बुधवार, 1 अप्रैल 2009

सियासत की हकीकत से हर कोई नहीं वाकिफ

डॉ. महेश परिमल
भारतीय प्रजातंत्र की जब भी बात होती है, हमारे देश के नेता इसे देश की आधारशिला निरुपित करते हैं। यहाँ बहुमत का बोलबाला है। बहुमत के नाम पर ऐसा बहुत कुछ हो जाता है, जो प्रजातंत्र की सीमा में नहीं आता। हमारे देश में अभी 15 वीं लोकसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। इस चुनाव में जो भी प्रत्याशी विजयी होता है, तो उसका विजय जुलूस निकलता है। अपने भाषण में वह मतदाताओं का आभार मानता है कि उन्होंनें उसे बहुमत से विजयी बनाया। इसके साथ ही पराजित प्रत्याशी का कहना होता है कि लोगों ने अपने मत के माध्यम से जो आदेश दिया है, वह सर माथे पर। क्या हकीकत यही है? क्या विजयी प्रत्याशी या दल हमेशा ऐसा दावा करने की स्थिति में होता है कि अधिकांश मतदाताओं ने उन्हें पसंद किया है।
अब तक हमारे देश में हुए 14 लोकसभा चुनाव में कभी भी 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं से मतदान नहीं किया है। सत्ता प्राप्त करने वाले किसी भी दल ने कुल मतदान का 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं किया है। दूसरे शब्दों में अब तक जितने भी दल सत्ता पर काबिज हुए हैं, उन्होंने 30 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। इसके बाद भी वे बहुमत का दावा कर सिंहासन पर आरूढ हुए हैं। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद जो सहानुभूति लहर चली और कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की, तब उसे 55 प्रतिशत नागरिकों ने मतदान किया था। कांग्रेस को कुल मतदान का केवल 37 प्रतिशत मत ही मिले थे। इस तरह से कुल मतदाताओं का केवल 20 प्रतिशत लोगों का समर्थन प्राप्त कर नरसिंह राव 5 वर्ष तक आराम से शासन करते रहे। जिन 80 प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को वोट नहीं डाला था, उन्हें भी पूरे 5 वर्ष तक कांग्रेस का शासन सहन करना पड़ा था।
1977 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल समाप्त कर नए चुनाव की घोषणा की थी, तब जनता पार्टी सत्ता पर काबिज हुई थी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। इस जनता पार्टी के पास उस समय कुल मतदान का 41.03 प्रतिशत ही मत थे। भारतीय मतदाताओं ने सबसे अधिक समर्थन जिस दल को दिया है, वह 1984 में बनी राजीव गांधी कांग्रेस सरकार ही थी। उस समय कांग्रेस को 49.1 प्रतिशत मत मिले थे, शेष 50.9 ने कांग्रेस के खिलाफ ही वोट दिया था।
भारतीय संविधान में सरकार बनाने की जो पद्धति है, वह ब्रिटिश संविधान से प्रभावित है। यह पद्धति आज बिलकुल भी प्रासंगिक नहीं है। हर 5 वर्ष बाद हमारे देश में लोकसभा चुनाव होते हैं, इसमें जिस पार्टी को जितने अधिक प्रतिशत मत मिले, आवश्यक नहीं है कि सरकार उसी पार्टी की बने। 1998 के चुनाव में कुछ ऐसा ही हुआ था। इस चुनाव में भाजपा को कुल मतदान का 25.6 प्रतिशत मत ही मिले। दूसरी ओर कांग्रेस को इससे .2 प्रतिशत यानी 25.8 प्रतिशत मत मिले, इसके बाद भी सरकार भाजपा की बनी। अधिक मत मिलने का आशय यह कतई नहीं है कि अधिक सीटें मिले। भाजपा को इस चुनाव में कुल 182 सीटें मिली थीं, उधर अधिक मत प्राप्त करने वाली कांग्रेस को कुल 141 सीटें मिली थी। इस तरह से कम मत प्राप्त करने वाले दल अन्य दलों का सहारा लेकर सत्ता पर काबिज हो सकते हैं।
यह आवश्यक नहीं है कि लोकसभा चुनाव में राजनैतिक दलों को जो सीटें प्राप्त होती हैं वह उन्हें प्राप्त हुए मतों के बराबर हो। 1984 के चुनाव में कांग्रेस को 49 प्रतिशत मत के साथ लोकसभा की 70 से भी अधिक सीटें मिली थी। इसके विपरीत 1977 में जनता पार्टी को 41.3 प्रतिशत मत मिले, पर सीटों की संख्या 60 थी। 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 28.3 मत मिले थे, इसके खिलाफ भाजपा को 23.75 प्रतिशत ही मत मिले, इसे यदि सीटों की दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस को 114 और भाजपा को 182 सीटें मिली थी। इस तरह से देखा जाए, तो जितने मतदाता भारत में है, उसके मात्र 12 प्रतिशत मतदाताओं के समर्थन के साथ भाजपा ने 33 प्रतिशत सीटें प्राप्त की थी और भाजपा ने पूरे 5 साल तक शासन चलाया। 2004 के चुनाव में देखा जाए, तो कांग्रेस को मिले मतों के प्रतिशत में कमी आई थी, फिर भी कांग्रेस सत्ता पर काबिज हो गई।
भारतीय लोकतंत्र में जनता के फैसले का अनादर किया जाता है, इसके बाद भी हमारे इसे बदलने के लिए हमारे राजनेता आतुर दिखाई नहीं देते। इस प्रणाली में मतदाताओं को मूर्ख बनाकर सत्ता पर कब्जा करना उनकी आदत में शामिल हो गया है। जहाँ भारतीय लोकतंत्र वर्षों से एक ही ढर्रे पर चल रहा है, वहीं विश्व के अनेक देशों में कुछ अलग ही तरह की चुनाव प्रक्रिया अस्तित्व में है। पश्चिम यूरोप के देशों में जो दल जितने प्रतिशत मत प्राप्त करता है, उतने प्रतिशत सीटें उसे संसद में प्राप्त होती है। इस प्रणाली को पी आर (प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम) कहा जाता है। जर्मनी में संसद की 50 प्रतिशत सीटें भारत की तरह बहुमत के आधार पर भरी जाती हैं। शर्त इतनी ही होती है कि ये 50 प्रतिशत सीटें किसके हिस्से जाएगी, इसके लिए सभी प्रत्याशियों की सूची राजनैतिक दल चुनावी मैदान में उतरने के पहले ही घोषित करनी पड़ती है। पश्चिम यूरोप, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, बेल्जियम, इटली, स्विटजरलैंड, में तो 'अनुमानित प्रतिनिधित्व' की पद्धति से जितने प्रतिशत मत प्राप्त किए हैं, उतने प्रतिशत सीटें राजनैतिक दलों को प्रदान की जाती है। भारत में 1999 के चुनाव में यह प्रणाली अपनाई जाती, तो कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें लोकसभा में प्राप्त हुई होती। फ्रांस में संसद सदस्यों के चुनाव के लिए दो बार मतदान कराया जाता है। पहले चरण में जिन प्रत्याशियों को सबसे कम मत मिले हों, उनको हटाकर मुख्य प्रतिस्पर्धियों के बीच दूसरी बार मतदान कराया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में जितने उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते हैं, उन्हें रेंक दे दिया जाता है। इस रेंक के आधार पर सबसे योग्य प्रत्याशी का चुनाव किया जाता है।
भारतीय प्रजातंत्र में ऐसी विचित्र परिस्थिति है कि मतदाता के सामने उनका सांसद भी होता है, जिसके मत से प्रधानमंत्री का चुनाव होता है। इसमें कई बार ऐसा होता है कि सांसद आपराधिक प्रवृत्ति का है, फिर भी वह जिस पार्टी के लिए खड़ा होता है, वह भी प्रधानमंत्री चुनने के लिए महत्वपूर्ण साबित होता है। इस परिस्थिति में अपना वोट किसे दिया जाए, मतदाता को यह उलझन होती है। केंद्र सरकार में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चुनाव आम मतदाता नहीं करता। जिसने कभी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी वह प्रधानमंत्री बन सकता है। अब राय की बात करें, तो राय में मुख्यमंत्री ही सब कुछ होता है। इसका चुनाव भी मतदाता नहीं करते। जिसने कभी विधानसभा चुनाव न लड़ा हो, वह भी मुख्यमंत्री बन सकता है। फिर 6 महीनों के अंदर उसे विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में खड़े होकर विजयश्री हासिल करनी होती है।
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे मतदान के माध्यम से होता है। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति कभी सेनेट के मोहताज नहीं होते। भारत में जिस तरह सांसदों की खरीद-फरोख्त कर प्रधानमंत्री की कुर्सी को खतरे में डाला जाता है, या फिर प्रधानमंत्री को कुर्सी छोड़ने के लिए विवश किया जाता है, ऐसा अमेरिका में कभी नहीं होता। क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को सेनेटर नहीं, बल्कि आम मतदाता चुनता है।
भारतीय परिदृश्य में देखें तो अब समय आ गया है कि देश के प्रबुद्ध मतदाताओं और धर्मगुरुओं को जागरुक बनकर इस प्रणाली को बदलने के लिए अभियान चलाना चाहिए। देशसेवा के नाम पर मलाई मारते, विदेशी शक्तियों के दलाल बने ऐसे सांसदों की पकड़ से देश को मुक्त कराया जाए, तभी हमारा देश सच्चे अर्थों में 'स्वतंत्र' राष्ट्र कहलाएगा।
डॉ. महेश परिमल

1 टिप्पणी:

  1. बढिया आलेख ... सुंदर विश्‍लेषण किया आपने ... सहमत हूं आपसे।

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