गुरुवार, 4 जून 2009

करोड़पति बनने गई लखपतियों की संतानों की चिंता


डॉ. महेश परिमल
भारत के जिनकी संतानें ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रही हंै, उसके माथे पर ङ्क्षचता की लकीरें हैं। अपनी संतानों के हाल-चाल जानने के लिए वे आतुर हैं। भारतीय छात्रों पर लगातार हो रहे हमलों ने उन्हें व्यथित कर दिया है। उधर भले ऑस्टे्रलिया में भारतीयों की तनी हुई मुट्ठियाँ देखकर पूरे विश्व के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया हो, पर सच तो यह है कि इसका दूसरा पहलू भी है, जिसे कोई समझना ही नहीं चाहता। आज ऑस्ट्रेलिया में गरीब-अमीर के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। इस दिशा में किए जा रहे तमाम सरकारी प्रयास बौने सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे मेें गरीबों का गुस्सा भारतीय विद्यार्थियों पर निकल रहा है। इस पर इतना हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। हमारे देश में भी नस्ल को लेेकर हमले होते रहे हैं। इस पर तो कभी इतना विवाद नहीं हुआ। इतना जान लें कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर जो हमले हुए हैं, उसमें हमलावर गरीब है। जो अपनी खीज ही निकाल रहा है। किसी गरीब भारतीय छात्र पर हमले की कोई खबर पढऩे में आई।
जब मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी गई थी, तब देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। यहाँ यह सोचने की बात यह है कि आखिर उत्तर प्रदेश के लोग सुदूर महाराष्ट्र में इतनी अधिक संख्या में कैसे चले गए? सीधी सी बात है कि कई ऐसे काम जो उत्तर भारतीय आसानी से कर लेते हैं, वही काम महाराष्ट्र के लोग उतनी आसानी से नहीं कर पाए। धीरे-धीरे वे सभी उत्तर भारतीयों द्वारा किए जा रहे कामों के आदी हो गए। एक तरह से उत्तर भारतीय महाराष्ट्र की जरुरत बन गए। अब यदि उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाना है, तो फिर उनके सारे काम महाराष्ट्रीयनों को करना होगा, जो उनके बूते के बाहर की बात है। इस बात को महाराष्ट्र के नाम पर राजनीति करने वाले नहीं समझ रहे हैं। पहले स्वयं को सक्षम कर लो, फिर दूसरों पर ऊँगली उठाओ। ठीक वही स्थिति आज ऑस्ट्रेलिया में हैं, वहाँ भी जो गरीब हैं, उनमें असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। वे देख रहे हैं कि हमारे देश में उच्च शिक्षा की अच्छी सुविधा होने के बाद भी वे उन संस्थाओं में नहीं पढ़ पा रहे हैं और दूसरे देशों से आए लोग आसानी से प्रवेश पाकर पढ़ाई कर रहे हैं। ऑस्टे्रलिया के इस पहलू पर चर्चा कुछ रुककर। पहले यह सोचें कि आखिर भारतीय विद्याथर््िायों को पढ़ाई के लिए विदेश जाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? हमारे ही देश में नालंदा और तक्षशिला जैसे विद्या के प्रसिद्ध केंद्र रहे हैं, जहाँ विदेशों से लोगों ने आकर पढ़ाई की है। क्या आज भारत में शिक्षा का खजाना खाली हो गया? नहीं ऐसी बात कतई नहीं है। आज भारतीय शिक्षा में शिक्षा माफियाओं की जबर्दस्त घुसपैठ हो गई है। जिसके कारण शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है। क्या हमारे ही देश में विद्याॢथयों को ऑस्ट्रेलिया जैसी सुविधाएँ नहीं मिल सकती, ताकि वे विदेश न जाकर देश में ही अध्ययन करें। इससे लाखों डॉलर ऐसे ही बच जाएँगे।
आज गाँवों में चिकित्सकों की कमी है। कोई चिकित्सक गाँवों में जाना ही नहीं चाहता। उधर मेडिकल कॉलेजों में डोनेशन के कारण एक गरीब विद्यार्थी मेघावी होने के बाद भी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसा क्या कारण है कि हमारे शिक्षाविद् अपने तमाम प्रयासों के बाद भी ऐसी शिक्षा नीति तैयार नहीं कर पाए, जो गरीब से गरीब छात्र-छात्राओं को ऊँची शिक्षा दे सके। आखिर क्या कारण है कि एक कॉलेज खोलने के लिए आवेदन से लेकर सारी अनुमतियों को प्राप्त करने में कालेज के संस्थापक के पसीने छूट जाते हैं? अफसरशाही और बाबूगिरी में ही शिक्षा की तमाम फाइलें अटक जाती हैं। स्वतंत्रता के 62 वर्ष बाद भी यदि सही सोच की शिक्षा नीति तैयार करने में हम सफल नहीं हो पाए, तो फिर कैसे कहा जाए कि हमारा देश पूरी तरह से स्वतंत्र हो गया है?
देश में शिक्षा को लेकर किए जा रहे तमाम प्रयासों पर यदि एक नजर डाली जाए, तो स्पष्ट होगा कि इसका लाभ विद्याथर््िायों को शिक्षित बनाने के लिए कम अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अधिक किया गया है। ऐसी समग्र शिक्षा नीति अभी तक नहीं बन पाई, जिसमें सभी का लाभ हो। एक सर्वे के अनुसार अभी हमारे देश से 15 प्रतिशत युवा ऐसे हैं, जिन्हें उच्च शिक्षा की आवश्यकता है। इनके लिए 1500 नई यूनिवॢसटी की स्थापना हो, तो उनकी पढ़ाई हो सकती है। पर यूनिवर्सिटी की स्थापना कौन करेगा? आज देश में जितने भी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, उनमें अधिकांश में हमारे देश के नेताओं का संरक्षण प्राप्त है। कई कॉलेजों के तो मालिक भी वही हैं।
ऑस्ट्रेलिया में करोड़पति बनने गई लखपतियों की संतानों के लिए इतनी हाय-तौबा और देश के गरीब मेधावी छात्र-छात्राओं की कोई चिंता नहीं। क्या हम सचमुच प्रगति कर रहे हैं। इसेे किसी वाद का नाम न दें और मानवता की दृष्टि से देखें कि क्या यह हमारी कमजोरी नहीं है कि हमारी संतानें विदेश में पढऩे जा रही हैं। पहले हमारे देश में लोग पढऩे आते थे, आज उसी देश के लोग विदेश जा रहे हैं। कहाँ हो गए हम कमजोर, हमें इसका पता लगाना होगा। एक तरफ गाँवों में समुचित चिकित्सा व्यवस्था नहीं, दूसरी ओर मेडिकल कॉलेजों में स्थान की कमी। अब महत्व नहीं रहा तक्षशिला और नालंदा का।
कांगे्रस सरकार ने अपने सौ दिन के एजेंडे में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना काम करने की अनुमति देने का विधेयक पर चर्चा को महत्व दिया है। अब यदि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में आ जाएं, तो हमारे देश के विद्याथर््िायों को विदेशी शिक्षा मिलेगी, इससे हमारे देश की संस्कृति का क्या होगा? इस पर भी गौर किया जाना चाहिए। अंत में एक बात.. यदि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पढऩे वाले विद्यार्थी वापस आ जाएँ, तो क्या उनके लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था हमारे देश में है? तय है कि नहीं है, तो फिर उन्हें वहीं पढऩे दिया जाए, आखिर पढ़ाई पूरी करके उन्हें रहना भी तो वहीं है। भारत आकर वे सेवा करने से रहे। एक बार केवल एक बार एक थके-हारे, मजबूर, विवश और लाचार ऑस्ट्रेलियाई छात्र की दृष्टि से देखें कि क्या उनकी खीझ वाजिब नहीं है? ऐसा हमारे देश में होता, तो हम क्या करते? ऑस्टे्रलिया में इस तरह से हमले करने वालों को जेल की सजा होती है और भारी दंड भी भुगतना पड़ता है। जिन्होंने भारतीय छात्रों पर हमला किया है, उन पर कार्रवाई हो रही है। लेकिन उस तरह की खबरें नहीं आ रही हैं। आखिर विश्व की सर्वश्रेष्ठ यूनिवॢसटी में पढऩे का कुछ तो सहना ही पड़ेगा। वहाँ केवल भारतीय विद्याथर््िायों पर ही हमले नहीं हो रहे हैं, बल्कि 180 देशों के विद्याथर््िायों पर भी हमले हो रहे हैं। मीडिया इस मामले में खामोश है। हमले की निंदा की जानी चाहिए, पर इसके दूसरे पहलू पर गौर भी किया जाना चाहिए। हमले हो रहे हैं, इससे बड़ी बात यह है कि हमले क्यों हो रहे हैं? यह तय है कि कुछ समय बाद हमले रुक जाएंगे, क्योकि ऑस्ट्रेलिया सरकार यह कभी नहीं चाहेगी कि इस तरह की घटनाएँ लगातार होती रहे। आखिर वहाँ 180 देशों के लोग पढ़ते हैं, जिनसे उस देश को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा मिलती है। आखिर आती हुई लक्ष्मी को कौन भगाना चाहेगा।
डॉ. महेश परिमल

4 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी हद तक मैं आपकी बात तक सहमत हूं। आज तो अमिताभ बच्चन भी चिंतित और व्यथित दिख रहे हैं। यहां जब आए दिन दलित स्त्रियों को नंगा कर घुमाया जाता है तो वे न जाने किस टापू पर जाकर मौनावस्था में विलीन हो जाते हैं। यह देश इतनी दुर्दशा के बाद भी अपने गिरेबान में झांकने को तैयार नहीं हो पाया है। इसके लिए जो साहस चाहिए होता है, हमारा समाज जुटा नहीं पा रहा है या जुटाना नहीं चाहता क्यों कि प्रभुवर्ग के हितों पर आंच आती है। नीची सोच वाला यह ऊंचा प्रभुवर्ण समाज को अपने हाथों की कठपुतली बनाए हुए है।

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