में कमी, चक्कर आना आदि समस्याएँ आती हैं. इसके अतिरिक्त उनमें श्वसन तंत्र एवं पेट के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव में भी झगड़ालू प्रवृति एवं छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा दिखाई देता है.
 9. शोर का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है. अमेरिका में केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में डा. जोन्स ने लगभग दो लाख बच्चों पर शोध करके यह निष्कर्ष निकाला कि शांत वातावरण में रहने वाली स्त्रियों की अपेक्षा शोर वाले वातावरण में रहने वाली स्त्रियों के नवजात शिशुओं मे अनेक प्रकार की शारीरिक विकृतियाँ पाई जाती है. इसके अलावा शोरगुल वाले वातावरण में रहने वाली गर्भवती स्त्रियों में प्रि मेच्योर डिलीवरी होने की संभावना भी अधिक रहती है.
 10. शोर के कारण स्मरणशक्ति में भी कमी आती है. एकाएक होने वाली आवाज जैसे कि बाइक या अन्य वाहन के हार्न की आवांज, किसी के रोने या चीखने की आवांज, विमान या बम की आवांज के कारण वार्तालाप पर प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति एक क्षण को यह भूल जाता है कि वह किस विषय पर बात कर रहा था, इसका सीधा प्रभाव याददाश्त पर पड़ता है.
 अधिकतर स्त्रियों में शोर के कारण थकान, चक्कर आना, घबराहट, उल्टी, सिरदर्द, माइग्रेन, नींद न आना आदि समस्याएँ पैदा होती है.
 शोर के कारण नींद न आना एक सामान्य बात है, इससे आगे चल कर एकाग्रता में कमी आती है और कार्य क्षमता पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है.
 शोर के कारण मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, स्नायु तंत्र, हृदय, पाचन तंत्र आदि प्रभावित होते हैं. शोध से यह बात भी सामने आई है कि अधिक शोर के कारण रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ जाता है जिससे हृदयरोग, एन्जाइना, हार्ट अटैक, रक्तचाप आदि का खतरा बढ़ जाता है.
इस तरह से देखा जाए तो आज हम किसी भी तरह से शोर से बच ही नहीं पा रहे हैं. वह हमारे जीवन का एक आवश्यक अंग बनकर रह गया है. हमें खुशी होती है, तो हम उसे शोर के माध्यम से ही व्यक्त करते हैं. अब तो दु:ख के समय भी हमें शोर की आवश्यकता पड़ने लगी है. हमारे कान इसके इतने आदि हो गए हैं कि जब कहीं शोर न हो रहा हो, तो वह स्थिति हमें नागवार गुजरने लगती है. इस शोर ने समाज को कुछ भी नहीं दिया, बस खुशियाँ जाहिर करने का माद्दा बनकर रह गया. लेकिन इसने समाज से वह सब कुछ छीन लिया, जो हमारे भीतर संवेदना के रूप में रहता था. इस शोर ने हमें संवेदनहीन बनाकर रख दिया है.
डा. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. ठीक कहा आपने..लेकिन इतने शोर में भी इंसान जाने क्यों तनहा हो गया है...

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  2. हम क्या कहें.. परेशान हो चुका हूं.. मैं जहां रहता हूं वो चेन्नई बैंगलोर मेन हाईवे से सटा हुआ है और चेन्नई के पॉश इलाके में से आता है और यहां सुबह् 4 बजे से लेकर रात 2 बजे तक चिल्ल-पों मची रहती है.. हम इन गर्मियों में भी खिड़की दरवाजे बंद करके रहते हैं और यहां से जा भी नहीं सकते हैं क्योंकि एक तो चेन्नई में उत्तरी भारतीय को जल्दी कोई घर नहीं देता है उपर से बैचलर को तो कतई नहीं..

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