सोमवार, 2 जून 2008

मासूमों के काँधों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बंदूक



डॉ. महेशपरिमल
आज हमारे में चुपके-चुपके बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ रहा है। इसे हम अभी तो नहीं समझ पा रहे हैं, पर भविष्य में निश्चित रूप से यह हमारे सामने आएगा। इस बार इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमारी मानसिकता पर हमला करने के लिए मासूमों का सहारा लिया है। हमारे मासूम याने वे बच्चे, जिन पर हम अपना भविष्य दाँव पर लगाते हैं और उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे हमारा सहारा बनें। सहारा बनने की बात तो दूर, अब तो बच्चे अपने माता-पिता को बेवकूफ समझने लगे हैं और उनसे बार-बार यह कहते पाए गए हैं कि पापा, छोड़ दो, आप इसे नहीं समझ पाएँगे। इस पर हम भले ही गर्व कर लें कि हमारा बच्चा आज हमसे भी अधिक समझदार हो गया है, पर बात ऐसी नहीं है, उसकी मासूमियत पर जो परोक्ष रूप से हमला हो रहा हैं, हम उसे नहीं समझ पा रहे हैं। आज घर में नाश्ता क्या बनेगा, इसे तय करते हैं आज के बच्चे। तीन वर्षका बच्चा यदि मैगी खाने या पेप्सी पीने की जिद पकड़ता है, तो हमें समझ लेना चाहिए कि यह अनजाने में उसके मस्तिष्क में विज्ञापनों ने हमला किया है। मतलब नाश्ता क्या बनेगा, यह माता-पिता नहीं, बल्कि कहीं बहुत दूर से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तय कर रही हैं।
मैंने पहले ही कह दिया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बहुत ही धीरे से चुपके-चुपके हमारे निजी जीवन में प्रवेश कर रही हैं, इस बार उन्होंने निशाना तो हमें ही बनाया है, पर इस बार उन्होंने काँधे के रूप में बच्चों को माध्यम बनाया है। यह उसने कैसे किया, आइए उसकी एक बानगी देखें-इन दिनों टीवी पर नई कार का विज्ञापन आ रहा है, जिसमें एक बच्चा अपने पिता के साथ कार पर कहीं जा रहा है, थोड़ी देर बाद वह अपने गंतव्य पहुँचकर कार के सामने जाता है और अपने दोनों हाथ फैलाकर कहता है '' माय डैडीड बिग कार''। इस तरह से अपनी नई कार को बेचने के लिए बच्चों की आवश्यकता कंपनी को आखिर क्यों पड़ी? जानते हैं आप? शायद नहीं, शायद जानना भी नहीं चाहते। टीवी और प्रिंट मीडिया पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों में नारी देह के अधिक उपयोग या कह लें दुरुपयोग को देखते हुए कतिपय नारीवादी संस्थाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। नारी देह अब पुरुषों को आकर्षित नहीं कर पा रही है, इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बच्चों का सहारा लिया है। अब यह स्थिति और भी भयावह होती जा रही है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब बच्चों में अपना बाजार देख रहीं हैं। आजकल टीवी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे हैं, जिसमें उत्पाद तो बड़ों के लिए होते हैं, पर उसमें बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। घर में नया टीवी कौन सा होगा, किस कंपनी का होगा, या फिर वाशिंग मशीन, मिक्सी किस कंपनी की होगी, यह बच्चे की जिद से तय होता है। सवाल यह उठता है कि जब बच्चों की जिद के आधार पर घर में चीजें आने लगे, तो फिर माता-पिता की आवश्यकता ही क्या है? जिस तरह से हॉलीवुड की फिल्में हिट करने में दस से पंद्रह वर्षके बच्चों की भूमिका अहम् होती है, ठीक उसी तरह आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बच्चों के माध्यम से अपने उत्पाद बेचने की कोशिश में लगी हुई हैं। क्या आप जानते हैं कि इन मल्टीनेशनल कंपनियों ने इन बच्चों को ही ध्यान में रखते हुए 74 करोड़ अमेरिकन डॉलर का बाजार खड़ा किया है। यह बाजार भी बच्चों के शरीर की तरह तेजी से बढ़ रहा है। इस बारे में मार्केटिंग गुरुओं का कहना है कि किसी भी वस्तु को खरीदने में आज के माता-पिता अपने पुराने ब्रांडों से अपना लगाव नहीं तोड़ पाते हैं, दूसरी ओर बच्चे, जो अभी अपरिपक्व हैं, उन्हें अपनी ओर मोड़ने में इन कंपनियों को आसानी होती है। नई ब्रांड को बच्चे बहुत तेजी से अपनाते हैं। इसीलिए उन्हें सामने रखकर विज्ञापन बनाए जाने लगे हैं, आश्चर्य की बात यह है कि इसके तात्कालिक परिणाम भी सामने आए हैं। याने यह मासूमों पर एक ऐसा प्रहार है, जिसे हम अपनी ऑंखों से उन पर होता देख तो रहे हैं, पर कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि आज हम टीवी के गुलाम जो हो गए हैं। आज टीवी हमारा नहीं, बल्कि हम टीवी के हो गए हैं।
हाल ही में एक किताब आई है ''ब्रांड चाइल्ड''। इसमें यह बताया गया है कि 6 महीने का बच्चा कंपनियों का ''लोगो'' पहचान सकता है, 3 साल का बच्चा ब्रांड को उसके नाम से जान सकता है और 11 वर्षका बालक किसी निश्चित ब्रांड पर अपने विचार रख सकता है। यही कारण है कि विज्ञापनों के निर्माता '' केच देम यंग '' का सूत्र अपनाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के बच्चे सोमवार से शुक्रवार तक रोज आमतौर पर 3 घंटे और शनिवार और रविवार को औसतन 3.7 घंटे टीवी देखते हैं। अब तो कोई भी कार्यक्रम देख लो, हर 5 मिनट में कॉमर्शियल ब्रेक आता ही है और इस दौरान कम से कम 5 विज्ञापन तो आते ही हैं। इस पर यदि क्रिकेट मैच या फिर कोई लोकप्रिय कार्यक्रम चल रहा हो, तो विज्ञापनों की संख्या बहुत ही अधिक बढ़ जाती है। इस तरह से बच्चा रोज करीब 300 विज्ञापन तो देख ही लेता है, यही विज्ञापन ही तय करते हैं कि उसकी लाइफ स्टाइल कैसी होगी। इस तरह से टीवी से मिलने वाले इस आकाशीय मनोरंजन की हमें बड़ी कीमत चुकानी होगी, इसके लिए हमें अभी से तैयार होना ही पड़ेगा।

समय बदल रहा है, हमें भी बदलना होगा। इसका आशय यह तो कतई नहीं हो जाता कि हम अपने जीवन मूल्यों को ही पीछे छोड़ दें। पहले जब तक बच्चा 18 वर्षका नहीं हो जाता था, तब तक वह अपने हस्ताक्षर से बैंक से धन नहीं निकाल पाता था। लेकिन अब तो कई ऐसी निजी बैंक सामने आ गई हैं, जिसमें 10 वर्षके बच्चे के लिए क्रेडिट कार्ड की योजना शुरू की है। इसके अनुसार कोई भी बच्चा एटीएम जाकर अधिक से अधिक एक हजार रुपए निकालकर मनपसंद वस्तु खरीद सकता है। सभ्रांत घरों के बच्चों का पॉकेट खर्च आजकल दस हजार रुपए महीने हो गया है। इतनी रकम तो मध्यम वर्ग का एक परिवार का गुजारा हो जाता है। सभ्रांत परिवार के बच्चे क्या खर्च करेंगे, यह तय करते हैं, वे विज्ञापन, जिसे वे दिन में न जाने कितनी बार देखते हैं। चलो, आपने समझदारी दिखाते हुए घर में चलने वाले बुध्दू बक्से पर नियंत्रण रखा। बच्चों ने टीवी देखना कम कर दिया। पर क्या आपने कभी उसकी स्कूल की गतिविधियों पर नजर डाली? नहीं न....। यहीं गच्चा खा गए आप, क्योंकि आजकल स्कूलों के माध्यम से भी बच्चों की मानसिकता पर प्रहार किया जा रहा है। आजकल तो स्कूलें भी हाईफाई होने लगी है। इन स्कूलों में बच्चों को भेजना किसी जोखिम से कम नहीं है। मुम्बई की एक नर्सरी स्कूल के संचालकों ने बच्चों फील्ड ट्रिप के बहाने एक आलिशान शॉपिंग मॉल में ले गए। यहाँ आकर बच्चों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विभिन्न उत्पादों के बारे में जानकारी ली। इसमें शामिल शिक्षकों ने भी अपने ज्ञान की अभिवृद्धि की। एक और नर्सरी स्कूल के बच्चों को शरीर की पाँच इंद्रियों के बारे में बताने के लिए मेकडोनाल्ड्स के रेस्टॉरेंट में ले जाया गया। ऐसे उदाहरणों से आप सभी समझ रहे होंगे कि किस तरह से इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने शाला के संचालकों और प्राचार्यों पर डोरे डालकर उन्हें अपने उत्पादों का संवाहक बना रहे हैं। ये कंपनियाँ अब उन्हें प्रलोभन देकर अपने उत्पादों को सीधे स्कूलों में ही बेचना शुरु कर दिया है। जिन स्कूलों में ये नियम होता है कि यूनिफार्म, जूते, कॉपी-किताबें आदि स्कूल से ही लिए जाएँ, वहाँ इसी तरह का खेल खेला जाता है। कोलगेट कंपनी तो आजकल स्कूलों में दंत विशेषज्ञों को लेकर पहुँच ही रही है। जहाँ विशेषज्ञ बच्चों के दाँतों का परीक्षण कर उन्हें कोलगेट करने की सलाह देते हैं, साथ ही एक छोटा सा ब्रष और पेस्ट की टयूब भी देते हैं, ताकि बच्चे को उसका चस्का लग जाए। इस तरह से बच्चों के दिमाग पर उपभोक्तावाद का आक्रमण हो रहा है। इससे तो पालक किसी भी तरह से अपने बच्चों को बचा ही नहीं सकते।
अब यह प्रश्न उठता है कि क्या आजकल स्कूलें बच्चों का ब्रेन वॉश करने वाली संस्थाएँ बनकर रह गई हैं? बच्चे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ग्राहक बनकर अनजाने में ही पश्चिमी संस्कृति के जीवनमूल्यों को अपनाने लगे हैं। यह चिंता का विषय है। पहले सादा जीवन उच्च विचार को प्राथमिकता दी जाती थी, पर अब यह हो गया है कि जो जितना अधिक मूल्यवान चीजों को उपयोग में लाता है, वही आधुनिक है। वही सुखी और सम्पन्न है। ऐसे मेें माता-पिता यदि बच्चों से यह कहें कि आधुनिक बनने के चक्कर में वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं, तो बच्चों का यही उत्तर होगा कि आप लोग देहाती ही रहे, आप क्या जानते हैं इसके बारे में। ऐसे में इन तथाकथित आधुनिक बच्चों से यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपने वृध्द माता-पिता की सेवा करेंगे?
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. संजय तिवारी2 जून 2008 को 5:39 pm

    सही पकड़. और कुछ न सही तो लिखना पढ़ना तो जारी ही रहे.

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  2. आपकी टिप्पणियों के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद.

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