शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

खत्म हो जाने के बाद अब शुरू हुआ खेल



डॉ. महेश परिमल
कॉमनवेल्थ गेम तो खत्म हो गए। वास्तव में खेल तो अब शुरू हुआ है। इस खेल के लिए किए गए निर्माण कार्यो का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। खेल की रंगारग शुरुआत और अंतिम दिन सुरेश कलमाड़ी भाषण के लिए आए, तो जिस तरह से उनकी हूटिंग हुई, उसी से स्पष्ट है कि हमारा देश भ्रष्टाचारियों को किसी भी रूप में सहन नहीं कर सकता। एक भ्रष्टाचारी की सार्वजनिक हूटिंग इस बात का परिचायक है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा कैंसर है, जो देश की रगों को सड़ा रहा है। अभी तो यह शुरुआत है। भ्रष्टाचार के प्रति लोगों का रवैया बदल रहा है। आज के नेताओं को अब सचेत होने की आवश्यकता है। सुरेश कलमाड़ी के बहाने जनता अब बहुत ही जल्द अपने वोट की ताकत दिखा ही देगी।
सुरेश कलमाड़ी भले ही इसका श्रेय ले लें कि कॉमनवेल्थ गेम बहुत ही शानदार तरीके से निपट गए। लेकिन इस खेल के पूर्व निर्माण कार्यो में हुए भ्रष्टाचार से इंकार नहीं कर सकते। उनका गुनाह माफ करने लायक नहीं है। इस दिशा में प्रधानमंत्री ने उच्चस्तरीय जाँच समिति गठित कर दी है। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने रिकॉर्ड खंगालने शुरू कर दिया है। आखिर क्या हुआ 76 हजार करोड़ रुपए का? तीन माह के भीतर इसकी रिपोर्ट आ जाएगी। फिर देखना कहाँ होते हैं सुरेश कलमाड़ी और उनकी भ्रष्टाचारी टीम। चारों ओर से कलमाड़ी की उपेक्षा शुरू हो गई है। खिलाड़ी जब प्रधानमंत्री से भेंट करने गए, तब उनके साथ सुरेश कलमाड़ी की टीम नहीं थी। पीएम कार्यालय ने इसकी पुष्टि भी की कि कलमाड़ी को खिलाड़ियों के साथ नहीं बुलाया गया था। अभी कलमाड़ी को कई ऐसे संकेते मिलेंगे, जिससे उन्हें लगेगा कि उनकी लगातार उपेक्षा की जा रही है। वे भले ही यह कहते रहें कि मैं बलि का बकरा नहीं बनूँगा, पर सच यही है कि वे सबकी निगाह में हैं। इसके अलावा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी निशाने पर हैं। यदि उनका नाम भी कलमाड़ी के साथ शामिल हो जाता है, तो फिर कई और चेहरे बेनकाब होंगे, यह तय है।
वास्तव में हम भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी तक पूरी तरह से सचेत नहीं हुए हैं। भ्रष्टाचार को अब हमने रोजमर्रा के खेल में शामिल कर लिया है। वैसे भी आज तक किसी भी भ्रष्टाचारी को सख्त सजा मिली हो, ऐसे उदाहरण बहुत ही कम देखने में आए हैं। जब देश के गद्दारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही हो, तब भ्रष्टाचारियों को कौन पूछे? सबसे पहले तो यह जानने की कोशिश होगी कि जब यह तय हो गया था कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेल भारत की राजधानी दिल्ली में होने हैं, तो फिर तीन वर्ष तक उस दिशा में एक भी काम आखिर क्यों नहीं हुआ? पूरे काम 2009 तक हो जाने थे, जो खेल शुरू होने के दिन तक चलते रहे। आखिर ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से इतना विलंब हुआ। उसके बाद अधिकांश ठेके अपने ही संबंधियों एव ब्लेक लिस्टेड कंपनियों को दिए गए, इससे ही अंजादा लग जाता है कि भ्रष्टाचार कहाँ से शुरू हुआ?
वास्तव में देखा जाए, तो भ्रष्टाचार ने हमारे देश की जड़ों को खोखला कर दिया है। देश में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को भी कहना पड़ा कि क्यों न इसे अनिवार्य कर दिया जाए। हम देख रहे हैं कि कोई भी सरकारी काम बिना लेन-देन के समय पर होता ही नहीं। आम आदमी सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा-लगाकर त्रस्त हो जाता है। उसके बाद भी उसका काम नहीं हो पाता। वहीं जिसने रिश्वत दी, उसका काम बिना किसी व्यवधान के तुरंत हो जाता है। भ्रष्टाचार अब व्यवस्था में शामिल हो गया है। सरकार खजाने से गरीबों के लिए निकला धन उन तक पहुँच ही नहीं पाता। बिचौलिये पूरी तरह से रकम को डकार जाते हैं। इसे समझने की कोशिश की, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने। वे अच्छी तरह से जानते थे कि सरकार खजाने से निकला एक रुपए जरुरतमंद तक पहुँचते-पहुँचते 15 पैसे बन जाता है। उन्होंने इस अव्यवस्था को रोकने की काफी कोशिशें की, पर कामयाब नहीं हो पाए। तब तक यह भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका था। आज तो हालत यह है कि यह घर के मुहाने तक आ पहुँचा है। चाहकर भी हम इसे अपने से दूर नहीं कर सकते।
सुरेश कलमाड़ी के बहाने अब भ्रष्टाचार के कई चेहरे हमारे सामने आने वाले हैं। इस बार चुनाव आयोग भी इस दिशा में सख्त हुआ है। आयोग की सक्रियता से भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है, पर अपराधी प्रवृत्तियों वाले प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोकने पर कुछ कर पाना संभव नहीं दिखता। अपराधी राजनीति में आकर इसे और भी अधिक प्रदूषित कर रहे हैं। आम आदमी तो आज चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता। देश के ये हालात कहाँ ले जाएँगे, यह एक शोध का विषय हो सकता है। कलमाड़ी ही इस देश के अकेले भ्रष्टाचारी नहीं है, जिसने देश को करोड़ों का चूना लगाया है। बहुत से अधिकारी, कर्मचारी और नेता भी इस भीड़ में शमिल हैं। पहले भी कई भ्रष्टाचारी हुए हैं, पर उन्हें ऐसी सख्त सजा मिली ही नहीं, जिससे दूसरे भ्रष्टाचारी सबक ले सकें। सख्त कानून ही भ्रष्टाचारियों में भय जगा सकता है।
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारत में कहां पर नहीं चल रहा है ऐसा खेल, जो सामने आ गया ठीक वरना पूरी जिदगी आराम से ऐश करने वालों की कोई गिनती ही नहीं है.

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