बुधवार, 9 दिसंबर 2009

खामोश सेंसर बोर्ड : उबलती हिंसा और भौंडे संवाद


सेंसर बोर्ड की उदारता का मतलब, सेक्स और हिंसाडॉ. महेश परिमल
एक जमाना था, जब फिल्मों पर निगरानी रखने वाले सेंसर बोर्ड से निर्माता-निर्देशक डरते थे। वे कितनी भी अच्छी फिल्म बनाते, सेंसर अपना काम दिखा ही देता। सेंसर बोर्ड की सख्ती से दर्शकों को साफ-सुथरी फिल्में देखने को मिलती थीं। समय के साथ सेंसर बोर्ड ने भी अपने आप को बदला। अब तो उसने अपनी धारदार कैंची को एक कोने पर रख दिया है। अब तो उसकी जरुरत ही नहीं पड़ती। पहले की तुलना में अब सेंसर बोर्ड काफी उदार हो गया है, इसीलिए अब फिल्मों में सेक्स और ङ्क्षहसा के दृश्य बढ़ गए हैं।
अभी कुछ समय पहले ही सुदीप्तो चट्टोपाध्याय की फिल्म 'पंख सेंसर बोर्ड के सामने आई। इस फिल्म में दो पुरुष परस्पर प्रगाढ़ चुम्बन करते हुए दिखाई देते हैं। इस दृश्य में सेंसर बोर्ड को किसी तरह की खराबी नजर आई। उसने उस दृश्य को ऐसे ही पास कर दिया। इसके पहले भी पिछले साल आई फिल्म 'गजनीÓ में असिन की बर्बर हत्या के दृश्य भी बिना किसी काँट-छाँट के दर्शकों तक पहुँचे। दूसरी ओर 'ओमकारा और 'ट्रेफिक सिगनल में द्विअर्थी संवादों की भरमार थी, उसके बाद भी सेंसर बोर्ड की कैंची खामोश रही।
सेंसर बोर्ड में यह बदलाव शर्मिला टैगोर एवं उनकी टीम के कारण आया है। बोर्ड की चेयरमेन यानी शर्मिला टैगोर इस संबंध में कहती हैं कि हम फिल्मों को सेंसर करने से अधिक महत्व उसके वर्गीकरण को देते हैं। फिल्म के प्रकार के अनुसार हम उसे कौन-सा प्रमाण पत्र दें, हमें इसी की चिंता अधिक होती है। हम दिग्दर्शक की कल्पनाओं को बिना फेरफार के उसे वर्गीकृत करते हैं। हम कोई बात पकड़ लेने के बदले निर्माता के साथ समझाइश और बातचीत से समस्या का समाधान करने में विश्वास रखते हैं। इससे स्पष्ट है कि सेंसर बोर्ड के विचार इतने पुख्ता नहीं हैं। सेंट्रल बोर्ड फॉर फिल्म सर्टिफिकेट (सीबीएफसी) ने कुछ समय पहले ही अनुराग कश्यप की फिल्म 'देव डी को बिना किसी खास कट पारित कर दिया। इस पर अनुराग कश्यप का मानना था कि सेंसर बोर्ड अब पहले से अधिक उदार हो गया है। श्री कश्यप की बात पर वजन रखते हुए निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट कहते हैं कि सीबीएफसी का यह बदला हुआ रुख सिने उद्योग के विकास में फलदायी होगा। जाने-माने एक्टर और डायरेक्टर रजत कपूर अपना अनुभव बाँटते हुए कहते हैं कि मेरी फिल्म 'मिक्स्ड डबल्स में पत्नियों की अदला-बदली जैसा बोल्ड विषय था, इसके बाद भी सेंसर को उसे पास करने में किसी तरह की आपत्ति नहीं हुई। पर फिल्म में एक स्थान पर धर्म से संबंधित संवाद पर उसे आपत्ति हो गई। हमें उस संवाद को काटने को कहा गया। हाल ही में अंजन दास की विवादास्पद बंगला फिल्म को भी सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया है।
सीबीएफसी मुंबई के रीजनल हेड विनायक आजाद बोर्ड के विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि हम फिल्म समीक्षक नहीं हैं। इसलिए फिल्म में क्या दिखाया जाए, क्या न दिखाया जाए, यह तय करना हमारा काम नहीं है। हमें तो यह तय करना होता है कि कौन सी फिल्म किन दर्शक वर्ग के लिए है। हम कटदेकर फिल्म को 'यू सर्टिफिकेट देने के बजाए बिना कट के 'ए सर्टिफिकेट देना पसंद करते हैं। हमारे यहाँ करीब 80 प्रतिशत फिल्में बिना किसी काँट-छाँट के बिना पारित हो जाती हैं।
यह तो हुई आज के सेंसर बोर्ड की उदारता। इसके पहले आशा पारेख और अनुपम खेर ने भी सीबीएफसी के चेयरमेन का पद संभाला है। उस समय बोर्ड के नियम काफी कड़े थे। उनकी इस सख्ती का शिकार कई निर्माता हुए। फिल्म 'धूम के डायरेक्टर संजय गढ़वी कहते हैं कि मुझे सेंसर बोर्ड का काफी कड़वा अनुभव है। मैंने 2001 में एक फिल्म बनाई थी 'तेरे लिए। इसमें एक संवाद था, 'शीट! आई लव हर सो मच बस फिर क्या था, इस संवाद पर सेंसर बोर्ड की भवें तन गईं। इस कारण फिल्म को 'यू सर्टिफिकेट दिया गया। मैंने जब बोर्ड से पूछा कि फिल्म को 'यू सर्टिफिकेट क्यों दिया गया, तो जबाब मिला कि फिल्म में अंग प्रदर्शन है और फिल्म के शुरू ओर अंत में बाइक बहुत ही तेजी से चलाते हुए बताया गया है, इसलिए हमने 'यू सर्टिफिकेट दिया है।
संजय गढ़वी की तरह अनुराग कश्यप की फिल्म 'पाँच बरसों तक सेंसर बोर्ड के शिकंजे में फँसी रही। फिर धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। अब तो फिल्मों में अंग प्रदर्शन द्विअर्थी संवादों पर सेंसर का विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लेकिन यदि कहीं धर्म या राजनीति पर किसी तरह का कटाक्ष किया गया, तो खैर नहीं। आज सेंसर इसी बात पर अधिक संवेदनशील है। अभी तो रामगोपाल वर्मा की 'रण सेंसर के शिकंजे में है, क्योंकि इस फिल्म में राष्ट्रगीत को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। कुछ समय पहले ही कन्नड़ फिल्म के निर्माता को राजनीति विषय पर बनी अपनी फिल्म को सेंसर बोर्ड से पारित करवाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। सेंसर बोर्ड ने हाल ही में हॉलीवुड की फिल्म 'एंजल एंड डेमोंस में कुछ संवादों के कारण वह फिल्म धर्म गुरुओं को दिखाई, उनकी सलाह ली और उनकी सलाह के आधार पर उसे 'यू सर्टिफिकेट दिया। सीबीएफसी के सामने सबसे बड़ा सरदर्द यह है कि किसी फिल्म में घोर धार्मिक टिप्पणी न हो और राजनीति पर किसी तरह का कटाक्ष न किया गया हो। बाकी सब चल जाएगा।
सीबीएफसी की कार्यपद्धति में भी सुधार आया है। उसकी कार्यक्षमता के बारे में कुछ बड़े दिग्दर्शकों विभिन्न विचार रखते हैं। ओनीर को लगता है कि सेंसर बोर्ड के नियम अपने में ही केंद्रित हैं, जहाँ एक ओर 'फैशनÓ को 'यू सर्टिफिकेट दिया जाता है, वहीं मार-धाड़ और हिंसा से भरपूर फिल्म 'गजनी को यू/ए दिया जाता है। ऑस्कर विजेता 'द रीडर को भारत में रिलीज होने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। आज जब सबकुछ इंटरनेट पर उपलब्ध है, तब सेंसरशिप का कोई अर्थ ही नहीं है। संजय गढ़वी कहते हैं कि भारतीय सेंसर बोर्ड का काम दूसरे देशों की तुलना में महत्वपूर्ण है। यहाँ सेंसर बोर्ड को नागरिकों की भावना, समय-समय पर बदलने वाली धारणाओं का खास ध्यान रखना पड़ता है। निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट कहते हैं कि सेंसर के विचारों में काफी प्रगति हुई है, फिर भी अभी बहुत कुछ प्राप्त करना शेष है। यह विशेष रूप से याद रखना होगा।
डॉ. महेश परिमल

4 टिप्‍पणियां:

  1. इसी उदारता का नतीजा है की क्राईम बढ़ रहा है
    ये सेंसर बोर्ड को नहीं दिख रहा

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  2. SENCER BOARD NAAM KI KOI CHEEJ HAI BHI APNE YAHAN ...YAH TO MAHSOOS HI NAHI HOTA....

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  3. sensar bord ki to bahut jimmevariya hai hi ,pr telivijion par dharavahiko me jo khule aam ghar baithe dikhya ja rha hai uska jimmevar kaoun?

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