गुरुवार, 20 नवंबर 2008

चुभती निगाहों में कैद मासूम


डॉ. महेश परिमल
आजकल सेक्स एजुकेशन की बड़ी चर्चा है। हर तरफ यही माँग उठ रही है कि बच्चों को स्कूल में सेक्स की शिक्षा दी जाए। कई लोग इसके खिलाफ आवाज भी उठा रहे हैं। लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि शालाओं में यौन शिक्षा नहीं, बल्कि योग शिक्षा दी जाए। इस विशय पर सभी सम्प्रदायों का अलग-अलग मत है। इसका दूसरा पहलू यह है कि आज जिस तरह से शालाओं में शिक्षकों, प्राचार्यों और वहाँ के कर्मचारियों द्वारा बच्चों का जो यौन शोषण किया जा रहा है, उसे देखते हुए यदि शालाओं में यौन शिक्षा दी जाएगी, तो यह मुद्दा एक विकृति के रूप में जिस तरह से सामने आएगा, उससे तो समाज का सर शर्म से झुक जाएगा।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी आजकल इसी बात से चिंतित हैं कि देश के 9 राज्यों ने शालाओं में यौन शिक्षा देने के लिए मना कर दिया है। दूसरी ओर उन्हें इस बात की भी चिंता है कि देश की राजधानी नई दिल्ली की एक प्रतिश्ठित शाला के शिक्षक ने शाला के ही दो कर्मचारियों के साथ मिलकर दस साल के एक छात्र के साथ दुष्कर्म किया। यही नहीं उस छात्र को यह धमकी भी दी गई कि इसकी चर्चा किसी से भी न करे, अन्यथा उसे जान से मार डाला जाएगा। राजधानी के हडसन रोड पर स्थित इस कांवेंट स्कूल के इस विद्यार्थी पर लगातार तीन महीने तक अत्याचार होता रहा।जब विद्यार्थी के माता-पिता को इसकी जानकारी हुई, तब उन्होंने इसकी शिकायत स्कूल के चेयरमेन से की, किंतु उन्होंने पालकों की इस शिकायत को अनदेखा कर दिया। इसकी वजह यही थी कि इस मामले में चेयरमेन का पुत्र भी शामिल था।चूँकि इस चेयरमेन की पहुँच काफी ऊँची थी, इसलिए पुलिस ने भी शिकायत दर्ज नहीं की।उसने भी मामले की रिपोर्ट लिखने से साफ मना कर दिया। अंतत: हारकर पालक केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी से मिले। इसके बाद प्रशासन में हरकत आई और दो आरोपियों की धरपकड़ की गई। तीसरा आरोपी अभी फरार है। आश्चर्य इस बात का है कि पकडे गए दो आरोपियों को जमानत पर छोड़ भी दिया गया है। इस मामले की जाँच के लिए महिला बाल विकास मंत्री ने एक समिति का गठन भी किया है।
एक तरफ केंद्र सरकार शालाओं में यौन शिक्षा देने पर लगातार जोर दे रही है, तो दूसरी तरफ देश के अनेक भागों में शिक्षकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। इस तरह की विकृत मानसिकता वाले शिक्षकों पर यदि यौन शिक्षा का भार सौंपा जाएगा, तो स्थिति कितनी भयावह होगी, इससे शायद ही कोई वाकिफ होगा। केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा ही इस वर्ष के अप्रेल माह में 5 से 12 वर्श के विद्यार्थियों के साथ होने वाले यौन शोषण पर एक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण में देश के 12 राज्यों के 12 हजार 447 विद्यार्थियों से बात की गई। इसमें चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि 53 प्रतिशत बच्चों ने कहा था कि उनका घर या स्कूल में यौन शोषण किया गया था। इसमें से 21.90 प्रतिशत ने तो स्वीकार किया कि उनके साथ बलात्कार या फिर अन्य तरह का यौन शोषण हुआ है। यौन शोषण के 70 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि वे तो इस हादसे से इतना घबरा गए थे कि अपने साथ हुए अत्याचार की जानकारी उन्होंने किसी को नहीं दी। हमारे देश की स्कूलों में जब इस तरह का वातावरण है, तो इस स्थिति में यौन शिक्षा का भार इस तरह के शिक्षकों को कैसे दिया जा सकता है?
नई दिल्ली में यौन शोषण की घटना जब प्रकाश में आई, उसके तीन दिन पहले ही चेन्नई की एक शाला में पढ़ने वाली सात वर्ष की मासूम के साथ उसी स्कूल के एक शिक्षक द्वारा बलात्कार करने का मामला प्रकाश में आया। इस शिक्षक पर इसके पहले भी इस तरह के आरोप लगाए गए थे, किंतु शाला प्रशासन द्वारा इस दिशा में ध्यान न दिए जाने के कारण मामला दब गया।ठीक इस तरह का मामला पिछले सप्ताह ही अहमदाबाद के मणिनगर में नेल्सन स्कूल के एक ड्राइंग टीचर अरुण तलाटी द्वारा दस वर्श्र की मासूम से शारीरिक कुचेष्टा करने की खबर सामने आई है।इस शिक्षक का पुराना रिकॉर्ड भी ठीक नहीं रहा है, उसके बाद भी शाला प्रशासन ने उसके चरित्र को अनदेखा कर उसे नौकरी पर रख लिया।इस तरह के मामलों में ऐसा ही होता आया है कि शाला प्रशासन हमेशा अपने शिक्षकों को बचाने के फिराक में होता है।स्पश्ट है कि इससे शाला की बदनामी होगी और पालक अपने बच्चों को अन्य शालाओं में भर्ती कर देंगे। नई दिल्ली की ही एक और घटना है जिसमें वहाँ की प्रतिश्ठित मीरांबिका स्कूल के एक चार वर्श के मासूम के साथ मनीश कुमार नाम के एक शिक्षक ने दुष्कर्म किया था। इस मासूम की माँ सामाजिक कार्र्यकत्ता थी, जब उसे अपने बच्चे के साथ होने वाले इस दुष्कर्म की जानकारी हुई, तब उसने इसकी शिकायत स्कूल के प्राचार्य से की, तो उसने शिकायत सुनने से ही इंकार कर दिया, आखिर पुलिस थाने में इसकी रिपोर्ट की गई, तब उस शिक्षक की धरपकड की गई। स्कूल में पढने वाली 16 व की छात्रा के साथ बलात्कार का उदाहरण मुम्बई की एसआईएस हाईस्कूल में देखने को मिला। इस स्कूल के सूर्यनाथ यादव नामक शिक्षक ने 6 वर्ष की एक कन्या से बलात्कार किया, इसके बाद भी उस शिक्षक की नौकरी जारी रही। मामला जब अदालत पहुँचा, तब सेशन जज ने बलात्कारी शिक्षक को सात वर्ष की कैद और दो लाख रुपए जुर्माना किया, तब कहीं जाकर उक्त शिक्षक को बर्खास्त किया गया। ऐसे शिक्षकों द्वारा जब यौन शिक्षा दी जाएगी, तो बच्चों का क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
भारतीय संस्कृति में शिक्षक को ईश्वर का स्वरूप माना गया है।उक्त घटनाओं से यह धारणा तो निर्मूल ही साबित हुई है। कितने विश्वास के साथ माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए शाला में भेजते हैं, यदि वहाँ जाकर बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं, तो फिर भला किस पर विश्वास किया जाए? दो वर्ष पहले ही रघुवीर नगर की एक शाला में प्रिंसीपाल ओमप्रकाश शर्मा ने अपनी ही शाला की दसवीं की छात्रा से बलात्कार किया। यह छात्रा दसवीं में अनुत्तीर्ण हुई थी और टयूशन के लिए प्राचार्य के घर जाती थी। प्राचार्य उसे खरीदी करने के बहाने एक गेस्ट हाउस में ले गया था, जहाँ चार पुरुषों ने उस छात्रा का बलात्कार किया।फिर छात्रा को उसके घर छोड़ दिया। इस घटना से दिल्ली में उग्र प्रदर्शन भी हुए।
ऐसा नहीं है स्कूल जाने वाली सभी छात्राएँ यौन शोषण का शिकार होती हैं, पर यह भी सच है कि अधिकांश छात्राएँ शाला में पुरुष शिक्षकों की विकृत मानसिकता की शिकार अवश्य होती हैं। दिल्ली की झोपड़पट्टियों में काम करने वाली संस्था '' नवसृष्टि'' का कहना है कि पालकों द्वारा अपनी 10 से 12 वर्र्ष की बच्चियों को स्कूल न भेजने के पीछे यही कारण है। शालाओं में पढ़ने वाली छात्राओं के लिए ''किशोरी प्रोजेक्ट'' सामने आया था, इस प्रोजेक्ट में भाग लेने वाली अधिकांश छात्राओं का कहना था कि पुरुश शिक्षकों द्वारा उनके शरीर पर अनावश्यक रूप से हाथ फेरा जाता है। आज तो हमारे देश में नौकरी करने वाली महिलाएँ भी सुरक्षित नहीं हैं। वहाँ भी वे महिलाएँ अपने आपको बचाए रखने की जद्दोजहद में लगी रहती हैं। ठीक उसी तरह अब छात्र-छात्राओं के लिए स्कूल भी असुरक्षित हो गया है। अब तो केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि अन्य कर्मचारी भी इस कार्य में शामिल होने लगे हैं। '' शिक्षा सबके लिए '' योजना के अनुसार भारत की 20 प्रतिशत शालाओं में केवल एक ही शिक्षक है। इसमें से 18 प्रतिशत मात्र पुरुष शिक्षक ही हैं। जब ऐसे पुरुष शिक्षक जब हैवान बन जाएँ, तो मासूमों की क्या हालत होती होगी, इसे कौन समझेगा ? इन तथ्यों के बाद भी यदि शालाओं में यौन शिक्षा देने के लिए सोचा जा रहा है, तो एक बार इस विकृति की तरफ भी विचार किया जाए, तभी बात बनेगी।
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. उचित यौन शिक्षा ही बच्चों को विपथगामी होने से बचा सकती है। इस के लिए उस का कोई मार्ग तो तलाशना ही होगा। यौन शिक्षा के लिए उचित शिक्षकों की व्यवस्था तो करनी ही होगी।
    मेरा सुझाव है कि यौन शिक्षा के लिए माता-पिता ही सर्वोत्तम हैं। हाँ उन्हें अपने बच्चों को यौन शिक्षा देने के लिए विशेष रुप से शिक्षित करने की योजना और व्यवस्था होनी चाहिए।

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