शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

मेरी ६०० वीं पोस्‍ट: आज का विषय पर्यावरण


स्वास्थ्य की कीमत पर धनोपार्जन, कितना उचित?
डॉ. महेश परिमल
एक उद्योगपति की पत्नी बीमार हो गई। हर जगह उसका इलाज करवाया, पर कोई फायदा नहीं हुआ। उद्योगपति पत्नी को खूब चाहता था, पत्नी भी उसे खूब चाहती थी। अंतत: डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। स्थिति यह आ गई कि उद्योगपति कहने लगा कि चाहे कितना भी खर्च हो, पर मेरी पत्नी को बचा लो। एक दिन में एक करोड़ रुपए भी खर्च होते हैं, तो मैं वह खर्च करने को तैयार हूँ। लेकिन कुछ न हो सका। अंतत: उद्योगपति की पत्नी का देहांत हो गया।
ये इंसान भी कितना मूर्ख है, पहले तो संपत्ति जमा करने के लिए हर तरह के उपाय करता है। इस दौरान यह भी समझ नहीं पाता कि वह क्या कर रहा है? वह प्रकृति से छेड़छाड़ करता रहता है। पेड़ कटवाता है। पानी बेकार बहाता है। प्रदूषण को प्रश्रय देता है। कुल मिलाकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला हर काम करता है। उसके बाद जब यह नुकसान अपना असर दिखाने लगता है, तब वह अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने लगता है। ङ्क्षकतु तब तक काफी देर हो चुकी होती है। तब स्वास्थ्य भी सँभल नहीं पाता। आखिर होता वही है, किसी अपने का पास से चुपचाप गुजर जाना। अपने स्वास्थ्य की कीमत पर वह संपत्ति जमा करता है। आगे चलकर यही संपत्ति उसे कोई काम नहीं आती।
आज मुंबई के लोगों से बात करके देख लें। किसी के पास समय नहीं है। हर कोई दौलत के पीछे भागा जा रहा है। मानसिक शांति क्या होती है, यह तो वे जानते ही नहीं। बस धन कमाना ही पहली और अंतिम प्राथमिकता रह जाती है। जीवन में धन ही सब कुछ नहीं होता। यह बात अब अमीर देश समझ रहे हैं। कोपेनहेगन में इसी बात की चिंता प्रकट की गई थी कि विश्व में बढ़ रहे प्रदूषण को दूर करने के लिए कितना धन खर्च किया जाए? इस पर रोक किस तरह से लगाई जाए? क्या इसे कम नहीं किया जा सकता? आदि प्रश्न जिस तेजी से उछले, उससे ही दोगुनी तेजी से लुप्त भी हो गए। कोपेनहेगन में किसी बात पर कोई राजी नहीं हो पाया। इतना खर्च करके किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सका। यह अखरने वाली बात है। इसे ही यदि पहले समझ लिया गया होता, तो शायद आज ये स्थिति नहीं आती। पर किया क्या जा सकता है।
आज इंसानों में भी यही देखा जा रहा है। एक हरियाली वाली जगह पर अपना आशियाना बनाता है। कुछ दिनों बाद वहाँ की हरियाली विदा ले लेती है, बस जाते हैं, कांक्रीट के जंगल। ढूँढते रह जाओगे हरियाली को। वह नहीं मिलेगी। हर कोई चाहता तो यही है कि वह हरियाली के बीच रहे। पर इस हरियाली को बनाए रखने के लिए वह ऐसा कुछ नहीं कर पाता, जिससे हरियाली बची रहे। एक पेड़ की छाँव कितना सुकून देती है, इसे जंगल में जाकर नहीं समझा जा सकता। इसे तो तब समझा जाएगा, जब मीलों लंबे रेगिस्तान की ययात्रा करने के बाद कहीं कोई घना पेड़ मिल जाए। यदि वहाँ एक कुआँ हो, तो क्या बात है? बस पानी पीयो और उसी छाँव में आराम करो। देखो, कितना सुकूल मिलता है। जिसने भी यह अनुभव किया है, वही इसे बेहतर समझ सकता है। वही इस पीढ़ी को भी समझा सकता है कि पेड़ हमारे लिए कितने लाभप्रद हैं।
एक बार पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र मिल गए। उन्होंने मॉल संस्कृति पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि इस पीढ़ी से मैं यह पूछना चाहता हूँ कि शहर के बीचों-बीच स्थित तालाब के स्थान पर मॉल बनाकर वे समाज के लिए तो एक अच्छा कार्य कर रहे हैं, पर क्या वे बता सकते हैं कि वह तालाब जो पानी संग्रह करता था, तो उसका काम कौन करेगा? क्या मॉल बनाने वाली पीढ़ी के पास ऐसा कोई उपाय है, जिससे वे बता सकें कि तालाब के स्थान पर मॉल बनाकर पानी संग्रहण किस तरह से किया जाएगा? यह पीढ़ी तालाब के स्थान पर मॉल बनाना तो जानती है, पर पानी संरक्षण के बारे में कुछ नहीं जानती। शहरों से तालाब कम हो रहे हैं और बड़े से बड़ मॉल बन रहे हैँ। हम इसी में खुश हैं कि हमें मॉल में कई अत्याधुनिक चीजें एक ही स्थान पर मिल रही हैं। पानी हमसे दूर चले जाएगा, तो हरियाली हमारे पास रहने वाली नहीं है। यदि आप हरियाली को चाहते हैं, तो पानी से प्यार करना सीखना होगा। एक बूँद पानी का मोल शरीर के खून जितना है। पानी बेकार बह रहा है, तो यह समझो कि हमारे शरीर का खून बेकार बह रहा है। खून बाद में बन जाएगा, पर पानी हम बना नहीं सकते। यह तो हमे प्रकृति से ही मिलेगा। हमें इसका संरक्षण करना होगा। तभी पानी हमारे पास रह पाएगा? अन्यथा अभी तो वह धरती के ५० मीटर अंदर है, हालात यही रहे, तो वह और भी नीचे चला जाएगा, जहाँ तक किसी की पहुँच नहीं हो पाएगी। यह हमारी अत्याधुनिक मशीनें वहाँ तक पहुँच भी गई, तो पानी की लागत इतनी अधिक होगी कि वह हमें हमारी नानी याद दिला देगा।
हिंदू शास्त्र की सभी विधियाँ और नीति-नियम मानव के स्वास्थ्य को लेकर ही तैयार किए गए हैं। शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी मन स्वस्थ रहेगा। यदि मन स्वस्थ रहा, तो मानव का मनोबल स्वस्थ रहेगा। शरीर का रक्त संचार निर्विघ्न हाता रहेगा, तो रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति में वृद्धि होगी। इसी गणित का अनुसरण करते हुए उत्तरी ध्रुव की चुंबकीय शक्ति का असर मानव के शरीर पर पडऩे के कारण यह तय किया गया है कि रात को सोते समय मनुष्य का सर दक्षिण दिशा मेें होना चाहिए, ताकि शरीर के खून में शामिल लौह तत्व उत्तरी ध्रुव की चुंबकीय शक्ति को खून के संचार के लिए सरल बना सके। ऐसे छोटे-छोटे अनेक नियम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ही बनाए गए हैं। किंतु शहर के भागम-भाग जीवन जीते हुए लोग ऐसा न कर पाने के लिए विवश हैं। वे सोचते हैं कि अभी धनोपार्जन कर लें, फिर स्वास्थ्य की ओर ध्यान देंगे। अब इंसान को इस समझ से कैसे बाहर निकाला जाए?
पहले हमारा देश कृषि प्रधान देश था, पर अब उद्योग प्रधान देश बन गया है। उद्योग-धंधों को सरकार की तरफ से संरक्षण मिल रहा है। इन उद्योगों का रसायनयुक्त पानी धरती के पानी को प्रदूषित कर रहा है। एक उद्योग यदि हजारों को रोजगार दे रहा है, तो लाखों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ भी कर रहा है। इसे सरकार नहीं समझ पा रही है। सरकारों का हर कदम उद्योगपतियों को लुभाने का होता है। ऐसे में आम आदमी का स्वास्थ लगातार बिगड़ता जा रहा है। लोभी नेताओं के जाल में फँसकर सामान्य नागरिक आज महँगाई से जूझ रहे हैं। पानी की समस्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। इन परिस्थितियों में मानव को अपने ही अस्तित्व का संकट नजर आने लगा है। अपने आप को बचाने के लिए शरीर को स्वस्थ्य रखना बहुत ही आवश्यक है। पर इस सामाजिक, सांस्कृतिक और सरकारी प्रदूषण से कैसे बचा जाए? जब से शहरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है, तब से परिस्थितियाँ और भी अधिक विकट हो गई है। तमाम कारखानों का रसायनयुक्त पानी आखिर कहाँ जा रहा है, यह जानने की फुरसत किसी को भी नहीं है। सैकड़ों एकड़ जमीन नष्ट हो गई है। पर्यावरण की रक्षा नहीं कर पाने के कारण वह आज अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार रहा है। पर्यावरण को आज भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। आखिर कब समझेगा इसे मानव?
डॉ. महेश परिमल

5 टिप्‍पणियां:

  1. ६००वी पोस्ट के लिए बधाई जल्द हजार का आंकड़ा पार करे. शुभकामनाओ के साथ ...

    महेन्द्र मिश्र

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  2. प्रदूषण की अति हो गई आज गंगा आचमन योग्य भी नहीं रही। विश्व के सारे जल को यदि एक गागर में भर लें तो उसमे पीने योग्य पानी महज़ एक चुल्लू भर बचा है।
    शास्त्रों में पेड़ों के महत्तव तो समझाते हुए 'एक हरे पेड़ को काटना युवा पुत्र की हत्या के सामान माना गया है।
    एक मानव को जीवित रहने के लिए २ पेड़ों की प्राण वायु दरकार है। जिसने जीवन में एक भी पेड़ नहीं लगाया उसे अपने दाह संस्कार में दो पेड़ों में जलने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

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