शनिवार, 7 जून 2008

चलें बचपन के गाँव में…



भारती परिमल
आओ चलें बचपन के गाँव में, यादों की छाँव में... कलकल करती लहरों से खेलें, कच्ची अमियाँ और बेर से रिश्ता जोड़े। रेत के घरोंदे बनाकर उसे अपनी कल्पनाओं से सजाएँ। कड़ी धूप में फिर चुपके से निकल जाएँ घर से बाहर और साथियों के संग लुकाछिपी का खेल खेलें। सावन की पहली फुहार में भीगते हुए माटी की सौंधी महक साँसों में भर लें। ठंड की ठिठुरन, गरमी की चुभन और भादों का भीगापन सब कुछ फिर ले आएं चुराकर और जी लें हर उस बीते पल को, जो केवल हमारी यादों में समाया हुआ है।
वो सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों और अजान की आवाज के साथ खुलती नींद और दूसरे ही क्षण ठंडी बयार के संग आता आलस का झोंका, जो गठरी बन बिस्तर मेें दुबकने को विवश कर देता, वो झोंका अब भी याद आता है। माँ की आवाज के साथ.. खिड़की के परदों के सरकने से झाँकती सूरज की पहली रश्मियों के साथ.. दरवाजे के नीचे से आते अखबार की सरसराहट के साथ.. चिड़ियों की चीं चीं के साथ.. दादी के सुरीले भजन के साथ.. दादा के हुक्के की गुड़गुड़ के साथ.. सजग हुए कानों को दोनों हाथों से दबाए फिर से ऑंखे नींद से रिश्ता जोड़ लेती थी। ऑंखों और नींद का यह रिश्ता आज भी भोर की बेला में गहरा हो जाता है। इसी गहराई में डूबने आओ एक बार फिर चलें बचपन के गाँव में।
बरगद की जटाओं को पकड़े हवाओं से बातें करना.. कच्चे अमरुद के लिए पक्की दोस्ती को कट्टी में बदलना.. टूटी हुई चूड़ियों को सहेज कर रखना.. बागों में तितलियाँ और पतंगे पकड़ना.. गुड्डे-गुड़िया के ब्याह करवाना.. पल में रूठ कर क्षण में मान जाना.. बारिश की बूँदों को पलकों पे सजाना.. पेड़ों से झाँकती धूप को हथेलियों में भरने की ख्वाहिश करना.. बादल के संग उड़कर परियों के देश जाने का मन करना.. तारों में बैठ कर चाँद को छूने की चाहत रखना.. बचपन कल्पना के इन्हीं इंद्रधनुषी रंगों से सजा होता है। सारी चिंताओं और प्रश्ों से दूर ये केवल हँसना जानता है, खिलखिलाना जानता है, अठखेलियाँ करना और झूमना जानता है। तभी तो जीवन की आपाधापी में हारा और थका मन जब-जब उदास होता है, यही कहता है- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.. बीते हुए दिन की कल्पना मात्र से ही ऑंखों के आगे बचपन के दृश्य सजीव होने लगते हैं। बचपन एक मीठी याद सा हमारे आसपास मंडराने लगता है। एकांत में हमारी ऑंखों की कोर में ऑंसू बनकर समा जाता है, तो कभी मुस्कान बन कर होठों पर छा जाता है। कभी ये बचपन चंचलता का लिबास पहने हमें वर्तमान में भी बालक सा चंचल बना देता है, तो कभी सागर की गहराइयों सा गंभीर ये जीवन क्षण भर के लिए इसकी एक बूँद में ही समा जाने को व्याकुल हो जाता है।
एक बार किसी विद्वान से किसी महापुरुष ने पूछा कि यदि तुम्हें ईश्वर वरदान माँगने के लिए कहे, तो तुम क्या माँगोगे? विद्वान ने तपाक से कहा- अपना बचपन। निश्चित ही ईश्वर सब-कुछ दे सकता है, लेकिन किसी का बचपन नहीं लौटा सकता। सच है, बचपन ऐसी सम्पत्ति है, जो एक बार ही मिलती है, लेकिन इंसान उसे जीवन भर खर्च करता रहता है। बड़ी से बड़ी बातें करते हुए अचानक वह अपने बचपन में लौट जाएगा और यही कहेगा कि हम बचपन में ऐसा करते थे। यहाँ हम का आशय उसके अहम् से कतई नहीं है, हम का आशय वे और उसके सारे दोस्त, जो हर कौम, हर वर्ग के थे। कोई भेदभाव नहीं था, उनके बीच। सब एक साथ एक होकर रहते और मस्ती करते। हम सभी का बचपन बिंदास होता है। बचपन की यादें इंसान का पीछा कभी नहीं छोडती, वह कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाए, बचपन सदैव उसके आगे-आगे चलता रहता है। बचपन की शिक्षा भी पूरे जीवन भर साथ रहती है। बचपन का प्यार हो या फिर नफरत, इंसान कभी नहीं भूलता। बचपन की गलियाँ तो उसे हमेशा याद रहती हैं, जब भी वक्त मिलता, इंसान उन गलियों में विचरने से अपने को नहीं रोक सकता। बचपन में किसी के द्वारा किया गया अहसान एक न भूलने वाला अध्याय होता है। वक्त आने पर वह उसे चुकाने के लिए तत्पर रहता है। कई शहरों के भूगोल को अच्छी तरह से समझने वाला व्यक्ति उन शहरों में भी अपने बचपन की गलियों को अपने से अलग हीं कर पाता।
बचपन चाहे सम्पन्नता का हो या विपन्नता का। दोनों ही स्थितियों में वह बराबर साथ रहता है। सम्पन्नता में विपन्नता का और विपन्नता में सम्पन्नता दोनों ही विचार साथ रहते हैं। याद करें कम से कम रुपयों में पिकनिक का मजा और अधिक से अधिक खर्च करने के बाद भी और खर्च करने की चाहत। हर किसी के बचपन में माँ, पिता, भाई, बहन, दोस्त एक खलनायक की तरह होतं ही हैं, उस समय उसकी सारी हिदायतें हमें दादागीरी की तरह लगती। उसे अनसुना करना हम अपनार् कत्तव्य समझते। पर उम्र के साथ-साथ वे सारी हिदायतें गीता के किसी श्लोक से कम नहीं होती, जिसका पालन करना हम अपनार् कत्तव्य समझते हैं। आखिर ऐसा क्या है बचपन में, जो हमें बार-बार अपने पास बुलाता है? बचपन जीवन के वे निष्पाप क्षण होते हैं, जिसमें हमारे संस्कार पलते-बढ़ते हैं। बचपन कच्ची मिट्टी का वह पात्र होता है, जो उस समय अपना आकार ग्रहण करता होता है। बचपन उस इबारत का नाम है, जो उस समय धुंधली होती है, पर समय के साथ-साथ वह साफ होती जाती है।
बचपन के गाँव में हमारा लकड़पन, हमारी शरारतें, हमारी उमंगें, हमारा जोश, हमारा उत्साह, हमारी नादानी, हमारी चंचलता, हमारा प्यार सब कुछ रहता है, जो समय के साथ वहीं छूट जाता है, हम चाहकर भी उसे अपने साथ ला नहीं सकते। जहाँ हमारा बचपन होता है, वहीं हमारी यादों का घरौंदा होता है, यादों के इस छोटे से घरौंदे में हमारा व्यक्तित्व ही समाया हुआ होता है। इसी घरौंदे का एक-एक तिनका जीवन की कठिनाइयों में हमारे सामने होता है। दूसरों के लिए वे भले ही तिनके हों, पर जब हम डूबने लगते हैं, तब यही हमें उबारने का एक माध्यम होते हैं। सच ही कहा गया है जिसने अपना बचपन भूला, दुनिया उसे भूल गई। इसीलिए कहता हूँ कि यदि आप चाहते हैं कि दुनिया आपको न भूले, तो अपने बचपन को याद रखें, दुनिया अपने आप ही आपको याद रखेगी। हाल ही में आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि बिग बी याने अमिताभ बच्चन ने अपने बचपन में पहली बार मंच पर एक नाटक के दौरान मुर्गा बने थे। कई भूमिकाएँ करने के बाद उन्हें बचपन की वह भूमिका आज भी याद है। देखा बचपन की यादें किस तरह से बार-बार हमारे जीवन में आती रहती हैं। यही है बचपन की यादों का महत्व!


भारती परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कुछ याद दिला दिया आपकी इस पोस्ट ने.
    बचपन को याद करते करते वर्तमान जीवन से जैसे नफरत होजाती है.
    हाँ नफरत ही सही लफ्ज है.
    "कोई लौटा दे मेरे बीते हुए (बचपन के ) दिन...........

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  2. bahut sahaj aor rochak tareeke se aapne sansmaran diya hai..likhte rahe...

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