बुधवार, 1 जुलाई 2009

पंडितजी ने पकड़ा पतंगा


भारती परिमल
एक थे पंडित जी। बस नाम के ही पंडित जी थे, क्योंकि पंडिताई से तो उनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। काला अक्षर उनके लिए भैंस बराबर था। निरक्षर होने के बाद भी पंडित कहलाने का ऐसा शौक कि एक दिन पहुँचे एक विद्वान के पास और उनके सामने अपना शौक रख दिया। विद्वान मित्र ने सलाह दी कि मैं तुम्हारे मोहल्ले के कुछ बच्चों से कह दूँगा कि वे तुम्हें पंडित जी कहकर चिढ़ाए, बदले में तुम उन पर गुस्सा जरूर होना, लेकिन उन्हें मारना नहीं।
बस, अब तो बात बन गई। पंडित जी जैसे ही दूसरे दिन घर से निकले, मोहल्ले के बच्चे उनके पीछे हो गए और पंडित जी... पंडित जी... कहकर चिढ़ाने लगे। वे बनावटी गुस्सा दिखाते, उन्हें मारने के लिए हाथ उठाते और उनसे दूर-दूर भागने का प्रयास करते। उनका यह रूप सभी ने देखा और लगे हँसने। एक दिन- दो दिन करते-करते यह बच्चों का रोज का क्रम बन गया। फिर क्या था, उनका सपना पूरा हो गया। वे बच्चों के बीच ही नहीं, बड़ों के बीच भी पंडित जी के रूप में पहचाने जाने लगे। जब कोई बड़ा उनसे मजाक में पंडित जी कहता तो पहले तो वे उसे घूरकर उसे देखते फिर हँसी में टाल देते। यहाँ तक कि वे उनके पुकारने का बुरा भी नहीं मानते। तो इस तरह एक निरक्षर, अनपढ़ आदमी लोगों के बीच पंडित जी के रूप में पहचाना जाने लगा।
एक दिन सुबह-सुबह पंडित जी बाग में टहलने के लिए गए। जब वे घूम-फिर कर थक गए, तो आराम करने के लिए एक बैंच पर बैठ गए। थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई, तो रंग-बिरंगे फूलों के बीच उड़तेे पतंगे नजर आए। कभी पतंगे फूलों पर बैठते, तो कभी उड़ जाते। इन पतंगों को देखकर पंडित जी को अपना बचपन याद आ गया कि कैसे वे बचपन में इन्हें पकड़ा करते थे और फिर धागे से बाँधकर हवा में उड़ाया करते थे। क्यों न आज बचपन का वही पुराना खेल खेला जाए! यह सोचते हुए पंडित जी ने पास ही के फूल पर बैठे पतंगे को पकडऩा चाहा। जैसे ही उन्होंने पतंगे का पकडऩे के लिए हाथ बढ़ाया, वह तो उड़ गया! अब उड़ते पतंगे को पकडऩा तो मुश्किल काम था, पर पंडित जी ने पतंगा पकडऩे का मन बना लिया था। इसलिए वे उसके पीछे-पीछे तेजी से चले।
फिर तो दृश्य देखने लायक था। पतंगा कभी इस फूल पर बैठता तो कभी उस फूल पर। कभी उड़कर दूर निकल जाता तो कभी आँख से ओझल हो जाता। लेकिन पंडित जी भी बराबर उस पर नजर रखे हुए थे। आँखों से ओझल होते ही तुरंत अपनी नजर यहाँ-वहाँ घुमाकर फिर से उसे ढूँढ़ ही लेते। आखिर परेशान होकर पतंगे ने भी एक जगह बैठने के बजाए उडऩा शुरू कर दिया। पंडित जी पतंगे के पीछे-पीछे हो लिए। पतंगे का पीछा करते हुए, दौड़ते हुए उनका ध्यान केवल पतंगे पर ही था। एक जगह बड़ा-सा पत्थर रखा था, पर पंडितजी पतंगे पर ध्यान देने के कारण उसे देख नहीं पाए और उससे टकराकर गिर पड़े।
पंडित जी ने आसपास देखा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा! जब विश्वास हो गया कि उन्हें गिरते हुए किसी ने नहीं देखा है तो उठकर अपने कपड़े साफ किए और फिर से पतंगे को खोजने लगे। आखिर उनकी खोज पूरी हुई। पतंगा थोड़ी दूर पर ही एक फूल पर बैठा हुआ था। वे धीरे घीरे उसके पास गए और सावधानी के साथ उसे पकड़ लिया। पतंगा हाथ में आते ही वे मन ही मन बहुत खुश हुए- वाह! आखिर मैंने पतंगा पकड़ ही लिया।
दो ऊँगलियों के बीच पतंगे को पकड़े हुए पंडित जी वापस अपनी बैंच पर आकर बैठ गए। उस समय बैंच पर उन्हीं के मोहल्ले का लड़का राहुल बैठा हुआ था। वह भी बाग में खेलने के लिए आया हुआ था। जब राहुल ने पंडित जी के हाथ में पतंगा देखा तो उनके पास आकर बैठ गया और बोला- पंडित जी, आपने पतंगा पकड़ा ?
हाँ, क्यों ? क्या मैं पतंगा नहीं पकड़ सकता ?
क्यों नहीं, जरूर पकड़ सकते हैं। वैसे पतंगा पकडऩा बड़ा मुश्किल काम है ना? उसके पीछे बहुत दौडऩा पड़ता है।
पंडित जी ने मन ही मन कहा, सचमुच पतंगा पकडऩा काफी मुश्किल भरा काम है। इसके पीछे खूब दौडऩा पड़ा और ऊपर से पत्थर से टकराकर घुटना भी छिल गया, लेकिन वास्तव में वे कुछ न बोले।
राहुल बोला- वैसे पंडित जी, पतंगे को पकडऩा अच्छी बात नहीं है। मेरे शिक्षक कहते हैं कि हमें कीट-पतंगे, तितलियाँ आदि को पकड़कर उन्हें सताना नहीं चाहिए। ये सभी स्वतंत्र होकर उडऩे वाले जीव हैं। हमें किसी भी प्राणी को इस तरह पकड़कर उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।
पंडित जी बोले- लेकिन मैंने इसे क्या नुकसान पहँुचाया है? मैंने तो केवन इसे पकड़ा ही है। थोड़ी देर बाद इसे छोड़ दूँगा। तब तक मैं इसे अपने पास रखकर थोड़ा प्यार तो कर लूँ।
राहुल बोला- किसी कीट-पतंगे को इस तरह पकड़कर प्यार नहीं किया जाता पंडित जी। इनसे प्यार करना हो, तो इन्हें फूलों पर बैठे हुए दूर से ही देखिए। एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराते हुए, उनका रस पीते हुए देखना ही इन्हें प्यार करने के बराबर है, क्योंकि जो मजा इन्हें इस तरह देखने में है, वह इन्हें पकडऩे में नहीं।
पंडित जी का मुँह देखने लायक था!
राहुल आगे बोला- पंडित जी, अब यह पतंगा उडऩे लायक नहीं रहा।
क्यों ? यह उड़ क्यों नहीं पाएगा ?
क्योंकि आपकी ऊँगलियों के स्पर्श से इसके पंखों में लगा रंग उतर गया होगा, जो कि इसकी उडऩे में सहायता करता है। आप अपनी ऊँगलियाँ देख लें, तो आप पाएँगे कि आपकी ऊँगलियों में पतंगे के पंखों का रंग लगा होगा।
पंडित जी ने पतंगे को धीरे से बैंच पर रखा और अपनी उँगलियों को ध्यान से देखा, तो उन्हें उस पर रंग लगा दिखाई दिया। पतंगा भी निष्क्रिय होकर बैंच पर पड़ा हुआ था। पंडित जी ने उसे इतनी जोर से पकड़ रखा था कि अब वह उडऩा तो दूर की बात थी, हिल भी नहीं पा रहा था। अब पंडित जी को अपनी भूल समझ में आई।
वे राहुल से बोले - बेटा, बचपन में मैंने कभी इस बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया कि पतंगे के पंखों को स्पर्श करने से उनकी उडऩे की शक्ति चली जाती है। तुम बहुत होशियार हो। इतनी छोटी उम्र में भी तुम्हें इस बात की जानकारी है और तुमसे उम्र में बड़ा होकर भी मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं है। मैं तो केवल नाम का ही पंडित हूँ। यदि मैंने भी बचपन में तुम्हारी तरह शिक्षा ली होती, तो मुझमें भी शायद पतंगों के प्रति दया भावना होती। आज तुमने छोटे होकर भी मुझे एक अच्छी बात सिखाई है। इसे मैं हमेशा याद रखूँगा और तुमसे वादा करता हूँ कि अब कभी भी इस तरह छोटे प्राणियों को परेशान नहीं करूँगा।
राहुल ने जब पंडित जी से यह सुना तो उसे बहुत खुशी हुई। उनके इस समझदारी पूर्ण निर्णय को सुनकर लगा कि पंडित जी अब सचमुच ही पंडित जी हो गए हैं।
भारती परिमल

2 टिप्‍पणियां:

Post Labels