शनिवार, 18 अप्रैल 2009

आत्महत्या समाधान नहीं, जीवन का अन्त है

डॉ. महेश परिमल
जब से वैश्विक मंदी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया है, तब से केवल देश ही नहीं, बल्कि महानगरों, शहरों एवं कस्बों में आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया है। हर रोज अखबारों में हम पढ़ते हैं कि फलां शहर में एक व्यक्ति ने घर के सभी सदस्यों को मारकर स्वयं आत्महत्या कर ली। कहीं कोई अपने कार्यालय में ही आत्महत्या कर रहा है, तो कोई घर पर ही इस कार्य को अंजाम दे रहा है। बेकारी से तंग आकर या कर्जदारों की धमकियों से डरकर भी आत्महत्या करने वालों की संख्या कम नहीं है। कई लोग नौकरी से निकाले जाने पर आत्महत्या कर रहे हैं, तो गुजरात में हीरा बाजार में छाई मंदी से बेरोजगार बने कारीगर आत्महत्या कर रहे हैं। इस मंदी ने अब तक हजारों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। आश्चर्य इस बात का है कि सभ्रांत और शिक्षित लोगों में यह अधिक देखा जा रहा है। कई लोग तो केवल किसी दोस्त ने आथर््िाक सहायता नहीं की, इसलिए आत्महत्या कर रहे हैं, तो कुछ को यह भ्रम सता रहा है कि परिवार की बरबादी के लिए वे ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं, इसलिए उन्हें जीने का कोई हक नहीं। मौत को आसानी से गले लगाने वालों की मनोदशा क्या होती है,आखिर क्यों वरदान में मिले जीवन को अभिशाप मानते हैं? किस तरह से आता है उनमें नैराश्य का भाव। आइए इसका विश्लेषण करें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 1 लाख लोगों में से 98 लोग आत्महत्या करते हैं। चीन में आत्महत्या का प्रतिशत एक लाख में 99 है। यह देखते हुए भारत आत्महत्या के मामले में दूसरे नंबर पर आता है। 1995 में 89 हजार लोगों ने आत्महत्या की थी। यह संख्या 1997 में बढ़कर 96 हजार हो गई। 1998 में 1 लाख 4 हजार से भी अधिक लोगों ने आत्महत्या का सहारा लिया था। हमारे स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष सवा लाख लोग आत्महत्या कर मृत्यु को प्राप्त करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि भारत में खुदकुशी करने वालों में 37.8 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। जबकि 71 प्रतिशत 44 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। हाल ही मेें बढ़ रहे आत्महत्या के मामलों में इस दु:खद सच्चाई को स्वीकार किया गया है।
खुदकुशी का सहारा लेने वाले कोई अलग से नहीं होते। वे अपनों में से ही होते हैं। आत्महत्या की धमकी देने वाले तो आत्महत्या नहीं करते, पर जो हमेशा दूसरों को जीने की प्रेरणा देते रहते हैं, कभी-कभी वे स्वयं भी अपने उपदेशों को भूलकर आत्महत्या का सहारा ले लेते हैं। इसके पीछे हैं कुछ आर्थिक और कुछ सामाजिक कारण। समाज में हमने ही कुछ ऐसे सिद्धांत बना रखे हैं कि अगर वे कुछ नहीं करेंगे, तो समाज क्या कहेगा, हमारी प्रतिष्ठा का क्या होगा? इस भाव से ग्रस्त लोग बहुत ही जल्दी आत्महत्या का सहारा लेते हैं। एक साहब को एक बड़ी कंपनी छोडऩी पड़ी, तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह आ गई कि अब उन्हें कार के लिए ड्राइवर कंपनी से नहीं मिलेगा, अब तक जो कंपनी के नाम से विदेश यात्राएँ होती थी, वे अब नहीं होंगी। यही खयाल उन्हें डिपे्रशन की ओर ले गया और उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उनके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा मौत से भी अधिक प्रिय थी। प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी प्रतिष्ठा के कारण ही कई लोग समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
सुशिक्षित और सभ्य समाज के सक्षम आदमियों को स्वयं ही जिंदगी के सफर को आधे रास्ते पर छोड़ देने का और अंतिम विदा लेने का अमंगल विचार आखिर क्यों आता है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक कारण बताते हुए दिल्ली के आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के मनोचिकित्सक प्रोफेसर मंजू मेहता कहती हैं कि हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में धनोपार्जन के लिए घर से बाहर निकलते परिवार के कमाऊ पुरुष इतने मशीन हो जाते हैं कि वे कमाने के सिवाय और कुछ नहीं सोचते। इस स्थिति के वे इतने आदी हो चुके होते हैं कि घर की आथर््िाक स्थिति खराब होने पर वे हताशा में घिर जाते हैं, उन्हें लगता है कि इसके लिए केवल वे ही जिम्मेदार हैं। उन्हें जीने का कोई अधिकार नहीं है। यह स्थिति भयावह है, इसके लिए सामाजिक व्यवस्था को दोषी मानना चाहिए।
जो आत्महत्या करने वाले होते हैं, कभी-कभी वे इसका हलका-सा संकेत भी देते हैं। हमें इसका ध्यान रखना होगा। कोई व्यक्ति एकाएक जब सभी मित्रों-संबंधियों से उत्साह से लबरेज होकर मिले, भूतकाल में संतानों या मित्रों के साथ किए गए झगड़े या विवाद को भूलकर सुलह करना चाहे। इससे बढ़कर यदि वह अपनी सबसे पसंदीदा चीज को भेंट के रूप में किसी को देने के लिए तैयार हो जाए, तो यह समझना चाहिए कि वह किसी कार्य को अंजाम देने की पूर्व तैयारी कर रहा है। ऐसा कई बार हो चुका है। जो आत्महत्या का संकल्प कर लेते हैं, वे अक्सर अपनों से मिलकर खूब बतियाते हैं। अंत में अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर आए इस तरह के अचानक बदलाव को हमें ध्यान देना होगा। यदि समय रहते इस दिशा में सचेत हो जाए, तो उसे व्यक्ति को बचाया जा सकता है।
सबसे बड़ी बात है अपनों के बीच अपना रहने की कला। कई लोग हमेशा दुत्कार प्राप्त करते हैं। कुछ लोगों को दुत्कार का पहला अनुभव होता है, वे बहुत ही जल्द निराशा से घिर जाते हैं। कुछ लोग खुशियों में भी दु:ख की झलक पाते हैं, तो कुछ लोग दु:ख में भी खुशियों के पलों को एक तरह से चुरा ही लेते हैं। आत्महत्या का प्रयास करने वाले वास्तव में मरना नहीं चाहते, अपनी हरकतों से वे मदद के लिए आर्तनाद करते हैं। ऐसे लोग भले ही जीवन से आशा छोड़ चुके हों, पर हमें उन्हें विषम परिस्थितियों में या रामभरोसे नहीं छोडऩा है। ऐसे लोगों से इस तरह का व्यवहार किया जाए, जिससे उनके मन में ' आज फिर जीने की तमन्ना हैÓ का विचार आए। हताशा से घिरे युवाओं को खुदकुशी के विचार से ही दूर रखने के लिए परिवारजनों को स्नेहभरे वातावरण, सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार और तटस्थ व्यवहार की आवश्यकता होती है। जो खुदकुशी के कश्मकश से लगातार जूझते रहते हों, ऐसे लोगों को सांत्वना और हिम्मत देनी चाहिए, ताकि वे जीवन को समाप्त करने के पहले सौ बार सोचें।
अकसर ऐसा होता है कि जिनके मन में आत्महत्या का विचार आ जाता है, वे अपने दिमाग से काम लेना बंद कर देते हैं। वे एकांत में रहना पसंद करते हैं। लगातार कुछ न कुछ बुरा सोचते रहने से वे स्वभाव से चिड़चिड़े हो जाते हैं। उन्हें न तो अपनों का साथ अच्छा लगता है और न ही वे किसी का साथ चाहते हैं। यह स्थिति बहुत ही खतरनाक होती है। ऐसे लोगों के सामने निराशा की बातें तो करनी ही नहीं चाहिए। उसे अपनों के बीच रखने की कोशिश करें। अगर संतानें उसके करीब हों, तो बुरे विचारों का आना रुक सकता है। उसके सामने उसी के जीवन की उन घटनाओं का जिक्र करें, जिसमें उसने साहस का प्रदर्शन किया था। उन बुरे हालात का जिक्र करें, जिसका सामना उसने डटकर किया। उसके जीवन की उपलब्धियों को गिनाना शुरू कर दें, तो उसे लगेगा कि उसमें साहस तो है, जो आज खो गया है। अंधकार भरे जीवन में ऊर्जा और साहस की किरण बनकर उनके जीवन में प्रवेश करें।
यह अच्छी तरह से जान लें कि जीवन एक बार ही मिलता है। यह बहुत ही कीमती है। जीवन लेना सरल है, किंतु जीवन देना मुश्किल है। मुश्किलें तो आती ही रहती हैं, वह हमें तराशने का काम करती हैं। जीवन में मुश्किलें जितनी अधिक आएँगी, इंसान भीतर से उतना ही मजबूत बनता है। आत्महत्या किसी समस्या का समाधान कतई नहीं है। यह निराशा के क्षणों में लिया जाने वाला एक कायराना फैसला है। ईश्वर और माता-पिता की ओर से दिया गया एक तोहफा है, यह जीवन। इसे इस तरह से तो न गँवाया जाए, जिससे मानवता को भी रोना आ जाए। याद रखे, जीवन एक बार ही मिलता है और मौत बार-बार हमारी परीक्षा लेने आती है। जीवन को उससे जीतना ही है, तभी तो मौत को मात देने की हिम्मत पैदा होती है। अंत में एक बात.. अगर आप ईमानदार हैं, तो खुदकुशी नहीं कर सकते।
डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. मैं कई ईमानदार व्यक्तियों को जानता हूँ जो खुदकुशी की कोशिश कर चुके हैं। उनमें ईमानदारी की कोई कमी नहीं थी, बस उनमें समस्याओं से लड़ने का साहस नहीं था।

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  2. Sartha aalekh ke liye aabhaar.

    Bahut sahi kaha aapne..vichaarwan vyakti bhi kabhi kabhi hatasha aur awsaad me ghirkar pranant karne ko sachesht ho jate hain...vastutah yahi pareeksha ka samay hota hai,jise yadi vyakti paas kar le to ek anokhe urja se bhar jata hai.

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  3. हर उम्र में जो अपनी जिम्‍मेदारियों को संभालते हैं ... उनका कठिनाइयो से अक्‍सर वास्‍ता पडता है ... इसलिए वे इसे अच्‍छी तरह झेलना जानते हें ... पर जिनके सामने अचानक जवाबदेही और समस्‍या दोनो ही आ जाएं ... उनका हिम्‍मत काम नहीं करता और निराशा के शिकार होकर वे आत्‍महत्‍या जैसे कृत्‍य को अंजाम देते हें।

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