मंगलवार, 17 नवंबर 2009

...एक ईमानदार जीवनी पर बवाल क्यों!


मैत्रेयी पुष्पा
'हजारों साल का इतिहास है कि स्त्री के लिए पति रूपी पुरुष मालिक है, स्वामी है। बराबरी की बात सिर्फ बात है, जो व्यवहार में लागू होने से आज तक कतरा रही है।' ऊपर लिखे वाक्यों को सोचते हुए मेरे मन में उन सवालों की उमड़-घुमड़ रही, जिन्हे पुरुष मानसिकता के धधकते हुए आवेश और आक्रोश ने जन्म दिया। बात यहां एक बायोग्राफी यानी जीवनी की है। जीवनी पति की है और कलमकार है पत्नी। पत्नी, जिससे ज्यादा पति नामक जीव को कोई नही जानता न पिता न भाई न बहन, यहां तक कि मां भी नहीं, जो उसे जन्म देती है। 'सत्य के प्रयोग' लिखने वाले महात्मा गांधी की जीवनी अगर कस्तूरबा लिखती तो किताब का चेहरा कुछ और ही होता।
कितना अच्छा रहा तब तक, जब तक स्त्रियां अनपढ़ रहीं। पढ़ भी गई तो मर्यादा और कुलशीलता से भयभीत रहकर चुप, लगभग बेजुबान रहीं। मैं चुप्पी को जुबान या जिह्वा से जोड़कर ही नहीं देखती, अपनी बात कहने का माध्यम कलम ज्यादा ताकतवर है।
गजब यही हुआ कि 20वीं शताब्दी में जहां देश को अंग्रेजों से आजादी मिली, औरतों ने अपनी लेखकीय जंग छेड़ दी। पुरुषों की दुनिया में विध्वंसक बदलाव। आंगन में तूफान। हां, साहित्य के संसार में जहां स्त्रियों की आत्मकथाओं ने तहलका मचाया, वहीं ऐसी जीवनियों ने भी, जो स्त्री द्वारा लिखी गई।
आत्मकथा और जीवनी में अंतर तो होता है कि आत्मकथा लेखक खुद लिखता है और जीवनी किसी शख्स की लिखी जाती है, जो शख्सियत बन चुका हो। फर्क यह भी होता है कि आत्मकथा के लिए सारे विवरण, सवाल-जवाब, नीति-अनीति, दुख-दर्द हमारे अपने भीतर होते है, जबकि जीवनी में आए वृत्तांत हमें वह खुद बताता-सुनाता है या उसके निकट संबंधी अथवा परिजन और मित्र कहते है।
बहुत से लेखक 'आत्मकथा और जीवनी' इन दोनों विधाओं में कलम चलाने से हिचकते है, क्योंकि यहां एक व्यक्ति की जिंदगी से कई लोगों का जीवन जुड़ा रहता है। अत: उन लोगों का मान प्रतिष्ठा गिराने वाली बातें क्यों आनी चाहिए, जिनकी यह कथा नहीं?
निसंदेह यह जोखिम भरा काम है। लगभग 'सीस उतारे मुइ धरै' के अंजाम तक पहुंचने वाला रास्ता। इन दिनों भाव प्रवण अभिनेता ओमपुरी की जीवनी की विशेष चर्चा है। चर्चा में उनकी पत्नी का जहां एक ओर साहस है, वहीं दूसरी ओर उनकी 'ले दे' हो रही है। पुरुष वर्ग को पत्नी द्वारा पति के जीवन प्रसंगों का खुलासा रास नहीं आ रहा।
लेखिका में लगभग हर पुरुष को गद्दार पत्नी नजर आ रही है। नंदिता को क्या पता होगा कि उनके तथाकथित विश्वासघात के घेरे में कितनी स्त्रियां आ गई? कहा यह भी जा रहा है कि मीडिया ने पूरी किताब में से केवल सेक्स प्रसंगों को उछाला है, जिससे आदरणीय अभिनेता की छवि धूमिल हुई है। और अखबारों तथा टीवी के पाठक और दर्शक बढ़ने की उम्मीद जगी है।
दूसरी बात यह भी सामने आई कि किताब की पब्लिसिटी के लिए यह सब किया गया है। जितने मुंह, उतनी बातें। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सेक्स-प्रसंग हमारे समाज में सनसनी फैलाते है, क्योंकि सेक्स को लेकर अभी तक पर्देदारी रही है।
मैं पर्देदारी शब्द इसलिए प्रयोग कर रही हूं कि पर्दे में होता सब कुछ है, दिखता कुछ भी नहीं। किया जाता बहुत कुछ है, कहा नहीं जाता कुछ भी। 'करो, लेकिन कहो नहीं' का सिद्धांत समाज का शांत और व्यवस्थित चेहरा ऐसे ही प्रस्तुत करता रहा, जैसे हरी-भरी घास के मनोरम मैदान के नीचे गहरी भयानक जीव-जंतुओं भरी खाई हो।
हमें सज्जान व्यक्तियों की बेदाग साफ शफ्फाक चादर देखकर उनके व्यक्तित्व की उज्जावलता का विश्वास करना होता है। और पुरजोर कोशिश की जाती है कि यह धारणा टूटनी नहीं चाहिए। मगर क्यों टूटनी नहीं चाहिए? क्यों झूठ में जीना सुविधाजनक लगता है? इसलिए कि ज्यों-ज्यों हमें अपने बड़े होने का अहसास होता है, हम उस छवि से चिपके रहना चाहते है और इसी चाहत में देवता का दर्जा पा लेना चाहते है।
इज्जात का सुनहरी मुलम्मा जब दमकता है तो लगता है कोई इसे छूकर मैला न कर दे। और जब सभी ही इस मुलम्मे को उखाड़ने लगें तो आक्रोश की सीमा नहीं रहती। आखिर औरत की औकात क्या है? उसने किस हिम्मत से वे राज खोले, जिन्हें राज ही रहना था? पतिव्रत से विश्वासघात, मान सम्मान से विश्वासघात, परिवार से विश्वासघात, पत्नी पर भरोसेमंदी से विश्वासघात।
कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि उन्हें अपनी फिक्र से ज्यादा उन स्त्रियों के सम्मान की चिंता है, जिनके नाम सेक्सुअल संबंधों के लिए आए है। क्या खूब है यह दलील भी। अगर ऐसा ही होता तो ये संबंध बनते ही क्यों?
अपनी गृह सेविकाओं से पुरुषों को सेक्सुअल संबंध बनाने में कितनी सुविधा रहती है, लगातार देखने में आ रहा है। रोटी-कपड़ा देने की एवज दासी से कितना कुछ लिया जा सकता है, शोषण का नायाब तरीका है। मैं इस ढंग को अजूबा इसलिए नहीं मानती, क्योंकि यह परंपरा राजाओं, नबाबों और जागीरदारों के यहां बराबर चलती आई है। उनके हरम तरह-तरह की औरतों से सजे और भरे रहते थे।
आज उन लोगों के नाम राजा, नबाब और जागीरदार या जमींदार नहीं है, उनकी श्रेष्ठ जाति धनवान है, उनकी दूसरी कोटि राजनेताओं की है, उनका तीसरा तबका दलालों का है। महान परंपरा जारी है और उस संस्कृति को क्षीण नहीं होने देती, जो स्त्री जीवन पर भारी है। जो औरत को गुलाम बनाती है।
हां, रोटी कपड़ा पाने वाली सेविका या सम्मानित पति से विवाहिता पत्नी क्रमश: मालिक और सामाजिक मान्यता के डर के मारे अहसान फरामोश भी कैसे हो? पत्नी देवी की तरह चुप रहती है तो दासी सती की तरह जलती झुलसती हुई दिन काटती है।
यह कौन है, जिसने कुछ खोलने की जुर्रत की? पत्नी। पत्नियां जानती है कि मिलन की पहली रात से ही पति लोग अपने अपूर्व सेक्सुअल पराक्रमों की कथाएं सुनाना शुरू कर देते है। पतियों का पत्नियों से सवाल होता है कि उनके किस-किस से संबंध रहे हैं? नवविवाहिता लजा जाती है।
जाहिर है कि वह 'हर हाल में कुंआरी कन्या' जिसका पिता ने कन्यादान किया है। लजाना स्त्री का गुण माना गया है, उसे इस तरह की कोई भी सच्चाई शर्म के गर्त में डाल सकती है और भय की खाई में धकेल देगी, क्योंकि जो पति के लिए जायज मान लिया गया है, वह पत्नी के लिए घोर नाजायज है। नंदिता पुरी को सारी बातें अपने पति से ही मालूम हुई न?
ऐसे ही क्षणों में पुरुष वर्ग के राज खुलते है, क्योंकि वह नहीं समझता कि यह औरत बोलना-लिखना सीख गई है। मान्यता तो यही है न कि सीख भी गई है तो अपनी अभिव्यक्ति को पत्नी के चोगे से बाहर नहीं आने देगी। नस-नस में स्त्री को बांधने वाला यह विश्वास कैसा भोला पराक्रम है!
और अब यही पराक्रम बच्चे की जिद-सा आरोप लगाने पर उतारू हो गया। धमकियां भी कम नहीं मिलती इस तरह के जीवन-वृत्तांत लिखने वाली स्त्रियों को। आदर्श और मर्यादा का पालन करने वाले किरदारों के असली चेहरे तो उसी मनुष्य के होते है, जो गुण और दोषों से बना है। फिर क्यों लालसा लगी रहती है कि उनके दर्शन ईश्वरीय रूप में हों?
इन दिनों ऊंचे से ऊंचे सिंहासनों पर विराजे भगवानों के मुकुट उलट गए। साहित्य से लेकर सिनेमा तक, राजनीति से लेकर धार्मिक संस्थानों तक पुरुषों का कामुक जाल बिछा हुआ है और इस महीन जाल को उधेड़ती हुई छिन्न-भिन्न कर रही है पत्नियां ही।
'नाच री घुमा' लिखने वाली माधवी देसाई हों या राजेंद्र यादव की लेखिका पत्नी मन्नू भंडारी, इन विनम्र स्त्रियों से ऐसे खुलासों की किसी को उम्मीद नहीं थी।
लग रहा है कि पुरुष वर्ग अब तक भी स्त्री को समझ नहीं पाया। क्या स्त्री के शरीर से लेकर उसके मन की बनावट इतनी जटिल है? या यह भी एक सामाजिक सम्मान की बात है कि पत्नी की अनैतिक मानी जाने वाली करतूतों को पुरुष उघाड़ेगा तो इज्जात उसी की जाएगी, क्योंकि इज्जात भी पुरुष की ही होती है, जिसे औरत अपने चरित्र से हर हाल में बचाने के लिए बाध्य रहती है। समाज में बौना हो जाने का आतंक पुरुष को पत्नी की हत्या के लिए तो उकसा सकता है, पत्नी की बदनामी के लिए नहीं। दूसरे की जूठी औरत एक मर्द बच्चा पचा नहीं पाता।
यह अलग बात है कि दूसरी औरतों को जूठी करने का चस्का उसे अपने पौरुष की बढ़ोतरी अनुभव कराता है। इस तरह कितनी औरतों का गृह निष्कासन और बहिष्कार कराया होगा, इसकी गिनती कौन करे?
वृंदावन में सभी विधवाएं नहीं, विधवाओं के नाम पर बहुत-सी परिव्यक्ता हैं। पराए मर्द की जूठन, लेकिन यह पुरुष का कौन-सा संस्कार है, सभी के चलते? वह मानती है कि यह मर्द की कमजोरी और कुंठा है, जो अपने प्रति उसके भय से निकलती है या फिर झूठा दम, जो जब न तब उसी के ऊपर भारी घन की तरह आ गिरता है।
लात लताड़ खाकर रोती औरत कितनी निरीह, लाचार और असहाय लगती है, लगता है यही उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसी रूप पर पुरुष को बेइंतहा प्यार आया है। जहां उसने पुरुष से पूछ-पूछकर कोई काम किया है, वहां वह अपनी लगी है। मगर यह कौन है, जिसने अपने आप किताब लिख डाली? यह प्यारी पत्नी तो नहीं, जिसने पुस्तक का एक वर्क भी न देखने दिया।
पत्नी ने लेखिका होने का अभिनय किया या लेखिका अब तक पत्नी होने का स्वांग रचती रही? आखिर इसकी असलियत क्या है? एक स्वतंत्र व्यक्ति जो पुरुष की तरह खुद ले रही है? पति की मंशा आदेश और वांछनाओं का क्या होगा? उसके लिए किसी पत्रकार की तरह पेश आकर या अपनी अभिव्यक्ति को अधिकार मानकर जो कर डाला, इसके लिए पनिश किया जाए या पुरस्कार दिया जाये? लेकिन पति रूपी पुरुष के इस निर्णय पर भी कौन तवच्चो देगा? अब तो लेखिका का ही अपना फैसला है कि वह अपने लिखे पर अडिग है और मानती है कि जो लिखा है, किसी को अपमानित करने के लिए नहीं, छिपे हुए सत्यों को उद्घाटित करने के लिए कलम उठाई।
अगर इस सच्चाई से संबंधित व्यक्ति आहत या क्रोधित होता है तो यह तय है कि वह अभी खुद को गिलाफों में छिपाकर रखना चाहता है।
मैत्रेयी पुष्पा
[लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार हैं]

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लगभग सारी बाते वही कह दी जो मेरे भीतर कल से उमड़ रही थी.....यूँ भी हम कागजो में वो क्यों दिखने की कोशिश करते है जो हम असल में नहीं है .....हम सभी के जीवन के कई ऐसे पन्ने होते है जिसकी पहुँच सिर्फ हम तक होती है ....गांधी के प्रयोगों को हम गांधी दर्शन कहकर नजर अंदाज कर देते है ..ओर बाकी जगह नैतिकता का मोतियाबिंद आँखों में चढ़ा लेते है ....राजेंदर यादव को ही ले ....मन्नू ने उन्हें उधेडा है ...जाहिर है वे पीड़ित है .उन्होंने तब उधेडा जब सामने वाले ने अपना उज्जवल पक्ष रखा ...फिर भी राजेंदर जी की इस बात पे तारीफ़ करनी होगी के उन्होंने हर आलोचना को स्वीकार करने की हिम्मत है....ओर अपने गुनाह को भी ..किसी बात को सामने रखने से हम उसे सही तो नहीं कह रहे .....हम क्यों उपेक्षा करे के एक अभिनेता खरा हो सोने जैसा ....सामान्य पुरुष न हो...यूं भी उम्र के हर दौर में जीवन में कई उतार चढ़ाव आते है ..शर्मिंदगी भरे भी......मसलन जावेद अख्तर ने स्वीकार किया है कम शब्दों में के एक वक़्त ऐसा था मै बहुत पीने लगा था वो मेरी जिंदगी का शर्मनाक दौर था .....आत्मकथा लिखना ओर अपने को निर्ममता से खंगालना बड़ा मुश्किल ओर बहुदारी का काम है .हाँ ओम पूरी जी को यहाँ इसलिए छाले जाना महसूस होता है के उन्होंने जो निजी बाते कही विशवास से शेयर की थी वे इस तरह से सार्वजनिक हो गयी ......
    यूं भी जीवन बड़ा लम्बा वक़्त होता है इसके एक पन्ने पे खड़ा जो मनुष्य महान दिखता है गुजरे वक़्त के साथ किन्ही कमजोर लम्हों में वो भी कभी विलेन होगा...ये तय है ओर सच है ....क्यूंकि आदमी होना ही गलती का पुतला होना है .....

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  2. सच हमेशा ही कडुआ होता है . एक विचित्र बात है इस व्यवस्था में, दो लोग जो काम मिलकर करते हैं उसमे एक सक्षम और दूसरा हिकारत की नजर से देखा जाता है

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