शनिवार, 13 दिसंबर 2008

नीली ऑंखों का जादूगर राज कपूर


राज कपूर, यह वो नाम है, जो पिछले आठ दशकों से फिल्मी आकाश पर जगमगा रहा है और आने वाले कई दशकों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। वैसे भी भूला तो उसे जाता है, जो दिमाग में हो। दिल में बसे लोगों को भला कैसे भुलाया जा सकता है। राज कपूर की यादें तो दिलों में गहराई तक बसी हुई हैं। उनकी ऑंखों का भोलापन ही उनकी फिल्मों की पहचान रहा है। पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े बेटे राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर 1924 को पेशावर में हुआ था। उनका बचपन का नाम रणबीर राज कपूर था। कोलकाता में उनकी स्कूली शिक्षा हुई, लेकिन पढ़ाई में उनका मन कभी नहीं लगा। यही कारण था कि उन्होंने 10 की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इस मनमौजी ने अपने विद्यार्थी जीवन में किताबें बेचकर खूब केले, पकोड़े और चाट खाई। माँ से नई किताबें खरीदने के लिए पैसे माँगते और दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाते।
1929 में जब पापा पृथ्वीराज कपूर मुंबई आए, तो उनके साथ मासूम राज कपूर भी मायानगरी के सपने ऑंखों में लिए साथ आ गए। पापाजी सिद्धांतों के पक्के थे। उन्होंने राज कपूर को साफ कह दिया था कि - राजू, नीचे से शुरुआत करोगे तो ऊपर तक जाओगे। पिता की यह बात उन्होंने गाँठ बाँध ली और सत्रह वर्ष की उम्र में जब उन्हें रणजीत मूवीटोन में साधारण एप्रेंटिस का काम मिला, तो उन्होंने वजन उठाने और पोंछा लगाने के काम से भी परहेज नहीं किया। काम के प्रति उनकी लगन पंडित केदारशर्मा के साथ काम करते हुए रंग लाई, जहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियों को समझा। एक बार गलती होने पर उन्होंने केदारशर्मा जी से चाँटा भी खाया था। उसके बाद एक समय ऐसा भी आया, जब केदार शर्मा ने अपनी फिल्म नीलकमल (1947) में मधुबाला के साथ उन्हें नायक के रूप में प्रस्तुत किया। इसके पहले बाल कलाकार के रूप में राज कपूर इंकलाब (1935)और हमारी बात (1943), गौरी (1943) में छोटी भूमिकाओं में कैमरे के सामने आ चुके थे। फिल्म वाल्मीकि (1946) में नारद और अमरप्रेम (1948) में कृष्ण की भूमिका निभाई थी। इन तमाम गतिविधियों के बावजूद उनके दिल में एक आग सुलग रही थी कि वे स्वयं निर्माता-निर्देशक बनकर अपनी स्वतंत्र फिल्म का निर्माण करे। उनका सपना 24 साल की उम्र में फिल्म आग (1948)के साथ पूरा हुआ। इसके बाद उनके मन में अपना स्टूडियो बनाने का विचार आया और चेम्बूर में चार एकड़ जमीन लेकर वहाँ आर.के. स्टूडियो बनाया। जिसमें सबसे पहले फिल्म आवारा की शूटिंग हुई।
राज कपूर को अभिनय विरासत में ही मिला था। पिता पृथ्वीराज अपने समय के मशहूर रंगकर्मी और फिल्म अभिनेता हुए हैं। अपने पृथ्वी थियेटर के जरिए उन्होंने पूरे देश का दौरा किया। राज कपूर भी उनके साथ जाते थे और रंगमंच पर काम भी करते थे। पृथ्वीराज कपूर को मरणोपरांत दादासाहेब फालके अवार्ड दिया गया।
राज कपूर और रंग : राज कपूर को बचपन में ही सफेद साड़ी पहने स्त्री से मोह हो गया था। इस मोह को उन्होंने जीवन भर बनाए रखा। उनकी फिल्मों की तमाम हीरोइनों- नरगिस, पद्मिनी, वैजयंतीमाला, जीनत अमान, पद्मिनी कोल्हापुरे, मंदाकिनी ने सफेद साड़ी परदे पर पहनी है और घर में पत्नी कृष्णा ने हमेशा सफेद साड़ी पहनकर अपने शो-मेन के शो को जारी रखा है।
राज कपूर और संगीत : राजकपूर को संगीत की अच्छी समझ थी। गीत बनने के पहले उन्हें एक बार अवश्य सुनाया जाता था। आर.के. बैनर तले अपने संगीतकार-शंकरजय किशन, गीतकार- शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, विट्ठलभाई पटेल, रविन्द्र जैन, गायक- मुकेश, मन्ना डे, छायाकार- राघू करमरकर, कला निर्देशक- प्रकाश अरोरा, राजा नवाथे आदि साथियों की टीम तैयार की। फिल्मी दुनिया में उन्होंने संगठन का जो उदाहरण दिया है, वह बेजोड़ है।
राज कपूर और गायन : राज कपूर ने अपना प्लेबैक पहली बार खुद दिया था, फिल्म थी- दिल की रानी। 1947 में बनी इस फिल्म के संगीत निर्देशक थे- सचिनदेव बर्मन। इस फिल्म की नायिका थी मधुबाला। गीत का मुखड़ा है- ओ दुनिया के रखवाले बता कहाँ गया चितचोर। इसके अलावा राजकपूर ने फिल्म जेलयात्रा में भी एक गीत गाया था।
राज कपूर का प्रेम : राज कपूर और नरगिस ने 9 वर्ष में 17 फिल्मों में अभिनय किया। अलगाव के बाद दोनोें ही खामोश रहे। उनकी गरिमामयी खामोशी उस युग का संस्कार थी। 1956 में फिल्म जागते रहो का अंतिम दृश्य नरगिस की विदाई का दृश्य था। रात भर के प्यासे नायक को मंदिर की पुजारिन पानी पिलाती है। फिल्म की वह प्यास सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक थी। राजकपूर और नरगिस के बीच अलगाव की पहली दरार रूस यात्रा के दौरान आई। तब तक 'आवारा' रूस की अघोषित राष्ट्रीय फिल्म हो चुकी थी। मास्को के ऐतिहासिक लाल चौराहे पर राज कपूर का नागरिक अभिनंदन किया गया। उसी रात राज कपूर ने नरगिस से कहा- आई हैव डन इट। इसके पूर्व हर सफलता पर राज कपूर कहते थे- वी हैव डन इट। दोनों के पास समान अहम था और अनजाने में कहे गए एक शब्द ने उनके संबंधों में दरार डाल दी। वर्षों की अंतरंगता पर एक शब्द भारी पड़ गया। राज कपूर और नरगिस जिस तरह अपने प्रेम में महान थे, उसी तरह अपने अलगाव में भी निराले थे।
25 वर्ष बाद ऋषिकपूर के विवाह में नरगिस अपने पति और पुत्र के साथ आर.के. आई थीं। उस यादगार मुलाकात में राज कपूर मौन रहे। यहाँ तक कि उनकी बहुत कुछ बोलनेवाली ऑंखें भी मौन ही रही। नरगिस ने कृष्णाजी से कहा कि आज पत्नी और माँ होने पर उन्हें उनकी पीड़ा का अहसास हो रहा है। किंतु गरिमामय कृष्णाजी ने उन्हें समझाया कि मन में मलाल न रखें, वे नहीं होती तो शायद कोई और होता। राज कपूर के सफल होने में बहुत-सा श्रेय कृष्णाजी को जाता है। आज भी वह महिला फिल्म उद्योग में व्यवहार का प्रकाश स्तंभ है।
1987 को दादा साहेब फालके पुरस्कार की घोषणा होते ही राज कपूर को बेहद खुशी हुई, लेकिन 2 मई को पुरस्कार लेते समय ही उन्हें अस्थमा का दौरा पड़ा। जिंदगी और मौत के बीच वे एक माह तक संघर्ष करते रहे। अंत में 2 जून 1988 को उनका देहावसान हो गया। इसे एक संयोग ही कहा जा सकता है कि 3 मई 1980 को नरगिस का देहांत हुआ और राज कपूर को अस्थमा का दौरा 2 मई को पड़ा। साल भले ही अलग हों, पर तारीखें तो काफी करीब थीं। है न अजीब संयोग!
राज कपूर स्वयं हाईस्कूल पास नहीं कर पाए थे, तो क्या हुआ। आज उनकी बनाई पुणे की लोनी हाई स्कूल में हजारों बच्चे हर साल उत्तीर्ण हो रहे हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह एक ऐसा परिवार है, जिसे फिल्म का सर्वोच्च दादा साहेब फालके पुरस्कार दो बार मिला है। इस परिवार की चार पीढ़ियाँ फिल्मी क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रही हैं। ऋषिकपूर के बेटे रणवीर कपूर, रणधीर कपूर की बेटियाँ करिश्मा और करीना ने इस परंपरा को बनाए रखा है। आर.के.स्टूडियो भले ही परिस्थितिवश बदहाली में हो, किंतु भाई शशिकपूर ने पृथ्वी थियेटर को अपने बच्चों के हाथों सौंपकर पिता की विरासत को सहेजे रखा है।
भारती परिमल

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी हमको यह जानकारी बहुत अच्छी लगी जी . राजकपूर द्वारा किए गए रोल हमें बहुत अच्छे लगते हैं जी .

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  2. राजकपूर अपने ज़माने के मशहूर कलाकार रहे है अपने उनकी यादे तरोताजा कर दी है. धन्यवाद.

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  3. इस सुंदर जानकरी के लिये आप का बहुत बहुत धन्यवाद

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