मंगलवार, 11 मई 2010

मांसाहार से हो सकता है गठिया


मांसाहार मनुष्य का प्राकृतिक आहार नहीं है। जो लोग मांसाहार करते हैं. उनके रक्त में यूरिक एसिड अधिक मात्ना में बनता है. जिससे उनमें गठिया. मूत्न संबंधी विकार और अन्य बीमारियां होने की संभावना रहती है। वास्तव में मनुष्य को जिन तत्वों की संतुलित मात्ना में जरूरत होती है. उनकी पूíत शाकाहार से हो जाती है। मांस में जिन तत्वों को पौष्टिक बताया जाता है. उनमें यूरिक एसिड की अधिकता पाई जाती है। यही यूरिक एसिड शरीर में जमा होकर गठिया और मूत्न संबंधी विकारों के अलावा रक्त विकार. हृदय रोग. क्षय रोग. अनिद्रा. रक्तचाप.यकृत रोग आदि अनेकानेक बीमारियों को जन्म देता है। मांस में मौजूद चर्बी और कोलेस्ट्रोल की अत्यधिक मात्ना मांसाहारी व्यक्ति के शरीर की रक्त धमनियों की आंतरिक भित्तियों में जमा होकर उन्हें संकरा बना देती है.जिससे रक्त संचार में बाधा उत्पन्न होती है। पशुओं से प्राप्त वसा और घी.मक्खन. मांस. मछली. अंडे में मौजूद वसा रक्त कोलेस्ट्रोल की मात्ना को शीघ्रता से बढाती है. जिससे उच्च रक्तचाप की स्थिति बनने लगती है। यहां तक कि मस्तिष्क में रक्तस्राव होकर पक्षाघात तथा हृदय के रक्त में बाधा से हृदय शूल और हृदयाघात तक हो सकता है। पित्ताशय में ज्यादातर पथरियां कोलेस्ट्रोल से बनती हैं। यदि व्यक्ति अपने आहार में कोलेस्ट्रोल की मात्ना कम कर ले तो वह पित्ताशय के रोगों से बच सकता है। मनुष्य के स्वस्थ गुर्दे प्रतिदिन सात ग्रेन की मात्ना में ही यूरिक एसिड का उत्सर्जन कर पाते हैं लेकिन मांसाहार से यूरिक एसिड की ज्यादा मात्ना हो जाने पर गुर्दो पर अतिरिक्त दबाव पडने लगता है. जिससे उनमें पथरी बनने लगती है या उसकी कोशिकाओं में सूजन उत्पन्न होने लगती है। यदि अधिक समय तक यह स्थिति बनी रहती है तो गुर्दे काम करना भी बंद कर सकते हैं। वास्तव में मांस मनुष्य का भोजन नहीं है। उसके शरीर. दांत और आहार नली की संरचना भी मांसाहारी जीवों की आंतों की रचना से मेल नहीं खाती है। शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य की छोटी और बडी आंत की लंबाई उसके शरीर की लंबाई से चार गुना से भी ज्यादा होती है। मनुष्य के दांत मांसाहारी जीवों की तरह नुकीले नहीं होते हैं. जिससे वे मांस काट सकें।

मनुष्य का लार टायलिन की उपस्थिति के कारण क्षारीय होता है जिससे काबरेहाइड्रेट का पाचन सुगमता से होता है जबकि मांसाहारी जीवों का लार अम्लीय होता है। साथ ही मांसाहारी जीवों के जठर रस में अम्ल की मात्ना मनुष्य की तुलना में चार गुना अधिक होती है ताकि मांस में मौजूद प्रोटीन की अधिक मात्ना का पाचन सरलता से हो सके। मांसाहार पेट संबंधी विभिन्न संक्रमण रोगों के लिए भी जिम्मेदार होता है। वैसे भी मृत शरीर में विभिन्न जीवाणु सक्रिय होकर शरीर की कोशिकाओं का विघटन तथा कैटाबोलिज्म प्रारंभ कर देते हैं. जिससे एक तरफ जीवाणुओं की संख्या में बडी तेजी से वृद्धि होने लगती है और दूसरी तरफ विभिन्न जहरीले और हानिकारक पदार्थो का निर्माण होने लगता है। इनमें कई ऐसे पदार्थ होते हैं. जो मांस को सामान्य रूप से पकाते समय नष्ट नहीं होते हैं। मांस के लिए अक्सर ऐसे जानवरों की भी हत्या की जाती है. जो रोगग्रस्त होते हैं या जिनमें रोग के जीवाणु पल रहे होते हैं। इस तरह दूषित मांसाहार के जरिए रोगाणु या जहरीले हानिकारक पदार्थ शरीर में पहुंचकर रोग का कारण बनते हैं। मांस में मौजूद प्रोटीन की अधिक मात्ना को पाचन के लिए जठर पाचक रस और अम्ल की अधिक मात्ना की आवश्यकता पडती है। इसलिए मांसाहारी व्यक्तियों में अम्ल का स्राव अधिक मात्ना में होता है. जिससे आमाशय और ग्रहणी की श्लेष्मिक कला में मौजूद अम्ल में सुरक्षा प्रदान करने वाला तंत्न धीरे.धीरे कमजोर पडने लगता है और आमाशय व्रण तथा ग्रहणी व्रण होने की संभावना बढने लगती है।

गुलशन अरोडा

2 टिप्‍पणियां:

  1. विज्ञान की भाषा संभावना पर आधारित नहीं होती,यदि गठिया होता है या हो ही जाता है या ये एक निश्चित कारक है ऐसा स्पष्ट लिखिये।

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  2. बहुत उपयोगी जानकारी।

    मैने भी देखा है कि मांस-मछ्ली खाने वाले गठिया रोगी यदि इसका सेवन बन्द कर देते हैं तो उन्हें आराम मिलता है।

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