सोमवार, 22 जून 2009

कौसरबानो की अजन्मी बिटिया की ओर से


कविता
सब कुछ ठीक था अम्मा
तेरे खाये अचार की खटास
तेरी चखी हुई मिट्टी
अक्सर पहुँचते थे मेरे पास...।
सूरज तेरी कोख से छनकर
आता था मुझ तक।

मैं बहुत खुश थी अम्मा
मुझे लेनी थी जल्दी ही
अपने हिस्से की साँस
मुझे लगनी थी
अपने हिस्से की भूख
मुझे देखनी थी
अपने हिस्से की धूप।

मैं बहुत खुश थी अम्मा
अब्बू की हथेली की छाया
तेरे पेट पर देखी थी मैंने
मुझे उनका चेहरा देखना था
मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे
मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी।

मैं बहुत खुश थी अम्मा!

एक दिन
मैं घबराई... बिछली
जैसे मछली-
तेरी कोख के पानी में
पानी में किस चीज की छाया थी
अनजानी....

मुझे लगा
तू चल नहीं, घिसट रही है
मुझे चोट लग रही थी अम्मा!
फिर जाने क्या हुआ
मैं तेरी कोख के
गुनगुने मुलायम अँधेरे से निकलकर
चटक धूप
फिर...
चटक आग में पहुँच गई।

वह बहुत बड़ा ऑपरेशन था अम्मा!

अपनी उन आँखों से
जो कभी नहीं खुलीं
मैंने देखा
बड़े-बड़े डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे
उनके हाथ में तीन मुँहवाले
बड़े-बड़े नश्तर थे अम्मा...
वे मुझे देख चीखे!

चीखे किसलिए अम्मा-
क्या खुश हुए थे मुझे देखकर!
बाहर निकलते ही
आग के खिलौने दिए उन्होंने अम्मा...
फिर तो मैं खेल में ऐसा बिसरी
कि तुझे देखा नहीं-
तू ने भी अंतिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा!
मैं कभी नहीं जन्मी अम्मा
और इसी तरह कभी नहीं मरी
अस्पताल में रंगीन पानी में रखे हुए
अजन्मे बच्चों की तरह
मैं अमर हो गई अम्मा!
लेकिन यहाँ रंगीन पानी नहीं
चुभती हुई आग है!
मुझे कब तक जलना होगा... अम्मा।

(कौसर बानो की बस्ती पर 28 फरवरी 2002 को हमला हुआ। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने उसका पेट चीरकर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया।
इस कविता में उस शिशु को लड़की माना गया है- कुछ अन्य संकेतो के लिए। )
- अंशु मालवीय

4 टिप्‍पणियां:

  1. aapki rachanaao ka jaadu sar chadakar bolata hai ........aapki rachana ko padhana nahi padhta wah syam padhawaleti hai..........bhawmay

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  2. भीतर तक झंकझोर दिया इस रचना ने.

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  3. बहुत मार्मिक रचना है महेश जी मैने भी उस वक्त "कौसर बानो का अजन्मा बेटा" शीर्शक से दो कवितायें लिखी थीं इस घटना को कौन भूल सकता है

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  4. एक अति वीभत्स सच और एक अति मार्मिक कविता.

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