सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

जरूरत नहीं है पुलिस से खौफ खाने की


डॉ. महेश परिमल
पुलिस का भय हर सच्चे इंसान को होता है। पुलिस भी ऐसे ही इंसानों को खोजती फिरती है, ताकि उस पर अपनी वर्दी का रौब गाँठ सके। इसकी वजह साफ है कि पुलिस को असीमित अधिकार मिले हुए हैं। इन अधिकारों के बल पर ही पुलिस हर किसी से कहती है 'यादा चूँ चपड़ की, तो सीधे अंदर कर दूँगा। पीसते रहना जिंदगी भर जेल में चक्की।' लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, संसद में पुलिस को असीमित अधिकारों पर कटौती करने वाला विधेयक पारित हो गया है, बस राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता है। फिर पुलिस किसी भी निर्दोष को न तो सता सकती है और न ही किसी पर धौंस जमा सकती है।
अधिक नहीं, करीब 25 वर्ष पहले जिस अखबार के दफ्तर में काम करता था, वहाँ से हर महीने उस क्षेत्र के पुलिस थाने में स्टेशनरी के नाम पर कागज और रिफिल की आपूर्ति की जाती थी। बाद में समझ में आया कि देश के सभी थानों में आज भी स्टेशनरी के नाम पर केवल 25 पैसे महीने का बजट है। ऐसा आज भी कई थानों में है। यही नहीं, आज देश के पुलिस थानों में जो भी नियम-कायदे हैं, वे ऍंगरेजों द्वारा सन् 1858 में बनाए गए नियम ही हैं। हमारे संविधान को बने भले ही 59 वर्ष बीत गए हों, पर आपराधिक कानून आज भी ऍंगरेजों के बनाए हुए लागू हैं और सख्ती से उसका पालन किया और कराया जा रहा है। यह भले ही शोध का विषय हो सकता है, पर सच यही है कि हम आज भी मानसिक रूप से ऍंगरेजों के गुलाम ही हैं।
आज साधारण नागरिक पुलिस से भय खाती है, इसकी वजह यही है कि पुलिस को असीमित अधिकार मिले हुए हैं। वह किसी भी आम आदमी को साधारण सी बात पर विभिन्न धाराओं के तहत जेल भेज सकती है। यदि यह संभव न हुआ, तो पुलिस उसे हिरासत में तो कई दिनों तक रख ही सकती है। यह कानून हमारा बनाया हुआ नहीं है, इसे तो ऍंगरेजों ने अपनी सुविधा को देखते हुए हम पर शासन करने के लिए बनाया था। देश तो स्वतंत्र हो गया, पर हमारी मानसिक गुलामी की जंजीरें हम पर कसी रही। हम देशवासी ऍंगरेजों के उसी नियम-कानूनों को ढोते रहे। पुलिस की स्वच्छ छबि की बात हमेशा की जाती है, पर उसे मिले असीमित अधिकारों के बारे में कोई ऊँगली नहीं उठाता। लेकिन अब हालात बदले हैं। दिसम्बर 08 में संसद में एक विधेयक पारित किया गया है। इस विधेयक के अनुसार जिस अपराध में सात वर्ष से कम कैद की सजा हो, उसमें अदालत की मंजूरी के बिना आरोपी की धरपकड़ करने का अधिकार पुलिस से छीन लिया गया है। इस कारण अब खून और बलात्कार के आरोप के सिवाय लगभग तमाम नागरिक पुलिस की धरपकड़ के आतंक से बच जाएँगे। ऍंगरेजों ने अपनी प्रजा को गुलाम बनाने के लिए कई तरह के कानून बनाए। उससे प्रजा को छुटकारा दिलाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। क्रिमीनल प्रोसीजर कोड में सुधार करने वाले इस विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून अमल में आ जाएगा।
सवाल यह उठता है कि सरकार को अभी ध्यान में आया कि देश में अभी भी ऍंगरेजों के बनाए कानून ही चल रहे हैं? क्या इसके पहले याद नहीं आया। अब जब इस दिशा में सरकार ने सुधार की दृष्टि से कदम उठाया है, तो फिर उस कानून को इतना पेचीदा बनाने की क्या आवश्यकता थी। कानून में सुधार अवश्य हुआ है, पर लगता है कि सरकार अभी भी पुलिस को संरक्षण देने में लगी हुई है। बिना किसी सुबूत के जिस इंसान को पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया गया हो और वहाँ उसे लम्बे समय तक सजा भुगतनी पड़ी हो, अंत में जब वह निर्दोष छूट जाता है, तो उस इंसान के पास इतना भी अधिकार नहीं रहता कि वह उसे दोषी बताने वाले पुलिस अधिकारियों की शिकायत नहीं कर सकता। यह कैसा कानून है? इस आशय के मामलों में आज तक किसी भी पुलिस अधिकारी को सजा मिली हो, ऐसा सुनने-पढ़ने को नहीं मिला।
हमारे देश में महिला कैदियों की धरपकड़ के मामले में आज तक कोई आचारसंहिता अमल में नहीं लाई गई है। पुलिस चाहे तो किसी भी महिला को वह आधी रात में गिरफ्तार कर हिरासत में ले सकती है। इस दौरान ही उस पर बलात्कार भी हो जाता है। इस तरह के मामलों में दोषी पुलिस अधिकारियों पर शायद ही कोई कार्रवाई की जाती है। अब फौजदारी कानून में हुए सुधार के अनुसार किसी महिला आरोपी की धरपकड़ सूर्योदय से सूर्यास्त के दौरान ही की जा सकती है। इसके बाद भी पुलिस हिरासत में महिला के साथ कुछ होता है और महिला इसकी शिकायत करती है, तो इसकी जाँच अनिवार्य कर दी गई है। निश्चित रूप से इसकी जाँच कोई पुलिस अधिकारी ही करेगा, तब यह जाँच कितनी विश्वसनीय कही जा सकती है, यह सब जानते हैं।
हाल ही में केंद्र सरकार ने कोड ऑफ द क्रिमीनल प्रोसीजर में सुधार करते हुए छोटे अपराध के कै दियों को राहत देने का केवल दिखावा ही किया है। इस सुधार के अनुसार जिस अपराधी को जिस अपराध में गिरफ्तार किया गया है, उसके लिए निर्धारित सजा जितनी अवधि जेल में बिता दी हो, यदि वह फाँसी की सजा का कैेदी न हो, तो उसे जेल से मुक्त होने के लिए आवेदन कर सकता है। पर यह बात सुनने में भले ही सहज लगती हो, पर उतनी आसान नहीं है। इस तरह के कैदी को अपनी रिहाई के लिए अदालत में आवेदन देना होगा। निश्चित ही इस काम के लिए उसे वकील की सहायता की आवश्यकता होगी। जिस कैदी के पास अपनी जमानत के लिए 500 रुपए की राशि न हो, इसी वजह से उसे जेल हुई हो, वह भला वकील की फीस कहाँ से लाएगा? क्या इस देश का कोई भी निर्दोष बिना वकील के आवेदन के जेल से रिहा नहीं हो सकता?
आज देश भर की जेलों में लाखों विचाराधीन कैदी हैं, जिन्होंने निर्धारित सजा से दोगुनी समय जेल में बिता दिया है। उन्हें रिहा करने की जहमत कोई नहीं उठा रहा है। न जाने कितने ही निर्दोष लोग तो पुलिस के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण ही जेल के अंदर सड़ रहे हैं। ऐसे कैदी भी बहुत हैं, जिसे गवाह बनाकर पुलिस ने अदालत में पेश किया और उन्हें अपराधी करार दिया गया। मतलब यही कि पुलिस ने अपनी मनमानी की और एक निर्दोष जेल चला गया। पुलिस को मिले इसी तरह के असीमित अधिकारों के कारण ही इस तरह का कानून अमल में लाया जाएगा। पर इसमें सरकार की मंशा क्या है? इस पर कोई भी पूरे अधिकार के साथ कुछ नहीं कह सकता।
स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद सरकार जागी, तो सही, पर लगता है उसकी नीयत साफ नहीं है। कानून में सुधार के नाम पर वह अब भी कानून को इतना पेचीदा बना रही है कि वह साधारण लोगों के कुछ काम न आ सके। कानून तो आज भी बलशाली लोगों के हाथों का खिलौना है। वे इसे अपनी तरह से इस्तेमाल करते ही रहते हैं। दोषी तो हमेशा एक आम आदमी ही पाया जाता है। इसी देश के कानून में यह भी लिखा है कि सौ दोषी भले ही छूट जाएँ, पर एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं पाता। इसके लिए आखिर किसे दोषी माना जाए, आम आदमी तो इसके लिए दोषी नहीं है ना?
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा विचारा है आपने। यदि हम चाहते हैं कि नियम-कानून पुराने वाले ही रहें और समाज बदल जाय, तो यह सम्भव नहीं है। यह खुशी की बात है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारी को सीमित एव्ं तर्कसम्मत बनाने सम्बन्धी विधेयक पर काम चालू है। इसे जल्दी आना चाहिये।

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  2. हम भारतीय, कोई भी कानून बनने से पहले ही उसके उल्‍लंघन के 'औचित्‍यपूर्ण उप मार्ग' खोज लेने में निष्‍णात् हैं। सो, हय कामना करना कि पुलिस को मनमानी करने की 'सुविधा' से वंचित कर दिया जाएगा, मुझे तो 'आकाश-कुसुम' ही लगता है।
    कानून में जो संशोधन किया जा रहा है उस पर महिलाओं के प्रति किए गए अपराधों के सन्‍दर्भ में पुनर्विचार किया जाना चाहिए। महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अधिकांश (प्राय: समस्‍त) अपराधों की सजा सात वर्षों से कम है। ऐसे में, समस्‍त अपराधी गिरफ्तारी से बच जाएंगे जिसका सन्‍देश गलत ही जाएगा।

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