शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

आतंकवादियों के लिए काल है, यह जाँबाज महिला


डॉ. महेश परिमल
अपराधी का सबसे गहरा संबंध अपराध से ही होता है। अपराध करने के लिए भी साहस चाहिए, जो जितना अधिक साहस इकट्ठा कर सकता है, वह उतना ही बड़ा अपराधी। अपराधी से कई लोग डरते हैं, विशेषकर शरीफ लोग। कई अपराधी बेखौफ होते हैं, तो कई मदमस्त। दुनिया में कुछ भी हो जाए, वे अपनी आपराधिक प्रवृत्ति से बाज नहीं आते। जिन अपराधियों के हाथों में हथियार होते हैं, वे और भी खूंखार होते हैं। निहत्था अपराधी भी यदि अपनी पर आ जाए, तो वह बहुत-कुछ कर सकता है। कुल मिलाकर अपराधी हर स्थिति में अपराधी ही होता है, केवल अपराध करने के पहले थोड़ी देर के लिए ही सही, पर शरीफ बनने का नाटक अवश्य करता है। अपराधी का बड़ा स्वरूप आतंकवादी है। अपराधी का इलाका होता है, पर आतंकवादी के सामने पूरा देश होता है। यही आतंकवादी जब किसी महिला के सामने हो और थर-थर काँपने लगे, तो उस महिला को क्या कहेंगे आप? जी हाँ हमारे देश में एक महिला ऐसी भी हैं, जिसके सामने अपराधी अपना गुनाह कुबूल करते हैं। इस महिला पर अब तक कई हमले हो चुके हैं, फिर भी वह आज भी गर्व से अपना काम मुस्तैदी से कर रही हैं।
यह महिला न तो पुलिस अधिकारी है, न हिप्रोटिस और न ही मनोचिकित्सक है। आतंकवादियों ने इस महिला का मार डालने की कसम खा रखी है। इस संबंध में जब उस महिला से पूछा गया, तो वह कहती हैं '' इट्स ए प्रोफेशनल हेजार्ड, यह तो व्यावसायिक खतरा है। इसमें हम क्या कर सकते हैं। मैं तो केवल अपनार् कत्तव्य निभा रही हूँ।'' इस जाँबाज महिला का नाम है डॉ. मालिनी सुब्रमण्यम। आतंकवादियों की हिट लिस्ट में इस महिला का नाम भी है। यह डॉक्टर किरण बेदी, मुम्बई पुलिस की एसीपी मीरा बोरवणकर से जरा भी कम नहीं है। देश के एकमात्र टॉप लेबल की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की सहायक अधीक्षक के रूप में कार्यरत् डॉ. सुब्रमण्यम अपने काम में इतनी निपुण हैं कि कितना बड़ा अपराधी हो या फिर आतंकवादी, उनके सामने झूठ नहीं बोल सकता। कई खतरनाक अपराधियों पर नार्को टेस्ट कर उन्हें सच बोलने के लिए विवश किया है। शायद यही वजह है कि उस पर अब तक कई हमले हो चुके हैं। एक बार एक आरोपी ने उन्हें ऐसा धक्का दिया कि वह गिर गई और उनके हाथ की हड्डी टूट गई। छह हफ्ते का प्लास्टर लगा। ऐसे कई हमले उन पर हुए, पर वह डरने वालों में से नहीं है। लश्कर-ए-तोयबा के आतंकवादी सबाहुद्दीन ने तो उसे जान से मारने की धमकी दे रखी है। एक पत्रकार वार्ता में कर्नाटक पुलिस के डायरेक्टर जनरल के.आर.श्रीनिवास ने इस बात को स्वीकार भी किया। सबाहुद्दीन वही आतंकवादी है, जिस पर 2005 में बेंगलुरु की इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस में हुए बम विस्फोट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
अपराधियों से सच उगलवाने के लिए नार्को टेस्ट को न्यायालय ने अभी तक पूरी तरह से मान्यता नहीं दी है। अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। किंतु सन 2000 से अब तक 1200 नार्को टेस्ट, 1800 ब्रेन मेपिंग और 3400 पोलिग्राफ टेस्ट करने वाली डॉ. मालिनी सुब्रमण्यम के लिए यह एक रिकॉर्ड है। यह रिकॉर्ड इस फौलादी महिला के मनोबल के आगे बहुत ही छोटा है। दो बच्चों की माँ डॉ. मालिनी ने अब तक 130 आतंकवादियों, 15 नक्सलवादियों और अन्य कई खूंखार अपराधियों के मुँह से सच उगलवाया है। इनमें से प्रमुख है स्टेम पेपर कांड के सूत्रधार अब्दुल करीम तेलगी, एक समय दाऊद इब्राहिम के साथी अबु सालेम, अल कायदा के सबाहुद्दीन, प्रीति जैन आदि।
अपराधियों के बीच आने के पहले डॉ. मालिनी नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड न्यूरोसाइंसिस (नीमहांस ) से सम्बध्द थी। इस संस्था को पूरे एशिया में मनोरोगियों की देखभाल के लिए सर्वश्रेष्ठ अस्पताल माना जाता है। इस अस्पताल में जब भी किसी ड्रग्स एडिक्ट को लाया जाता, तब उसके इलाज में डॉ. मालिनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती। एक बार पुलिस के एक उच्चाधिकारी की नजर डॉ. मालिनी पर पड़ गई, वे उनकी कार्यप्रणाली से बहुत प्रभावित हुए। तब उन्होंने राय और केंद्र सरकार से डॉ मालिनी की सेवाएँ लेने की सिफारिश की। यही कारण है कि कुछ ही दिनों में डॉ. मालिनी का तबादला फोरेंसिक सइंस लेबोरेटरी में कर दिया गया। यहाँ पहुँचने के बाद डॉ. मालिनी ने नार्को टेस्ट और ट्रूथ सिरम के माध्यम से अपराधियों से सच किस तरह से उगलवाया जाए, इस पर एक रिसर्च तैयार किया और उसे केंद्र सरकार सूचना विभाग को भेज दिया। सामान्यत: केंद्र सरकार ऐसे विषय पर तुरंत कोई निर्णय नहीं लेती, परंतु न जाने क्यों, डॉ. मालिनी के शोधपत्र में ऐसा क्या था कि सरकार ने तुरंत ही इस पर अपना निर्णय लेते हुए डॉ. मालिनी के सुझाव को माना और अपराधियों से सच उगलवाने के लिए इस तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति दे दी।
सबसे पहले कर्नाटक सरकार ने ही इस तकनीक को अपनाया। कुछ ही वर्षा में डॉ. मालिनी का नाम इस क्षेत्र में गूँजने लगा। फिर तो अपराधियों के बीच रहना उनकी दिनचर्या में ही शामिल हो गया। पिछले आठ वर्षों में डॉ. मालिनी ने इस क्षेत्र में अपना काम पूरी शिद्दत से करते हुए इतनी महारत हासिल की कि अपराधी उनके नाम से ही काँपने लगते। उसके बाद ही पुलिस ने उनकी सेवाएँ लेनी शुरू की। आज स्थिति लगातार बदल रही है। रोज-रोज नए-नए अपराधी उनके सामने होते हैं, एक महिला होने के नाते डॉ. मालिनी बखूबी जानती हैं कि उनका काम ही ऐसा है कि अपराधियों की ऑंखों की किरकिरी बनना स्वाभाविक है। फिर भी वह आज भी अपना काम बिंदास भाव से करती हैं। बिना डरे बिना थके... ऐसी जाँबाज महिला को शत-शत नमन ...।
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut achcha laga dr. malini ke baare mein jaankar...naman hai unki nishtha ko.

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  2. ऐसी जाँबाज महिला को शत-शत नमन ।

    बहुत ही सुंदर और ज्ञानवर्धक प्रस्तुति।

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  3. किरण बेदी ने बहादुरी का कौन सा काम किया है?

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