बुधवार, 23 दिसंबर 2009

गीता किसी एक धर्म की जागीर नहीं


ख्यातिलब्ध जैन संत तरूण सागर का मानना है कि धर्म ग्रंथ गीता किसी एक धर्म की जागीर नहीं है और न ही उस परङ्क्षहदुओं का एकाधिकार है। श्री तरूण सागर ने कल यहां पत्रकारों से कहा कि गीता में कहीं भी ङ्क्षहदू का उल्लेख नहीं है। गीता पर सबका अधिकार है। उन्होने साम्प्रदायिक सौहार्द को जरूरी बताते हुए कहा कि ङ्क्षहदू मुसलमान देश की दो आंखें हैं। भारत में सांप्रदायिकता मुल्क के हिसाब से नहीं है। रमजान लिखते हैं तो राम से शुरुआत करते हैं दिवाली लिखते हैं अली से खत्म करते हैं।
उन्होने कहा कि सत्ता और भ्रष्टाचार का करीबी रिश्ता है। सत्ता और राजनीति को काजल की कोठरी करार देते हुए उन्होंने कहा कि इस पर अगर कोई घुसे और बेदाग निकल जाए यह संभव नहीं है लेकिन जो बेदाग निकलते हैं उन्हें प्रणाम करना चाहिए। उन्होने कहा कि राजनीति में जो ईमानदार लोग भी हैं उसमें साहस नहीं है ईमानदारी के साथ, साथ साहसी भी होना जरूरी है। बुराइयों के खिलाफ लडऩे का साहस होना चाहिए। उन्होंने जीवन जीने के दो तरीके बताते हुए कहा कि पहला जो चल रहा है उसके साथ चलना। दूसरा जो हो रहा है उसके विपरीत चलना। प्रवाह के विरोध के लिए ऊर्जा चाहिए। गंगोत्री से गंगासागर की यात्रा मुर्दा भी कर लेता है लेकिन गंगासागर से गंगोत्री की यात्रा करने के लिए साहस चाहिए। प्रवाह के विरुद्ध बहने के लिए साहस जरूरी है। सामाजिक वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए साहस चाहिए। जैन सन्त ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि आज देश में गाय धर्मनीति और राजनीति के बीच पिस रही है। जब तक इन्हें इन बंधनों से मुक्त नहीं करेंगे गौरक्षा असंभव है। गौरक्षा को धर्मनीति और राजनीति से निकालकर अर्थनीति से जोडऩा होगा तभी गौरक्षा आंदोलन सफल होगा। उन्होने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कहा कि जैन धर्म के सिद्धांत दुनिया को सुधारने के लिए उपयोगी है अच्छे हैं लेकिन उसकी मार्केङ्क्षटग नहीं हो पा रही है इसलिए पिछड़ रहा है। धर्म और राजनीति के संबंध में उन्होंने कहा कि धर्म गुरु है और राजनीति शिष्य। राजनीति अगर गुरु के समक्ष आती है तो यह समस्या खड़ी हो जाती है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के संबंध में पूछे गए सवाल पर संतश्री ने कहा कि वहां हजारो लाखों लोगों की आस्था टिकी हुई है इसलिए कानून के दायरे में रहकर मंदिर का निर्माण का काम होना चाहिए। धर्म को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन का नाम है। यह बेचने, खरीदने की चीज नहीं है। धर्म जीने की चीज है प्रदर्शन का नहीं।

अपेक्षा से उत्पन्न होता है दु:ख
व्यक्ति की यह सामान्य प्रवृत्ति है कि वह जब किसी के लिए कोई कार्य या भलाई करता है तो उससे अपेक्षा करने लगता है कि बदले में वह भी उसके लिए कुछ करे और जब उसकी यह अपेक्षा पूरी नहीं होती है तो वह दुखी होने लगता है। किसी ने अपने पुत्र के लिए अपना जीवन दाव पर लगा दिया लेकिन बुढ़ापे में वह उसकी लाठी नहीं बना। पत्नी के लिए सुख-सुविधा के तमाम साधन जुटाए, लेकिन उसने साथ नहीं दिया। मित्रों के लिए बहुत कुछ किया लेकिन जब जरूरत पड़ी तो सबने दगा दे दिया। इस तरह की तमाम बातें व्यक्ति के साथ होती रहती हैं और वह दूसरे लोगों और नाते.रिश्तेदारों से अपनी अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर दुखी होता रहता है लेकिन वह पंचतंत्र की कहानियों. पौराणिक ग्रंथों और कहावतों के रूप में पूर्वजों की ज्ञान की थाती का अवलोकन करे तो उसे जीवन का मर्म समझाने और दिशा देने वाले ऐसे बहुत से अमूल्य नीति वचन और सूत्रवाक्य मिल सकते हैं जिनसे उसका मार्गदर्शन हो सकता है। एक कहावत है ' नेकी कर दरिया में डाल ।Ó यानी भलाई करो और इस बात की बिल्कुल अपेक्षा मत करो कि सामने वाला उसके बदले में तुम्हें भी कुछ देगा। इस बात को जिस भी व्यक्ति ने अपने जीवन में उतार लिया. तय मानिए कि वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति है। हालांकि यह आसान नहीं है कि किसी की मदद करो. सेवा करो और वह दगा दे जाए तो भी उसे विराट् मन से क्षमा कर दो लेकिन यह लाख टके की बात है कि मदद करने के बाद उसे भूलने की आदत जितनी विकसित होती जाएगी. मनुष्य उतना ही सुखी रहेगा। कल्पना कीजिए कि यदि अनन्य रामभक्त हनुमान को यह शिकायत हो जाती कि उन्होंने भगवान् राम के लिए कितना कुछ किया लेकिन उन्हें क्या मिला । पर हनुमान किसी भी तरह की अपेक्षा से रहित होकर बस अपना कर्तव्य करते रहे और प्रभुभक्ति में लीन रहे। व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए कि पुष्प की तरह सुगंध बांटना ही उसका धर्म बने और इसके बदले उसके मन में कोई अपेक्षा नहीं हो। इस जगत में यदि आपने'नेकी कर दरिया में डाल' का सही मर्म समझ लिया तो संसाररूपी भवसागर को पार करने में बहुत आसानी होगी।

4 टिप्‍पणियां:

  1. तरूण सागर जी के विचार मुझे समझदारी भरे लगते है .. खासकर किसी पत्रिका में प्रकाशित होनेवाले उनके 'कडवे प्रवचन' मैं सबसे पहले पढा करती थी .. बहुत दिनों बाद आपके माध्‍यम से उनकी बातों को पढने का अवसर मिला .. आपका आभार !!

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  2. बढ़िया पोस्ट लिखी आभार। तरूण सागर जी को बहुत बार टी वी पर सुना है.....बहुत सार्थक बोलते हैं..

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  3. तरूण सागर जी अपने विचारों से हमेशा प्रभावित करते रहे हैं.....छदम सन्तों की इस भीड में वो सही मायनों में एक सच्चे सन्त का धर्म निभा रहे हैं ।

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