शुक्रवार, 23 मई 2008

अपराध का अवैध हथियारों से गहरा संबंध


डॉ. महेश परिमल
अपराध आज समाज का एक आवष्यक हिस्सा बनकर रह गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में तो यह बच्चों को घुट्टी में मिलता है। यहाँ हथियार रखना बच्चों का खेल है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि हथियार से दूसरों को नुकसान पहुँचता है। आज मीडिया अपराध समाचारों के बिना पंगु है। जिस अखबार और टीवी चैनल के पास अपराध की खबर न हो, तो उसका टीआरपी बहुत ही कम होता है। इसीलिए ही कहा जाता है कि अपराध आज समाज का एक आवश्यक अंग है, इसके बिना तो जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। एक सर्वेक्षण के अनुसार सन् 2005 में देशमें कुल 5643 हत्याएँ हुई, इसमें से 90 प्रतिशत हत्याएँ गैरकानूनी शस्त्रों से की गई। जब देशमें इतने असंवैधानिक शस्त्र हैं, तो क्या लायसेंसी शस्त्र बिलकुल नहीं हैं? प्रश्न स्वाभाविक है, पर उत्तर उतना ही कठिन, क्योंकि पिस्तौल, रिवाल्वर, गन, राइफल्स, कारतूस और दूसरे शस्त्रों का उत्पादन और विक्रय सरकार स्वयं ही करती है। हमारे देशमें शस्त्र खरीदना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए लोग अवैध शस्त्रोें की ओर आकर्शित होते हैं। ये शस्त्र अपेक्षाकृत सस्ते भी होते हैं, तो क्यों न इसे ही लिया जाए, इस सोच से वशीभूत होने वाले आज अपराध की दुनिया में अपना नाम कमा रहे हैं।
हमारी सरकार की मूर्खता के दो उदाहरण यह प्रस्तुत है- दिल्ली में हीरे-जवाहरात के व्यापारी की मौत के बाद उसकी बेटी से कारोबार सँभाला। पिता के नाम पर एक लायसेंसी रिवाल्वर थी, बेटी से उस रिवाल्वर को अपने नाम पर कराना चाहा, इसके लिए बाकायदा उसने आवेदन किया। महीनों तक चक्कर लगाने के बाद पुलिस से उसे रिवाल्वर रखने की अनुमति तो दी, पर उसके कारतूस के लिए अनुमति नहीं दी, अब आप ही सोचें कि यदि मुसीबत के समय उसे सचमुच ही रिवाल्वर की आवश्यकता आ पड़ी, तो क्या वह बिना कारतूस के अपनी रक्षा कर पाएगी? दूसरा उदाहरण- राश्ट्रीय या ओलम्पिक जैसे खेलों में शामिल होने वाले निशानेबाजों को उत्तम क्वालिटी की इम्पोटर्ेड गन की आवश्यकता होती है। पर इन्हें ये गन आसानी से उपलब्ध नहीं होती। हाँ राजनेताओं और अपराध की दुनिया के लोगों को इस तरह के हथियार आसानी से मिल जाते हैं, पर देशके निशानेबाजों को नहीं मिल पाती। नेशनल राइफल्स ऐसोसिएशन के महामंत्री बलजीत सिंह सेठी रोशभरे स्वर में कहते हैं कि यदि आप विश्वस्तर की प्रतिस्पर्धा जीत कर आ जाओ, तो एक बार संभव है कि आपको गन मिल जाए, पर विश्व स्तर की स्पर्धा को जीतने के लिए भी तो लगातार प्रेक्टिस की आवश्यकता होती है, इसके लिए भी तो गन चाहिए, पर इतनी छोटी सी बात हमारी सरकार की समझ में नहीं आती। यह एक हास्यास्पद स्थिति है।

आज से कुछ वर्शपूर्व हमारे देशके सैनिकों के हाथों में कबाड़ में रखे जाने वाले शस्त्र हुूआ करते थे। अब स्थिति में थोड़ा सुधार आया है और अब जवानों, अर्ध सैनिक बलों, कमांडो, सिनियर पुलिस अधिकारियों और वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे स्टॉफ के पास ए. के. 47 दी जाने लगी है। कुछ वर्शपूर्व तक स्थिति काफी खराब थी। कारगिल युध्द के बाद एक सैनिक अधिकारी ने एक अखबार को दिए गए साक्षात्कार में यह बताया कि युध्द के दौरान एक स्थिति ऐसी भी आई थी, जब मेरे हथियार ने काम करना बंद कर दिया था, सामने से गोलियों की बौछारें आ रहीं थीं, मैं किस तरह से बचा, इसका मुझे आश्चर्य है। बहुत ही विकट स्थिति थी, आज जब भी उस स्थिति को याद करता हूँ, तो मेरी रुह ही काँप जाती है।
अपराधों पर अंकुशरखने के लिए सरकार ने सभी तरह के हथियारों का निर्माण और विक्रय का काम अपने हाथ में रखा है, दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेशमें देशी पिस्तौल और तमंचे बनाने वाले कारखाने दिन-रात चल रहे हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सरकारी शस्त्रों की अपेक्षा ये हथियार अधिक विश्वसनीय होते हैं। ये अच्छा काम करते हैं और समय पर धोखा नहीं देते हैं, यही इनकी विशेशता होती है। सरकारी हथियार आखिर क्यों नहीं बिकते? यह सवाल आसानी से समझा जा सकता है। पहली बात तो यह है कि सरकार खुले रूप में हथियार बेचना ही नहीं चाहती। दूसरी बात यह है कि इसके लायसेंस लेने की प्रक्रिया काफी पेचीदा है। इसके अलावा ये काफी महँगी साबित होती है।

आज पूरे विश्व में आतंकवाद पाँव पसार चुका है, इस स्थिति में देशकी सुरक्षा के साथ स्वयं की सुरक्षा भी एक पेचीदा सवाल है। सरकार जब शस्त्र का लायसेंस नहीं देती, तो लोग विदेशी शस्त्रों की ओर आकर्शित होते हैं। लेकिन सरकार यहाँ भी नहीं चूकी, उसने विदेशी शस्त्रों पर तीन गुना इम्पोर्ट डयूटी वसूल करती है। गन की कीमत यदि 60 हजार रुपए है, तो उस पर एक लाख 80 हजार रुपए से लेकर दो लाख रुपए तक आयात डयूटी वसूल करती है। तब फिर लोग क्यों न मेड इन उत्तर प्रदेशया फिर मेड इन बिहार के शस्त्राें की तरफ आकर्शित हों? सरकार की ढीली नीतियों के कारण ही आज अवैध शस्त्रों का बाजार गरमाया हुआ है। एक सेवानिवृत सैनिक अधिकारी का कहना है कि हमारे सरकारी कारखाने में निर्मित ब्रांड न्यू पिस्तौल से बेहतर है 1960 के जमाने की विदेशी पिस्तौल। यह बेहतर परिणाम देती है। हमारे ही देशमेें बनने वाली 60 हजार रुपए में बिकने वाली गन अंतरराश्ट्रीय बाजार में छह हजार रुपए में भी कोई खरीदने को तैयार नहीं है। यह है भारतीय सेना के लिए बनी पिस्तौल की स्थिति। ऐसे में भला सरकार पर कैसे विश्वास किया जाए कि वह अच्छे हथियार का निर्माण कर सकती है।
आजकल जो भी अपराधी मारा जाता है या फिर गिरोह पकड़ा जाता है, उसके पास से अवैध हथियारों का जखीरा ही पकड़ा जाता है। ये सारे हथियार हमारे देशके दो विशेशराज्यों में बने होते हैं, सारे अपराधी यहीं से हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेते हैं, फिर बाद में हथियार भी खरीदते हैं। हमारे देशमें सबसे अधिक हथियार या तो राजनेताओं के पास हैं, या फिर फिल्म स्टार के पास। अब यह बात अलग है कि इनमें से कितनों को हथियार चलाना आता है। वैसे देखा जाए तो लायसेंसी हथियार अक्सर आत्महत्या करने के ही काम आते हैं। इससे सुरक्षा हो नहीं पाती। जेसिका लाल और भाजपा नेता प्रमोद महाजन की हत्या लायसेंसी हथियार से की गई थी, पर इस तरह के ऑंकड़े बहुत कम मिलते हैं। इस दिशा में सरकार जितनी सख्ती करती है, यह धंधा उतना ही फलता-फूलता है। जहाँ सरकार की विफलता होती हे, यह धंधा वहीं सफल होता है। आज पूरे देशमें जितने लायसेंसी हथियार हैं, उससे कई गुना अवैध हथियार हैं, जो अपराध की दुनिया में फैले हुए हैं।
; डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं बस दो लाईनों को ही पढ़कर कमेंट कर रहा हूं..
    आप किस बिहार कि बात कर रहे हैं? मैं भी उसी बिहार में रहा हूं, मगर मुझे तो कुछ ऐसा नजर नहीं आया? शायद आप भी मिडिया की उड़ाई बातों में आ गये हैं जिसमें बिहार को बेच कर वो टी आर पी का खेल खेलते हैं..

    मेरी बात को अन्यथा ना लें.. आपका बहुत सम्मान है मेरे मन में.. :) बस मन में आया सो लिख दिया.. बाकी पोस्ट को अब पढता हूं..

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  2. hamesa ganda samaj hi najar aata hai..usi bihar ke log IT aur UPSC me parcham lahara rahen hain yah nhi dikhta.yah dogla drisikon kyon?

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