बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

तीसरी कसम: साहित्यिक कृति पर बनी कालजयी फिल्म


भले ही गीतकार शैलेन्द्र (फिल्म निर्माता) को इस फिल्म की वजह से अपनी जान गंवानी पडी हो, पर सच है कि तीसरी कसम ने शैलेन्द्र को अमर कर दिया। शैलेन्द्र ही क्यों, राजकपूर को अभिनय की अप्रतिम ऊंचाई तक पहुंचाने और कथाकार रेणु के नाम को आमजन तक पहुंचाने का काम भी इस फिल्म ने किया।
सेल्यूलाइड पर लिखी एक हृदयस्पर्शी कविता तीसरी कसम सिर्फ इसलिए एक यादगार फिल्म नहीं है कि इसे सर्वोत्तम फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण कमल पुरस्कार प्राप्त हुआ, बल्कि इसलिए भी कि मित्रों और खासतौर पर राजकपूर के इस आग्रह और सुझाव को भी गीतकार से पहली बार निर्माता बने शैलेन्द्र ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया कि फिल्म की व्यावसायिक सफलता के लिये मूलकथा में मामूली हेरफेर कर दिया जाये। वस्तुत: शैलेन्द्र को इस कहानी से प्यार था, और वे इस कथा को जस का तस फिल्माना चाहते थे। उन्हीं के आग्रह पर रेणु जी ने स्वयं फिल्म के संवाद लिखे।
रेणु की मूल कथा मारे गये गुल्फाम पर आधारित यह फिल्म बासु भट्टाचार्य का भी बेहतरीन मास्टरपीस माना जाता है। हालांकि उन्होंने इन्हीं वर्षो में कई और समानान्तर फिल्में निर्देशित कीं, जैसे- अनुभव (1971) आविष्कार (1973) और गृह प्रवेश (1980) लेकिन तीसरी कसम जैसा जादू और कोई फिल्म कर न सकी। फिल्म की पृष्ठभूमि को देखते हुए प्रारंभ में फिल्म की शूटिंग की योजना बिहार और नेपाल के ग्रामीण इलाकों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, लेकिन कई कारणों से वास्तविक फिल्म इगतपुरी (महाराष्ट्र) में शूट की गई। (पूर्व में मधुमती फिल्म की शूटिंग भी यहीं की गई थी।) कथा में उपस्थित और फिल्म में जतन से संवार कर रखे गये चार तत्व इस फिल्म को चिर-स्मरणीय बनाते हैं। एक हीरामन और हीराबाई के बीच के सहज मानवीय संबंधों की ऊर्जा और धीरे-धीरे पनपी स्वाभाविक अंतरंगता (भौतिक नहीं) दर्शक जिसके साथ अपने को आत्मसात करता है। हीराबाई को हीरामन का जमीनी चरित्र और संगीतमय जीवन-दर्शन प्रभावित करता है, जिसे वह अपने गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है, वहीं हीरामन को नौटंकी वाली बाई की बेबसी बांधती है। इस संबंध को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। यह संबंध समाप्त होने के लिए बना है, इस दर्द का एहसास दर्शक को शुरू से हो जाता है। इन बेहद मुश्किल और संश्लिष्ट चरित्रों को राज और वहीदा रहमान ने जिस खूबसूरती और सहजता से निभाया है वह देखने की चीज है।
भाव-भंगिमा और आंखों से भावनाओं को, उल्लास और दर्द को व्यक्त करवा लेने की सफलता ही निर्देशक की सफलता है। राज की शो मैन वाली छवि इस फिल्म में टूट-टूट कर बिखर गई है और यहां है बात-बात में लजाने, शरमाने वाला एक गंवई, ठेठ गाडीवान! दूसरी तरफ नृत्य-कौशल के चलते हीराबाई ने नौटंकी वाली बाई के चरित्र को जीवन्त बना दिया है। फिल्म का दूसरा सशक्त पक्ष है इसका स्वाभाविक चित्रण, छायांकन और दृश्य संयोजन, जो कथा की मांग थी। सत्यजीत रे की कई फिल्में करने वाले सुब्रत मित्रा का छायांकन बेमिसाल तो है ही, दृश्य की मांग और प्रकृति के अनुसार भी है। गांव के नैसर्गिक सौंदर्य को लगभग अकृत्रिम प्रकाश व्यवस्था के साथ श्वेत-श्याम फिल्मांकित किये जाने से एक-एक शॉट का सौंदर्य कथा की काव्यात्मकता के साथ मेल खाता हुआ है। प्रतीकात्मक बिम्बों का इस्तेमाल छायाकार और निर्देशक की पटकथा पर पकड को रेखांकित करता है। फिल्म का तीसरा सशक्त पक्ष है इसके संवाद, जो स्वयं रेणु के लिखे हुये हैं। संवादों की रवानगी, सहजता और ठेठपन कथा को कहीं से बिखरने नहीं देते। मूल कथा लेखक ही फिल्म का संवाद लिखे, ऐसे कम उदाहरण मिलेंगे, परन्तु तीसरी कसम के संवाद दर्शक की जुबान पर अनायास चढ जाते हैं, तो इसलिए कि इसमें मीठा सा सोंधापन है।
फिल्म का चौथा सशक्त पहलू है इसके गीत और मधुर संगीत। हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र ने इस फिल्म के गीत लिखते वक्त न केवल फिल्म के समूचे परिवेश और चरित्रों को ध्यान में रखा, बल्कि लोकधुन और नौटंकी विधा को भी साथ लिया। (पान खाये सैंय्या हमारो..)। हीरामन के समूचे चरित्र को उभारता सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. या फिर दुनियां बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई... के बहाने हीरामन का गांव की लडकी महुआ को याद करना, या फिर नौटंकी शैली में लिखा गया गीत आ, अब तो आजा, रात ढलने लगी.. ऐसे गीत हैं जो आज भी कान में पडते ही जुबान पर आ जाते हैं। ग्रामीण परिवेश का एक और गीत चलत मुसाफिर मोह लियो रे.. भी एक सदाबहार गीत है। शंकर जयकिशन का संगीत शोर रहित और कर्णप्रिय तो है ही, कथ्य के साथ न्याय भी करता है।
आज जबकि भारतीय फिल्म जगत से अच्छी साहित्यिक कृतियों का नाता लगभग टूट चुका है। फिल्म उद्योग की जटिलतायें इतनी बढ चुकी हैं कि कोई निर्माता पचासों करोड खर्च करके किसी साहित्यिक रचना पर फिल्म बनाने का खतरा चाहकर भी मोल नहीं ले सकता, तीसरी कसम जैसी 70 से 90 के दशक में बनी ऐसी तमाम फिल्मों का याद आना स्वाभाविक है। आज भी बंगला फिल्म जगत में साहित्यिक फिल्मों के अच्छे दर्शक हैं। दूसरी तरफ हिंदी कृतियों की कमी नहीं, पर फिल्में नहीं बनतीं। कारण कई हैं, पर एक बडा कारण है हिन्दी लेखकों का अलग-थलग कटे रहना और हिन्दी कृतियों का सीमित पाठक वर्ग। एक दूसरी वजह है अच्छे पटकथा लेखकों का अभाव, जो एक अच्छी कृति को एक सफल पटकथा में बदल सकें।
[प्रभु झिंगरन]

3 टिप्‍पणियां:

  1. जितना सटीक विश्लेषण, उतना ही सटीक लेख। हमें फिल्मों में साहित्य की ओर एक न एक दिन लौटना ही होगा।

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  2. बस इतना पता है की इस पिक्चर को अपनी शर्तो पर बनाने ओर इसकी मूलकथा को ज्यूँ का त्यु रखने की खातिर हमने शैलेन्द्र जी जैसे हीरे को खो दिया ....जो अपने आखिरी दिनों में अवसाद ओर कर्ज तले गुजर गये .आज हम इसे क्लासिक कहते है पर उस दौर में इसे वितरक नहीं मिले ओर सिनेमा हाल में दर्शक नहीं.....पर निसंदेह इसमें आज भी उनकी आत्मा बस्ती है

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  3. एक उल्‍लेख और।
    फिल्‍म के कुछ गीतों के मुखडे मूल कहानी में ही मिलते हैं।

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