गुरुवार, 27 मई 2010

गलत ही नहीं सही भी हैं थरूर-रमेश


नीरज नैयर
शशि थरूर के बाद सुर्खियों में रहना अगर किसी को आता है तो वो हैं पर्यावरण एवं वनमंत्री जयराम रमेश। रमेश आजकल चीन में दिए गए अपने बयान को लेकर खबरों की हैडलाइन बने हुए हैं। चीनी नेताओं के बीच बैठकर उन्होंने चीनियों जैसी जो बातें बोली वो कांग्रेस को भी पसंद नहीं आई। तो फिर भाजपा और दूसरे दलों के रुख का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। भाजपा और भाकपा दोनों ही और मंत्रीजी की कुर्सी के पीछे पड़ गए हैं, याद हो कि थरूर को गद्दी से उतारने में भाजपा ने ही मुख्य भूमिका निभाई थी। हालांकि शशि थरूर की गुस्ताखियों की फेहरिस्त थोड़ी ज्यादा लंबी थी, शरद पवार और उनके जैसे कई भारी-भरकम नेताओं को बचाने के लिए उन्हें बली का बकरा बनाया। लेकिन रमेश भी शनै: शनै: उसी राह पर निकलते दिखाई दे रहे हैं। दोनों नेताओं में फर्क है तो बस इतना कि थरूर साहब को ट्विीट करने की आदत थी और जयराम सीधे मीडिया में जाना पसंद करते हैं। पूर्व विदेश राज्यमंत्री के हर बयान की शुरूआत सोशल नेटवर्किग साइट से होती थी। ट्विटर से हटकर बोलना शायद उन्हें बिल्कुल नहीं भाता था। अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि उनकी विदेश मंत्रालय से रवानगी की नींव भी इसी ट्विटर पर रखी गई। ललित मोदी ने कोच्चि टीम में उनकी महिला मित्र सुनंदा के बारे में जो कुछ भी लिखा वो, थरूर के खिलाफ माहौल बनाता गया। और अंत में प्रधानमंत्री को उन्हें राम-राम कहने को मजबूर होना पड़ा। ये बात अलग है कि थरूर की कुर्सी छिनवाने वाले मोदी भी ज्यादा दिनों तक आईपीएल की कमिoAरी नहीं कर पाए। उन्हें भी ट्विीट करने की सजा भुगतनी पड़ी। थरूर को तो विदेश मंत्रालय में ही नया पद मिल गया लेकिन मोदी अभी भी बेचारे निलंबन पर आंसू बहा रहे हैं। वैसे इकॉनोमी क्लास को कैटल क्लास कहने वाले थरूर के बयान को छोड़ दें तो बाकी जो कुछ भी उन्होंने कहा उसमें कहीं न कहीं दम जरूर था।
मसलन वीजा संबंधी नियमों को कड़ा बनाने के सरकार के फैसले पर सवाल खड़े करना। इस संबंध में उन्होंने ट्विीट किया, क्या इससे सचमुच सुरक्षा बढ़ेगी? क्या आतंकवादी इसमें सफल होंगे कि भारत यहां आने वाले के प्रति बेरूखी दिखाए? याद रहे कि 26/11 के हमलावरों के पास कोई वीजा नहीं था। क्या यह सब हेडली जैसे किसी के लिए भारत में आना और घूमना वाकई मुश्किल बना पाएगा? इससे तो ज्यादातर हमारे पड़ोसी नागरिकों या मासूम लोगों की ही तकलीफें बढ़ेंगी और हमें लाखों डॉलर्स का नुकसान होगा, सो अलग। गौर से सोचा जाए तो थरूर के इस बयान में बवाल मचाने लायक कुछ भी नहीं है। उन्होंने बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी, भारत में सख्त कानूनों की कोई कमी नहीं है, पर क्या उनका कड़ाई से पालन हो पाता है। जरूरी नहीं है कि नई व्यवस्थाएं स्थापित की जाएं, पुरानी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करके भी हालात सुधारे जा सकते हैं। ऐसे ही राजनेताओं और नौकरशाहों के एक सम्मेलन में थरूर ने कहा था कि गांधी और नेहरू ने दुनिया के मंच पर जिस तरह से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की छवि पेश की, वह दुनिया के देशों को उपदेश लगा। और इसके चलते कहीं न कहीं भारतीय विदेश नीति को लेकर दूसरे देशों में भारत की नकारात्मक छवि बनी। ये बात गांधी-नेहरू समर्थकों को चुभना लाजमी है, और चूंकि कांग्रेस खुद इस खानदान से है इसलिए शशि थरूर साहब को उसके तीखे तेवर झेलने पड़े। मगर भारतीय विदेश नीति में जवाहर लाल नेहरू के योगदान और उनकी गलतियों का आकलन करने वाले शायद ही थरूर के खिलाफ नहीं जाते। चीन के साथ युद्ध के जिस दंश को भारत आज भी महसूस करता रहता है, वो नेहरूजी की गलतियों का ही नतीजा था। थरूर महज गली-मोहल्ले की राजनीति से उठकर विदेश मंत्रालय तक नहीं पहुंचे थे, उनकी शैक्षणिक योग्यता इतनी है कि वो सही या गलत में अंतर कर सकें। खैर आईपीएल में बैकडोर से एंट्री मारने का प्रयास करना शायद उनकी सबसे बड़ी गलती थी और इसका पता अब तक उन्हें चल गया होगा। जहां तक जयराम रमेश की बात है तो उनके भी कुछ बयानों की गंभीरता को समझना जरूरी है। चीन में वो जो कुछ भी बोले उसे कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता। खासकर चीन के मुद्दे पर तो किसी भारतीय मंत्री का इस तरह का रवैया ना तो विपक्षी दलों को समझ में आएगा और न ही जनता को। रमेश ने बीजिंग पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत का गृहमंत्रालय चीनी कंपनियों के प्रति जरूर से ज्यादा ही सुरक्षात्मक रवैया और सावधानी बरत रहा है। उन्होंने ये भी कहा था कि गृहमंत्रालय को अपना नजरीया बदलना चाहिए। चीन को लेकर भारत सरकार पहले से ही आवश्यकता से अधिक उदारवादी नीति अपनाती आई है, ये उदारवादी नीति का ही हिस्सा है कि हम सीमा विवाद जैसे मुद्दे को छूना भी नहीं चाहते। चीनी सैनिकों की घुसपैठ को कोरी अफवाह करार दे देते हैं। इससे ज्यादा अगर भारत उदारवादी हुआ तो चीन की राजधानी बीजिंग नहीं दिल्ली होगी। लेकिन रमेश ने पॉलीथिन बैग्स, गंदगी का नोबल और दीक्षांत समारोह के पारंपरिक परिधान को लेकर जो बयान दिए उन्हें पूरी तरह से गलत करार नहीं दिया जा सकता। सबसे पहले पॉलीथिन बैग्स पर प्रतिबंध की मुखालफत करके जयराम रमेश सुर्खियों में आए। उनका कहना था कि प्रतिबंध किसी समस्या का हल नहीं हो सकता, बात सही भी तो है। पॉलीथिन पर बैन लगता है तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को ही उठाना पड़ेगा। पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है। ऐसे में प्लास्टिक के बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगा तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा। वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं। वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं। पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है। अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों के सड़ने आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा। इस समस्या का केवल एक ही समाधन है, रिसाईकिलिंग, रमेश ने रीसाइकिलिंग पर ही जोर दिया था। कुछ समय पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने भी अपने रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रिसाईकिलिंग किया जा सके। वैसे सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है। उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रिसाईकिलिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाईकिल हो पाती है मतलब साफ है, हमारे देश में रिसाईकिलिंग का ग्राफ काफी नीचे है। प्लास्टिक को अगर अधिक से अधिक रिसाईकिलिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए जयराम रमेश का तर्क विरोध का कारण नहीं बल्कि विचार की वजह बनना चाहिए था। इसी तरह गंदगी को लेकर उनका ये कहना कि अगर गंदगी का नोबल दिया जाता भारत उसका प्रबल दावेदार होता, बिल्कुल सही है। हम इस बयान के लिए रमेश को बुरा-भला जरूर ही कह सकते हैं, पर क्या हकीकत हम खुद नहीं जानते। देश में ऐसा कौन सा शहर है जिसे पूर्णता साफ-सुथरा कहा जा सके। दिल्ली से लेकर मुंबई तक हर जगह गंदगी ही गदंगी है, तो फिर रमेश गलत कैसे हो सकते हैं। कुछ इसी तरह उन्होंने दीक्षांत समारोह की पारंपरिक वेशभूषा को बर्बर औपनिवेशवाद बताया, क्या ये सही नहीं है। क्या ये जरूरी है कि हम राजा-महाराजाओं की माफिक पोशाक पहनकर ही डिग्री हासिल करें। जयराम रमेश और शशि थरूर कहीं न कहीं गलत हो सकते हैं लेकिन उनके हर बयान को एक ही नजरीए से देखना कहीं से भी तर्क संगत नहीं। अगर दोनों कुछ अच्छा कहते हैं तो उसे सहज मन से स्वीकार करना ही चाहिए।
नीरज नैयर

2 टिप्‍पणियां:

  1. डा. साहब । एक हद तक आपकी बातों से सहमत हूं । खासकर तब तो ये बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है जब सत्ता में बैठा हुआ व्यक्ति खुद ही सरकार के विरोध में अपनी राय रख दे । हां विदेश में बिना कुछ सोचे समझे कुछ भी कह देना वो भी तब जब आप भारतीय प्रतिनिधि के रूप में हों , कुछ तर्कसंगत नहीं लगा ।आलेख हमेशा की तरह सार्थक लगा ।

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