सोमवार, 30 अगस्त 2010

वेदांता के लिए लाल झंडी, पास्को के लिए लाल जाजम

डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई। इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।
वेदांता के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है। इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125 लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के लोग अपनी जमीन वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना समिति की जाँच में सामने आई।
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी निवेश की योजना थी। केवल पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का मामला भी शामिल है।
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है। इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था। इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई। पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है। इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।
पास्को प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर। आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से नहीं मिल पाया?
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 21 अगस्त 2010

हमें ऑस्ट्रेलिया से कुछ सीखना होगा



डॉ. महेश परिमल

भारत में जब भी चुनाव होते हैं, तब उसका मुख्य मुद्दा विकास या महँगाई ही होता है। देश में कई चुनाव हुए पर कभी जनसंख्या मुद्दा नहीं बना। आज २१ अगस्त को ऑस्ट्रेलिया में आम चुनाव हैं, जहाँ इस बार जनसंख्या को एक मुद्दे के रूप में सामने लाया गया है। इस मुद्दे पर भारतीय नेताओं के मुँह पर ताले लग जाते हैं। पर एक आम आस्ट्रेलियन इस बार इस विषय पर काफी गंभीरता से सोच रहा है। विभिन्न लोगों के मत लिए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जनसंख्या को लोग पर्यावरण से जोड़कर देख रहे हैं।
हमारी देश में आबादी कभी भी नेताओं के लिए मुद्दा नहीं बनी। पर ऑस्ट्रेलिया में इस बार आम चुनाव में यह मुद्दा जोर-शोर के साथ उभरा है। इस मुद्दे को जो भी अच्छी तरह से पेश कर गया, समझ लो जीत उसी की। शायद आपको यह नहीं पता होगा कि ऑस्ट्रेलिया आकार में भारत से कई गुना बड़ा है, पर आबादी के मामले में वहाँ की आबादी हमारे त्रिपुरा राज्य के बराबर है। इतना विशाल क्षेत्र होने के बाद भी लोगों की बसाहट आखिर इतनी कम क्यों है? दरअसल बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया एक सूखा महाद्वीप है। जहाँ पानी की कमी हमेशा बनी रहती है। इस दृष्टि से वहाँ जनसंख्या पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है।
अभी वहाँ की हालत यह है कि वहाँ के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड बढ़ती जनसंख्या को बेहतर मानते हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी से उनका पत्ता साफ करने वाली वर्तमान प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड जनसंख्या नियंत्रण की बात कर रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया की आबादी वहाँ के मूल नागरिकों की वजह से नहीं, बल्कि अप्रवासियों के कारण बढ़ रही है। प्रश्न यह है कि यदि आबादी वहाँ के मूल लोगों के कारण बढ़ती, तो क्या यह मुद्दा बनती। ऐसा नहीं है, मुद्दा तो तब भी बनती, क्योंकि वहाँ का हर नागरिक यह चाहता है कि देश का पर्यावरण सुरक्षित रहे। पर्यावरण की कीमत पर आबादी बढ़ाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यानी ऐसा ऑस्ट्रेलिया जहाँ जनसंख्या उतनी ही रहे कि पर्यावरण, मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के अनुपात में देश की विकसित जीवन शैली बनी रहे। अर्थशास्त्री भले ही चाहें कि आबादी बढ़े, क्योंकि इससे आर्थिक सम्पन्नता बढ़ेगी। अर्थशास्त्री हमेशा यही चाहेंगे कि जनसंख्या बढ़ती जाए, क्योंकि वो इसे एक संसाधन के रूप में देखते हैं. जितने Êयादा लोग उतना Êयादा सफल घरेलू उत्पाद। लेकिन बात केवल पैसे की नहीं होती, लोगों के जीवनस्तर क्या है, ये भी मायने रखता है.
पर्यावरणविद मानते हैं कि दूसरे जीवजंतु भी हमारे साथ जिंदा रह सकें, ऑस्ट्रेलिया में पानी की कमी है और दुनिया में जहाँ भी रेगिस्तान होता है वहां कम लोग होते हैं. ऑस्ट्रेलिया एक सूखा महाद्वीप है इसलिए ये धारणा गलत है कि यहाँ का क्षेत्रफल बड़ा है तो जनसंख्या भी बड़ी होनी चाहिए। इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में यह मुद्दा छाया हुआ है। हर क्षेत्र के लोग इसमें अपनी राय दे रहे हैं। सभी यही चाहते हैं कि आबादी इतनी रहे कि पर्यावरण को नुकसान न हो। लोग अपनी जीवनशैली में बिना बदलाव किए सुरक्षित रह सकें। हमारे देश के नेताओं और नागरिकों को इससे सबक लेना चाहिए कि जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है। इस सरकार को नहीं, बल्कि हमें ही निपटना है। हमारे देश के नेता इसे भले ही न मानें, इसे मुद्दा न बनाएँ, पर सच तो यह है कि हम इस गंभीर समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते। वर्तमान प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार टोनी एबट ने हाल ही में कहा कि अगर वे चुने जाते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया आने वाले अप्रवासियों की संख्या में एक लाख तीस हजार की कटौती करेंगे। यह एक चुनौतीपूर्ण घोषणा है। आखिर उन्होंने कुछ सोच-समझकर ही यह कहा है। अब तो यह तय है कि जिसने भी इस मुद्दे को अच्छी तरह से पेश कर दिया, उसकी जीत सुनिश्चित है।
समझ में नहीं आता कि हमारे देश में नेता ऐसा कब सोचेंगे? आज भले ही वे इस गंभीर समस्या पर अपना मुँह न खोलें, पर जब इस दिशा में नागरिकों की जागरुकता बढ़ जाएगी, तब उन्हें इस बात पर सोचने के लिए विवश होना ही होगा। बहुत ही छोटा सा देश है ऑस्ट्रेलिया, पर उसकी सोच हमसे काफी आगे है। हम आबादी में भले ही विशाल माने जाते हों, पर सच तो यह है कि हमारे देश के नेताओं की सोच संकीर्ण है, जहाँ वे अपने वेतन भत्तों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दुश्मन से हाथ मिला सकते हैं। इसी देश के नेता ऐसे भी हैं, जो खुले आम सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हैं। शरद पवार का आज का बयान यही सिद्ध करता है कि वे सुप्रीमकोर्ट के आदेश को भी नहीं मानते। ऐसे लोगों से भला क्या अपेक्षा की जा सकती है। हमें ऑस्ट्रेलिया से कुछ सीखना ही होगा। सोच की यह बुनियाद देश के नागरिकों में है, पर इसका पता हमें ही नहीं है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

भारत के लिए चीन पाकिस्तान से अधिक खतरनाक



डॉ. महेश परिमल

चीन भारत के लिए पाकिस्तान से भी अधिक खतरनाक है। यह बात शायद हमें देर से समझ में आ रही है। चीन ने जिस तेजी से अपना वर्चस्व कायम किया है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वह भारत के लिए और भी अधिक अवरोध खड़े करेगा। जिस तरह से उसने अपने उत्पाद हमारे देश में निर्यात किए हैं, उससे ही स्पष्ट होता है कि उसकी तैयारी कैसी है। नकली दूध और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खिलौने से हम सब वाकिफ हैं। अब वह अपनी फौजी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है।
दक्षिण एशिया में व्यूहात्मक डेटरंस के लिए चीन ने भारतीय सीमा पर मिसाइल तैनात की है। सीएसएस फाइव उर्फ दोंग फेंग 21-ए नामक इस मिसाइल से देश के मुम्बई जैसे शहरों पर खतरा बढ़ गया है। चीन अपनी आर्थिक ताकत ही नहीं बढ़ा रहा है, वह तो अपने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत भी बढ़ा रहा है। भारत से लगी 4057 किलोमीटर सीमा पर चीन अरुणाचल प्रदेश और अक्सई चीन कश्मीर के पूर्व में आने वाले क्षेत्र हैं। जिस तरह से पक्के रास्तों को चीन ले लांघा है, उससे उसकी नीयत साफ पता चलती है। उसके लिए अब दिल्ली दूर नहीं है। भारत की सीमा पर उसकी बार-बार की जाने वाली घुसपैठ यह बताती है कि उसके इरादे नेक नहीं हैं। अब तक उसने 250 बार सीमा का उल्लंघन किया है।
भारत-चीन संबंधों को सुधारने की बात बार-बार की जाती है। इसके जवाब में चीन सदैव ही सीमा पर अपनी सेनाएँ भेजता है। भारत के पास चीन के महानगर बीजिग तक प्रहार करने वाली मिसाइलें हैं, साथ ही अणुबम भी हैं, इसके बाद भी हमारा देश चीन की किसी भी क्षेत्र में बराबरी नहीं कर सकता। इसके बाद भी चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। चीन की सैन्य ताकत और उसकी दगाखोरी नीति के आगे भारत कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। 1961 के युद्ध में भारत ने चीन से हार मान ली थी। इसकी वजह भले ही स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ही क्यों न रहें हों। कहा जाता है कि उनकी संकीर्ण दृष्टि ही इसका मुख्य कारण रही। नेहरु ने बीजिंग की यात्रा कर चीनी-हिंदी भाई-भाई का नारा लगा रहे थे, उधर चीन भारतीय सीमा पर घुस आया था। भारत आकर नेहरु ने बिना किसी तैयारी के सेनाओं को चीनी सैनिको से मुकाबला करने के लिए हिमालय बर्फीली चोटियों पर भेज दिया था।
वर्तमान में वैश्विक स्थिति को देखते हुए चीन-भारत में युद्ध हो, इसकी संभावना काफी कम है। फिर भी भारत को चीन से सचेत रहना ही होगा। वह कभी भी कुछ भी कर सकता है। भारत उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए चीन ने क्या-क्या नहीं किया। अपने यहाँ नकली दवाएँ बनाकर उसने भारत की सील लगाकर विश्व बाजार में बेचा, ताकि भारत की साख गिर जाए। अपने उत्पादों से उसने भारतीय बाजार पर कब्जा कर रखा है। हमारी कमजोर नीतियाँ उसे इस तरह के काम करने के लिए उकसाती हैं। हमने कभी भी चीन उत्पादों का खुलकर विरोध नहीं किया। चीनी उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता, तो शायद इस दिशा में यह एक ठोस कदम होता। पर हम ऐसा नहीं कर पाए। चीन ने अपनी पूरी तैयारी के साथ भारत पर आíथक रूप से प्रहार किया है। जिसका जवाब हमें देना ही होगा। कैसे देना है यह हमारे नेता और मंत्री बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं।
उधर चीन की सैन्य तैयारियों के बारे में अमेरिकी प्रतिरक्षा-मुख्यालय पेंटागन की ताजा रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि चीन की ताकत को देखते हुए अमेरिका सचमुच चिंतित है। चीन ने भारत से जुड़ी सीमाओं पर तैनात पुरानी मिसाइलों को ज्यादा उन्नत मिसाइलों से बदल दिया है। उसने भारतीय सीमाओं पर सैनिकों को जमा करने की आकस्मिक योजना तैयार की हो। अब उसके निशाने की जद में सिर्फ अपना पास पड़ोस ही नहीं, पूरी दुनिया है। वह अपनी सैन्य तैयारियों को-लेकर भारी गोपनीयता बरत रहा है। सवाल यह है कि आखिर कौन-सा देश है जो यही सब नहीं करेगा या करना चाहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चीन दुनिया भर में अपने पैर पसारने में जुटा है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपनी सैन्य क्षमता के जो आंकड़े दिये हैं, उनमें पारदर्शिता नहीं है। रिपोर्ट अमेरिका के निचले सदन कांग्रेस में पेश की गयी है।
रिपोर्ट में कहा गया है भारत और चीन के बीच राजनैतिक और ओर्थक संबंधों में सुधार के बाद भी दोनों देशों की सीमा पर तनाव बरकरार है। चीन की सेना अक्सर सीमा का उल्लंघन और आRामक बॉर्डर पेट्रोलिंग करती है। इससे तनाव और बढ़ जाता है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर सबसे अधिक तनाव है। चीन इसे तिब्बत का हिस्सा मानता है। इसके अलावा तिब्बत के पठार के पश्चिमी छोर पर मौजूद अक्साई चिन पर भी चीन दावा करता है। भारत के लोन रुकवाने की कोशिश की रिपोर्ट में कहा गया है अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन ने अपने-अपने दावों को मजबूती देने के लिए कई कदम उठाये थे।
रिपोर्ट के अनुसार 2009 में ऐशयन डेवलपमेंट बैंक से भारत को करीब 13 हजार अरब रुपये के लोन को रुकवाने की पूरी कोशिश की। चीन का तर्क था कि इस लोन का एक हिस्सा अरुणाचल प्रदेश में पानी की योजना में लगाया जाएगा। भारत में हमें यह रिपोर्ट पढ़ते हुए भूलना नहीं चाहिए कि यह अमेरिकी रिपोर्ट है। चीन के बढ़ते प्रतिरक्षा खर्च के बारे में-हमें वह देश आगाह कर रहा है, जिसका अपना प्रतिरक्षा बजट-चीन से काफी अधिक और दुनिया में सबसे ज्यादा है। फिर-स्थापित महाशक्ति अमेरिका और उभरती महाशक्ति चीन के बीच कटुता जानी-पहचानी है। इस किस्म की रिपोर्ट से एशिया में चीन की बढ़ती ताकत के प्रति चिंता पैदा करके हथियारों की होड़ को बढ़ावा देना उसका मकसद हो सकता है। इसमें उसका-दोहरा फायदा है। वह चीन के खिलाफ उसके ही पड़ोस में चुनौती खड़ी करेगा और हथियार बेचकर मुनाफा भी कमाएगा। पहला सबक तो यह है कि किसी अमेरिकी रिपोर्ट के आधार-पर दहशतजदा होने या अपनी रणनीति बनाने के बजाय हम खुद अपनी रिपोर्ट तैयार करें।


क्या है रिपोर्ट में ..
- चीन ने भारत से सटी सीमा पर आधुनिक मिसाइल सीएसएस 5 को तैनात किया है
- सीमा पर बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती पर भी विचार कर रहा है
- कम समय में वायुसेना को सीमा के पास पहुंचाने की योजना बनाई
- 2009 में 150 अरब डॉलर सेना पर खर्च किए
- चीन द्वारा बॉर्डर पर रोड और रेल इंफा्रस्ट्रक्चर के विकास पर जोर दे रहा
- सीमा पर रोड और रेल इंफा्रस्ट्रक्चर के विकास पर जोर दे रहा है।
-भारत-चीन की 4057 किलोमीटर लंबी सीमा पर हालात सामान्य नहीं
- अरुणाचल प्रदेश को लेकर सबसे अधिक तनाव
- अक्सई चिन पर भी करता है दावा
-चीन की बढ़ती ताकत- चीन का पहला मानवरहित अंतरिक्ष यान तियानगोंग-1 तैयार
-8.5 टन वजन वाले इस यान को 2011 में कक्षा में छोड़ा जाएगा
-चीन इस समय दो महिलाओं समेत चीनी अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का प्रशिक्षण दे रहा है।
- 2003 में शेनझाव में पहली बार अंतरिक्ष में मानव भेजा था।

डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

देश के दुश्मन : मौत के सौदागर

स्वराज्य करुण
कहते हैं कि शिक्षा मानव को मानवता सिखाती है , वह मनुष्य को सत्य, अहिंसा, सदाचार और शांति से जीवन जीने और प्रत्येक मानव के जीवन को अपने जीवन की तरह अनमोल समझने की सीख देती है. हमारे इस महान देश में भगवान गौतम बुद्ध ,महावीर ,गुरु नानक ,कबीर और महात्मा गांधी सहित अनेक महान विभूतियों ने अपने सदविचारों से पूरी दुनिया को जियो और जीने दो का प्रेरणादायक सन्देश दिया है. लेकिन आज की दुनिया में हो क्या रहा है ? दुनिया को रहने दें और यह देखें कि अपने ही देश में क्या हो रहा है ? कहीं नक़ली दवाईयों के काले कारोबार के जरिये मरीजों के जीवन से खुले आम खिलवाड़ चल रहा है ,तो कहीं मिलावटी दूध ,मिलावटी खोवा , मिलावटी तेल के घिनौने व्यापार से पूरे मानव समाज को बीमार बनाया जा रहा है .जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों ने अब तो सब्जियों को घातक रासायनिक रंगों से रंग कर बेचना शुरू कर दिया है . छतीसगढ़ के पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय की रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में बाज़ार से खरीदी गयी परवल और खेक्सी को जब पानी में डाल कर जाँच की गयी तो विशेषज्ञ यह देख कर चौंक गए कि पानी का रंग हरा हो गया कारण यह था कि स्वाद और विटामिनों का भण्डार समझी जाने वाली इन हरी सब्जियों को मेल्काईट ग्रीन नामक जहरीले रसायन से रंगा गया था . प्रायोगिक जाँच में यह भी पाया गया कि बाज़ारों में बिक रही इस प्रकार की सब्जियों में कापर सल्फेट ,ब्रिलियंट ग्रीन और आक्सीटोसिन नामक इजेक्शन से भी ऐसे जहरीले रसायन डाल कर उन्हें ग्राहकों को थमाया जा रहा है,कच्चे टमाटर को पकाने के लिए एथेफोन और एक अन्य रसायन का इस्तेमाल हो रहा है. केले और आम के कच्चे फलों को जल्दी पकाने के लिए मौत के सौदागरों ने कार्बाइड नामक जानलेवा रसायन का उपयोग शुरू कर दिया है . यह किसी एक शहर की बात नहीं है. देश के अनेक शहरों की सब्जी मंडियों से ऐसी ख़बरें लगभग हर हफ्ते -दस दिन में अखबारों और छोटे परदे के समाचारों में पढ़ते -पढ़ते और देखते -देखते हम थक गए हैं .डॉक्टर सचेत करते हैं कि ऐसी जहर बुझी सब्जियों के जरिये शरीर में घातक रसायनों के पहुँचने पर किडनी ,दिल और लीवर की प्राण घातक बीमारियाँ हो सकती हैं ,लेकिन ग्राहक बेचारा करे भी तो क्या ? रोजी -रोटी के लिए शहरी जीवन में रहने की मजबूरी ,छोटे -छोटे घरों में रहने की मजबूरी भाग -दौड़ से भरी ज़िंदगी में असली सब्जियों के धोखे में लोग इन मिलावटी,नकली और जहरीली सब्जियों को खरीद कर और खाकर खुद बीमार हो रहें है और अनजाने में उनके परिवारों के सदस्य और घर आने वाले मेहमान भी अनजाने में ऐसी बीमारियों को शरीर में डाल रहें है , जिनका नतीज़ा उन्हें निर्दोष होने के बावजूद आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा. भोले -भाले इंसानों को नकली दवा,मिलावटी दूध ,मिलावटी घी , नकली खोवा और जहरीली सब्जियां बेच कर उनकी जेबों से लाखो -करोड़ों रुपयों की लूट-पाट करने और उन्हें मौत के मुंह में धकेलने वाले लोग मानव के वेश में दानव नहीं तो और क्या हैं ? ऐसे लोग मानवता के शत्रु और देश और दुनिया के दुश्मन नहीं तो और क्या हैं ? इनके साथ वही सलूक होना चाहिए जो हत्या के अपराधियों के साथ होता है. लेकिन सवाल यह है कि मौत के सौदागर , हमारे ये दुश्मन क्या ब्रम्हांड के किसी दूसरे ग्रह से आये हैं ,जिन्हें हम पृथ्वी ग्रह के निवासी अपनी खुली आँखों से नहीं देख पा रहे हैं और जो मौत का ऐसा घिनौना खेल हमारे बीच छुप कर खेल रहें हैं ? सब कुछ हमारे आस- पास, हमारे ही खिलाफ खुलकर हो रहा है , फिर भी हम अगर अपने इन दुश्मनों को नहीं पहचान पा रहे हैं, तो इसमें गलती आखिर किसकी है ?
स्वराज्य करुण

शनिवार, 14 अगस्त 2010

क्‍या हम सचमुच आजाद हो गए हैं



डॉ. महेश परिमल

आंजादी.... आंजादी.... और आंजादी, पिछले 64 वर्षों से यह सुनते आ रहे हैं, पर आज भी हम यदि इस आंजादी को ढूँढ़ने निकल जाएँ, तो वह कुछ हाथों में छटपटाती नजर आएगी। आंजादी कैद हो गई है, कुछ मजबूत हाथों में, वे हाथ जो खून से रँगे हैं, वे हाथ जो कानून को अपने हाथ में लेते हैं, वे हाथ जो पाँच वर्ष में आम लोगों के सामने एक बार जुड़ते हैं,। इन हाथों में छटपटाती आंजादी की सिसकियाँ किसने सुनी?सन् 1857 के पहले भी आंजादी का शंखनाद हुआ था। उसमें था आंजादी पाने का जोश, भारत माँ को जंजीरों की जकड़न से दूर करने का उत्साह। बच्चा-बच्चा एक ंजुनून की गिरफ्त में था। सभी चाहते थे – आंजादी। वह आंजादी केवल विचारों की नहीं, बल्कि इंसान को इंसान से जोड़ने वाली आंजादी की कल्पना थी, जिसमें बिना भेदभाव, वैमनस्यता के एक-दूसरे के दिलों में बेखौफ रहने की कल्पना थी।अनवरत् संघर्षो, लाखों कुर्बानियों एवं असंख्य अनाम लोगों के सहयोग से हमें रक्तरंजित आंजादी मिली, भीतर कहीं फाँस अटक गई, विभाजन की। एक सपना टूट गया- साथ रहने का। वह सपना कालांतर में एक ऐसा नासूर बन गया, जो रिस रहा है। असह्य वेदना को साकार करता शरीर का वही भाग आज आक्रामक हो चला है।हमें आंजादी मिली तो सही, पर हम उसे संभाल नहीं पाए, आंजादी मिलने की खुशी में हम भूल गए कि यह धरोहर है, हमारे पूर्वजों के पराक्रम की, इसे संभालकर रखना हमारा कर्त्तव्य है। इसे सहेज कर रखने से ही प्रजातंत्र जिंदा रह पाएगा। आज प्रजातंत्र जिंदा तो है, पर उसकी हालत मरे से भी गई बीती है। हमें चाहिए था, एक ऐसा प्रजातंत्र जो साँस लेता हुआ हो, जिसकी धमनियों में शहीदों का खून दौड़ता हो, पर हमने अपने हाथों से अपनी आंजादी खो दी। वह भी आंजादी मिलने के तुरंत बाद ही।इस आंजादी को पाने के लिए कई अनाम शहीदों ने भगीरथ प्रयास किए। आज बदलते जीवन मूल्यों के साथ वही आंजादी की गंगा कुछ लोगों की सात पीढ़ियों को तारने का काम कर रही है। पीढ़ियों को उपकृत करने वाली आंजादी की कल्पना तो हमने नहीं की थी। पूरे 60 बरसों से आंजादी का भोंपू हम सुन रहे हैं, पर इन वर्षो में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर और अमीर । हाँ विकास के नाम पर देश इतना आगे बढ़ गया है कि हर हाथ को काम मिलने लगा है। हर गाँव रोशनी से जगमगा रहा है, प्रत्येक गाँव में सड़कें हैं, कोई भी बेरोजगार नहीं है, एक-एक बच्चा शिक्षित हो रहा है, यह सब हो रहा है, सिर्फ ऑंकडाें के रूप में, मोटी-मोटी फाइलों में।सच्चाई के धरातल पर देखें तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे उपलव्धि कहा जाए। रिक्शा चालक सुखरू या समारू के बेटे भी या तो रिक्शा चला रहे हैं या मंजदूरी कर रहे हैं। अलबत्ता उस वक्त एक ट्रक का मालिक आज कई ट्रकों के मालिक बनकर करोड़ों से खेल रहा है। महज एक रोटी का जीवंत प्रश्न सुलझाया नहीं जा सका है, पिछले 62 वर्षों में। रोटी की बात छोड़ भी दें, तो आज हम साफ पानी के भी मोहताज हैं।सामाजिक परिवेश में जीवनमूल्य बदल रहे हैं। भ्रष्टाचार शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। बलात्कारी सम्मानित हो रहे हैं। घूसखोरों की हवेलियाँ बन रही है। बहुओं को जला कर वर्ष भर होली मनाने वाले नारी उत्पीड़न विरोधी समिति या नारी उत्थान संघ के संचालक बने बैठे हैं। कानून को हाथ में लेने वाले अपराधी सफेदपोशों के अनुचर हैं। इन सबके अलावा कलमकार के हाथों को खरीदने की भी प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए सच हमेशा झूठ का नकाब लगाकर सामने आ रहा है।आंजादी अब खेतों-खलिहानों में नहीं बल्कि कांक्रीट के जंगलों में सफेदपोशों के हाथों में या फिर ए। के। 56 या ए. के. 47 वाले हाथों में पहुँच गई है। आंजादी को इस कैद से हमें ही छुड़ाना है। इसके लिए हमेें आंजादी की सही पीड़ा को समझना पड़ेगा। त्रासदी भोगती इस आंजादी को खेतों, खलिहानों, खेल के मैदानों, शालाओं, महाविद्यालयों में पहुँचाने का संकल्प लेना होगा, ताकि सही हाथों में पहँचकर आंजादी ‘हाथों के दिन’ की उक्ति को चरितार्थ कर सके। ताकि हम सगर्व कह सकें, आ गए हाथों के दिन.... .... ।
डॉ. महेश परिमल

जुलिया का हिंदू प्रेम कहीं सतही तो नहीं..



डॉ. महेश परिमल

लोगों को यह जानकर बहुत ही खुशी हुई कि हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री जुलिया राबर्ट्स ने हिंदू धर्म अंगीकार कर लिया। जुलिया के बयान पर नजर डालें, तो जब उसने नीम करोल बाबा की तस्वीर देखी, तो उसके मन में हिंदू धर्म के प्रति आस्था बढ़ गई। किसी बाबा की तस्वीर देखकर जब इतने प्रभावित हुई, तो फिर धर्म अंगीकार करके उसकी क्या हालत होगी? वास्तव में यह एक स्टंट है। बहुत ही जल्द भारत में भी जुलिया राबर्ट्स की फिल्म ‘इट, प्रे, लव’ रिलीज होने वाली है। उसी फिल्म को हिट करने के लिए यह चोंचला किया गया है।
आखिर कौन है ये जुलिया राबर्ट्स, पहले इसके बारे में जान लें। हॉलीवुड की नम्बर वन 42 वर्षीय हीरोइन जुलिया राबर्ट्स ने हाल ही में प्रेटी वुमन नामक फिल्म में अभिनय के लिए ऑस्कर पुस्स्कार प्राप्त किया है। इसका जन्म जार्जिया प्रांत में हुआ था। उसके माता-पिता बाप्टीस्ट और केथोलिक हैं। एल्ले नामक मैगजीन को दिए गए एक साक्षात्कार में वह कहती हैं कि केवल वे ही नहीं, बल्कि उनका पूरा परिवार ही हिंदू बन गया है। हम सब साथ-साथ मंदिरों में जाते हैं, वहाँ भजन-कीर्तन करते हैं। वह बताती हैं कि उसके पति ने भी हिंदू घर्म स्वीकार कर लिया है।
अब आते हैं इस करोल बाबा पर। इस बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गाँव में हुआ था। ये बाबा महाराज के रूप में जाने जाते थे। भारत एवं विदेशों में उनके लाखों शिष्य हैं। आध्यात्मिक शिक्षक बाबा रामदास और योगी भगवान दास भी इनके शिष्य थे। जय उत्तल और कृष्णादास जैसे संगीतकार भी नीम करोल बाबा को अपना गुरु मानते हैं। एपल कंपनी के सीईओ स्टीव जोब्स इसी बाबा से मिलने 1973 में भारत आए। पर वे बाबा से मिल पाते, उसके पहले ही बाबा का स्वर्गवास हो गया। अमेरिका और जर्मनी में बाबा के आश्रम भी हैं। वे कई प्रकार के चमत्कार करते थे। इसलिए इनके भक्तों की संख्या लाखों में है।
भारत में इसके पहले भी कई विदेशी हस्तियाँ आईं और हिंदू धर्म अपनाया। 1960 के दशक में विख्यात बीटल्स स्टार जार्ज हेरिसन ने वैदिक धर्म अंगीकार किया था। वे इस्कॉन के अभियान से जुड़े थे। इसके पीछे वास्तविकता यह है कि अमेरिका में इस्कॉन के अभियान को बल देने के लिए यह चोंचलेबाजी की गई थी। बीटल्स का अनुसरण करते हुए लाखों अमेरिकियों ने हिंदू धर्म अंगीकार कर इस्कॉन से जुड़ गए। इससे हिंदू धर्म को किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। इसका दूसरा पहलू यह है कि अमेरिका में इस्कॉन के अभियान को हत्या, ड्रग्स और अनेक मामलों के कारण काफी बदनामी हुई। इससे हिंदू संस्कृति पर भी छींटे पड़े। विख्यात पॉप गायिका मेडोना ने भी हिंदू धर्म अपनाने का नाटक किया था। क्रोजन नामक एलबम में मेडोना हाथ में मेंहदी देखने को मिलती है। लोगों ने जब हाथ को ध्यान से देखा, तो आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि उसके हाथ में ओम लिखा था। बाद में पता चला कि यह तो उसने अपने एलबम के प्रचार के लिए किया था।
जब भी विदेशी अभिनेत्री भारतभूमि पर अपने पाँव रखती हैं, तब वह यहाँ की संस्कृति से काफी प्रभावित होती हैं। लिज हर्ली को तो भारत इतना भाया कि उसने अपनी शादी पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों से करना तय किया। इसके लिए उसने जोधपुर का राजमहल ही किराए पर ले लिया। इस दौरान भजन संध्या जैसे धार्मिक कार्यक्रम भी हुए। कुछ समय पहले ही डेमी मूर को मेंहदी लगाकर घूमते लोगों ने देखा। रिचर्ड गेरे जैसी बड़ी हस्ती ने कुछ समय पहले बौद्ध धर्म स्वीकार किया। वे कई बार धर्मशाला आते हैं, वहाँ रहते हैं। वे दलाई लामा से भी कई बार मिल चुके हैं। तिब्बत की मुक्ति के लिए चलाए जा रहे दलाई लामा के अभियान से भी वे जुड़े हैं। इस अभियान में उनके जुड़ जाने से थोड़ा बल मिला है। पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि गेरे ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर इस धर्म को बहुत बड़ा सहारा दिया है।
बात फिर जुलिया की। अपनी फिल्म ‘इट, प्रे, लव’ की शूटिंग के लिए पिछले साल जुलिया भारत आई थी। तब वह हरियाणा के एक आश्रम में भी काफी समय तक रुकी थी। इस वर्ष जनवरी में वह अपने पति के साथ भारत आई थीं। जब वह ताजमहल देखने गई, तब उसके माथे पर ¨बदी देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ था। इसके बाद भी उसने कहीं भी यह नहीं कहा कि वह हिंदू धर्म को स्वीकार कर रहीं हैं। अभी अमेरिका में जब उसकी फिल्म रिलीज होने वाली थी, उसकी पूर्व संध्या ही उसने यह घोषणा की कि वह ¨हदू धर्म स्वीकार कर रहीं हैं। आखिर घोषणा करने के लिए उसे फिल्म रिलीज होने के एक दिन पहले ही मिला। वैसे देखा जाए, तो इस फिल्म की स्टोरी भी जुलिया से मिलती-जुलती है। फिल्म की नायिका एलिजाबेथ गिल्बर्ट एक लेखिका है। जो अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं है। इससे दु:खी होकर कई बार वह रात में बाथरुम के फ्लोर पर खूब रोती है। इन हालात में वह एक व्यक्ति के प्रेम में पड़ जाती है। इधर वह अपने पति से तलाक के लिए कोशिश करती है। उसका पति तलाक के लिए तैयार नहीं होता। इस बीच जिससे वह प्रेम करने लगी थी, वह व्यक्ति उसे धोखा दे देता है। इससे वह बुरी तरह से टूट जाती है। एक बार वह योग पर कुछ काम करती रहती है, उसी दौरान उसकी भेंट एक आध्यात्मिक व्यक्ति से होती है। वह उससे काफी प्रभावित होती है। तब गिल्बर्ट उस आध्यात्मिक व्यक्ति से कहती है कि एक दिन मैं आपके पास आकर रहूँगी। कुछ दिनों बाद ही उसे तलाक मिल जाता है। अब उसके पास काफी वक्त था, तो उसने एक वर्ष भ्रमण में बिताने का संकल्प लिया। इस विषय पर पुस्तक लिखने के लिए उसे एडवांस में धन मिला। इस धन से वह चार महीने तक इटली में रही। वहाँ खूब मौज-मस्ती की। यानी खाया-पीया। मतलब (इट), उसके बाद वह भार आ गई, जहाँ एक आश्रम में रही। यहाँ योग-साधना का अध्ययन किया। यानी (प्रे), इसके बाद के अंतिम चार महीने उसने इंडोनेशिया के एक टापू पर बिताए। यहाँ उसका प्यार ब्राजील के एक फैक्टरी मालिक से हो जाता है। फिर तो वह तय करती है कि अब वह अपना बाकी जीवन इसी टापू पर अपने प्रेमी के साथ बिताएगी। इस तरह से उसकी जिंदगी का तीसरा पड़ाव लव पर आकर समाप्त होता है।
पश्चिम के लोग जब भी भारत आते हैं और यहाँ की प्राचीन संस्कृति के दर्शन करते हैं, तो पहली नजर में वह उस संस्कृति से प्यार करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वे वैदिक धर्म अपना सकते हैं। दूसरी ओर उनका लालन-पालन कुछ दूसरे ही तरीके से हुआ होता है, इसलिए वे इससे तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते। भारत की संस्कृति में तप, त्याग, संयम और सहिष्णुता रग-रग में बसी है, इन विदेशियों के खून में यह सब नहीं होता। उनपका जीवन तो भोग प्रधान होता है। इसी भोग प्रधान जीवन से जब वे बोर हो जाते हैं, तब वे योग और त्याग की बातें करते हैं। इस जीवन में आकर कुछ समय बाद वे इससे भी बोर होने लगते हैं, तब वे फिर भोग की दुनिया में चले जाते हैं। जुलिया राबर्ट्स के लिए संभव है कि वह हिंदू धर्म को हृदय से स्वीकार न कर पाए और फिर उसी दुनिया में चली जाए, जहाँ से वह आई हैं। हिंदू धर्म के प्रति उनका प्रेम कुछ समय बाद पिघल जाए, तो इससे हमको आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 4 अगस्त 2010

स्वागत कीजिए और सब भूल जाइए


ओबामा भी भारत यात्रा
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नीरज नैयर
इस्लामाबाद में हुई किरकिरी पर गौर फरमाने के बजाए भारतीय खेमा किसी दूसरे अभियान में व्यस्त है, ये अभियान है ओबामा की खुशामदगी का। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा नवंबर में भारत आएंगे, उनके दौरे से पहले अमेरिकी प्रशासन के नुमांइदे नई दिल्ली के चक्कर लगा चुके हैं। काबुल में विदेशमंत्री एसएम कृष्णा और उनकी अमेरिकी समकक्ष हिलेरी क्लिंटन ने भी ओबामा की यात्रा को लेकर करीब 30 मिनट गुफ्तगू की। भारत अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को काफी अहम मानकर चल रहा है, वैसे भारत के लिए वाशिंगटन से आने वाला हर शख्स कुछ ज्यादा ही अहमियत रखता है। फिर ओबामा से तो भारतीयों के दिल के तार पहले से ही जुड़े हुए हैं। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त वाशिंगटन से ज्यादा सरगर्मियां और उत्साह दिल्ली में नजर आ रहा था। कहीं से ओबामा के लिए हनुमानजी की मूर्ति भेजी थी तो कहीं उनकी जीत के लिए दुआएं की जा रही थीं। जिस दिन ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को पछाड़कर व्हाइट हाउस की दौड़ में फतह हासिल की, उस दिन देशभर का मीडिया ओबामामय हो गया था। जिस चैनल को देखो इस अश्वेत राष्ट्रपति और भारत के बीच के रिश्तों को रेखांकित करने में लगा था। ओबामा की पूरी बायोग्राफी पेश की जा रही थी। चैनलों के भरपूर डोस के दूसरे दिन अखबारात भी बराक हुसैन ओबामा की खबरों से सजे पड़े थे। एक बारगी तो ऐसा लग रहा था, जैसे या तो ओबामा भारत के राष्ट्रपति बने हैं या हिंदुस्तान अमेरिका का हिस्सा है। हालांकि ये बात अलग है कि जल्द ही ये खुशियां काफुर हो गईं। गद्दी संभालने के बाद ओबामा तेवर भी वैसे ही बदल गए, जैसे भारत के नेताओं के चुनाव जीतने के बाद बदल जाते हैं। चुनाव से पहले हाथ जोड़कर सुनहरे सपने दिखाने वाले नेता, जीत का स्वाद चखने के बाद सपनों को सपना ही बना छोड़ जाते हैं। ओबामा में भारतीयों को भारत की छाप दिखती है, शायद ऐसा उनके काले रंग को देखकर लगता होगा। क्योंकि अब तक उन्होंने जो कुछ भी किया है उससे ऐसा अहसास होना भी मुश्किल है। पाकिस्तान को लेकर चुनावी मंच से उनके दो-चार भाषणों का मतलब हमारे देश में ये लगाया गया कि अब वाशिंगटन भारत की पैराकारी पर ध्यान देगा। मगर हुआ इसके एकदम उलट। एक-दो बंदर घुड़की के अलावा ओबामा प्रशासन ने पाकिस्तान के कान एंेठने की कोई जहमत नहीं उठाई। जबकि मुंबई हमले के बाद हमे आश्वस्त किया गया था कि नए राष्ट्रपति को पदभार संभाल लेने दीजिए पाक को मिलकर सबक सिखाएंगे। जब-जब नई दिल्ली ने अमेरिका के आगे आतंकवाद की फैक्ट्री यानी पाकिस्तान का रोना रोया, पाक को फेंकी जाने वाली बोटियों की तादाद दुगनी कर दी गई। पाकिस्तान दौरे पर आईं हिलेरी भी विकास परियोजनाओं के नाम पर 50 करोड़ डॉलर की बोटियां फेंककर चली गईं। जिस देश का जन्म ही हिंसा और अलगाववाद की बुनियाद पर हुआ वहां विकास की गंगा बहाकर भी क्या हासिल होगा। पाकिस्तान को चलाने वाले हुक्मरानों ने अगर भारत को बर्बाद करने के ख्वाब देखने की जगह मुल्क की खुशहाली और तरक्की के बारे में सोचा होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। लेकिन अमेरिका इन बातों को समझना नहीं चाहता। उसे एशिया में पैर जमाए रखने के लिए एक ऐसे साथी की जरूरत है जो उसके कहने पर जमीन पर पड़ा थूक भी चाटने को तैयार हो जाए। और इसके लिए पाकिस्तान से बेहतर भला कौन हो सकता है। मगर इस सबका खामियाजा भारत को उठाना पड़ रहा है, पर खामियाजा उठाने वाला ही अगर ऐतराज न जताए तो फिर अमेरिका पर भी उंगली कैसे उठाई जा सकती है। उसे तो महज अपने सरोकारों से मतलब है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब ओबामा नई दिल्ली से लौटते वक्त हाथ खिलाकर बाय-बाय का इशारा करेंगे, तो भारत की उम्मीदें भी बाय-बाय कह चुकी होंगी। हिलेरी के दौरे वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था, बावजूद इसके भारतीय खेमा अमेरिकी विदेशमंत्री के स्वागत की खुमारियों में ही खोया रहा। हिलेरी ने जाते-जाते पाक की तारीफ करने के साथ परमाण अप्रसार संधि पर भारत को बांधने के शिगूफे छोड़ दिए थे। उस वक्त एंड यूजर समझौते पर नई दिल्ली अमेरिका का रुख परिवर्तित करने में सफल हुआ था, लेकिन वो सफलता भी इसलिए मिली क्योंकि उसके पीछे अमेरिका का बहुत बड़ा आर्थिक फायदा छुपा था। भारत चाहता था कि समझौते के तहत अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी से उसे आजाद रखा जाए, इसके चलते डील अटकी पड़ी थी। डील के सील लगने के बाद अमेरिकी कंपनियों को भारी-भरकम कमाई होनी थी, सो हिलेरी ने झट से हामी भी दी। ओबामा की यात्रा को किस नजरीए से महत्वपूर्ण कहा जा रहा है, ये बात कम से कम मेरी समझ से तो बाहर है। क्या बराक ओबामा पाकिस्तान के हाथ बांधने वाला कोई एग्रीमेंट कर जाएंगे, या कश्मीर पर भारत के रुख की पैरवी करेंगे। या फिर वो अपनी भारत विरोधी को त्यागकर नए संबंधों का सूत्रपात करेंगे? हकीकत की दूरबीन से देखा जाए तो इस बात की रत्ती भर भी संभावना नहीं है। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को कुछ समझाना होता तो हिलेरी ये काम कर गईं होती। क्योंकि इस्लामाबाद में भारत-पाक विदेशमंत्रियों की मुलाकात के बाद कुरैशी के तल्खजुबानी का चैप्टर अभी पुराना नहीं पड़ा था। काबुल में कृष्णा ने उन्हें इससे परिचित भी कराया, इसके बाद भी वो पाक को विकास की खैरात बांट कर चली गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति का ये दौरा महज रस्मअदागी मात्र है, हमारे मनमोहन सिंह उन्हें भारत आने का निमंत्रण दे आए थे। इसलिए ओबामा तफरी करने का प्लान बना ही डाला। कहा तो जा रहा है कि भारतीय खेमा अपना पक्ष रखने के लिए दिन-रात तैयारी करने में लगा है, लेकिन ये सारी तैयारी सिर्फ स्वागत समारोह तक ही सीमित रह जाएगी। ओबामा का स्वागत सत्कार इस अंदाज में किया जाएगा कि उन्हें वाशिंगटन के मखमली गद्दी कठोर लगने लगेंगे। इसके अलावा कुछ और होने वाला नहीं है। जो लोग कुछ अच्छे की आस लगाए बैठे हैं उन्हें मायूसी ही हाथ लगने वाली है। खैर असली तस्वीर तो नवंबर में ही सामने आ पाएगी, तब तक भारत को उसकी तैयारियों में मशगूल रहने देते हैं और हम सोचते हैं कि आखिर पाकिस्तान से दोस्ती की खुजाल क्या किसी बी-टेक्स से मिट सकती है या नहीं।
नीरज नैयर

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