शुक्रवार, 27 मार्च 2009

हाशिए पर पहुंँचे देश के तीन महान नेता


डॉ. महेश परिमल
आज राजनीति का परिदृश्य बदल गया है। नेताओं ने समय के साथ चलना शुरू कर दिया है। अब तो वे भी कंप्यूटर और लेपटॉप की बात करने लगे हैं। वे यह अच्छी तरह से समझते हैं कि यदि आज की पीढ़ी को लुभाना है, तो नई तकनीकों का सहारा लेना ही होगा। इसके बाद भी यह तय नहीं है कि उनकी छबि साफ और शफ्फाक होगी। अब राजनीति भी एक मुश्किल राह हो गई है। न जाने कब कौन कहाँ हाशिए पर चला जाए, कहा नहीं जा सकता। राजनीति किसी को रिटायर नहीं करती, पर लोग कब इससे दूर चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। कभी अपने कांधों पर पूरा देश उठाने वाले आज स्वयं अपने पैरों से चल भी नहीं पा रहे हैं। दो कदम चलने के लिए उन्हें लोगों के सहारे की जरूरत पड़ने लगी है।
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यहाँ उन तीन नेताओं का जिक्र जरूरी है, जो इन दिनों हाशिए पर हैं। इन्हें सुनने के लिए लोग घंटों खड़े रहते थे। उनकी बातें ध्यान से सुनते थे और उस पर विचार भी करते थे। इनमें से एक ने प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया है, दूसरे ने प्रधानमंत्री पद ठुकराया है और तीसरे प्रधानमंत्री पद तक तो नहीं पहुँच पाए,पर रक्षा मंत्री के पद को अवश्य सुशोभित किया। इनके नाम हैं अटल बिहारी वाजपेयी, योति बसु और जार्ज फर्नाण्डीस। अटल जी की हालत हाल ही में एक बार फिर बिगड़ गई थी, वे अब स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। योति बसु भी एकदम निष्क्रिय हैं। जार्ज फर्नाण्डीस भी अशक्त हो गए हैं। बिना सहारे उनसे चला भी नहीं जा रहा है। एक समय ऐसा भी था, जब इनमें अद्भुत कार्य क्षमता थी। इनके काम करने की क्षमता से कई युवा नेता भी हतप्रभ रह जाते थे। इनकी इमेज इतनी साफ-सुथरी थी कि पूरी पार्टी को अपने कांधों पर लेकर चलते थे। इनके भाषण इतने ओजस्वी हुआ करते थे कि सत्तारूढ़ दल की हालत पतली हो जाती थी। जहाँ भी अटल जी की सभा होती, निश्चित रूप से वह कांग्रेस का वोट खींच लाने का काम करती। इसीलिए अटल जी की सभा के बाद कई दिग्गज नेता वहाँ पहुँचते और उन्हें तमाम दलीलों को झूठा साबित करने की पुरजोर कोशिश करते। जार्ज फर्नाण्डीस की एक आवाज से उद्योगपति ढीले पड़ जाते। योति बसु की पश्चिम बंगाल में ऐसी धाक थी कि भाजपा या कांग्रेस को एंट्री ही नहीं मिल पाती। वामपंथियों की सबसे बड़ी ताकत पश्चिम बंगाल में ही थी। ये तीनोें प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करें, ऐसे पक्के राजनीतिज्ञ थे। इन तीनों ने धन से अधिक महत्व राष्ट्रहित को दिया। अपने सिद्धांतों के कारण कई बार इन्होंने सत्ता के सिंहासन को लात मारी है।
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जब केंद्र में जनता दल का शासन था, तब ऐसे समीकरण बने थे कि योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के काफी करीब हो गए थे। सब कुछ तय हो गया था, जब योति बसु ने पार्टी से पूछा तो पार्टी के सदस्यों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार करने को कहा। योति बसु ने बिना किसी देर के प्रधानमंत्री पद को ठुकरा दिया और पार्टी के निर्णय को सर्वोपरि बताया। ऐसा ही कुछ जार्ज फर्नाण्डीस के मामले में भी हुआ, प्रतिपक्षी दल एक हुए, तो उनके सामने एक ही प्रश्न था कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा? तब सभी ने उस समय के 'हाट केक' जार्ज फर्नाण्डीस का नाम सामने किया। जार्ज का नेटवर्क इतना बड़ा था कि कोई नेता उनकी बराबरी में नहीं आता था। जब जार्ज का नाम प्रधानमंत्री पद की दौड में आगे आया, तो दूसरे ही दिन उन्होंने पत्रकार वार्ता में कहा ''आई एम नाट इन द रेश'', दूसरे दिन कई अखबारों की यह हेडलाइंस थी ''आई एम नाट इन द रेश''। वाजपेयी सरकार के समय जार्ज रक्षा मंत्री बने थे। खादी का सफेद पायजामा, बिना इस्तरी का कुरता, खींचकर कोहनी तक लाई गई बाँह, काली डंडी का चश्मा और बेतरतीब बाल, यह उनकी खासियत थी। जब वे लेबर यूनियन में सक्रिय थे, तब वे अपने कांधे पर लटकता हुआ झोला रखते थे। अटल जी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार किया और एक स्थिर सरकार भी दी।
यहाँ आश्चर्य की बात यह है कि इन तीनों राजनीतिज्ञों ने राजनीति को फुल टाइम जॉब बनाया था। आज की राजनेता इनके सामने बिलकुल ही बौने नजर आते हैं। इतने अशक्त होने के बाद भी जार्ज बिहार में लालू की दाल नहीं गलने देते। लालू ने बिहार में हीरो बनने की काफी कोशिशें की, पर हर बार जार्ज उन पर भारी पड़ जाते हैं। उक्त तीनों राजनीतिज्ञों के पास अनुभवों का खजाना है। यही नहीं उनके सीने में देश के कई रहस्य छिपे हुए हैं। राजनीति के कई उतार-चढ़ाव और धूप-छाँव के दिन इन्होंने देखे हैं। कई बार अपमान सहकर भी इन्होंने अपने सधे कदमों से राजनीति के स्तर को ऊँचा उठाया है। आज ये तीनों राजनेताओं को चलने-फिरने के लिए सहारे की जरूरत पड़ती है। राजनीति की नब्ज को पहचानते हुए अच्छी यह तरह से जानते हैं कि बिना क्षेत्रीय दलों के राजनीति करना मुश्किल है। उनसे बिना जोड़-तोड़ किए देश की राजनीति सही दिशा पर नहीं चल पाएगी। इन तीनों के अनुभवों का लाभ राजनीतिक दल उठाएँ, इससे अच्छी बात कोई और हो ही नहीं सकती। विवादास्पद बयानों से दूर रहकर इन्होंने जो राजनीति की है, वह आज के नेताओं के लिए एक सबक है।
आज कितने नेताओं के लिए ये नेता आदर्श हैं? चुनाव की तलवार लटक रही है, आज नेता रंग और भेष बदलकर अपने मतदाताओं के पास जाने के लिए तैयार हैं, पर कितने नेता ऐसे हैं, जिन्हें अपने मतदाता पर पूरा विश्वास है? कितने नेता हैं, जो ईमानदारी से देश सेवा को अपना सच्चा धर्म समझते हैं? कितने नेता हैं, जिन्होंने अपनी तमाम सम्पत्तियों का ईमानदारी से खुलासा किया है? अरे छोड़ो, एक नेता भी बता दें, जो बिना सुरक्षा के अपने मतदाताओं के सामने पहुँच पाए? इस तरह के कई प्रश्न अनसुलझे हैं, जिसे इस बार चुनाव में हमें सुलझाने हैं।
डॉ. महेश परिमल

4 टिप्‍पणियां:

  1. यही समय की गति है महेश जी. ये लोग भी सोच रहे होंगे, काश! नेहरू परिवार से होते. देश हाशिए पर चला जाता, पर कब्र में जाकर भी हम हाशिए पर न जाते.

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  2. नववर्ष की शुभकामनाएँ।
    भारत का यह दुर्भाग्य है कि राजनीति को कभी महत्व न देकर सदा राज परिवार को ही महत्व दिया है। परिवारवाद के चलते केवल किसी विशेष परिवार से सम्बन्ध रखना ही सबसे बड़ी योग्यता हो गई है। आज भी देश में ऐसे लोग हैं जो समाज व राजनीति को समर्पित हैं। किन्तु हमें तो ऐसा नेता चाहिए जो हम पर शासन कर सके न कि हमारे लिए काम करे। अतः हम बाहरी तामझाम व चमक के नाम पर ही अपने नेता को चुनते हैं। सदियों की गुलामी ने हमारी मानसिकता को भी गुलाम बना दिया है। दंडवत प्रणाम किए बिना हमारा खाना हजम नहीं होता। हमें वह नेता नहीं चाहिए जो हमें आत्मसम्मान से जीना सिखाए या जीने दे, हमें तो वह चाहिए जो हमें दान में रोटी बाँटे, चाहे वह हमारे ही पसीने की कमाई हो।
    घुघूती बासूती

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  3. यह सही है कि हम परिवारवाद के शिकार हैं, मगर क्या इंदिरा, राजीव ख़राब प्रधानमंत्री थे?

    अटल, ज्योति महान नेता हैं, मगर जॉर्ज उतने बड़े कद के नेता नहीं हैं | वे एक बड़े यूनियन लीडर हैं. उनसे बड़े कद और महान नेता सोमनाथ साहब हैं, जो अब अतीत का हिस्सा हो चुके हैं....

    हाँ, अब परिवारवाद किस पार्टी में नहीं है, जरा आप अपने पर इसका खुलासा कीजियेगा? प्रतीक्षा रहेगी..

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