सोमवार, 29 जून 2009

बैसाखी

डा. महेश परिमल
‘‘ अच्छा तो डाक्टर साहब ! मैं चलती हूँ। शिप्रा ने उठते हुए कहा।
‘‘ठीक है, तुम उसे एक बार यहाँ ले आओ, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे ठीक कर दूँगा डाक्टर मेहता ने कहा।
‘अच्छा नमस्ते।’ ‘नमस्ते।’ कहते हुए डाक्टर मेहता अन्य रोगियों को देखने लगे। हाॅस्पीटल से बाहर आकर शिप्रा ने घर की ओर कदम बढ़ाए। चेहरे पर आत्म संतोष की छाया स्पष्ट दिखाई दे रही थी। जो सोचा था, वहीं होने जा रहा है, वह खुश थी, बहुत खुश। खुशी के मारे यह भी पता नहीं चला कि कब घर आ गया।
‘‘दीदी आ गई, दीदी आ गई’’ कहते हुए रीतु और गुड्डू दोनों उससे लिपट गए। ‘‘दीदी हमारे लिए क्या लाई हो ?’’ कहते हुए दोनों उसके बैग को देखने लगे।‘‘ये लो टाफियाँ’’ शिप्रा ने दोनेां को टाॅफियाँ थमा दी। अंदर पहुँचकर उसने हाथ-मुँह धोए, इतने में माँ चाय का प्याला लेकर उसके कमरे में आती दिखाई दी।-
आज कुछ देर हो गई बेटी ? माँ ने स्नेह से पूछा।
हाँ, माँ, आज वेतन मिलने में समय कुछ ज़्यादा लग गया। फिर आजकल आॅफिस में काम भी कुछ ज़्यादा है।-
अच्छा ले चाय पी। थकान कुछ कम हो जाएगी। और हाँ, तेरे नाम एक लिफाफा आया है, ठहर लाती हूँ, कहकर माँ दूसरे कमरे में चली गई। शिप्रा ने चाय का प्याला उठाया और दूसरे कमरे में गई, माँ के आने की प्रतीक्षा करने लगी। चाय की चुस्कियों के बीच वह उतावली हो रही थी कि किसका लिफाफा आया है। कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और चाय का खाली प्याला लेकर भीतर चली गई।
शिप्रा ने लिफाफा खोला, देखा अमोल का खत है, लिखा था -प्रिय शिप्रा, हाॅस्पीटल की ज़िन्दगी कितनी उबाऊ और जानलेवा होती है, यह मैं पिछले चार महीनों से देख रहा हूँ। वहीं दवाइयाँ, वही इंजेक्शन - - और वही हिदायतें ! सुन-सुन कर तो मेरे दिमाग की ग्रंथियाँ ढीली पड़ने लगी हैं। मैं जानता हूँ शिप्रा, ज़िम्मेदारियों ने तुम्हें कितना खामोश कर दिया है। तुम्हारा प्यार ही तो है, जो मुझे इस हालत में भी अभी तक ज़िन्दा रखे हुए है। उस दिन मुझे पहली ज़िन्दगी मिली थी, जिस दिन तुमने मेरे प्यार को स्वीकारते हुए मेरे साथ जीवन जीने की शपथ ली थी। मैं इस दिन को साकार करने के लिए जी जान से जुट गया - - - पर शायद नियति को यह मंज़ूर न था। हमारे प्यार के फूलों, की महक शायद ईश्वर को अच्छी न लगी और मुझसे मेरे अंग छिन लिए- - - ।
उन क्षणों को याद करता हँू, शिप्रा, तो सच बताऊँ उस दिन मैंने जाना कि आज मेरी पहली मौत हुई है। सड़क में पीछे से आने वाले ट्रक ने मुझे जिस ढंग से रौंदा, उसे याद करते हुए सोचता हँू, पूरी तरह से रौंद दिया होता, तो कितना अच्छा होता ? इस तरह अपाहिज होकर जीने से तो वही अच्छा। सोचा था माता-पिता का बोझ कम करूँगा, तुम्हारी माँग का सिन्दूर बन जीवन-पथ पर तुम्हारे संग चलूँगा, पर हुआ इसके विपरीत। आज तुमसे - - तुमसे तो बहुत दूर - - नितांत अकेला हूँ।
उस समय पहली मौत के बाद मैं यहाँ पिछले चार महीनों से रोज़ ही ऐसी मौत मर रहा हूँ। ज़िन्दगी मुझसे काफी दूर है। हाँ, तुम्हारे संबल देने वाले ख़त अवश्य ही कभी-कभी मौत को दूर धकेेलकर ज़िन्दगी को करीब ला देते हैं। पर अब लगता है भूल-भूलैया से दूर जाना पड़ेगा। सच के धरातल पर पाँव रखना पड़ेगा। कुछ ही दिनों बाद मेरी इस हाॅस्पीटल से छुट्टी हो जाएगी और जाते वक़्त मुझे मिलेगा, बैसाखियों का उपहार। इसके पहले कि मैं मौत के गड्ढे में गिर पडूँ, तुम मेरी बैसाखी बन कर मुझे बचा लो शिप्रा- - -। तुम्हारा सहारा पाकर मैं जीवन पथ पर फिर आशा और उम्मीद के साथ चल पडूँगा। तुम्हारा संबल बहुत ज़रूरी है मेरे लिए, क्योंकि अब निराशा घेरने लगी है। तुम्हारे खतों का विलंब से आना मुझे भीतर से तोड़ने लगा है। इसके पहले कि मैं टूट कर बिखर जाऊँ - - - मुझे आकर बचा लो - शिप्रा।
ख़त पढ़कर शिप्रा कुछ देर तक शून्य में निहारती रही, सोचती रही, कितना महात्वाकांक्षी था अमोल। ‘ये करूँगा, वो करूँगा’ कहते-कहते उसका मुँह न थकता। कहता - शिप्रा, तुम्हारा प्यार मिलता रहे, तो देखना एक दिन मैं कहाँ से कहाँ पहुँच जाऊँगा। इतनी दूर - - इतनी दूर - - कि फिर जब भी तुम अपने भीतर झांकोगी तो मुझे पाओगी और शिप्रा मुस्कराकर रह जाती। - - - पर आज यह कैसी परिस्थिति है ? शिप्रा ने सोच रखा है कि जब तक छोटे भाई विकल की इंजीनियर की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, और वह कमाने लायक नहीं हो जाता तब तक मैं माता-पिता को अपना सहारा देती रहूँगी, और न ही तब तक अपने विवाह के बारे में सोचूँगी। अमोल ने भी तो इसे स्वीकारा था और अच्छी सर्विस मिलते ही उससे दूर दूसरे शहर चला गया था और जाते हुए विश्वासपूर्वक कहा था, शिप्रा मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा । पर आज तो - - आज तो - - -।
सोच की तरंगे कुछ और दूर पहुँचती कि माँ ने पुकारा - ‘चल बेटी खाना खा ले। ‘जी, अच्छा माँ, तुम परोसो, मैं अभी आई। शिप्रा बाथरूम की ओर बढ़ गई। खाना खाते समय पिता ने पूछा - शिप्रा बेटी ! वह जो आॅफ़िस से प्राॅविडेंट फंड के पच्चीस हज़ार रूपये निकालने के लिए कहा था, उसका क्या हुआ ? ‘वह तो मैंने निकाल लिए और डाक्टर को दे दिए’ ‘डाक्टर को! डाक्टर को क्यों दिए ? पिता ने आश्चर्य से पूछा । ‘अमोल के इलाज के लिए ’
‘अमोल, अमोल, अमोल - - - ! मैंने कितनी बार कहा तुमसे कि उसे अब भूल जाओ। ‘कैसे भूल जाऊँ पिताजी, आपने ही तो हमारे प्यार को स्वीकारते हुए शादी का वचन दिया था’ कहते हुए शिप्रा हाथ धोकर सीधे अपने कमरे में चली गई। पलंग पर गिरकर तकिए में मुँह छिपाकर फफक कर रो पड़ी। कुछ देर बाद उसके सर पर किसी ने प्यार से हाथ फेरा, देखा - पिताजी थे ! जो अश्रुपूरित नेत्रों से उसे देख रहे थे।
-‘ बेटी, मैं तेरा दुःख समझ रहा हूँ, पर मैं अपनी फूल-सी बेटी को कैसे किसी के साथ बाँध दूँ। जो स्वयं अपना भार उठाने में असमर्थ है, वह कैसे तुम्हारा भार उठाएगा ? पिता ने रूँधे गले से कहा। नहीं, नहीं- - -, नहीं पिताजी। जब तक अमोल अच्छा था, तो आप भी उसे बेटे-बेटे कहते नहीं अघाते थे, साथ ही गर्व भी करते थे, अपनी इस बेटी पर कि कितना अच्छा वर चुना है इसने। याद है, जब उसने अपनी सर्विस की और दिल्ली आफ़िस ज्वाइन करने की ख़बर सुनाई थी, तो कितने खुश हुए थे आप? पर आज जब वह नियति के क्रूर हाथों से अपनी एक टाँग गँवा बैठे हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि अब वह मेरे लायक नहीं रहे, मानो टाँग के साथ-साथ उनकी योग्यता, उनका आचरण, उनका स्वभाव और उनका चऱि़त्रा भी चला गया। शिप्रा ने सजल नेत्रों से पूछा - मान लीजिए, पिताजी यदि ये ही हादसा मेरी शादी के बाद होता, तो क्या तब भी आप ऐसा ही कहते ? नहीं, पिताजी मुझे पूरा विश्वास है, कि तब आप मुझे मेरा कर्तव्य याद दिलाते। क्या सिंदूरी रेखा अधिकार और कर्तव्य के मायने बदल देती है? तो पिताजी, मेरे प्यार की रेखा उस सिंदूरी रेखा से भी ज़्यादा गहरी है, जहाँ सिर्फ और सिर्फ अमोल हंै।
- - पर बेटी ! तुम्हीं सोचो कि - - - बस कीजिए पिताजी। मैं समझ गई, आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी किसी अपाहिज की बैसाखी बने। आप नहीं चाहते कि मैं अमोल से ब्याह कर सुखी रहूँ। लेकिन आप ग़लती कर रहे हैं पिताजी, अगर भावनाओं में बह कर आप मेरी शादी किसी और कर देंगे, तो वह जीवन मेरे लिए नरक से भी गया-बीता हो जाएगा। शिप्रा ने कुछ रूक कर फिर कहा - मैंने अपने मन-मंदिर में अमोल को बसाया है और जीवन भर उसे ही पूजती रहँूगी।
कुछ समय बाद पिताजी भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चले गए और वह पलंग पर ढेर हो गई। कमरे में उसकी धीमी-धीमी सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी। आवाज़ सुन कर माँ ने धीरे से शिप्रा के कमरे में प्रवेश किया और उसे अपनी छाती से लगाकर सांत्वना देती रही। जब उन्हें लगा कि शिप्रा सो रही है, तब धीरे से वह दूसरे कमरे में चली गई। जाते ही शिप्रा उठी और अमोल का खत फिर से पढ़ने लगी। उसे लगा, उसका अमोल टूट रहा है, निराशा के गहरे सागर में डूब रहा है। नहीं, वह उसे यूँ निराश होने नहीं देगी। वह उठी और टेबल लेम्प जला कर अमोल को ख़त लिखने लगी। ख़त में उसने इस बात का ज़िक्र कर दिया कि उसने यहाँ एक डाक्टर से बात कर ली है और उन्होंने उसे आश्वासन दिया है कि अमोल पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। वे ऐसे कई केस में सफल आॅपरेशन कर चुके हैं, इसीलिए वह अपने प्रोव्हीडेंट फं़ड में से पच्चीस हज़ार रूपए भी उन्हें दे चुकी है। तुम आ जाओ। फिर तुम्हारा इलाज यहाँ शुरू हो जाएगा और तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ और सदैव रहूँगी। इस प्रेरणादायी ख़त को लिखने के बाद वह स्वयं को हल्का महसूस कर रही थी। सुबह आॅफ़िस जाते हुए सबसे पहले उसने अपना ख़त पोस्ट किया फिर आॅफिस की सीढ़ियों पर कदम रखा। दिन भर शिप्रा आॅफिस के कार्यो में व्यस्त रही। समय का पता ही न चला। छुट्टी होने के पंद्रह मिनट पहले उसका एक फोन आया। फोन रमेश का था। अमोल का दोस्त रमेश, जो अभी अमोल के पास ही हाॅस्पीटल में था। रमेश की बात सुन कर वह धक् से रह गई। उसके पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई। रमेश के कहे अनुसार अमोल ने ‘स्यूसाइड’ कर लिया था। उसका अमोल, यह दुनिया छोड़कर जा चुका था। उसका दिमाग सन्न हो गया। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। रिसीवर उसके हाथ से गिर पड़ा। वह निढाल हो कर कुर्सी पर बैठ गई। अचानक मानों उसे कहीं से शक्ति प्राप्त हो गई, वह संयत हो उठी। सब घर जाने लगे थे, उसने अपना बैग उठाया और निकल पड़ी। रास्ते में क्लिनिक के सामने से गुज़रते हुए डा. मेहता ने उसे देख लिया। ‘अरे बेटी, वो तुम्हारे पेशेंट का क्या हाल है ? उसे तुम मेरे पास नहीं लाई ? डाक्टर ने पूछा !
‘जी, वो नहीं आएँगे।’ ‘क्यों आखिर क्या बात है ?’
‘जी, अब वो उस डाक्टर के पास चले गए हैं, जो हर तरह के रोगों से मुक्ति दिलाते हैं।’
- ‘मैं समझा नहीं बेटी ?’
तब शिप्रा ने अमोल के ‘स्यूसाइड’ वाली बात डाॅ. मेहता को बता दी।
‘ओह’ कहते हुए डाक्टर मेहता चश्मा निकाल कर अपनी आँखों को मलने लगे।
‘एक मिनट ठहरो बेटी, यह कह कर डाॅॅ. मेहता अंदर गए और साथ में पच्चीस हज़ार रुपए की गड्डी लेते आए। ‘लोे बेटी, इसे रख लो, अब इसकी ज़रूरत नहीं।’ ‘इसे आप ही रख लीजिए डा. साहब - - -।’ ‘पर क्यों बेटी ? यह तो तुम्हारे ही रुपए हैं। जो तुमने अमोल के इलाज के लिए मुझे दिए थे।
‘इसे मैं अब नहीं लँूगी डाक्टर साहब ! इन रुपयों को उन मरीजों के लिए रख दीजिए, जो रुपयों के अभाव में अपना इलाज नहीं करवा पाते हैं। ताकि भविष्य में कोई मेरी तरह दुःखी न हो।’ यह कहते हुए शिप्रा ने अपने आँसू पोंछे और चलने लगी।
डाक्टर मेहता दूर तक शिप्रा को सजल नेत्रों से जाते हुए देखते रहे। नोट की गड्डियाँ अब भी उनके हाथोें में थी।
डा. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार पढ़ने बैठा तो पढ़ता चला गया थोड़ी बड़ी कहानी थी पर अच्छी थी। अंत काफी सोच कर लिखा गया लगता है।

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  2. ओह!! बहुत उम्दा कहानी..बहा ले गई.

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