बुधवार, 4 अगस्त 2010

स्वागत कीजिए और सब भूल जाइए


ओबामा भी भारत यात्रा
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नीरज नैयर
इस्लामाबाद में हुई किरकिरी पर गौर फरमाने के बजाए भारतीय खेमा किसी दूसरे अभियान में व्यस्त है, ये अभियान है ओबामा की खुशामदगी का। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा नवंबर में भारत आएंगे, उनके दौरे से पहले अमेरिकी प्रशासन के नुमांइदे नई दिल्ली के चक्कर लगा चुके हैं। काबुल में विदेशमंत्री एसएम कृष्णा और उनकी अमेरिकी समकक्ष हिलेरी क्लिंटन ने भी ओबामा की यात्रा को लेकर करीब 30 मिनट गुफ्तगू की। भारत अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को काफी अहम मानकर चल रहा है, वैसे भारत के लिए वाशिंगटन से आने वाला हर शख्स कुछ ज्यादा ही अहमियत रखता है। फिर ओबामा से तो भारतीयों के दिल के तार पहले से ही जुड़े हुए हैं। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त वाशिंगटन से ज्यादा सरगर्मियां और उत्साह दिल्ली में नजर आ रहा था। कहीं से ओबामा के लिए हनुमानजी की मूर्ति भेजी थी तो कहीं उनकी जीत के लिए दुआएं की जा रही थीं। जिस दिन ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को पछाड़कर व्हाइट हाउस की दौड़ में फतह हासिल की, उस दिन देशभर का मीडिया ओबामामय हो गया था। जिस चैनल को देखो इस अश्वेत राष्ट्रपति और भारत के बीच के रिश्तों को रेखांकित करने में लगा था। ओबामा की पूरी बायोग्राफी पेश की जा रही थी। चैनलों के भरपूर डोस के दूसरे दिन अखबारात भी बराक हुसैन ओबामा की खबरों से सजे पड़े थे। एक बारगी तो ऐसा लग रहा था, जैसे या तो ओबामा भारत के राष्ट्रपति बने हैं या हिंदुस्तान अमेरिका का हिस्सा है। हालांकि ये बात अलग है कि जल्द ही ये खुशियां काफुर हो गईं। गद्दी संभालने के बाद ओबामा तेवर भी वैसे ही बदल गए, जैसे भारत के नेताओं के चुनाव जीतने के बाद बदल जाते हैं। चुनाव से पहले हाथ जोड़कर सुनहरे सपने दिखाने वाले नेता, जीत का स्वाद चखने के बाद सपनों को सपना ही बना छोड़ जाते हैं। ओबामा में भारतीयों को भारत की छाप दिखती है, शायद ऐसा उनके काले रंग को देखकर लगता होगा। क्योंकि अब तक उन्होंने जो कुछ भी किया है उससे ऐसा अहसास होना भी मुश्किल है। पाकिस्तान को लेकर चुनावी मंच से उनके दो-चार भाषणों का मतलब हमारे देश में ये लगाया गया कि अब वाशिंगटन भारत की पैराकारी पर ध्यान देगा। मगर हुआ इसके एकदम उलट। एक-दो बंदर घुड़की के अलावा ओबामा प्रशासन ने पाकिस्तान के कान एंेठने की कोई जहमत नहीं उठाई। जबकि मुंबई हमले के बाद हमे आश्वस्त किया गया था कि नए राष्ट्रपति को पदभार संभाल लेने दीजिए पाक को मिलकर सबक सिखाएंगे। जब-जब नई दिल्ली ने अमेरिका के आगे आतंकवाद की फैक्ट्री यानी पाकिस्तान का रोना रोया, पाक को फेंकी जाने वाली बोटियों की तादाद दुगनी कर दी गई। पाकिस्तान दौरे पर आईं हिलेरी भी विकास परियोजनाओं के नाम पर 50 करोड़ डॉलर की बोटियां फेंककर चली गईं। जिस देश का जन्म ही हिंसा और अलगाववाद की बुनियाद पर हुआ वहां विकास की गंगा बहाकर भी क्या हासिल होगा। पाकिस्तान को चलाने वाले हुक्मरानों ने अगर भारत को बर्बाद करने के ख्वाब देखने की जगह मुल्क की खुशहाली और तरक्की के बारे में सोचा होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। लेकिन अमेरिका इन बातों को समझना नहीं चाहता। उसे एशिया में पैर जमाए रखने के लिए एक ऐसे साथी की जरूरत है जो उसके कहने पर जमीन पर पड़ा थूक भी चाटने को तैयार हो जाए। और इसके लिए पाकिस्तान से बेहतर भला कौन हो सकता है। मगर इस सबका खामियाजा भारत को उठाना पड़ रहा है, पर खामियाजा उठाने वाला ही अगर ऐतराज न जताए तो फिर अमेरिका पर भी उंगली कैसे उठाई जा सकती है। उसे तो महज अपने सरोकारों से मतलब है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब ओबामा नई दिल्ली से लौटते वक्त हाथ खिलाकर बाय-बाय का इशारा करेंगे, तो भारत की उम्मीदें भी बाय-बाय कह चुकी होंगी। हिलेरी के दौरे वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था, बावजूद इसके भारतीय खेमा अमेरिकी विदेशमंत्री के स्वागत की खुमारियों में ही खोया रहा। हिलेरी ने जाते-जाते पाक की तारीफ करने के साथ परमाण अप्रसार संधि पर भारत को बांधने के शिगूफे छोड़ दिए थे। उस वक्त एंड यूजर समझौते पर नई दिल्ली अमेरिका का रुख परिवर्तित करने में सफल हुआ था, लेकिन वो सफलता भी इसलिए मिली क्योंकि उसके पीछे अमेरिका का बहुत बड़ा आर्थिक फायदा छुपा था। भारत चाहता था कि समझौते के तहत अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी से उसे आजाद रखा जाए, इसके चलते डील अटकी पड़ी थी। डील के सील लगने के बाद अमेरिकी कंपनियों को भारी-भरकम कमाई होनी थी, सो हिलेरी ने झट से हामी भी दी। ओबामा की यात्रा को किस नजरीए से महत्वपूर्ण कहा जा रहा है, ये बात कम से कम मेरी समझ से तो बाहर है। क्या बराक ओबामा पाकिस्तान के हाथ बांधने वाला कोई एग्रीमेंट कर जाएंगे, या कश्मीर पर भारत के रुख की पैरवी करेंगे। या फिर वो अपनी भारत विरोधी को त्यागकर नए संबंधों का सूत्रपात करेंगे? हकीकत की दूरबीन से देखा जाए तो इस बात की रत्ती भर भी संभावना नहीं है। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को कुछ समझाना होता तो हिलेरी ये काम कर गईं होती। क्योंकि इस्लामाबाद में भारत-पाक विदेशमंत्रियों की मुलाकात के बाद कुरैशी के तल्खजुबानी का चैप्टर अभी पुराना नहीं पड़ा था। काबुल में कृष्णा ने उन्हें इससे परिचित भी कराया, इसके बाद भी वो पाक को विकास की खैरात बांट कर चली गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति का ये दौरा महज रस्मअदागी मात्र है, हमारे मनमोहन सिंह उन्हें भारत आने का निमंत्रण दे आए थे। इसलिए ओबामा तफरी करने का प्लान बना ही डाला। कहा तो जा रहा है कि भारतीय खेमा अपना पक्ष रखने के लिए दिन-रात तैयारी करने में लगा है, लेकिन ये सारी तैयारी सिर्फ स्वागत समारोह तक ही सीमित रह जाएगी। ओबामा का स्वागत सत्कार इस अंदाज में किया जाएगा कि उन्हें वाशिंगटन के मखमली गद्दी कठोर लगने लगेंगे। इसके अलावा कुछ और होने वाला नहीं है। जो लोग कुछ अच्छे की आस लगाए बैठे हैं उन्हें मायूसी ही हाथ लगने वाली है। खैर असली तस्वीर तो नवंबर में ही सामने आ पाएगी, तब तक भारत को उसकी तैयारियों में मशगूल रहने देते हैं और हम सोचते हैं कि आखिर पाकिस्तान से दोस्ती की खुजाल क्या किसी बी-टेक्स से मिट सकती है या नहीं।
नीरज नैयर

2 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय प्रस्तुती ,सत्ता के दलाल लोग जो ना करे वह कम है !

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  2. गुलामी की मानसिकता से निकलने मे अभी समय लगेगा

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