मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

आखिर क्या चाहते हैं दूध का विरोध करने वाले?


डॉ. महेश परिमल
देश में एक बार फिर देश में गाय के दूध का विरोध होने लगा है। इसमें मेनका गांधी का नाम प्रमुख है। गाय का दूध का विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं। अपने तर्कों से यह सब यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि लोग शाकाहार की ओर न बढें अौर मांसाहार का अपना लें। आजकल दूध में जिस तरह से विभिन्न रसायनों की मिलावट हो रही है, उसे आधार बनाकर एक तरह से साजिश का हिस्सा बन रहे हैं, ये दूध का विरोध करने वाले। लेकिन इनके तर्क इतने लचर हैं कि भारतीय मान्यताओं के आगे ये तर्क बिलकुल ही टिक नहीं पाते। वास्तव में देखा जाए, तो दूध एक संपूर्ण आहार है। दूध का विरोध करने वाले मांसाहार के लिए वातावरण बना रहे हैं। वास्तविकता यह है कि यह सब एक साजिश के तहत हो रहा है, जिसमें एक विदेशी संस्था हमारे देश को भरमाने में लगी है।
पेटा-इंडिया नाम की एक मूल अमेरिकी संस्था द्वारा एक प्रस्ताव हमारे सामने आया है, जिसमें यह कहा गया है कि भारत में जिस तरह से गाय-भैंसों पर अत्याचार हो रहे हैं, इससे लोग यदि दूध का सेवन करना बंद कर दें, तो उन पर अत्याचार कम हो जाएँगे। इसके लिए उनका यही तर्क है कि गाय-भैंस के पालने वाले उनका अधिक से अधिक दूध निकालने के लिए उन पर अत्याचार कर रहे हैं। जब लोग दूध का सेवन बंद कर देंगे, तो उन पर होने वाले अत्याचार कम हो जाएँगे। सोचो यदि लोग दूध पीना बंद कर देंगे, तो हमारे देश के लाखों पशुओं का फिर क्या काम? उन पशुओं की उपयोगिता समाप्त हो जाएगी और उन्हें कतलखाने का रास्ता दिखा दिया जाएगा। एक और तर्क यह है कि लोग जब दूध का सेवन बंद कर देंगे, तो वे कुपोषण का शिकार हो जाएँगे। इससे बचने के लिए लोग विवश होकर मांसाहार की शरण में चले जाएँगे। अनजाने में दूध का विरोध करने वाले मांसाहार के लिए हमें प्रेरित कर रहे हैं।
पेटा-इंडिया दूध का विरोध करने के लिए जो कारण बता रही है, वे अत्यंत हास्यास्पद हैं। इसमें अधिकांश कारण तो भारत देश नहीं, अपितु अमेरिका में ही लागू होते हैं। पेटा-इंडिया कहता है:- दिन-प्रतिदिन दूध की बढ़ती माँग को देखते हुए पशु-पालक गाय का बार-बार गर्भाधान करवा रहे हैं, उन्हें बराबर खुराक नहीं दी जा रही है, साथ ही उन्हें दिन-भर जंजीरों से बाँधकर रखा जाता है। भारत के संबंध में यह बात पूरी तरह से बेबुनियाद साबित होती है। क्यों यह संस्था जो कुछ कह रही है, वह सब-कुछ यूरोपीय देशों में होता है। भारत में पशुओं का प्राकृतिक रूप से गर्भाधान होता है। यहाँ कृत्रिम गर्भाधान का प्रतिशत मात्र दस है। देखा जाए, तो कृत्रिम गर्भाधान में क्रूरता शामिल है। अधिकांश कृत्रिम गर्भाधान जर्सी या होलिस्टिन जैसी संकर गायों का ही होता है। प्राणीशास्त्री मानते हैं कि विदेशी जर्सी या होलिस्टिन गाय हकीकत में गाय नहीं है, बल्कि ये सूअर के वर्ग का एक प्राणी है, जिसका बाह्य आकार और कद गाय जैसा है। इसीलिए संकर गाय के दूध में गाय के दूध का गुण देखने में नहीं आता।
पेटा-इंडिया की उपरोक्त दलील कितनी हास्यास्पद है, यह तो इसी से पता चलता है कि क्या पशुओं को कम खुराक देकर उनसे अधिक दूध प्राप्त किया जा सकता है? भारत के पशुपालक भले ही अनपढ़ हों, पर यह अच्छी तरह से जानते हैं कि पशुओं को जितनी अधिक और अच्छी खुराक दी जाएगी, पशु उतना ही अधिक दूध देगा। खुराक न मिलने के कारण पशुओं की मौत के पीछे घास वाली जमीन की कमी है। घास वाले मैदानों पर अतिक्रमण हो गया है, वहाँ पर अब कांक्रीट के जंगल तैयार हो गए हैं। यदि घासचारे का उत्पादन बढ़े, तो देश में एक भी पशु भूख से न मरे। पर सरकार की नीतियाँ ही ऐसी नहीं हैं कि पशुओं के लिए कुछ अलग हो पाए।
शाकाहाहरयों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शरीर को आवश्यक सभी पदार्थों को प्राप्त करना हो और निरोगी रहना हो, तो दूध का कोई विकल्प नहीं है। दूध एक संपूर्ण आहार है। आयुर्वेद ने गाय के दूध की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध पीने से शरीर को स्फूर्ति और मजबूती मिलती है। बुद्धि और स्मृति प्रबल होती है, ऑंखों की रोशनी बढ़ती है, आयुष्य प्राप्त होता है। गाय का दूध वातरोग और पित्तरोग में बहुत ही लाभदायक है। जीर्ण वर, क्षय, तृषा, थकान, जलन और कमजोरी में अत्यंत लाभकारी है। आयुर्वेद ने गाय के दूध को अमृततुल्य और आरोग्यप्रद बताया है। हमारे पास एक तरफ हजारों वर्षों से प्रतिष्ठित आयुर्वेद के ऋषि-मुनियों का अनुभव है, तो दूसरी तरफ एक विदेशी संस्था द्वारा दूध न पीने के खोखले तर्क हैं। यह अवश्य जान लें कि विदेशी संस्था की नीयत बिलकुल ही साफ नहीं है।
पेटा-इंडिया दूध के विकल्प के रूप में सोया मिल्क, नींबू का शरबत, नारियर पानी या फिर आइस टी पीने की सलाह देती है। दूध में सुपाच्य पोषण का जो खजाना मिलता है, क्सया वह सब-कुछ उपरोक्त चीजों में मिलेगा। इन्हें दूध का विकल्प कैसे कहा जा सकता है। क्या तीन महीने के नन्हें मासूम को नींबू का शरबत या आइस टी दी जा सकती है? क्या इससे उसकी तंदरुस्ती कायम रह सकती है। पेटा-इंडिया शायद सोया मिल्क और आइस टी बनाने वाले उद्योगों के लाभ लिए ही ऐसा कह रही है।कुछ लोग यह भी कहते हैं कि दूध बच्चों की खुराक है। बड़ी उम्र के लोग दूध पचा नहीं पाते हैं। यह दलील एक वाहियात है। हिमालय में रहने वाले अनेक योगियों ने पूरे जीवन दूध पर ही निर्भर रहे, उन्हें तो कुछ नहीं हुआ।
यह सच है कि आजकल दूध की माँग बढ़ने से इसमें यूरिया और दूसरे जंतुनाशक जहरीले रसायनों की मिलावट की जा रही है। इसके लिए तो हमारे देश की कानून-व्यवस्था दोषी है। आजतक किसी भी मिलावटखोर को कड़ी सजा नही दी गई। लोग तो जीवन-रक्षक दवाओं में भी मिलावट करने से नहीं चूकते, फिर दूध की क्या बिसात? मिलावट करने वालों पर कानून में कड़ाई का प्रावधान नहीं होने के कारण आजकल हर चीज में मिलावट हो रही है। इस दिशा में न तो राय सरकारें सचेत हैं और न ही केंद्र सरकार। एक साजिश के तहत सब-कुछ बेखौफ जारी है।
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. दूध में हो रही मिलावट को रोका जाना चाहिए....आपका कहना सही है कि यदि लोग दूध को प्रयोग न करें तो गायों को पालेगा कौन ? उन्‍हें तो मारा ही जाएगा।

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  2. हमारे पास एक तरफ हजारों वर्षों से प्रतिष्ठित आयुर्वेद के ऋषि-मुनियों का अनुभव है, तो दूसरी तरफ एक विदेशी संस्था द्वारा दूध न पीने के खोखले तर्क हैं। यह अवश्य जान लें कि विदेशी संस्था की नीयत बिलकुल ही साफ नहीं है।
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    bahut bahut sahi baat kahi aapne.....is sundar aalekh dwara jansadharan ko sachet karne hetu aapka bahut bahut aabhaar....

    ishwar kare bharteey janmanas baazaar ke is dushchakra ko pahchane aur shakahaar ko prerit hote hue gou mata ke mahatva ko pahchane tatha iska sadaiv aadar kare.

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