शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

प्रगतिवादी बन रहा है मुस्लिम समाज

डॉ. महेश परिमल
मुस्लिम वर्ग से जुड़ी तीन घटनाएँ मेरी आँखों के सामने से गुज़रीं। तीनों ही घटनाएँ उस दकियानूसी और कट्टर समझे जाने वाले समाज की प्रगतिशीलता की ओर इशारा करती हैं। यह सच है कि इस समाज को आज कई देशों में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। सच यह है कि मात्र कुछ लोगों के कारण पूरा समाज ही बदनाम हो रहा है। इनमें में एक नहीं अनेक लोग हैं, जिन्हें भारतीय प्रजातंत्र पर पूरा विश्वास है। वे यहाँ रहकर यहीं के कानून को मानते हैं। यहाँ की परंपराओं ओर रीति-रिवाजों में घुलमिल गए हैं। कई जगहों पर तो इन्हें केवल नाम जानने के बाद ही पहचान होती है कि ये मुस्लिम हैं। बाकी रहन-सहन, खान-पान और संस्कृति को पूरी तरह से अपने में ढाल लेने वाले ये लोग कितने प्रगतिशील हे, यह जानने की जरूरत है।
पहली घटना: हैदराबाद की यह घटना है। एक युवत कहीं जा रही थी। उसके पीछे एक मनचला लग गया। वह फिकरे कसता, मजाक उड़ाता उसे लगातार छेड़ रहा था। एक सहज शर्म हया के बीच वह युवती भी उसे अनदेखा कर रही थी। यह उसकी एक की समस्या नहीं थी। आए दिनों उस रास्ते पर मनचले उन्हें अक्सर छेड़ते ही रहते। युवती आगे बढ़ती जा रही थी। युवक का हौसला बढ़ रहा था। बात काफी आगे पहुँच गई, युवती की खामोशी देखकर युवक ने उसका हाथ पकड़ लिया। बस यही हो गई गलती। उस युवती ने उस युवक को पकड़ा और इतने घूंसे मारे की, वह अधमरा हो गया। उसकी हालत ही खराब हो गई। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि छेड़छाड़ का यह सिला मिलेगा। वह कराह रहा था। युवती खामोश थी। जब वहाँ से गुजरने वाले लोगों ने घायल युवक को देखा और पास खड़ी युवती को देखा, तो दंग रह गए। वह युवती उस जिले की मुक्केबाज चैम्पियन थी। संयोग से उक्त युवती मुस्लिम थी।
दूसरी घटना: हाल ही में एक पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर छ: सगी मुस्लिम बहनों ने वंदेमातरम्, सरफरोशी की तमन्ना जैसे राष्ट्रभक्ति गीतों का शमां बाँध दिया। कानपुर की इन छ: सगी मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की शपथ ली है। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। वह 1857 की 150 वीं वर्षगांठ पर नानाराव पार्क में शहीदों की याद में दीप प्रज्जवलित कर वंदेमातरम् का उउ्घोष हो, गणेश शंकर विद्यार्थी व अब्दुल हमीद खान की जयंती हो, वीरांगना लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस हो, माधवराव सिंधिया मेमोरियल अवार्ड समारोह हो या राष्ट्रीय एकता से जुड़ा अन्य कोई अनुष्ठान हो,ये बहनें वहाँ मुक्त मन से गीत गाती हैं और देशभक्ति की अलख जगाती हैं। इनके नाम नाज मदनी, मुमताज अनवरी, फिरोज अनवरी, अफरोज अनवरी, मैहरोज अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें-नाज मदनी, मुमताज अनवरी व फिरोज अनवरी वकालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफी की ये बेटियाँ अपने इस कार्य को खुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। पहली बार इन्होंने 17 सितम्बर 2006 को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में वंदेमातरम का उद्घोष किया। उसके बाद इन बहनों ने 24 दिसम्बर 2006 को मानस संगम के समारोह में पं0 बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं, तो लोग सम्मान में स्वत: अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं।
तीसरी घटना : दाऊद खाँ, जो एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं और छत्‍तीसगढ़ के धमतरी में रहते हैं। शिक्षकीय कार्य के अलावा उन्होंने पूरा जीवन गाँव-गाँव जाकर रामायण पाठ में अपना जीवन गुजार दिया। समाज के विरोध के बाद भी उन्होंने रामायण पाठ नहीं छोड़ा। काफी मुश्किलें झेलने के बाद भी वे अपने काम में डटे रहे। दाऊद खाँ विचारों से प्रगतिशील हैं। वे कहते हैं कि रामायण के लिए जमात से अलग होना मुझे मंजूर है। उनका मानना है कि अगर जमात निंदा नहीं करती तो मैं आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपके समाज ने रामायण पाठ के लिए आप पर पाबंदी नहीं लगाई? इस पर उन्होंने कहा कि समाज के लोगों ने तो बहुत विरोध किया, पर मैंने रामायण पाठ नहीं छोड़ा। साथ ही उन्होंने यहां तक कहा कि रामायण छोड़ो, नहीं तो जमात से बरतरब (बर्खास्त) कर दिए जाओगे, तो उन्होंने कहा कि मैं जमात में हूं कहाँ? जो मुझे बरतरब करोगे। फिर भी मैंने समाज वालों से कहा कि रामायण को हम छोडऩा तो चाहते हैं, मगर रामायण हमको नहीं छोड़ती। इस पर उन्होंने बच्चों की शादियों के लिए सामाजिक दिक्कतें आने की भी बात बताई, लेकिन मैं इन बातों से घबराया नहीं। मैं तो यह मानता हूं जो पैदा करता है, वह लड़के-लड़कियों का इंतजाम भी करता है और इसी बात को समाज को महसूस कराना चाहता था और मैंने अपनी दो बेटियों और एक बेटे की शादी करके दिखा दिया। हालांकि मेरे बच्चों की शादियों में समाज के 25 प्रतिशत लोग ही शामिल हुए थे। मैं इससे भी संतुष्ट था। मैंने अपने बच्चों की शादी के दौरान उनके ससुराल वालों से यह भी कह दिया था कि मैं खाना नहीं खिला सकता, भोजन कराऊँगा और मेरे बच्चों के ससुराल वालों ने इस बात को स्वीकार किया और बच्चों की शादी भी हो गई। मेरी दो बेटियां और एक बेटा है जिसमें से एक बेटी के. खान रायपुर में अपर कलेक्टर है, तो दूसरी बेटी बगरू निशा सागर में एसडीएम है। लड़का अयूब खां को इंसपेक्टर की नौकरी मिली थी और उसकी पदस्थापना भी धमतरी में ही हुई थी। लेकिन उसने यह नौकरी छोड़ दी, अब वह एक दुकान का संचालन कर रहा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपकी पत्नी ने भी कभी इसका विरोध नहीं किया? इस पर उन्होंने कहा कि न तो मेरी पत्नी को कभी कोई आपत्ति थी और न ही शादी से पहले मेरे ससुर को। शादी के पूर्व मेरे ससुर को इन सब बातों की जानकारी थी। इसके बाद भी उन्होंने अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में दिया।
जब उनसे पूछा गया कि आप नमाज अदा करते हैं या नहीं? इस पर उन्होंने कहा कि मौलाना साहब ने भी यही बात मुझसे कही थी कि कम से कम नमाज तो पढ़ लिया करो। तब मैंने उनसे कहा कि नमाज होती है, पढ़ी नहीं जाती। मैं तो साल में सिर्फ दो बार नमाज अदा करता हूँ, पहली ईद में और दूसरी बकरीद में। परिवार के बच्चों ने कभी आपके इस कार्य का विरोध नहीं किया? तब उन्होंने कहा कि जब मेरी पत्नी विरोध नहीं कर पाई तो मेरे बच्चे कैसे विरोध करते? मैं अपना धर्म निभाता हूं बच्चे अपना धर्म निभाते हैं। रामायण की जिज्ञासा आपमें कैसे जागी? इस पर 1983 में शिक्षकीय कार्य से सेवानिवृत्त हुए दाऊद खां ने कहा कि मेरे गुरु शालिग्राम द्विवेदी और पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की प्रेरणा से मेरी जिज्ञासा रामायण में जागी। उन्होंने कहा कि जब मैं एम.ए हिंदी के प्रथम वर्ष में था, तब मेरे गुरु ने मुझे रामायण की एक गुटका दी और कहा कि इसे रात में पढऩा। अगर समझ में आए तो ठीक वरना वापस कर देना। मैंने पुस्तक का जैसे ही पृष्ठ खोला उसमें सबसे पहला शब्द शंभु, प्रसाद, सुमति, हीय, हुलसी इन पांचों शब्दों को पढ़ा। इन पाँचों शब्दों में शंभु का अर्थ शंकर, प्रसाद का अर्थ प्रसाद, सुमति का अर्थ अच्छी बुद्धि या सलाह ये तो समझ में आ गया लेकिन हीय और हुलसी ये शब्द का अर्थ समझ नहीं आया और मैंने पुस्तक बंद कर रख दी। लेकिन रात भर मुझे नींद नहीं आई। मैं अपनी कल्पना में खोया रहा और सोचता रहा कि मुझे शिक्षक बनना है और मैं दो शब्दों का अर्थ नहीं खोज पा रहा हूँ, तो फिर शिक्षक बनकर बच्चों को क्या पढ़ाऊँगा। यह सोचकर मैं रात भर जागता रहा और फिर जब मैंने पुस्तक वापस की तो मैंने अपने गुरुजी से कहा कि मुझे सब कुछ तो समझ में आ गया, लेकिन दो शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाया। गुरुजी ने 'लेकिनÓ शब्द को पकड़ लिया और कहा जिसके मन में 'लेकिनÓ की जिज्ञासा हो, वह सब कुछ कर सकता है और वह जिज्ञासा तुममें नजर आ रही है। गुरुजी ने हीय और हुलसी की परिभाषा बताते हुए कहा हीय यानी हृदय और हुलसी का अर्थ आनंद से है। इसके बाद गुरुजी ने रामायण की तीन परीक्षाएं दिलवाई प्रथमा, मध्यमा और उत्तम। जिसमें मुझे इलाहाबाद से रामायण रत्न की डिग्री भी मिली।
उक्त घटनाएँ ये बताती हैं कि मजहब के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले दूसरे लोग हैं, जो भटके हुए हैं। यह समाज भी इन्हें हिकारत की नजरों से देखता है। कुछ मुट्ठीभर लोग ही ऐसे हैं, जिनकी बदौलत ये अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त कर इस समाज के लोग आज देश में बड़े पदों पर विराजमान हैं। विचारों से ये हमसे भी कहीं अतिआधुनिक हैं। पर इसका कुछ बोलना ही हमारे लिए असह्य हो जाता है। अब उन मुस्लिम बहनों पर जब दारुउलम ने फतवा दे दिया। तब कई ऐसे मुस्लिम सामने आए, जिन्होंने इस फतवे का विरोध किया। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने तो ऐसे फतवों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि वन्देमातरम् गीत गाने से अगर इस्लाम खतरे में पड़ सकता है, तो इसका मतलब हुआ कि इस्लाम बहुत कमजोर मजहब है। प्रसिद्ध शायर अंसार कंबरी ने कहा कि मस्जिद में पुजारी हो और मंदिर में नमाजी हो। यह किस तरह फेरबदल है। ए.आर. रहमान तक ने वन्देमातरम् गीत गाकर देश की शान में इजाफा किया है। ऐसे में स्वयं मुस्लिम बुद्धिजीवी ही ऐसे फतवे की व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.जेड. कलीम जायसी कहते हंै कि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत का हुक्म है, मगर यह भी कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है। चूंकि कुरान में मातृभूमि को माँ के तुल्य कहा गया है, इसलिए हम उसकी महानता को नकार नहीं सकते और न ही उसके प्रति मोहब्बत में कमी कर सकते हैं। भारत हमारा मादरेवतन है, इसलिए हर मुसलमान को इसका पूरा सम्मान करना चाहिए।
इस तरह के विचार ही यह बताते हैं कि जो मुस्लिम देश की बेहतरी के लिए सोच रहे हैं, वे देश के दुश्मन कदापि नहीं हैं। वे हमारे मित्र हैं। हमें उनसे ठीक वैसा ही व्यवहार करना है, जैसा पहले करते थे। वे हमसे अलग नहीं, बल्कि हमने ही उन्हें अलग कर दिया है। मनचले को घूँसा मारकर, मुस्लिम होकर भी रामायण पाठ कर और वंदे मातरम् गाकर ये मुस्लिम परिवार आखिर अपनी प्रगतिशीलता ही बता रहा है। हमें इनका सहयोग करना चाहिए, तभी हमें इनका सहयोग मिलेगा।
डॉ. महेश परिमल

6 टिप्‍पणियां:

  1. मैं नहीं कह सकता कि मुसलमान कभी प्रगतिशील हो सकते हैं या नहीं।

    बात यह है कि यदि कम्प्यूटर का हार्डवेयर कितना भी उन्नत हो लेकिन सॉफ्टवेयर में कोई गड़बड़ी आ जाय तो वह बार-बार हैंग होगा; धीमे चलेगा; उलटी-सीधी हरकतें करेगा।

    यह सॉफ्टवेयर क्या है? यह मजहबी किताबे हैं जो मानव के लिये सॉफ्टवेयर का काम करतीं हैं। यदि वही किताब सिखाती है कि तुम काफिर का कत्ल करोगे तो 'हूर' और क्या-क्या मिलेगी तो दुनिया में शान्ति और सभ्यता के विकास के लिये खुदा ही मालिक है। दुनिया के विद्वानों ने कुछ किताबों के पचासों अनुच्छेदों के बारे में अपनी राय दी है कि वे सह-अस्तित्व को अंगूठा दिखाने वाली हैं। सच्चाई से आंख मूंद लेने से खतरा नहीं टल जाता।

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  2. परिमल जी, राष्ट्रवादियों से किसे बैर है ? हम कभी नहीं भूलते कि इस देश के ९५ प्रतिशत मुसलामानों के पूर्वज हिन्दू ही थे. किस मजबूरी में उन्होंने अपना धर्मं परिवर्तन किया होगा इसका अंदाजा भी हमें है. लेकिन स्वयं मुस्लिम समाज या उसका एक हिस्सा इस बात को भूल जाता है और अपने मार्गनिर्देशन के लिए अरब या अरब के चंदे पर पलने वाले मुल्लाओं की ओर देखता है जो कि इस देश को नेस्तनाबूद करने की ही ताक में बैठे हैं. जो उदहारण आपने गिनाये वह इस देश की मिली-जुली संस्कृति का नमूना है. RSS भी "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" की ही बात करता है लेकिन कुछ मुल्लाओं और वामपंथियों को यही बात नहीं सुहाती और मुस्लिम समाज का प्रगतिशील तबका इनके विरुद्ध आवाज उठाने के बजाये चुप बैठ जाता है जिससे लगता है कि सभी मुसलमान यही राय रखते हैं . सामाजिक वैमनस्य की जड़ यही चुप्पी है.

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  3. अच्छे उद्धरण हैं। अगर आप दूसरे मजहबों को अपने मजहब से कमतर नहीं आँकते तो आप किसी भी धर्म के हों क्या फर्क पड़ता है।

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  4. अच्छे उद्धरण हैं। अगर आप दूसरे मजहबों को अपने मजहब से कमतर नहीं आँकते तो आप किसी भी धर्म के हों क्या फर्क पड़ता है।

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  5. अच्छा तो ये वजह हैं मुस्लिम समाज के प्रगतिशील होने की... पैमाना अगर समान रखें तो हमें हिन्दू समाज के भी प्रगतिशील होने का भी इंतज़ार रहेगा....

    सलीम खान
    "हमारी अन्जुमन"
    (http://hamarianjuman.blogspot.com)

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  6. स्वागत है हरेक घटना का प्रगतिशील होना मत कहिये बोलिए अपने मूल की ओर लौट रहे हैं आजकल प्रगतिशीलता तो पश्चात्य्करण का प्रतिक बन gya है ,

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