गुरुवार, 10 जुलाई 2008

जब जागा स्वाभिमान


डॉ. महेश परिमल
अखबार में प्रकाशित एक छोटी सी खबर ने चौंका दिया. मध्यप्रदेश के खरगोन जिले से मात्र तेरह किलोमीटर दूर पीपरखेड़ा गाँव के लोगों ने मिलकर अपने बिजली कनेक्शन काट दिए. वे सभी गाँव में अपर्याप्त बिजली आपूर्ति से त्रस्त थे. एक तो अपर्याप्त बिजली, उस पर बिजली बिल के रूप में मोटी राशि. लोगों को लगा कि इससे अच्छा तो यही है कि अब अंधेरे से ही समझौता कर लिया जाए. इसके सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं था. अब वहाँ की आटा चक्कियाँ भी डीजल से चलने लगी हैं. लोग शाम से पहले ही अपने भोजन का काम कर लेते हैं और रात को चौपाल पर बैठकर अपने दु:ख-सुख की बातें कर लेते हैं. ऐसे में टीवी की कल्पना ही बेकार है.
गाँव वालों की यह हिम्मत एक पैगाम है, उन सब के लिए, जो लगातार परावलंबी होते जा रहे हैं. आत्मनिर्भरता की बात तो दूर वे आजकल अपना भी कोई काम अकेले नहीं कर पा रहे हैं. ग्रामीणों ने इस तरह का कदम उठाकर सरकार ही नहीं, बल्कि उन अफसरों के गाल पर एक करारा तमाचा मारा है, जो अफसरशाही के अपने ही जाल में उलझे हुए हैं. ग्रामीणों ने सभी को अपने सत्कार्यों से सभी को स्वावलंबन का सबक दिया है. आत्मगौरव, आत्मप्रतिष्ठा भाव, आत्मसम्मान, आत्माभिमान, खुद्दारी, गैरत, पानी और मान ये सभी स्वाभिमान के रूप हैं. यह मनुष्य के भीतर संस्कार के रूप में होता है. कोई मासूम अपने पिता को दिनभर हाड़तोड मेहनत करते देखता है, तो उसके मन में विचार आता है कि वह भी इसी तरह मेहनत करेगा. पर जब वह यह भी देखता है कि इतनी मेहनत के बाद भी घर में हमें ठीक से भोजन तक नहीं मिलता, तो मासूम दु:खी हो जाता है. पर यदि उस परिवार को कोई अनजानी सहायता मिल जाती है, तो पिता उसे लेने से इंकार कर देते हैं, तब मासूम तड़प कर रह जाता है. अगर आज पिताजी उस सहायता को स्वीकार कर लेते, तो हमें एक समय का भोजन तो ठीक से मिल जाता. उस वक्त पिताजी का व्यवहार उसे भले ही अनुचित लगता हो, पर आज वह सोचता है कि अनजाने में पिताजी ने उसे स्वाभिमान का पाठ पढ़ा दिया. स्कूल में तो टीचर ने कितनी तरह से समझाना चाहा, पर समझ में नहीं आया. पर पिता के व्यवहार ने उसे स्वाभिमान का पाठ कितनी अच्छी तरह से समझा दिया.
स्वाभिमान का सुर जिसे एक बार लग जाए, वह जीवन भर दु:खी तो रहता है, पर भीतर से कहीं सुकून की जिंदगी भी जीता है. इसे भले ही कोई न समझे, पर जीवन के पड़ाव पर अक्सर साँस लेते हुए इसका अहसास होता है कि हमसे सुखी कोई नहीं.
बचपन में पढ़ी वह कहानी याद आ रही है, जिसमें खेत में घोंसला बनाकर रहने वाली चिड़िया अपने बच्चों को समझाती है कि जब तक यह किसान अपनी फसल को काटने के लिए दूसरों का मुँह ताकता रहेगा, तब तक हमें यहाँ से कोई नहीं हटा सकता. पर जिस दिन इसने फैसला कर लिया कि अब उसे ही यह काम करना है, तो निश्चित ही हमें दूसरी जगह जाकर अपना घोंसला बनाना होगा. हुआ भी यही. एक दिन उस किसान के भीतर उसका स्वाभिमान जागा और उसने तय कर लिया कि अब दूसरों के भरोसे नहीं रहना है. अब वह स्वयं ही फसल काटेगा, तब चिड़िया ने अपने बच्चों से कहा कि अब हमें यहाँ से जाना ही पड़ेगा, क्योंकि किसान का स्वाभिमान जाग उठा है.

स्वाभिमान का बिगुल जब भी बजता है, तो उसकी आवाज में जिंदगी नई करवट लेने लगती है और संघर्ष के पड़ाव पर स्व-मान और आत्मसम्मान के गारे से एक ऐसी मूरत बनाने का प्रयास किया जाता है, जिसकी स्वयं की एक अलग पहचान हो. यदि व्यक्ति यह कर जाता है, तो इस सफलता के पीछे उसके स्वाभिमान की एक बहुत बड़ी भूमिका होती है.स्वाभिमान का एक और आशय है भीतरी तांकत. यह ऐसी शक्ति है, जिसका भान हमें नहीं होता. इसे तो कोई दूसरा हमें बताए, तभी पता चलता है कि हममें उस काम को अंजाम देने की शक्ति है. कई बार व्यक्ति स्वयं नहीं जानता कि वह क्या कर सकता है. लेकिन जब अवसर आता है, तो वह उस कार्य का संपादन इतने सुलझे हुए तरीके से करता है कि कोई कह नहीं सकता कि वह इस कार्य में अनुभवी नहीं है. ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है.
हमने बात शुरू की थी, गाँव में जागे स्वाभिमान से. उस गाँव का यह विचार कई लोगों के सामने सवालिया निशान लगा गया. पहले तो लोगों ने इसे शिगूफेबाजी समझा. पर सचमुच जब गाँव वाले बिना बिजली के रहने लगे, तब दूसरों लोगों को समझ में आया कि निर्भरता कभी भी दगा दे सकती है. आज शहरी जीवन निर्भरता से शुरू होता है और निर्भरता पर ही समाप्त होता है. निर्भरता से कभी साक्षात्कार करना हो, तो शहर के एक ऐसे संयुक्त परिवार की एक ऐसी सुबह देख ली जाए, जहाँ अभी-अभी यह सूचना मिली हो, कि उनके घर आज कामवाली नहीं आ रही है. फिर देखो वहाँ का नजारा. सभी एक झटके में परेशान होना शुरू हो जाएँगे. किसी का कोई काम नहीं हो पाएगा. अधिकारी भी समय पर दफ्तर नहीं पहुँच पाएँगे. ऐसा होता है दूसरों पर निर्भर होने का हश्र.
ऐसा केवल बडे लोगों के साथ होता है, ऐसा नहीं है. ऐसा हर उस इंसान के साथ हो सकता है, जो छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर होता है. ऐसे लोगों की सोच होेती है कि यदि हम अपना काम खुद कर लेंगे, तो इन छोटे लोगों का रोजगार कैसे चलेगा? उनका यह सोचना ंगलत है, क्योकि जहाँ स्वावलंबन है, वहाँ की तस्वीर ही कुछ और होती है. हर कोई सुकून के साथ जीता है, कोई मारा-मारी नहीं होती. लोग परस्पर सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. अनजाने में सभी को जीने का अधिकार मिल जाता है. इस खुशहाली में हर किसी को अपना काम कुछ नए ढंग से करने की प्रेरणा मिलेगी.
जब स्वाभिमान जागता है, तब मनुष्य का आंतरिक विकास प्रारंभ होता है. तब एक सूत्रीय कार्यक्रम यही होता है कि हमें अपने काम के लिए दूसरों का मुँह नहीं ताकना है, बस यही एक ऐसा जज्बा है, जिसमें बहकर इंसान कुछ नया कर गुजरता है. इसकी शुरुआत में ही कई बाधाएँ आती हैं. मगर हमें कुछ भी समझ में नहीं आता. पर यही होती है परीक्षा की घड़ी. यही क्षण सँभलने का होता है. यही हमें सँभलना है, बाद में तो कई राहें खुल जाएँगी. शहरों में आज कई ऐसी संस्थाएँ हैं, जो घर का सारा काम कर देने का आतुर है. पर क्या इससे हमें काम करने के बाद का आत्मसंतोष मिल पाएगा. हम कितने भी रईस हो जाएँ, माँ के पाँव को दबाने वाली कई मशीनें ला दें, पर सच बताएँ माँ के लिए तो सबसे बड़ा सुख होता है जब बेटा अपनी बातें करते हुए माैं का पैर दबाए. यही होता है आत्मसंतोष का क्षण. इस क्षण को माँ के जाने के बाद बेटा उम्र भर नहीं भूलता. याने स्वाभिमान से जागी संवेदना हमें भावना के उस पड़ाव पर ले जाती है, जहाँ अपनापा होता है, स्वाभिमान का सम्मान होता है. आज भले ही हम इसे कोई महत्व न दें, पर यही स्वाभिमान हमें गुलामी की जंजीरों से मुक्त करा चुका है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए.
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ. महेश परिमल जी आप के बांलग पर आ कर मुझे एक खाजाना मिल जाता हे, ओर यह धन मे अपने बच्चो मे बाटं देता हु, ओर बाकी मे अपनी जेब मे डाल लेता हु, धन्यवाद,

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  2. आपकी टिप्पणियों के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद.

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