बुधवार, 6 अगस्त 2008

भारत में प्रसूता का जीवन जोखिमपूर्ण


भारती परिमल
हमारे देश में जन्म देने वाली माँ को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। जिसके पास माँ होतीे है, उसे खुशकिस्मत कहा जाता है। पर आज उसी माँ की स्थिति हमारे देश में बहुत ही दयनीय है। जन्म देने वाली माँ की हालत इतनी खराब हो गई है कि उसे संतान को जन्म देने के पहले भी कई बार मरना पड़ता है। हालत यही नहीं सुधर पाती, संतान को जन्म देते समय कई माँएँ दम तोड़ देती हैं।
'प्रति 7 मिनट में एक महिला की मौत' खबर पढ़कर दिल को चोट पहुँची। वास्तव में यह खबर है ही आहत करने वाली। देश को आजाद हुए 58 वर्ष हो चुके हैं, किंतु आज भी स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। हमारे यहाँ कुपोषण से आज भी हजारों बच्चों की मौत होती है और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में प्रति 7 मिनट में एक महिला की प्रसवोपरांत मृत्यु हो जाती है। एक अनुमान के अनुसार प्रसव के दौरान होने वाले प्रभावों एवं रोगों के कारण मृत्यु को प्राप्त होती महिलाओं में से 30 प्रतिशत जितने मामलों की तो लिखित जानकारी भी नहीं होती।
भारत सरकार के द्वारा इस दिशा में अनेक योजनाएँ लागू की गई और काफी धन खर्च किया गया, किंतु ऐसे मामलों को रोकने के संबंध में विशेष सफलता नहीं मिली। यूनिसेफ के एमएमआर प्रोजक्ट के अनुसार ग्रामीण्ा क्षेत्रों में स्वास्थ्य की कम सुविधाएँ उपलब्ध हैं। साथ ही गाँवों में लगभग 65 प्रतिशत प्रसव अनुभवहीन स्टाफ के द्वारा करवाया जाता है। भारत का एमएमआर (मेटरनल मोरालीटी रेशियो) 301 के करीब है। अर्थात् 301 माताएँ कहीं प्रसव दौरान मृत्यु को प्राप्त करती है अथवा प्रसव के 42 दिनों में मृत्यु को प्राप्त होती हैं। भारत का एमएमआर, यूनिसेफ के अनुसार 106 होना चाहिए, किंतु आश्चर्य यह कि ये बांगलादेश और श्रीलंका से भी अधिक है। भारत में आज जिस तरह से ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही की जा रही है, उसे देखते हुए तो ऐसा लगता है कि 2015 में भी भारत का एमएमआर 140 का होगा!! भारत में इस प्रकार की मृत्यु का प्रमाण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं में अधिक देखने को मिलता है। दु:ख की बात यह है कि पिछले छ: वर्षों में एमएमआर कम करने के संबंध में सरकार ने कोई गंभीर प्रयास नहीं किए हैं।

मृत्यु के इन बढ़ते ऑंकड़ों के पीछे मूल कारण गाँव की गरीबी है। दूसरी तरफ प्रसव संबंधी अज्ञानता और स्वास्थ्य की कम सुविधाओं के कारण भी गाँवों में ऐसे मामले बहुतायत से देखने को मिल रहे हैं। गाँव में प्रसवकाल दौरान अनेक शारीरिक समस्याओं से जूझती महिला को पास के शहर में ले जाया जाता है, वहाँ यदि उसे उचित उपचार नहीं मिल पाता, तो बड़े शहर में ले जाने की सलाह दी जाती है। गाँव से शहर और शहर से बड़े शहर तक का सफ़र करते हुए अंत में महिला मृत्यु को प्राप्त करती है। आज भी न तो गाँवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था हो पाई है और न ही परिवार नियोजन के क्षेत्र में जागरूकता आई है। 5-6 संतान को पालने वाली माता सातवीं संतान को उसकी आवश्यकता अनुसार पोषण नहीं दे पाती। नतीजा यह होता है कि बालक जन्म से पूर्व या जन्म के कुछ ही समय बाद मृत्यु को प्राप्त होता है। कई ग्रामीण घरों में तो अधिक संतान के कारण उनके खान-पान की उचित व्यवस्था न होने के कारण वे बीमार होकर अपनी जान गँवा बैठते हैं। इसके पीछे गरीबी, अज्ञानता, जागरूकता का अभाव, सरकारी व्यवस्था, स्वयं की लापरवाही आदि ऐसे अनेक से कारण हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मध्यप्रदेश में इस प्रकार की मृत्यु के लिए प्रसवोपरांत आंतरिक रक्तस्राव एवं प्रसव वेदना के दौरान उचित चिकित्सा के अभाव को कारणभूत माना गया है।
मध्यप्रदेश में चाइल्ड बर्थ एवं प्रसव दौरान माता की मृत्यु की संख्या 1,36,000 है। वर्तमान में मध्यप्रदेश का एमएमआर 540 है। अर्थात् एक लाख महिलाओं में से 540 की मौत होती है। उत्तर प्रदेश में प्रति वर्ष ऐसे मामलों में 40 हजार महिलाओं की मौत होती है। ऐसे मामलों को घटाया जा सकता है। प्रसव के दौरान महिलाओं को यदि योग्य उपचार एवं बलवर्धक दवाओं का सेवन करवाया जाए, तो इन संख्याओं को कम किया जा सकता है। प्रसव के बाद भी मिलने वाली योग्य चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव है। इसप्रकार आर्थिक पक्ष इस दिशा में जितना जिम्मेदार है, उतना ही सरकारी पक्ष भी। क्योंकि सरकार द्वारा ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएँ देने की बात केवल फाइलों में ही कैद होकर रह जाती हैं। स्वैच्छिक संस्थाएँ तो एमएमआर को 'साइलेन्ट सुनामी' कहती हैं। एमएमआर के कारण तो दो लाख घर माताविहीन होकर उजड़ गए हैं। प्रसव के दौरान होने वाले रोगों का योग्य उपचार न होने के कारण लगभग 6 लाख जितनी महिलाएँ रोग की शिकार हो चुकी हैं। चीन, श्रीलंका और इन्डोनेशिया जैसे देशों में तो प्रसव दौरान अनुभवी चिकित्सक की सेवा उपलब्ध हो, ऐसी पूरी व्यवस्था करने में आई है।
मृत्यु के इन ऑंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकार के द्वारा इस दिशा में किए गए तमाम प्रयास निष्फल हुए हैं। आजादी मिलने के बाद गाँवों के उत्थान के लिए अरबों रूपए खर्च किए जा चुके हैं। बिजली एवं पानी की सुविधा के लिए खर्च किए गए पैसों का तो थोड़ा-बहुत उपयोग भी हुआ है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी सुविधा के मामले में सफल उपयोग की बात तो आज भी विचाराधीन ही है। भारत में यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाए और गाँवों में स्वास्थ्य सुविधा का पूरा प्रयास किया जाए, तभी महिलाओं की मृत्यु के ऑंकड़े कम हो सकते हैं।
आज भारत हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। भारत का जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) दो अंको को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है, सेंसेक्स 15 हजार की दिशा के नजदीक है, एक्सपोर्ट एवं एफडीआई में आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकने वाला भारत अब गाँवों के विकास की ओर ध्यान दे, यही आज की आवश्यकता है।
भारत के पास आज बहुत-सी उपलिब्धयाँ हैं, जिसके कारण उसकी चर्चा चारों ओर हो रही है, किंतु स्वास्थ्य के संबंध में उसकी लापरवाही इन सारी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है। अभी तक हालत यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह केवल शहरों में ही दिखता है, गाँव की हालत में अभी भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। सरकारी सहायता गाँवों तक पहुँचते-पहँचते दम तोड़ देती है। केंद्र या राज्य शासन द्वारा भेजी गई सहायता गाँवों तक समुचित रूप से नहीं पहुँच पाती।
भारती परिमल

1 टिप्पणी:

  1. बहुत विस्तृत...स्पष्ट तस्वीर
    सामने ला दी आपने.
    दरअसल इस मुद्दे पर
    बेहद संज़ीदा कदम उठाने
    की दरकार है.
    =======================
    डा.चन्द्रकुमार जैन

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