फ़ेसबुक

Saturday, May 29, 2010

तस्‍वीरें बोलती हैं......















कुछ सोचा आपने, नहीं सोचा,तो हो जाए, एक लम्‍बा कश जिंदगी का .........

Friday, May 28, 2010

तांगे-रिक्शे पर बैन लगाकर क्या होगा



नीरज नैयर
आर्थिक प्रगति की दौड़ में भागे जा रही दिल्ली में अब तांगे दिखाई नहीं देंगे। नई दिल्ली के बाद पुरानी दिल्ली में भी घोड़ा गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वैसे तांगे वालों के पुर्नवास के लिए कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं लेकिन वो कितने कारगर साबित होंगे इसका इल्म सरकार को भी बखूबी होगा। तांगे शायद सरकार को संपन्नता की चादर में पैबंद की माफिक लग रहे होंगे, घोड़े के टापों की अवाज उसके लिए सिरदर्द बन रही होगी, इसलिए शीला सरकार को प्रतिबंध के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा। घोड़ा गाड़ी पर बैन लगाने से महज तांगा चलाने वाले ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि घोड़े के पैरों में नाल लगाने वाले, चाबुक बनाने वाले, गाड़ी बनाने वाले जैसे लोगों को भी रोजगार के दूसरे विकल्प तलाशने होंगे। इसका सीधा सा मतलब है कि बेराजगारों की फेहरिस्त में कुछ लोग और शामिल हो जाएंगे। आधुनिक जमाने में जहां मेट्रो ट्रेन और ट्रांसपोर्ट के कई अन्य अत्याधुनिक साधन मौजूद हैं, तांगों को पुराना जरूर कहा जा सकता है मगर इनकी उपयोगिता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। ये बेहद चिंतनीय विषय है कि एक तरफ तो हम जलवायु परिवर्तन के प्रति गंभीरता बरतने की बात करते हैं और दूसरी तरफ इको फ्रेंडली ट्रांसपोर्टेशन को हतोत्साहित करने में लगे हैं। हो सकता है कि तंग गलियों में घोड़े गाड़ियों की आवाजाही से परेशानियां बढ़ जाती हों लेकिन इसका हल प्रतिबंध लगाकर तो नहीं निकाला जा सकता। तांगे या रिक्शे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कोई योगदान नहीं देते बावजूद इसके भी हम महज आधुनिक दिखने की धुन में प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। अत्याधुनिक तकनीक अपनाकर दुनिया के साथ कदम साथ कदम मिलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उन पारंगत साधनों को प्रोत्साहित करना जो हमारे भविष्य को प्रभावित करते हैं।
दिल्ली की तरह ही कुछ वक्त पहले कोलकाता की शान कहे जाने वाले रिक्शों पर प्रतिबंध लगया गया था, वो रिक्शे जो हजारों लोगों की जीविका का एकमात्र साधन थे। इस तरह के फैसले न केवल समाज के निचले तबके के प्रति सरकारों की गैरजिम्मेदाराना सोच को उजागर करते हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के हमारे दावों की हकीकत भी सामने लाते हैं। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हाल ही में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 13 वर्ष की अवधि में करीब तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में पर्यावरण के लिए घातक कही जाने वाली गैसों के उत्सर्जन में 1994 की तुलना में 2007 तक आए परिवर्तन का आंकलन है। हालांकि ये रफ्तार अमेरिका और चीन के मुकाबले काफी कम है। अमेरिका 20 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है। 2005 में दुनिया का प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 4.22 टन था जबकि भारत का औसत 1.2 टन है। पर फिर भी तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी को कहीं न कहीं रणनीति पर पुनर्विचार के संकेत के रूप में देखा ही जाना चाहिए। ग्रीन हाउस गैसों को सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं। इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और वाष्प मौजूद रहते है। ये गैसंे खतरनाक स्तर से वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इसका नतीजा ये हो रहा है कि ओजोन परत के छेद का दायरा लगातार फैल रहा है। ओजोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह काम करती है। इस कवच के कमजोर पड़ने का मतलब है, पृथ्वी का सूरज की तरह तप जाना। मौजूदा वक्त में ही हम काफी हद तक उस स्थिति को महसूस कर रहे हैं। इस साल गर्मी ने अप्रैल-मई में ही सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। अब जरा सोचिए कि अगर तापमान बढ़ने की रफ्तार कुछ यही रही तो आने वाले कुछ सालों में क्या दिन में घर से बाहर निकलना मुमकिन हो पाएगा। हो सकता है कि दिन में लगने वाले बाजार रात में लगे, लोग रात को शॉपिंग पर जाएं, दफ्तरों में काम रात में हो। यानी दिन रात बन जाए और रात दिन। ये बातें अभी सुनने में जरूर अजीब लग रही होंगी, लेकिन जितनी तेजी से मौसम में परिवर्तन हो रहा है, उसमे कुछ भी मुमकिन है। इसलिए विश्व के हर मुल्क को अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती करने जैसे कदम उठाने होंगे। छोटे-छोटे प्रयासों से ही बड़ी-बड़ी योजनाओं को मूर्तरूप दिया जा सकता है। अगर अब भी हम विकसित और विकासशील के झगड़े में उलझकर एक-दूसरे पर उंगली उठाते रहेंगे तो हमारा आने वाला कल निश्चित ही अंधकार मे होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरे को टालने का सबसे कारगर तरीका यही हो सकता है कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर को कम किया जाए, और उसके लिए यातायात के परंपरागत साधनों को अपनाने में शर्म हरगिज महसूस नहीं होनी चाहिए। फिलीपिंस की राजधानी मनीला ने इस दिशा में एक अच्छी पहल की है, जिसपर विचार किया जा सकता है। मनीला प्रशासन ने बैटरी चलित बसों को पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के काम में लगाया है और इसमें यात्रा बिल्कुल मुफ्त रखी गई है। ऐसा निजी वाहनों के प्रयोग में कमी लाने के उद्देश्य से किया गया है। सारा खर्चा प्रशासन खुद वहन कर रहा है। इस योजना के शुरू होने के बाद से काफी तादाद में लोगों ने दफ्तर आदि जाने के लिए निजी वाहनों का प्रयोग बंद कर दिया है। जरा अंदाजा लगाइए कि प्रतिदिन यदि 100 वाहन भी सड़क पर नहीं दौड़े तो पर्यावरण को कितना फायदा पहुंचा होगा। भारत में तांगे-रिक्शे के रूप में अच्छे-खासे विकल्प मौजूद हैं मगर स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार दोनों ही आधुनिकता का चोला ओढ़ने पर आमादा हैं। यूएन की एक स्टडी रिपोर्ट में कुछ समय पूर्व ये खुलासा किया गया था कि आने वाले 20 से 30 साल में भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शुमार होगा। यहां, सूखा और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसारएशिया में भारत के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इंडोनेशिया उन देशों में शामिल हैं, जो अपने यहां चल रही राजनैतिक, सामरिक, आर्थिक प्रक्रियाओं के कारण ग्लोबल वॉमिर्ंग से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। ऐसे ही सांइस पत्रिका की प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत समेत तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों को तेजी से बढ़ती जनसंख्या और उपज में कमी की वजह से खाद्य संकट का सामना करना पड़ेगा। तापमान में बढ़ोतरी से जमीन की नमी प्रभावित होगी, जिससे उपज में और ज्यादा गिरावट आएगी। इस लिहाज से देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन के खतरे को भारत सरकार जितना कम आंकती आई है, हालात उससे ज्यादा खराब होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर हमारी सरकार जितनी ढुलमुल है उतनी ही सुस्त यहां की जनता भी है। अगर सरकार की तरफ से कोई पहल की भी जाती है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि लोग उसका खुलेदिल से स्वागत करेंगे। अर्थ ऑवर इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। देश की आबादी का एक बड़ा तबका इसे महज चोचलेबाजी करार देकर अपना पल्ला झाड़ लेता है, जबकि ग्लोबल वॉमिर्ंग के खतरों से वो खुद भी अच्छी तरह वाकिफ है। इसलिए पर्यावरण मंत्रालय को अब अपनी आराम तलबी की आदत से बाहर निकालकर कुछ कदम उठाने चाहिए, उसे महज अर्थ ऑवर जैसी अपील करने के बजाए दिशा निर्देश तय करने होंगे जिसका पालन करने के लिए हर कोई बाध्य हो। कुछ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल जैसे ताजमहल आदि के आस-पास एक निर्धारित परिधि में वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध है, केवल बैटरी चलित वाहन ही वहां जा सकते हैं। इस व्यवस्था का शुरूआत में जमकर विरोध हुआ लेकिन आज सब इसके आदि हो चुके हैं। इसी तरह वो प्रमुख शहर जो प्रदूषण फैलाने में सबसे आगे हैं, के कुछ इलाके चिन्हित करके वहां ऐसी व्यवस्था लागू करने पर विचार-विमर्श किए जाने की जरूरत है। हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर तो लगाम लगा ही सकते हैं। सड़कों पर जितने ज्यादा तांगे-रिक्शे और बैटरी चलित वाहन दौड़ेंगे हमारे भविष्य की संभावनाएं उतनी ही अल्हादित करने वाली होंगी। अगर पारंपरिक साधनों को अपनाकर हम अपना कल खुशहाल कर सकते हैं तो फिर आधुनिकता को एक दायरे में सीमित रखने में बुराई क्या है। कम से कम इससे कुछ घरों के चूल्हे तो जलते रहेंगे।
नीरज नैयर

Thursday, May 27, 2010

गलत ही नहीं सही भी हैं थरूर-रमेश


नीरज नैयर
शशि थरूर के बाद सुर्खियों में रहना अगर किसी को आता है तो वो हैं पर्यावरण एवं वनमंत्री जयराम रमेश। रमेश आजकल चीन में दिए गए अपने बयान को लेकर खबरों की हैडलाइन बने हुए हैं। चीनी नेताओं के बीच बैठकर उन्होंने चीनियों जैसी जो बातें बोली वो कांग्रेस को भी पसंद नहीं आई। तो फिर भाजपा और दूसरे दलों के रुख का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। भाजपा और भाकपा दोनों ही और मंत्रीजी की कुर्सी के पीछे पड़ गए हैं, याद हो कि थरूर को गद्दी से उतारने में भाजपा ने ही मुख्य भूमिका निभाई थी। हालांकि शशि थरूर की गुस्ताखियों की फेहरिस्त थोड़ी ज्यादा लंबी थी, शरद पवार और उनके जैसे कई भारी-भरकम नेताओं को बचाने के लिए उन्हें बली का बकरा बनाया। लेकिन रमेश भी शनै: शनै: उसी राह पर निकलते दिखाई दे रहे हैं। दोनों नेताओं में फर्क है तो बस इतना कि थरूर साहब को ट्विीट करने की आदत थी और जयराम सीधे मीडिया में जाना पसंद करते हैं। पूर्व विदेश राज्यमंत्री के हर बयान की शुरूआत सोशल नेटवर्किग साइट से होती थी। ट्विटर से हटकर बोलना शायद उन्हें बिल्कुल नहीं भाता था। अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि उनकी विदेश मंत्रालय से रवानगी की नींव भी इसी ट्विटर पर रखी गई। ललित मोदी ने कोच्चि टीम में उनकी महिला मित्र सुनंदा के बारे में जो कुछ भी लिखा वो, थरूर के खिलाफ माहौल बनाता गया। और अंत में प्रधानमंत्री को उन्हें राम-राम कहने को मजबूर होना पड़ा। ये बात अलग है कि थरूर की कुर्सी छिनवाने वाले मोदी भी ज्यादा दिनों तक आईपीएल की कमिoAरी नहीं कर पाए। उन्हें भी ट्विीट करने की सजा भुगतनी पड़ी। थरूर को तो विदेश मंत्रालय में ही नया पद मिल गया लेकिन मोदी अभी भी बेचारे निलंबन पर आंसू बहा रहे हैं। वैसे इकॉनोमी क्लास को कैटल क्लास कहने वाले थरूर के बयान को छोड़ दें तो बाकी जो कुछ भी उन्होंने कहा उसमें कहीं न कहीं दम जरूर था।
मसलन वीजा संबंधी नियमों को कड़ा बनाने के सरकार के फैसले पर सवाल खड़े करना। इस संबंध में उन्होंने ट्विीट किया, क्या इससे सचमुच सुरक्षा बढ़ेगी? क्या आतंकवादी इसमें सफल होंगे कि भारत यहां आने वाले के प्रति बेरूखी दिखाए? याद रहे कि 26/11 के हमलावरों के पास कोई वीजा नहीं था। क्या यह सब हेडली जैसे किसी के लिए भारत में आना और घूमना वाकई मुश्किल बना पाएगा? इससे तो ज्यादातर हमारे पड़ोसी नागरिकों या मासूम लोगों की ही तकलीफें बढ़ेंगी और हमें लाखों डॉलर्स का नुकसान होगा, सो अलग। गौर से सोचा जाए तो थरूर के इस बयान में बवाल मचाने लायक कुछ भी नहीं है। उन्होंने बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी, भारत में सख्त कानूनों की कोई कमी नहीं है, पर क्या उनका कड़ाई से पालन हो पाता है। जरूरी नहीं है कि नई व्यवस्थाएं स्थापित की जाएं, पुरानी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करके भी हालात सुधारे जा सकते हैं। ऐसे ही राजनेताओं और नौकरशाहों के एक सम्मेलन में थरूर ने कहा था कि गांधी और नेहरू ने दुनिया के मंच पर जिस तरह से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की छवि पेश की, वह दुनिया के देशों को उपदेश लगा। और इसके चलते कहीं न कहीं भारतीय विदेश नीति को लेकर दूसरे देशों में भारत की नकारात्मक छवि बनी। ये बात गांधी-नेहरू समर्थकों को चुभना लाजमी है, और चूंकि कांग्रेस खुद इस खानदान से है इसलिए शशि थरूर साहब को उसके तीखे तेवर झेलने पड़े। मगर भारतीय विदेश नीति में जवाहर लाल नेहरू के योगदान और उनकी गलतियों का आकलन करने वाले शायद ही थरूर के खिलाफ नहीं जाते। चीन के साथ युद्ध के जिस दंश को भारत आज भी महसूस करता रहता है, वो नेहरूजी की गलतियों का ही नतीजा था। थरूर महज गली-मोहल्ले की राजनीति से उठकर विदेश मंत्रालय तक नहीं पहुंचे थे, उनकी शैक्षणिक योग्यता इतनी है कि वो सही या गलत में अंतर कर सकें। खैर आईपीएल में बैकडोर से एंट्री मारने का प्रयास करना शायद उनकी सबसे बड़ी गलती थी और इसका पता अब तक उन्हें चल गया होगा। जहां तक जयराम रमेश की बात है तो उनके भी कुछ बयानों की गंभीरता को समझना जरूरी है। चीन में वो जो कुछ भी बोले उसे कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता। खासकर चीन के मुद्दे पर तो किसी भारतीय मंत्री का इस तरह का रवैया ना तो विपक्षी दलों को समझ में आएगा और न ही जनता को। रमेश ने बीजिंग पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत का गृहमंत्रालय चीनी कंपनियों के प्रति जरूर से ज्यादा ही सुरक्षात्मक रवैया और सावधानी बरत रहा है। उन्होंने ये भी कहा था कि गृहमंत्रालय को अपना नजरीया बदलना चाहिए। चीन को लेकर भारत सरकार पहले से ही आवश्यकता से अधिक उदारवादी नीति अपनाती आई है, ये उदारवादी नीति का ही हिस्सा है कि हम सीमा विवाद जैसे मुद्दे को छूना भी नहीं चाहते। चीनी सैनिकों की घुसपैठ को कोरी अफवाह करार दे देते हैं। इससे ज्यादा अगर भारत उदारवादी हुआ तो चीन की राजधानी बीजिंग नहीं दिल्ली होगी। लेकिन रमेश ने पॉलीथिन बैग्स, गंदगी का नोबल और दीक्षांत समारोह के पारंपरिक परिधान को लेकर जो बयान दिए उन्हें पूरी तरह से गलत करार नहीं दिया जा सकता। सबसे पहले पॉलीथिन बैग्स पर प्रतिबंध की मुखालफत करके जयराम रमेश सुर्खियों में आए। उनका कहना था कि प्रतिबंध किसी समस्या का हल नहीं हो सकता, बात सही भी तो है। पॉलीथिन पर बैन लगता है तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को ही उठाना पड़ेगा। पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है। ऐसे में प्लास्टिक के बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगा तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा। वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं। वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं। पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है। अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों के सड़ने आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा। इस समस्या का केवल एक ही समाधन है, रिसाईकिलिंग, रमेश ने रीसाइकिलिंग पर ही जोर दिया था। कुछ समय पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने भी अपने रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रिसाईकिलिंग किया जा सके। वैसे सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है। उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रिसाईकिलिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाईकिल हो पाती है मतलब साफ है, हमारे देश में रिसाईकिलिंग का ग्राफ काफी नीचे है। प्लास्टिक को अगर अधिक से अधिक रिसाईकिलिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए जयराम रमेश का तर्क विरोध का कारण नहीं बल्कि विचार की वजह बनना चाहिए था। इसी तरह गंदगी को लेकर उनका ये कहना कि अगर गंदगी का नोबल दिया जाता भारत उसका प्रबल दावेदार होता, बिल्कुल सही है। हम इस बयान के लिए रमेश को बुरा-भला जरूर ही कह सकते हैं, पर क्या हकीकत हम खुद नहीं जानते। देश में ऐसा कौन सा शहर है जिसे पूर्णता साफ-सुथरा कहा जा सके। दिल्ली से लेकर मुंबई तक हर जगह गंदगी ही गदंगी है, तो फिर रमेश गलत कैसे हो सकते हैं। कुछ इसी तरह उन्होंने दीक्षांत समारोह की पारंपरिक वेशभूषा को बर्बर औपनिवेशवाद बताया, क्या ये सही नहीं है। क्या ये जरूरी है कि हम राजा-महाराजाओं की माफिक पोशाक पहनकर ही डिग्री हासिल करें। जयराम रमेश और शशि थरूर कहीं न कहीं गलत हो सकते हैं लेकिन उनके हर बयान को एक ही नजरीए से देखना कहीं से भी तर्क संगत नहीं। अगर दोनों कुछ अच्छा कहते हैं तो उसे सहज मन से स्वीकार करना ही चाहिए।
नीरज नैयर

Wednesday, May 26, 2010

जीवन में दु:ख का भी स्वागत करें



मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह सुख तो चाहता है लेकिन दुख से हमेशा दूर भागने की कोशिश करता है किन्तु देखा जाए तो दुख की घड़ी में ही मनुष्य के आत्मबल.धैर्य. विवेक और जीवटता की असली परीक्षा होती है। यह दुख ही है. जो अपने और पराए की पहचान कराता है और व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण पर मजबूर करते हुए उसे अपनी गलतियों को दूर करने का महत्वपूर्ण सबक सिखाता है। प्रसिध्द कवि दुष्यंत कुमार ने अपनी एक कविता में कहा है, दुख को बहुत सहेज कर रखना पड़ा हमें. सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया।, सुख कपूर की टिकिया है. जो आग लगी नहीं कि तेजी से भभक कर जल उठता है और फिर बुझ जाता है। सुख गरम तवे पर पानी की बूंदों की तरह छन्न से पड़ता है और उड़ जाता है। हालांकि उसकी स्मृति लंबे समय तक बनी रहती है और ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है। दरअसल अस्वाभाविक यह सोच है कि हमेशा सुखी बने रहें। यह सोच ही व्यक्ति को भीर और पलायनवादी बनाती है। हमेशा सुखबोध की कल्पनाएं संजोने वाला मन दुख के आते ही डर जाता है। दुख किसी अनजान और भयानक अतिथि की तरह होता है जिससे निपटने में पसीना छूट जाता है। दुख या प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति का नजरिया शुर से ही पलायनवादी होता है और वह उससे लड़ने की बजाय उससे बचने में अपनी शक्ति अधिक लगाता है। दुख के समय दूसरों को दोषी ठहराना व्यक्ति का प्रिय शगल होता है जबकि जीवन की सच्चाई यही है कि दुख ही मनुष्य का सच्चा साथी है। तुलसीदास ने कहा है, धीरज. धर्म. मित्र अर नारी. आपतकाल परखिए चारी।, यानी संकट के समय ही धीरज. धर्म. मित्र और नारी की परीक्षा होती है। जो विवेकशील होते हैं. वे आने वाले कठिन समय का अनुमान बहुत पहले ही करते हुए उससे निपटने की तैयारी में जुट जाते हैं। सुख किसी व्यक्ति को अहंकारी. गैर जिम्मेदार और लापरवाह बना सकता है लेकिन दुख की भट्ठी में जलने के बाद बहुत से दुर्गुण भी जल जाते हैं। वास्तव में दुख जीवन का सर्वश्रोष्ठ शिक्षक है लेकिन दुर्भाग्य से मनुष्य उसकी पाठ ठीक से पढते नहीं हैं। कोशिश करिए कि जीवन में सुख के साथ दुख का भी प्रसन्नता से स्वागत किया जाए। यह काम मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं।

Monday, May 24, 2010

क्रेडिट और डेबिट कार्ड इस्तेमाल करने वाले हो जाएं सावधान


क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों को सावधान रहने की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि जिस चिप और पिन प्रणाली को इन कार्डो की सुरक्षा की गारंटी समझा जाता था.उसमें एक गंभीर खामी है और चोर इससे फायदा उठा सकते हैं। इस खामी का मतलब है कि चुराए गए कार्ड का इस्तेमाल शाप टíमनलों और एटीएम में किया जा सकता है और चोर पहचाना भी नहीं जा सकेगा। चोरों को चार अंक के पिन के इस्तेमाल की जरूरत ही नहीं पडेगी और वह नकदी निकालने और खरीदारी करने का काम कर सकते हैं।
चिप और पिन प्रणाली को २क्क्६ में वैलेंटाइन डे पर पूरे विश्व में लागू किया गया था। इसके शुरु होने के बाद खरीदारी के लिए हस्ताक्षर के इस्तेमाल की जरूरत खत्म हो गई थी। उस समय बैंकों ने कहा था कि पिन प्रणाली के लागू होने से कार्डो से होने वाली धोखाधड़ी में कमी आएगी। उनकी दलील थी कि नम्बर नहीं जानने के कारण चोर कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे लेकिन कैम्ब्रिज यूनिवíसटी कम्प्यूटर लैब के प्रोफेसर रास एंडरसन ने इस बात को गलत साबित किया है। उन्होंने कई ऐसे तरीकों का पता लगाया है.जिससे इस प्रणाली को नकारा किया जा सकता है। प्रोफेसर एंडरसन का कहना है कि उनकी इस नई खोज के बाद अब बैंकों को चिप और पिन प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए सुरक्षा साफ्टवेयर में परिवर्तन करना होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार कम्प्यूटर चिप और ट्रांसमीटर लगे एक छोटे सíकट बोर्ड को चोरी किए गए क्रेडिट और डेबिट कार्ड में लगे चिप से जोड़ा जा सकता है. जिसे चोर अपनी आस्तीन में छिपा लेता है। इसके जरिए वह अपने पिट्ठू बैग या ब्रीफकेस में रखे कम्प्यूटर से जुड़ा रहता है। कैश मशीन पर कार्ड का इस्तेमाल करते समय चार अंक का पिन मांगे जाने पर वह कोई भी चार नम्बर उसमें डाल देता है और तब कार्ड से जुड़ा साफ्टवेयर टíमनल को संकेत देता है कि सही पिन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्रारंभ में कार्डो से धोखाधड़ी के मामलों में गिरावट आई थी लेकिन वर्ष २क्क्८ के आखिर तक इसमें 61 करोड़ डालर की बढोत्तरी होने से आंकड़ा 43 प्रतिशत तक पहुंच गया। प्रोफेसर एंडरसन ने कहा हमारे विचार से पिन प्रणाली की यह अब तक की सबसे बड़ी खामी है। मैं इस पर25 साल से काम करता रहा हूं बीबीसी के न्यूजनाइट कार्यक्रम में चिप और पिन कार्ड में खामी के इन ब्योरों का खुलासा किया गया। इसमें दिखाया गया कि किस तरह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एक कैंटीन में क्क्क्क् के फर्जी पिन का इस्तेमाल करके चार कार्डो से खरीदारी की गई। उपभोक्ता मामलों के वकील स्टीफन मैसन ने कार्यक्रम में कहा चिप और पिन प्रणाली में ये खामियां गंभीर हैं। मुझे नहीं लगता कि बैंकों ने इस समस्या का उचित समाधान किया है। उन्हें इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। चिप और पिन प्रणाली की शुरुआत के साथ बडे खतरे भी सामने आए हैं। कार्डो से हुई धोखाधड़ी के शिकार लोगों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। कुछ बैंकों ने तो यह कहकर नुकसान की भरपाई करने से इन्कार कर दिया कि उपभोक्ताओं के कार्ड के साथ लापरवाही बरतने के कारण ऐसा हुआ। वे अपने पिन को गोपनीय नहीं रख पाए। प्रोफेसर एंडरसन का कहना है कि बैंक अपनी प्रणालियों की सुरक्षा के बारे में झूठ बोलते रहे हैं। लेकिन बैंकों के श्रम संगठन यू के कार्डस एसोसिएशन ने इस खोज को ज्यादा महत्व नहीं दिया है। उसका कहना है यह जटिल प्रणाली हमारे ग्राहकों के कार्ड के लिए वास्तविक खतरा नहीं बन सकती।

अजय कुमार विश्वकर्मा

Saturday, May 22, 2010

कमजोर ‘लैला’ से प्रभावित हो सकता है मानसून



डॉ. महेश परिमल

चारों ओर लैला की ही चर्चा है। हर कोई लैला के बारे में ही बात कर रहा है। कोई इसे जबर्दस्त चक्रवाती तूफान करार देता है, तो कोई इसके कमजोर होने पर राहत महसूस कर रहा है। अब तक करीब 25 जानें लेने वाला यह तूफान भले ही कमजोर पड़ गया हो, पर सच तो यह हे कि इसके हमारे मेहमान मानसून का मिजाज बिगाड़ दिया है। अब मानसून हमसे रुठ जाएगा, जो पहले आने वाला था, अब उसे आने में कुछ देर हो जाएगी। हमारे देश में मानसून एक ऐसी शक्ति है, जो अच्छे से अच्छे बजट को बिगाड़ सकती है। कोई भी तुर्रमखाँ वित्तमंत्री इसके बिना अपना बजट बना ही नहीं सकता। पूरे देश का भविष्य मानसून पर निर्भर करता है। इसलिए इस बार मानसून को लेकर की जाने वाली तमाम भविष्यवाणियों को प्रभावित कर सकती है, लैला की सक्रियता। मानसून सक्रिय होता है, समुद्र पर, किंतु वह सभी देशों को विशेष रूप से प्रभावित करता है। मानसून की सक्रियता छोटे-छोटे देशों, राज्यों को मालामाल कर सकती है और इसकी निष्क्रियता कई देशों को कंगाल भी बना सकती है।
लैला ने मानसून मानसून एक्सप्रेस की रफ्तार पर थोड़ा ब्रेक लगा दिया है। इससे मानसून के केरल तट पर पहुंचने में दो से तीन दिन की देरी हो सकती है, जिसका असर दिल्ली तक के सफर पर पड़ेगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल मानसून के पूरे सीजन पर लैला का कोई खास असर पड़ने का अंदेशा नहीं है, क्योंकि इस साइक्लोन का प्रभाव लगभग खत्म हो गया है। मौसम विशेषज्ञ रंजीत सिंह के अनुसार साइक्लोन मानसून को पुश करने में अहम भूमिका निभाने वाली समुद्रतटीय इलाकों की एनर्जी को सोख लेता है। मानसून के केरल तट पर पहुंचने की सामान्य तारीख 1 जून है। इसमें अभी 10 दिन का वक्त है। अगर इन दिनों के अंदर दोबारा उतनी एनर्जी डेवलप हो गई, तो मानसून सामान्य स्पीड से आगे बढ़ पाएगा, वरना यह लेट हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार वातावरण (सर्फेस) टेंपरेचर और सी-लेवल (समुद्र तल) के टेंपरेचर के बीच के अंतर को थर्मल ग्रेडिएंट कहते हैं। यह ग्रेडिएंट जितना ज्यादा होता है, मानसून उतनी ही तेजी से आगे बढ़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि मैदानी इलाकों में जितनी गर्मी होगी, मानसून में उतनी ही अच्छी बारिश होगी। मौसम विभाग के वैज्ञानिक अशोक कुमार के अनुसार दो- तीन दिन में पता लग जाएगा कि मानसून केरल को कब तक हिट करेगा। दिल्ली में मानसून के पहुंचने की नॉर्मल डेट 29 जून है। एक-दो दिन में वेस्टर्न डिस्टबेर्ंस प्रभावी होने वाला है। ऐसे में अगले दो-तीन दिन दिल्ली का टेंपरेचर बढ़ेगा, मगर इसके बाद तापमान गिरेगा। ऐसे में पारा 45 डिग्री से ऊपर पहुंचने के कोई आसार नहीं हैं।
अच्छी बारिश होगी, तो ये होगा
1. पिछले साल 37 साल के सबसे खराब मानसून से तिलहन व गन्ने की फसलों की बर्बादी ने खाद्यान्न सूचकांक दो अंकों में पहुंचा दिया था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की आशंका से खाद्यान्न की कीमतें 17 मार्च की तुलना में 17.70 फीसदी अधिक है। अच्छे मानसून की उम्मीद से इसमें सुधार होगा।
2. अच्छे मानसून की उम्मीद से गेहूं के निर्यात की संभावना बढ़ गई है। वरना देश में कमी के डर से गेहूं निर्यात पर तीन साल से पाबंदी लगी हुई है।
3. हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक हैं और खपत सबसे यादा है लेकिन पिछले साल कम बारिश से 50 लाख टन चीनी आयात करनी पड़ी थी। इससे न्यूयॉर्क के चीनी के वायदा कारोबार में उछाल आ गया था।
4. तिलहन के कम उत्पादन के कारण हमने खाद्य तेल के सबसे बड़े खरीदार चीन को भी पीछे छोड़ दिया था। अब अच्छी बारिश से खाद्य तेल कम आयात करना पड़ेगा।
कैसे पड़ा लैला का नाम लैला
यह सवाल आपके मन में आ रहा होगा कि आखिर इस तूफान का नाम लैला क्यों पड़ा? इसका जवाब पाकिस्तान के पास है, क्योंकि इस तूफान का नाम पाकिस्तान ने ही सुझाया है। फारसी में लैला का मतलब काले बालों वाली सुंदरी या रात होता है। अरबी भाषा में लैला काली अंधेरी रात को कहते हैं। इस तूफान के प्रभाव के कारण आंध्र के तटीय इलाकों में घना अंधेरा छाया हुआ है। गाड़ियां दिन में भी बिना लाइट जलाए नहीं चल पा रही हैं।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी)के एक अधिकारी ने बताया कि लैला का नाम पाकिस्तान ने भारतीय मौसम विभाग को सुझाया है। विश्व मौसम संगठन ने आईएमडी को हिन्द महासागर में आने वाले तूफानों पर नजर रखने और उसका नाम रखने की जिम्मेदारी सौंपी है। अधिकारी के अनुसार तूफानों की आसानी से पहचान करने और इसके तंत्र का विश्लेषण करने के लिए मौसम वैज्ञानिकों ने उनके नाम रखने की परंपरा शुरू की। अब तूफानों के नाम विश्व मौसम संगठन द्वारा तैयार प्रRिया के अनुसार रखे जाते हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में तूफानों को नाम देने की प्रRिया 1953 में शुरू हुई और बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के ऊपर बनने वाले तूफानों के नाम 2004 से रखे जाने लगे।
क्षेत्रीय विशेषीकृत मौसम केंद्र होने की वजह से आईएमडी भारत के अलावा 7 अन्य देशों बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, थाइलैंड तथा श्रीलंका को मौसम संबंधी परामर्श जारी करता है। अधिकारी के अनुसार, आईएमडी ने इन देशों से साल दर साल हिंद महासागर और अरब सागर में आनेवाले तूफानों के लिए नाम की लिस्ट मांगी थी। इन देशों ने अंग्रेजी वर्णमाला के Rम के अनुसार नामों की एक लंबी लिस्ट आईएमडी को दी है। अब तक ये देश तूफानों की पहचान करने के लिए 64 नाम दे चुके हैं, जिसमें से 22 का उपयोग हो चुका है। इसी लिस्ट के हिसाब से हिंद महासागर में आनेवाले इस तूफान का नाम लैला रखा गया है, जो कि पाकिस्तान ने सुझाया है। आंध्रप्रदेश में सबसे विनाशकारी तूफान 1977 में कृष्णा जिले में आया था। इसमें 10,000 से यादा लोगों की मौत हुई थी। अगले चRवाती तूफान का नाम ‘बंडू’ रहेगा। यह नाम श्रीलंका के सुझाव के अनुरूप रखा गया है।
खतरा तो है, लेकिन.
चRवात का कम दबाव वाला केंद्र हवा में से पूरी नमी चुरा सकता है। पिछले साल आए तूफान ‘आइला’ ने यही किया था। जिसके कारण मानूसनी बारिश में 22 फीसदी कमी आ गई थी। हालांकि इस बार ‘लैला’ के साथ ही अरब सागर में बनी चRवातीय स्थिति कर्नाटक-कोकण के तट पर आ रही है। उम्मीद है यह ‘लैला’ को बेअसर कर देगी। भुवनेश्वर. बंगाल की खाड़ी में दक्षिण पूर्व तथा अन्य क्षेत्नों में बना दबाव गोपालपुर से करीब 875 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम की तरफ बढ़ता हुआ चRवात लैला के रूप में फैल गया जिससे उत्तर तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्न में भारी बारिश की संभावना बन गई है। मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल जो स्थिति बन रही है और मौसम के की तरफ पश्चिम उत्तर दिशा में और बढेगा। लैला चRवात की वजह से अगले 24 घंटे के दौरान उड़ीसा के दूरवर्ती क्षेत्नों में भारी बारिश हो सकती है। सभी तटीय इलाकों को आवश्यक सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।
हमारे वैज्ञानिक लैला की एक-एक गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। कमजोर होने के बाद इसने सभी दिशाओं में अपना प्रभाव छोड़ा है। अब इसके आकलन की आवश्यकता है। जो इसके थमते या आगे बढ़ते ही शुरू हो जाएगा। बहरहाल यही सोचें कि लैला हम सबके लिए आइला नहीं, बल्कि प्राणदायी लैला बने।

डॉ. महेश परिमल

Friday, May 21, 2010

आज भी भाव-विभोर कर देता है बाँस गीत


अशोक कुमार टंडन
छत्तीसगढ के यदुवंशी कहे जाने वाले राउत समुदाय में प्रचलित बांस लोकवाद्य को फूंककर विशेष ध्वनि के साथ गीत एवं गाथा की प्रस्तुति बांस गीत की अद्भुत कला विलुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी है । बावजूद इसके कहीं-कहीं अब भी इस कला की अभिव्यक्ति करते लोग नजर भी आ जाते हैं । वहीं कुछ कला मर्म ऐसी विधाओं को संरक्षित करने में जुटे हुए हैं ।
बांसगीत के बारे में कहा जाता है कि यह बांसुरी का ही एक रूप है । कभी वनों में पोले बांस से हवा गुजरने से उत्पन्न प्राकृतिक ध्वनि ही बंशी अथवा बांसुरी की प्रेरक बनी। तृण जाति की प्रसिद्ध वनस्पति विशेष बांस की ढाई से तीन हाथों तक लंबी इस बांस की पोली नली में बांसुरी की भांति छिद्र बना लेते हैं । चार की संख्या वाले छिद्रों में से एक आर.पार होता है और शेष तीन फलक तक सीमित होते हैं । इन्हीं छिद्रों से मुंह से फूंक कर स्वर लहरी प्राप्त की जाती है । वादक इसके छिद्रों को अपनी अंगुलियों से आवृत-अनावृत कर आरोह.अवरोह के जरिए स्वर संचालन करते हैं । सामाजिक.सांस्कृतिक संस्था.बिलासा कला मंच के संयोजक एवं बांसगीत के संदर्भ में शोध कार्य करने वाले डा.सोमनाथ यादव ने े बातचीत में बताया कि छत्तीसगढ में छरामीण अंचलों में निवासरत मुख्यत: राउत समुदाय के लोग इस कला में पारंगत माने जाते हैं । हालांकि अपवादस्वरूप कहीं कहीं अन्य लोग भी बांसगीत का प्रदर्शन करते देखे जाते हैं ।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ में बांस गीत जैसी कई लोक कलाओं को संरक्षित करने की दिशा में कई स्तर पर क्रियाशील रहने वाले डा. यादव को पिछले वर्ष राष्ट्रीय संगीत अकादमी ने बनारस में बांसगीत पर किए गए शोध पठन के लिए आमंत्नित किया गया था । इसी तरह दक्षिण मध्य क्षेत्नीय सांस्कृतिक केंद्र नागपुर द्वारा बांस गीत के संदर्भ में एक शोध ग्रंथ का प्रकाशन तथा डाक्यूमेंटरी फिल्म का निर्माण भी किया गया है । श्री यादव बताते हैं कि बांस गीत गायकों के लिए गांव की किसी गली का चबूतरा ही उनका मंच बन जाता है । बांसकहार अपने बांस से ध्वनि निकालकर स्वरों में ढालते हुए प्रचंड स्वरघोष उच्चारित करता है मानो शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व शंखघोष कर मंगल ध्वनि से आपूरित कर देना चाहता हो । इस घोष को छत्तीसगढी में.घोर.कहा जाता है। बांसगीत गायकों की टोली में कम से कम तीन सदस्य होते हैं । एक बांस गीतों का गायन करने गीतकहार.दूसरा बांस वादन करने वाला बांसकहार तथा तीसरा गीतकहार के राग में राग मिलाने वाला रागी कहलाता है । गीतकहार अपने हाथों को कानों से लगाकर ही गाता है जिससे वह हाथों को संचालित करके गाने का अवसर नहीं जुटा पाता । फिर भी वह पूरी देह को लहराने.मुख पर विभिन्न भावों को व्यक्त करने तथा उठने बैठने का संयोजन कर ही लेता है । भाव भंगिमाओं के अतिरिक्त इनमें स्वरालाप एवं स्वर परिवर्तन की अद्भुत क्षमता होती है । गीतकहार बीच-बीच में अर्थ भी स्पष्ट करना नहीं भूलता ताकि सुनने वालों को कथानक को समझने में आसानी हो सके ।
बांस गीतों की टोली में शामिल रागी की भूमिका महत्वपूर्ण भले नहीं होती हो फिर भी वह टोली का सक्रिय सदस्य होता है । लोक कथाओं में हुंकृति भरते हुए वह गीतकहार के काम को सरल बनाता है। जब कभी गायक पंक्ति को शुरू करके छोड देता है उसे वही पूरा करता है ।
वैसे बांस गीत गायकों के टोली या मंडली का नायक गीतकहार ही माना जाता है । गीत कहार अपने कानों में हाथ लगाकर लहराते हुए विविध भाव. भंगिमाओं से अपनी तान छेडता है । गीतों का आरंभ में ये विभिन्न देवी.देवताओं को जोहार.प्रणाम.करते हैं जिसे स्थानीय बोली में ‘जोहारनीन’ कहते हैं । गीतों में अन्तर्निहीत भावों के अनुरूप गीतकहार स्वयं को नायक के स्थान पर प्रतिस्थापित कर प्रसंगानुकूल मुद्राओं का संयोजन भी करने लगता है । शोधकर्ता के मुताबिक ऐसे मौके पर इन्हें देखकर महाकवि निराला याद आ जाते हैं, जो कभी-कभी गाते हुए इतने तन्मय हो जाते थे कि अंगुलियां द्रुत वेग से ही नहीं चलते बल्कि उनका प्रहार इतना सबल हो जाता था मानों वह तबले के बोल भी हारमोनियम से ही निकाल कर मानेंगे । छन्दशा में नए प्रयोग करने वाले कवि को ताल से भी दिलचस्पी हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं ।
आधुनिक एवं वैश्विक उदारीकरण के जमाने की नई पीढ़ी के लोग जिस तरह अपने सांस्कृतिक मूल्यों को खोते जा रहे हैं, उससे अलग अलग सामाजिक पहचान बने अनेकों क्षेत्नीय और आंचलिक लोक कलाएं अतीत का विषय बनती जा रही है । सरकारी एवं निजी उपक्रम कभी कभी सामयिक अवसरों पर आयोजित कार्यक्रमों के जरिए ऐसे कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के लिए एक मंच जरूर उपलब्ध कराते हैं । सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ऐसी लोक कलाओं को किसी न किसी रूप में प्रोत्साहन की आवश्यकता भी लाजिमी है ।
अशोक कुमार टंडन

Thursday, May 20, 2010

जिंदगी की टेंशन से छुट्टी दे रहा है कंपनी का HR


मोनिका बेहुरा
मौजूदा समय के एचआर हेड के सामने तनाव बिल्कुल नए तरह की चुनौती है। जब भी कोई कर्मचारी काम के ज्यादा बोझ की शिकायत करता है तो वे उसे हिमालय पर ट्रेक के लिए जाने को कहते हैं या गंगा की लहरों में राफ्टिंग करने की सलाह देते हैं। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया के एचआर डायरेक्टर और सीओओ यशो वी वर्मा ने बताया, 'किसी पहाड़ पर कैंप या कोई डिनर स्पॉन्सर करने या महीने में एक बार छुट्टी देकर कर्मचारियों के उत्साह को बनाए रखा जा सकता है।' एलजी ने अपनी एचआर नीतियों में बदलाव किया है।

कई कंपनियों को अब यह समझ में आ गया है कि कर्मचारियों में तनाव जैसी समस्या को उन्हें एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में व्यस्त रखकर दूर किया जा सकता है क्योंकि इससे कंपनी के प्रति कर्मचारी का जुड़ाव बढ़ता है और मानव संसाधन का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिलती है। इसलिए अगर आपको तनाव दूर करने के लिए ट्रेडमिल पर चलना पसंद नहीं है तो आपके सामने डांस फ्लोर पर थिरकने से लेकर केक तैयार करने जैसे कई रोचक विकल्प मौजूद हैं। जिन कंपनियों में एचआर विभाग पहल नहीं कर रहे हैं, वहां कर्मचारी खुद ही ऐसी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं।

शामक डावर जैसे डांस इंस्टीट्यूट के छात्रों का करीब 20 फीसदी हिस्सा कॉरपोरेट वर्ल्ड से आता है। इसमें अच्छी संभावना को देखते हुए ही यह संस्थान अब टेक महिंद्रा, कोका कोला, कॉग्निजेंट और प्राइसवाटरहाउसकूपर्स जैसी कंपनियों के कर्मचारियों के बीच वर्कशॉप का आयोजन कर रहा है। इस संस्थान ने ऐसे तात्कालिक डांस क्लासेज शुरू किए हैं जो एग्जिक्यूटिव वर्ग को सूट करे। डावर ने ऐसे 'कॉरपोरेट जैज' कोर्स तैयार किए हैं जिससे किसी कंपनी के कर्मचारी को 'मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक और भावनात्मक फायदे' हो सकते हैं।

उन्होंने बताया, 'इस फॉमेर्ट में कर्मचारियों के फिटनेस में सुधार, तनाव दूर करने, टीम भावना, इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास एवं संचार क्षमता बढ़ाने और उनमें एकाग्रता कायम करने पर जोर दिया गया है।' डावर ने बताया कि उनके पास आने वाले ज्यादातर कर्मचारी भारी तनाव, ऊर्जा की कमी, एकाग्रता की कमी जैसी समस्याओं से ग्रस्त होते हैं। कोका कोला इंडिया ने भी शामक डावर इंस्टीट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट (एसडीआईपीए) के साथ मिलकर 'डांस ऐट वर्क' कार्यक्रम शुरू किया है। कोका कोला इंडिया के जनरल मैनेजर, एचआर तपस्वी चंदेल ने बताया, 'हम चाहते हैं कि कर्मचारी अपना तनाव दूर करने के लिए कुछ मजेदार तरीका अपनाएं और यह तरीका तत्काल कारगर हुआ है। कंपनी अपने कर्मचारियों को आईपीएल मैचों के टिकट भी फ्री में दे रही है ताकि वे मैच देखें और अपने को ऊर्जावान रखें।'

तनाव दूर करने के इस अभियान की वजह से ही दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी कोला कंपनियां एक जगह पहुंची हैं। पेप्सिको और कोका कोला इंडिया ने कर्मचारियों में तनाव दूर करने के उपाय करने के लिए ह्युमन डायनामिक एशिया पैसिफिक के साथ साझेदारी की है। यह काउंसलिंग और कोचिंग की प्रमुख कंपनी है। हेडहंटर्स इंडिया के सीईओ क्रिस लक्ष्मीकांत ने बताया, 'कर्मचारियों के बीच तनाव कम रखने के प्रति कंपनियां अब ज्यादा से ज्यादा सचेत हो रही हैं। यह ध्यान रखा जा रहा है कि कर्मचारियों में तनाव इतना न बढ़ जाए कि उनमें निगेटिव एनर्जी का विकास हो जाए जिससे कामकाज प्रभावित हो।'
मोनिका बेहुरा

Wednesday, May 19, 2010

नजीर अकबराबादी की तीन रचनाऍं






रोटियाँ

जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ।
फूली नही बदन में समाती हैं रोटियाँ।
आँखें परीरुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँ।
सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ।

जितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।

रोटी से जिसका नाक तलक पेट है भरा।
करता फिरे है क्या वो उछल कूद जा ब जा।
दीवार फाँद कर कोई कोठा उछल गया।
ठट्ठा हँसी, शराब, सनम, साक़ी, इस सिवा।

सौ सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँ।।

जिस जा पे हाँडी, चूल्हा तवा और तनूर है।
ख़ालिक़ के कुदरतों का उसी जा ज़हूर है।
चूल्हे के आगे आँच जो जलती हुज़ूर है।
जितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर है।

इस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँ।।

आवे तवे तनूर का जिस जा ज़बां पे नाम।
या चक्की चूल्हे का जहाँ गुलज़ार हो तमाम।
वां सर झुका के कीजे दंडवत और सलाम।
इस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मुक़ाम।

पहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँ।।

इन रोटियों के नूर से सब दिल हैं पूर पूर।
आटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूर।
पेड़ा हर एक उसका है बर्फ़ी-ओ-मोती चूर।
हरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूर।

इस आग को मगर ये बुझाती हैं रोटियाँ।।

पूछा किसी ने ये किसी कामिल फ़क़ीर से।
ये मेह्र-ओ-माह हक़ ने बनाये हैं काहे के।
वो सुन के बोला बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर दे।
हम तो न चाँद समझें, न सूरज हैं जानते।

बाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ।।

फिर पूछा उसने कहिये ये है दिल का नूर क्या?
इसके मुशाहिदे में है खिलता ज़हूर क्या?
वो बोला सुन के तेरा गया है शऊर क्या?
कश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-कुबूर क्या?


जितने ही कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।

रोटी जब आई पेट में सौ कन्द घुल गये।
गुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गये।
दो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गये।
चौदा तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गये।

ये कश्फ़ ये कमाल दिखाती हैं रोटियाँ।।

रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो।
मेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न हो।
भूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न हो।
सच है कहा किसी ने कि भूके भजन न हो।

अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ।।

अब जिन के आगे मालपूये भर के थाल हैं।
पूरे भगत उन्हें कहो, साहब के लाल हैं।
और जिनके आगे रोग़नी और शीरमाल हैं।
आरिफ़ वही हैं और वही साहब कमाल हैं।

पक्की पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँ।।

कपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्ते।
लम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्ते।
बाँधे कोई रुमाल है रोटी के वास्ते।
सब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्ते।

जितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।

रोटी से नाचे पयादा क़वायद दिखा दिखा।
असवार नाचे घोड़े को कावा लगा लगा।
घुँघरू को बाँधे पैक भी फिरता है जा ब जा।
और इस सिवा जो ग़ौर से देखा तो जा ब जा।

सौ सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँ।।

दुनिया में अब बदी न कहीं औ निकोई है।
ना दुश्मनी न दोस्ती ना तुन्दखोई है।
कोई किसी का, और किसी का न कोई है।
सब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई है।

नौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँ।।

रोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीर।
रूखी भी रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीर।
या पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीर।
गेहूं जुआर, बाजरे की जैसी भी हो ‘नज़ीर‘।

हमको सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ।।
कश्फ़=प्रदर्शन; क़ुलूब=हृदय

आदमी

दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वह भी आदमी
ज़रदार बेनवा है सो है वह भी आदमी।
नेमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वह भी आदमी।।


मस्ज़िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ।
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्वाँ।
पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज़ यां।
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ।
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी।।

यां आदमी पै जान को वारे है आदमी।
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी।
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी।
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी।
और सुनके दौड़ता है सो है वह भी आदमी।।

अशराफ़ और कमीने से ले शाह ता वज़ीर।
ये आदमी ही करते हैं सब कारे दिलपज़ीर।
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर।
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए 'नज़ीर'।
और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी।।


रीछ का बच्चा

कल राह में जाते जो मिला रीछ का बच्चा।
ले आए वही हम भी उठा रीछ का बच्चा।
सौ नेमतें खा-खा के पला रीछ का बच्चा।
जिस वक़्त बड़ा रीछ हुआ रीछ का बच्चा।
जब हम भी चले, साथ चला रीछ का बच्चा ।।

था हाथ में इक अपने सवा मन का जो सोटा।
लोहे की कड़ी जिस पे खड़कती थी सरापा।
कांधे पे चढ़ा झूलना और हाथ में प्याला।
बाज़ार में ले आए दिखाने को तमाशा।
आगे तो हम और पीछे वह था रीछ का बच्चा ।।

था रीछ के बच्चे पे वह गहना जो सरासर।
हाथों में कड़े सोने के बजते थे झमक कर।
कानों में दुर, और घुँघरू पड़े पांव के अंदर।
वह डोर भी रेशम की बनाई थी जो पुरज़र।
जिस डोर से यारो था बँधा रीछ का बच्चा ।।

झुमके वह झमकते थे, पड़े जिस पे करनफूल।
मुक़्क़ैश की लड़ियों की पड़ी पीठ उपर झूल।
और उनके सिवा कितने बिठाए थे जो गुलफूल।
यूं लोग गिरे पड़ते थे सर पांव की सुध भूल।
गोया वह परी था, कि न था रीछ का बच्चा ।।

एक तरफ़ को थीं सैकड़ों लड़कों की पुकारें।
एक तरफ़ को थीं, पीर-जवानों की कतारें।
कुछ हाथियों की क़ीक़ और ऊंटों की डकारें।
गुल शोर, मज़े भीड़ ठठ, अम्बोह बहारें।
जब हमने किया लाके खड़ा रीछ का बच्चा ।।

कहता था कोई हमसे, मियां आओ क़लन्दर।
वह क्या हुए,अगले जो तुम्हारे थे वह बन्दर।
हम उनसे यह कहते थे 'यह पेशा है "क़लन्दर"।
हां छोड़ दिया बाबा उन्हें जंगले के अन्दर।
जिस दिन से ख़ुदा ने दिया, ये रीछ का बच्चा' ।।

मुद्दत में अब इस बच्चे को, हमने है सधाया।
लड़ने के सिवा नाच भी इसको है सिखाया।
यह कहके जो ढपली के तईं गत पै बजाया।
इस ढब से उसे चौक के जमघट में नचाया।
जो सबकी निगाहों में खुबा रीछ का बच्चा ।।

फिर नाच के वह राग भी गाया, तो वहाँ वाह।
फिर कहरवा नाचा, तो हर एक बोली जुबां "वाह"।
हर चार तरफ़ सेती कहीं पीरो जवां "वाह"।
सब हँस के यह कहते थे "मियां वाह मियां वाह"।
क्या तुमने दिया ख़ूब नचा रीछ का बच्चा ।।

इस रीछ के बच्चे में था इस नाच का ईजाद।
करता था कोई क़ुदरते ख़ालिक़ के तईं याद।
हर कोई यह कहता था ख़ुदा तुमको रखे शाद।
और कोई यह कहता था ‘अरे वाह रे उस्ताद’।
"तू भी जिये और तेरा सदा रीछ का बच्चा" ।।

जब हमने उठा हाथ, कड़ों को जो हिलाया।
ख़म ठोंक पहलवां की तरह सामने आया।
लिपटा तो यह कुश्ती का हुनर आन दिखाया।
वाँ छोटे-बड़े जितने थे उन सबको रिझाया।
इस ढब से अखाड़े में लड़ा रीछ का बच्चा ।।

जब कुश्ती की ठहरी तो वहीं सर को जो झाड़ा।
ललकारते ही उसने हमें आन लताड़ा।
गह हमने पछाड़ा उसे, गह उसने पछाड़ा।
एक डेढ़ पहर फिर हुआ कुश्ती का अखाड़ा।
गर हम भी न हारे, न हटा रीछ का बच्चा ।।

यह दाँव में पेचों में जो कुश्ती में हुई देर
यूँ पड़ते रूपे-पैसे कि आंधी में गोया बेर
सब नक़द हुए आके सवा लाख रूपे ढेर।
जो कहता था हर एक से इस तरह से मुँह फेर।
"यारो तो लड़ा देखो ज़रा रीछ का बच्चा" ।।

कहता था खड़ा कोई जो कर आह अहा हा
इसके तुम्हीं उस्ताद हो वल्लाह "अहा हा"
यह सहर किया तुमने तो नागाह "अहा हा"
क्या कहिये ग़रज आख़िरश ऐ वाह "अहा हा"
ऐसा तो न देखा, न सुना रीछ का बच्चा ।।

जिस दिन से 'नज़ीर' अपने तो दिलशाद यही हैं।
जाते हैं जिधर को उधर इरशाद यही हैं।
सब कहते हैं वह साहिब-ए-ईजाद यही हैं।
क्या देखते हो तुम खड़े उस्ताद यही हैं।
कल चौक में था जिनका लड़ा रीछ का बच्चा ।।
नजीर अकबराबादी

Monday, May 17, 2010

सरकार की विफलता वरदान है नक्सलियों के लिए

डॉ. महेश परिमल
लो, अब केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी कह दिया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों का सरकार में भरोसा कम हुआ है। वहां के कुछ लोगों को सरकार का विरोध करने वाली ताकतों पर ज्यादा यकीन है। विकास के लिए उद्योग क्षेत्र को लाभ-हानि का गणित छोड़कर आगे आना चाहिए। आँकड़ों के हिसाब से हमारे देश कितना भी विकास कर ले, पर मूल विकास तो उन क्षेत्रों का होना चाहिए, जो वास्तव में पिछड़े हैं। दुर्भाग्य यही है कि देश में आज उन्हीं क्षेत्रों में माओवादी सक्रिय हैं, जहाँ विकास के कोई चिह्न दिखाई नहीं देते। देर से ही सही, पर गृहमंत्री ने स्वीकारा तो सही। अक्सर हमारे मंत्री वास्तविकता को नकारते रहते हैं। वे जमीनी रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करते, उन्हें अपनों उन कथित लोगों पर अधिक विश्वास होता है, जो मूल स्थिति को गलत तरीके से पेश करते हैं। यही नजरिया सरकार को मुश्किल में डालता है। नक्सली आखिर क्यों सक्रिय हुए, क्यों उनकी ताकत बढ़ी, कैसे उन्होंने आदिवासियों का विश्वास प्राप्त किया, कैसे उन्होंने अपना नेटवर्क बनाया, किस तरह से उन्होंने आदिवासियों को पुलिस के चंगुल से बचाया। इन सब बातों पर गौर किया जाए, तो इस नक्सली समस्या से निपटने में आसानी हो जाएगी। अभी तो यही कहा जा रहा है कि नक्सलियों के खिलाफ अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस होकर हमारे जवान उनका मुकाबला करेंगे। ऐसा काफी समय से कहा जा रहा है, पर हो कुछ नहीं पाता। सरकार को यह पता चल जाता है कि नक्सली बड़ा हमला करने वाले हैं, पर वह सचेत नहीं हो पाती और नक्सली हमला कर देते हैं। हमले के बाद जो स्थिति आती है, वह बड़ी शर्मनाक होती है।
कितने शर्म की बात है कि छत्तीसगढ़ सरकार के पास नक्सलियों की गोली के शिकार जवानों के मृत शरीर को सही स्थान पर ले जाने के लिए वाहन नहीं मिले। यही राज्य है, जहाँ ढेर सारी कारों के साथ मुख्यमंत्री का काफिला चलता है। दो-तीन एकड़ की जमीन पर मुख्यमंत्री निवास होता है। 5 एकड़ की जमीन पर राजभवन होता है। दूसरी ओर टेंट में रहकर नक्सलियों का मुकाबला करने वाले जवानों को एक बोतल पानी के लिए 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का कुत्ता बीमार पड़ जाता है, तो उसे इलाज के लिए विशेष विमान से जबलपुर ले जाया जा सकता है। एक मंत्री बीमार पड़ जाए, तो तुरंत ही उसके लिए विशेष विमान की व्यवस्था हो जाती है। डॉक्टरों की फौज तैयार हो जाती है। पर नक्सलियों से जूझने के लिए हमारे जवानों को बिना किसी तैयारी के भेज दिया जाता है। जवान नाहक ही मारे जाते हैं। उसके बाद भी उनका सम्मान नहीं हो पाता। परिजन उनके मृत शरीर के अंतिम दर्शन के लिए तरसते रहते हैं और सरकारी लापरवाहियों के चलते मृत शरीर भी समय पर नहीं पहुँच पाते। किस बात पर आखिर हम गर्व करें कि हमारी सरकार संवेदनशील है। विमान से बाढ़ का दृश्य देखने वाले और कारों के काफिले के साथ चलने वाले देश के कथित वीआईपी आज हमारे लिए सबसे बड़े सरदर्द बन गए हैं।
इस देश को जितना अधिक वीआईपी ने नुकसान पहुँचाया है, उतना तो किसी ने नहीं। कितने वीआईपी ऐसे हैं, जिन्होंने बस्तर के जंगलों में जवानों के साथ रात बिताई है? उनकी जीवनचर्या को दिल से महसूस किया है? उनकी पीड़ाओं को समझने की छोटी-सी भी कोशिश की है? उनके साथ भोजन कर उनके सुख-दु:ख में शामिल होने का एक छोटा-सा प्रयास किया है। सरकारी अफसर जाते तो हैं, पर रेस्ट हाउस तक ही सीमित रहते हैं। थोड़ी-सी भी असुविधा उनके लिए बहुत बड़ी पीड़ा बन जाती है। कितने अफसर हैं, जो जमीन से जुड़े हैं, जिन्हें आदिवासियों की तमाम समस्याओं की जानकारी है। उनका निराकरण कैसे किया जाए, इसके लिए उनके पास क्या उत्तम विचार हैं? जवानों को नक्सलियों के सामने भेज देना ठीक वैसा ही है, जैसे शेर के सामने बकरी को भेजना। अत्याधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों के सामने जंग खाई हुई आदिकाल की बंदूकें भला कहाँ तक टिक पाएँगी?
कितना आपत्तिजनक होता है वीआईपी का सफर? जब इनका काफिला चलता है, तो सारे कानून कायदों से ऊपर होकर चलता है। पुलिस के कई जवान इनकी सुरक्षा में होते हैं। इन्हें किसी तरह की तकलीफ न हो, इसलिए पूरे साजो-सामान के साथ इनका काफिला आगे सरकता है। इस दौरान किसी को न तो सुरक्षा जवानों की हालत पर किसी को तरस आता है और न ही उनकी पीड़ाओं पर कोई मरहम लगाता है। अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए उनका एक दौरा कितने के लिए त्रासदायी होता है, यह अभी तक किसी वीआईपी ने जानने की कोशिश नहीं की। ये वीआईपी शायद नहीं जानते कि समस्याओं को जानने के लिए आम आदमी बनना पड़ता है। आम आदमी बनकर ही अपनों की समस्याओं से वाकिफ हुआ जा सकता है। अपराधी को पकड़ने के लिए चुपचाप जाना पड़ता है, न कि चीखती हुई लालबत्ती गाड़ी में। ऐसे में अपराधी तो क्या उसका सुराग तक नहीं मिलेगा।
हाल ही में खरियार रोड में जिस वनकर्मी की लाश मिली, उसके पास नक्सलियों द्वारा लिखा गया पत्र भी बरामद किया गया। पत्र में स्पष्ट लिखा था कि यह वनकर्मी लोगों को नाके पर लूटता था, उनके सामान अपने पास रख लेता था। लोगों के घर तुड़वा देता था, हमने इसे कई बार समझाने की कोशिश की, पर यह नहीं माना। आखिरकार हमने इसे मार डाला। सोचो, आखिर कुछ तो दोष होगा उस वनकर्मी में। उसके खिलाफ रिपोर्ट तक का न होना, इस बात का गवाह है कि उसका आतंक पूरे क्षेत्र में था। उसकी संगत बुरे लोगों से थी। लोग उसके खिलाफ शिकायत नहीं कर पाते थे। जो करता भी था, तो उसका हश्र बहुत ही बुरा होता था। कहाँ गलत हैं नक्सली? जब प्रशासन कुछ नहीं कर पाता, तब ही नक्सली सक्रिय होते हैं। जहाँ प्रशासन अक्षम साबित होता है, नक्सलियों का काम वहीं से शुरू होता है।
छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र कितना मजबूत है, यह तो वहाँ के गृहमंत्री ननकी राम कँवर के उस बयान से ही स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नक्सलियों का खुफिया तंत्र हमारे पुलिस विभाग के खुफिया तंत्र से अधिक मजबूत है। इस तरह से देखा जाए, तो राज्य के गृह मंत्री राज्य की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उन्हंे हमारे खुफिया तंंत्र से अधिक नक्सलियों के खुफिया तंत्र पर भरोसा है। ऐसे बयानों से हमारे जवानों का आत्मबल कम होता है। वे किस बल से जूझ पाएँगे, उन बीहड़ में जहाँ उनका अपना ऐसा कोई नहीं है, जिसे अपनी पीड़ा कह सकें।
देश में जब सुरक्षा बलों की भर्ती होती है, तब उनसे तमाम प्रमाणपत्र माँगे जाते हैं, उनके शरीर का नाप लिया जाता है। उनके परिवार के लोगों की जानकारी ली जाती है। प्रशिक्षण के पहले कई परीक्षाएँ देनी होती हैं। इसके बाद गहन प्रशिक्षण का सिलसिला शुरू होता है। तब कहीं जाकर एक जवान तैयार होता है। लेकिन नक्सली बनने के लिए केवल एक ही योग्यता चाहिए, आपके भीतर पुलिस के खिलाफ कितनी ज्वाला है? इसी ज्वाला को वे लावा बनाते हैं? ताकि वह पुलिस वालों पर जब भी टूटे, लावा बनकर ही टूटे। यदि हमें नक्सलियों के खिलाफ जवान तैयार करने हैं, तो नक्सलियों द्वारा पीड़ित परिवार के सदस्यों को तैयार करना होगा। इनके भीतर की आग को बराबर जलाए रखना होगा, इनकी पूरी देखभाल करनी होगी। इस देखभाल करने में जरा भी चूक हुई कि वह नक्सलियों की शरण में चला जाएगा, फिर वहाँ उसका ऐसा ब्रेनवॉश होगा, जिससे उसे लगेगा कि उनके परिजनों को मारकर नक्सलियों ने ठीक ही किया।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नक्सलियों के खिलाफ जिन्हें भी खड़ा करना है, पहले उसका विश्वास जीतें, फिर पूरे विश्वास के साथ उसे नक्सलियों के सामने भेजें, जवान को भी विश्वास होगा कि इस दौरान यदि मुझे कुछ हो जाता है, तो मेरे परिवार को समुचित सुविधा सरकार देगी। विश्वास की यह नन्हीं सी लौ जलती रहे, तो इसे विश्वास का सूरज बनते देर नहीं लगेगी।
डॉ. महेश परिमल

Saturday, May 15, 2010

जीभ फिसलने का मौसम आया


डॉ. महेश परिमल
इंसान जब गुस्से में होता है, तब जीभ उसका साथ छोड़ देती है। कई बार यही जीभ फिसल जाती है। इसका फिसलना कई बार विवादों को जन्म देता है। विवाद यदि राजनीतिक हों, तो उसे खूब पकाया जाता है। इन दिनों भारतीय राजनीतिज्ञों की जीभ अधिक फिसल रही है। भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी की जीभ क्या फिसली, हाशिए पर चले गए लालू और मुलायम यादव को मानो एक मुद्दा ही मिल गया। अब लालू कहते हैं कि गडकरी कान पकड़कर माफी माँगें और मुलायम तो अदालत की शरण में जाने की बात कह रहे हैं।
राजनेताओं की बेबाक टिप्पणी सदा ही चर्चित रही है। १३ मई को ही मध्यप्रदेश विधानसभा में ऐसी टिप्पणी की गई कि विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी रो पड़े। उधर नीतिन गडकरी को अब लग रहा है कि उन्होंने जिस मुहावरे का प्रयोग किया, उसका गलत अर्थ निकल गया। अब माफी के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं है। पर चारा के नाम से ही दागदार बने लालू यादव तो बिफर ही गए। यह भी सच है कि कई बार वरिष्ठ नेताओं के लिए उन्होंने भी बहुत-कुछ गलत कहा है। पर अब वे सब कुछ भूलकर भाजपाध्यक्ष के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। वैसे भी लालू यादव ही नहीं, बल्कि अमर सिंह, मुलायम यादव, ममता बनर्जी, मायावती आदि सब अपनी बेबाक टिप्पणी के कारण देश में पहचाने जाने हैं। फिर भी इसकी वाणी इतनी संयत तो है ही कि अपशब्द की सीमा पर नहीं पहुँचती। कई बार ये सभी इतने आक्रामक हो जाते हैं कि लगता है अब ये फट ही पड़ेंगे। पर कुछ देर बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है।
शशि थरुर, जयराम रमेश की जीभ भी फिसल चुकी है। जयराम रमेश को इसके लिए प्रधानमंत्री ने लताड़ भी लगाई। शशि थरुर भी अपने विवादास्पद बयानों के लिए पहले काफी चर्चित हो चुके हैं। आईपीएल की जो पोल खुली, उसमें शशि थरुर की यही बयानबाजी ही काम आई। न ललित मोदी उनसे पंगा लेते, न कोई बात सामने आती। वाणी में संयम जहाँ खो जाता है, वहीं से शुरू होता है विवाद। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी जब कोई तीखी टिप्पणी करते हैं, तब सामने वाला जल-भुन जाता है। पर मोदी अपनी वाणी पर इतना अधिक नियंत्रण रखते हैं कि जीभ फिसलती नहीं। शब्दों को कटार के रूप में इस्तेमाल करना कोई नरेंद्र मोदी से सीखे। पर हमारे नेताओं को कौन समझाए? आज जो भाजपाध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं, उनकी वाणी भी संयत नहीं है। वे भी खूब बोलते हैं। पर उनकी बातों का अर्थ वह नहीं निकलता, जो वे चाहते हैं। बड़ी सफाई से ये लोग उसे मीडिया पर दोष देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैँ। आज जिस तरह से संसद में मारा-मारी के दृश्य आम हो गए हैं, उसी तरह ये अपशब्द की संस्कृति कहीं नेताओं का स्थायी भाव न बन जाए। इसका सबको खयाल रखना होगा।
याद कीजिए, जब राम जेठमलानी भाजपा में थे, तब उन्होंने बोफोर्स कांड पर राजीव गांधी से रोज दस सवाल पूछने का सिलसिला शुरू किया था। कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा, पर राजीव गांधी ने कभी इसका जवाब नहीं दिया। जब लोगों ने पूछा, तो राजीव जी ने यही कहा कि कुत्ते भौंकते ही रहते हैं। तब शायद उनकी इस बात को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था। पर आज जो शब्द भाजपाध्यक्ष के माध्यम से सामने आया, तो कई लोगों की बेरोजगारी अचानक ही खत्म हो गई।
जीभ के सहयोग से मुँह से शब्द निकल गया यानी तीर हाथ से निकल गया। यह तो सब जानते हैं, पर कई बार ऐसी स्थिति भी आती है, विशेषकर संसद में, जब एक नेता दूसरे के सामने आवाज तो नहीं निकालता, पर ओठों को मोड़कर कुछ ऐसा अभिनय करता है, जिससे साफ पता चलता है कि वह गाली दे रहा है। पर चूँकि उस समय आवाज नहीं होती, इसलिए कुछ कहना मुश्किल है सामने वाला क्या कह रहा है? कुछ संस्कृतप्रेमी तो कह देते हैं - वराह पुत्र अंजुलिभर जल में निमग्न हो जा। अब इसका अर्थ वह कितने दिनों में समझेगा? यह कहना मुश्किल है? कई बार ऐसी भी स्थिति आती है, जब अच्छे संस्कारी शब्द भी किसी को गाली लगते हैं। वाहन के सामने आने वाले व्यक्ति से कहा गया- महापुरुष जरा हटेंगे! तो व्यक्ति का जवाब था- हट तो रहे हैं, पर गाली क्यों दे रहे हैं? उस महाशय से सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कोई उन्हें महापुरुष कहेगा। यह अप्रचलित शब्द उसे किसी गाली से कम नहीं लगा। अब भला इसे क्या कहा जाए? शब्दों की अपनी सीमा होती है। कई बार ये ऐसे लगते हैं किे साधारण प्रेमी तुलसीदास बन जाता है। कई बार गंभीर घाव कर जाते हैं।
डॉ. महेश परिमल

Friday, May 14, 2010

जजों के फैसलों से मिल सकती है, समाज को नई दिशा


डॉ. महेश परिमल
दिल्ली की एक अदालत ने शपथ लेकर झूठी गवाही देने वाले एक शख्स को अनूठी सजा सुनाई। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के बजाय अदालत ने उसे बतौर प्रायश्चित एक महीने तक महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर प्रतिदिन दो घंटे तक प्रार्थना करने और समाधि स्थल के आसपास की सफाई करने का आदेश दिया। कहना कठिन है कि बापू के समाधि स्थल पर प्रार्थना और सफाई इस व्यक्ति के अंतर्मन को बदल पाएगी या नहीं। फिर भी यह बेहतर प्रयोग है क्योंकि हमारे कानूनों में वर्णित सजाएं और प्रक्रियाएं तो आपराधिक प्रवृत्तियों के लोगों का हृदय परिवर्तन करने में आम तौर पर विफल रही हैं।
वह दृश्य कितना सुखद होगा, जब हम देखेंगे कि एक नेता पूरे एक हफ्ते तक झोपड़पट्टियों में रहकर वहाँ रहने वालों की समस्याओं को समझ रहा है। एक मंत्री ट्रेन के साधारण दर्जे में यात्रा कर यात्रियों की समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहा है और एक साहूकार खेतों में हल चलाकर एक किसान की लाचारगी को समझने की कोशिश कर रहा है। यातायात का नियम तोड़ने वाला शहर के भीड़-भरे रास्तों पर साइकिल चला रहा है। वातानुकूलित कमरे में बैठने वाला अधिकारी कड़ी धूप में खेतों पर खड़े होकर किसान को काम करता हुआ देख रहा है। बड़े-बड़े उद्योगपतियों की पत्नियाँ झोपड़पट्टियों में जाकर गरीबों से जीवन जीने की कला सीख रही हैं। यह दृश्य कभी आम नहीं हो सकता। बरसों लग सकते हैं, इस प्रकार के दृश्य ऑंखों के सामने आने में। पर यह संभव है। यदि हमारे देश के न्यायाधीश अपने परंपरागत निर्णयों से हटकर कुछ नई तरह की सजा देने की कोशिश करें। जल और जुर्माना, यदि तो परंपरागत सा हुई, इससे हटकर भी सजाएँ हो सकती हैं।
कुछ वर्ष पहले एक खबर पढ़ने को मिली कि एक जज ने एक विधायक को सजा के बतौर गांधी साहित्य पढ़ने के लिए कहा। बहुत अच्छा लगा। इसी तरह एक हीरोइन को दिन भर एक अनाथालय में रहने की सजा दी। कितनी अच्छी बात है कि एक विधायक गांधी साहित्य पढ़े और ऐश्वर्ययुक्त हीरोइन दिन भर अनाथालय में रहे। करीब 35 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी दुश्मन। इस फिल्म में ट्रक ड्राइवर नायक से उसकी गाड़ी के नीचे आने से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है, जज उसे मृतक के परिवार को पालने की सजा देते हैं। पहले तो नायक को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, बाद में स्थिति सामान्य हो जाती है। फिल्म के अंत में नायक जज के पाँवों पर गिरकर अपनी सजा बढ़ाने की गुहार करता है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय था। कुछ ऐसी ही कोशिश आज के न्यायाधीशों को करनी चाहिए, जिससे भटके हुए समाज को एक दिशा मिले। कुछ वर्ष पूर्व ही कोलकाता हाईकोर्ट के एक जज अमिताभ लाला अदालत जा रहे थे, रास्ते में एक जुलूस, धरना या फिर रैली के कारण पूरे तीन घंटे तक फँसे रहे। यातायात अवरुद्ध हो गया था, अतएव देर से ही सही, कोर्ट पहुँचते ही उन्होंने सबसे पहला आदेश यह निकाला कि अब शहर में सोमवार से शुRवार के बीच कहीं भी कभी भी धरना, रैली, जुलूस या फिर प्रदर्शन नहीं होंगे। केवल शनिवार या रविवार को ही ऐसे कार्यRम किए जा सकते हैं, वह भी नगर निगम की अनुमति के बाद।
जज महोदय पर जब बीती, तभी उन्होंने आदेश निकाला। अगर वे आम आदमी होते, तो शायद ऐसा नहीं कर पाते। यह प्रजातंत्र है, यहाँ आम आदमी की पुकार अमूमन नहीं सुनी जाती। कहा भले ही जाता हो, पर सच्चाई इससे अलग है। मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि एक आम आदमी का प्रतिनिधि विधायक या सांसद बनते ही वीआईपी कैसे हो जाता है? आम से खास होने में उसे जरा भी देर नहीं लगती। खास होते ही उसे आम आदमी की पीड़ा से कोई वास्ता नहीं होता। क्या वोट देकर वह अपने हक से भी वंचित हो जाता है? उसका प्रतिनिधि सुविधाभोगी कैसे हो जाता है?
ऐसे लोग यदि किसी प्रकार का गुनाह करते हैं, तो उनके लिए जज यह फैसला दे कि उसे लगातार एक महीने तक ट्रेन के साधारण दर्जे में यात्रा करनी होगी या फिर सड़क से उसके गाँव तक पैदल ही जाना होगा। किसी दौलतमंद को सजा देनी हो, तो उसे दिन भर किसी झोपड़पट्टी इलाके में रहने की सजा दी जाए, खेत में हल चलाने की सजा दी जाए। इस तरह लोग आम आदमी की तमाम समस्याओं से बेहतर वाकिफ होंगे। उन्हें यह समझ में आएगा कि वास्तव में बुनियादी समस्याएँ क्या हैं?
अमिताभ लाला ने जब भुगता, तभी आम आदमी की समस्याएँ समझ में आई। इसके पहले उसी कोलकाता में न जाने कितनी बार बंद का आयोजन हुआ होगा, धरना आंदोलन हुआ होगा, इन सब में आम आदमी की क्या हालत हुई होगी, यह इसके पहले किसी ने भी समझने की कोशिश नहीं की। वैसे भी अमीरों के सारे चोचलों में बेचारे गरीब ही मारे जाते हैं, जो मजदूर रोज कमाते-खाते हैं, उनके लिए ऐसे कार्यRम भूखे रहने का संदेशा लेकर आते हैं। अनजाने में वे उपवास कर लेते हैं।
मनुष्य की प्रवृत्ति होती है, बहाव के साथ चलना। जो बहाव के साथ चलते हैं, उनसे किसी प्रकार के नए कार्य की आशा नहीं की जा सकती है। किंतु जो बहाव के खिलाफ चलते हैं, उनसे ही एक नई दिशा की आशा की जा सकती है। कुछ ऐसा ही प्रयास पूर्व में कुछ हटकर निर्णय देते समय जजों ने किया है। अगर ये जज हिम्मत दिखाएँ, तो कई ऐसे फैसले दे सकते हैं, जिससे समाज को एक नई दिशा मिल सकती है। आज सारा समाज उन पर एक उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है। आज भले ही न्यायतंत्र में ऊँगलियाँ उठ रही हों, जज रिश्वत लेने लगे हों, बेनाम सम्पत्ति जमा कर रहे हों, ऐसे में इन जजों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए, जब वे भी एक साधारण आरोपी की तरह अदालतों में पेशी के लिए पहुँचेंगे, तब उन्हें भी समझ में आ जाएगा कि न्याय के खिलाफ जाना कितना मुश्किल होता है?
अब समाज की न्याय व्यवस्था वैसी नहीं रही, जब खून का बदला खून जैसा जंगल का कानून चलता था। लोग अब भी न्याय व्यवस्था पर विश्वास करते हैं। न्याय के प्रति उनकी आशा जागी है। कानून तोड़ने वाले अब भी कानून तोड़ रहे हैं, लेकिन जो इस बात पर विश्वास करते हैं, वे अब भी कानून के दायरे में रहकर गुज़ारा कर लेते हैं। यदि संवेदनशील जज चाहें, तो अपने फैसलों से समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं। उनके ये फैसले जमीन से जुड़ाव पैदा करने में मदद करेंगे। अब यह जजों पर निर्भर करता है कि वे क्या करना चाहते हैं।
डॉ. महेश परिमल

Wednesday, May 12, 2010

मुस्लिम समाज की अनुकरणीय पहल


डॉ. महेश परिमल
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर वह हमेशा अपने स्वार्थ से सधे काम ही करता रहता है। आजकल लोगों के पास समय ही इतना कम है कि वह समाज सेवा चाहकर भी नहीं कर पाता। कई सामाजिक संस्थाएँ हैं, जो कथित रूप से समाज सेवा करती हैं। कथित रूप से इसलिए कि वह पहले अपने द्वारा किए जा रहे कार्यो का प्रचार-प्रसार करती हैं। फिर काम करती हैं। ऐसे कार्य प्रचारित तो खूब होते हैं, पर जमीनी हकीकत से दूर होते हैं। इसके अलावा बहुत से कार्य ऐसे होते हैं, जिसके लिए किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में जिन कार्यो के लिए प्रचार-प्रसार की आवश्यकता होती हो, उनका उद्देश्य समाज-सेवा हो ही नहीं सकता।
अभी कुछ दिनों पहले ही यह जानने का मौका मिला कि इंदौर के मुस्लिम समुदाय ने रास्ते में आने वाली करीब सौ साल पुरानी दरगाह को खुद ही हटा ली। उन्हें लगा कि रास्ते में आने वाली यह दरगाह आवागमन में बाधा पहुँचा रही है। इससे शहर का विकास अवरुद्ध हो रहा है। उन्हें लगा कि शहर के विकास से बढ़कर धर्म नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं से बढ़कर विकास है। उनकी इसी भावना ने एक ऐसी मिसाल दी है, जिससे अन्य समाज को प्रेरणा लेनी चाहिए। समाज ने गुम्बद इस तरह हटाया गया कि मजार को क्षति न पहुँचे।
हमारे देश में ऐसे कई धार्मिक स्थल हैं, जो सड़क किनारे हैं, या फिर सड़क के बीचों-बीच, इनसे यातायात कितना अवरुद्ध होता है, यह सब जानते हैं, पर बोल कोई नहीं पाता। प्रशासन भी इस दिशा में कहीं न कहीं पक्षपात करता है। हाल ही में भोपाल के जे के रोड से अतिक्रमण हटाया गया, पर वहाँ स्थित मंदिर पर एक खरोंच तक नहीं आई। वह अब भी कायम है। देखा जाए, तो सबसे पहले उसी मंदिर को हटाया जाना था। क्यांेकि जब मंदिर बनने की शुरुआत हुई, तब वहाँ एक छोटा-सा पत्थर रखा गया, धीरे-धीरे उस क्षेत्र का आकार बढ़ने लगा। फिर मूर्ति स्थापना, मंदिर, चबूतरा आदि सब-कुछ बनने के बाद पुजारी के लिए घर भी बनने लगा। तब तक प्रशासन की उस ओर दृष्टि नहीं गई। जब मंदिर ने विस्तार प्राप्त कर लिया, तो उसे हटाने के विरोध में कई धार्मिक संस्थाएँ सामने आने लगी। देखा जाए, तो इसी तरह के मंदिर के कारण सड़क किनारे अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता है।
इंदौरमें कुछ दिनों पहले करीब 100 साल पुरानी एक दरगाह को रविवार को जिला प्रशासन ने स्थानांतरित कर दिया। संभवत: यह पहला मौका है, जब मुस्लिम समाज के किसी उपासना स्थल को हटाया गया है। यह कार्रवाई व्हाइट चर्च मार्ग पर कृषि महाविद्यालय से पीपल्याहाना चौराहे के बीच की गई। 15 घंटे से अधिक की मशक्कत के बाद दरगाह को बिना क्षति पहुँचाए पास में ही स्थानांतरित कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि दंदौर में सड़कों के चौड़ीकरण में कई धर्मस्थल बाधक हैं। इस कारण बीआरटीएस सहित कई मागोर्ं के निर्माण संबंधित क्षेत्रों में रुके हुए हैं। कुछ दिन पूर्व ही प्रशासन ने उक्त क्षेत्र में स्थित मंदिर की दीवार भी हटाई थी। इस मार्ग को 80 फुट चौड़ा बनाया जा रहा है। इस मार्ग पर अभी कई मंदिर तथा मकान हटाए जाने हैं। व्हाइट चर्च चौराहे से कृषि महाविद्यालय तक मार्ग बन चुका है, लेकिन इसके बाद का कार्य धर्मस्थलों के पास जाकर रुक गया था। कलेक्टर ने दरगाह को स्थानांतरित करने की योजना बनाई। उनके निर्देश पर एसडीएम विवेक श्रोत्रिय ने करीब पंद्रह दिनों में क्षेत्र के मुस्लिम समाज के लोगों के साथ कई बैठकें कीं। अंतत: सभी लोगों ने शहर के विकास के लिए दरगाह हटाने हेतु सहमति दे दी।
अमूमन मुस्लिम समुदाय को दकियानूसी समझा जाता है। पर इंदौर में इस समाज ने जिस तरह से अपनी प्रगतिशीलता का परिचय दिया है, उससे अन्य समाज भी इसी तरह के कार्यो में सामने आएँ, तो समाज को एक नई दिशा मिल सकती है। देखा जाए, तो इसी तरह के छोटे-छोटे कार्यो से ही समाज की पहचान बनती है। रास्ते में धार्मिक स्थल बनाना आसान है, पर स्वयं उसे हटाना बहुत ही मुश्किल है। मुझे यह समझ में नहीं आता है कि शोर-शराबे से घिरे हुए धार्मिक स्थलों पर पहुँचकर मनुष्य किस तरह की शांति प्राप्त करता है? सड़क का शोर-शराबा, उस पर मंदिर पर लगे ध्वनि विस्तारक यंत्रों से से होने वाला शोर। क्या इस शोर में शांति की तलाश करते हैं हम? जितना समय हम इन धार्मिक स्थलों पर जाकर बिताते हैं, उतना समय यदि हम अपने परिवार को देंगे, तो हम परिवार के अधिक निकट हो सकते हैं। अपनों के निकट हो सकते हैं। आजकल इन्हीं मंदिरों से रोज ही चीख-चीखकर गाने और चिल्लाने की आवाज ध्वनि विस्तारक यंत्रों के माध्यम से आती रहती है। क्या प्रशासन इस पर रोक नहीं लगा सकता? वैसे भी शहरों में धार्मिक स्थलों से होने वाले शोर और सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों के शोर पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही कह दिया है। पर उस पर अभी तक अमल नहीं हो रहा है। न राज्य सरकार, न प्रशासन और न ही सामाजिक संस्थाएँ। धार्मिक स्थलों से ध्वनि विस्तारक यंत्रों को पूरी तरह से निकाल दिया जाना चाहिए। विदेशों में तो ऐसा नहीं होता। कई मामलों में विदेशों की नकल करने वाले हम आखिर इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि ये शोर हमें ही नहीं, बल्कि हमारी संतानों पर बुरा असर डाल रहे हैं। डीजे के माध्यम से पार्टियों में इन दिनों कुछ अधिक ही शोर हो रहा है, यह पुलिस प्रशासन की लाचारी का उदाहरण है।
कभी अस्पताल का दौरा कर लें, या स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट का अवलोकन कर लें, आप पाएँगे कि इन दिनों ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिन्हें सुनने में तकलीफ होती है, या वे ऊँचा सुनते हैं। ये आज की पीढ़ी है, यदि शोर पर काबू नहीं पाया गया, तो अगली पीढ़ी अपनी मां की लोरी सुनने से वंचित रह जाएगी, यह तय है। शोर लगातार हमें आक्रामक बना रहा है, हमारे सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर कर रहा है। हमें अपनों से दूर कर रहा है। इन बातों को हमें ही समझना होगा। शोर चाहे घर के इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों का हो, या फिर धार्मिक स्थलों से होने वाला, शोर हर तरह से शरीर को नुकसान ही पहँुचाता है। शोर से हम धार्मिक स्थलों को अपवित्र कर रहे हंैं। मंदिर ने हमारे देश में सैकड़ों जानें ली हे, वह मुद्दा भले ही कितना भी राजनैतिक क्यों न हो, पर मंदिर का सड़क पर होना कभी समाज के लिए अच्छा नहीं हो सकता। जैसे हर चीज का अपना स्थान होता है, वैसे ही मंदिर का भी अपना स्थान होता है। सड़क आवागमन का साधन है, इस पर अवरोधक के रूप में जो भी हो, उसे हटाना समाज का ही काम है, फिर वह मंदिर, दरगाह, चर्च या फिर कोई आवारा पशु की क्यों न हो?
सड़क गति का सूचक है। इसकी गतिशीलता ही इसकी पहचान है। जिस सड़क पर जाम अधिक होता है, उस पर लोग चलना कम कर देते हैं। जाम यानी शहर का अवरुद्ध होता विकास। शहर का विकास यानी व्यक्ति का विकास। इसलिए सड़क पर जाम होने का कारण जो भी हो, उसे दूर किया ही जाना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

Tuesday, May 11, 2010

मांसाहार से हो सकता है गठिया


मांसाहार मनुष्य का प्राकृतिक आहार नहीं है। जो लोग मांसाहार करते हैं. उनके रक्त में यूरिक एसिड अधिक मात्ना में बनता है. जिससे उनमें गठिया. मूत्न संबंधी विकार और अन्य बीमारियां होने की संभावना रहती है। वास्तव में मनुष्य को जिन तत्वों की संतुलित मात्ना में जरूरत होती है. उनकी पूíत शाकाहार से हो जाती है। मांस में जिन तत्वों को पौष्टिक बताया जाता है. उनमें यूरिक एसिड की अधिकता पाई जाती है। यही यूरिक एसिड शरीर में जमा होकर गठिया और मूत्न संबंधी विकारों के अलावा रक्त विकार. हृदय रोग. क्षय रोग. अनिद्रा. रक्तचाप.यकृत रोग आदि अनेकानेक बीमारियों को जन्म देता है। मांस में मौजूद चर्बी और कोलेस्ट्रोल की अत्यधिक मात्ना मांसाहारी व्यक्ति के शरीर की रक्त धमनियों की आंतरिक भित्तियों में जमा होकर उन्हें संकरा बना देती है.जिससे रक्त संचार में बाधा उत्पन्न होती है। पशुओं से प्राप्त वसा और घी.मक्खन. मांस. मछली. अंडे में मौजूद वसा रक्त कोलेस्ट्रोल की मात्ना को शीघ्रता से बढाती है. जिससे उच्च रक्तचाप की स्थिति बनने लगती है। यहां तक कि मस्तिष्क में रक्तस्राव होकर पक्षाघात तथा हृदय के रक्त में बाधा से हृदय शूल और हृदयाघात तक हो सकता है। पित्ताशय में ज्यादातर पथरियां कोलेस्ट्रोल से बनती हैं। यदि व्यक्ति अपने आहार में कोलेस्ट्रोल की मात्ना कम कर ले तो वह पित्ताशय के रोगों से बच सकता है। मनुष्य के स्वस्थ गुर्दे प्रतिदिन सात ग्रेन की मात्ना में ही यूरिक एसिड का उत्सर्जन कर पाते हैं लेकिन मांसाहार से यूरिक एसिड की ज्यादा मात्ना हो जाने पर गुर्दो पर अतिरिक्त दबाव पडने लगता है. जिससे उनमें पथरी बनने लगती है या उसकी कोशिकाओं में सूजन उत्पन्न होने लगती है। यदि अधिक समय तक यह स्थिति बनी रहती है तो गुर्दे काम करना भी बंद कर सकते हैं। वास्तव में मांस मनुष्य का भोजन नहीं है। उसके शरीर. दांत और आहार नली की संरचना भी मांसाहारी जीवों की आंतों की रचना से मेल नहीं खाती है। शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य की छोटी और बडी आंत की लंबाई उसके शरीर की लंबाई से चार गुना से भी ज्यादा होती है। मनुष्य के दांत मांसाहारी जीवों की तरह नुकीले नहीं होते हैं. जिससे वे मांस काट सकें।

मनुष्य का लार टायलिन की उपस्थिति के कारण क्षारीय होता है जिससे काबरेहाइड्रेट का पाचन सुगमता से होता है जबकि मांसाहारी जीवों का लार अम्लीय होता है। साथ ही मांसाहारी जीवों के जठर रस में अम्ल की मात्ना मनुष्य की तुलना में चार गुना अधिक होती है ताकि मांस में मौजूद प्रोटीन की अधिक मात्ना का पाचन सरलता से हो सके। मांसाहार पेट संबंधी विभिन्न संक्रमण रोगों के लिए भी जिम्मेदार होता है। वैसे भी मृत शरीर में विभिन्न जीवाणु सक्रिय होकर शरीर की कोशिकाओं का विघटन तथा कैटाबोलिज्म प्रारंभ कर देते हैं. जिससे एक तरफ जीवाणुओं की संख्या में बडी तेजी से वृद्धि होने लगती है और दूसरी तरफ विभिन्न जहरीले और हानिकारक पदार्थो का निर्माण होने लगता है। इनमें कई ऐसे पदार्थ होते हैं. जो मांस को सामान्य रूप से पकाते समय नष्ट नहीं होते हैं। मांस के लिए अक्सर ऐसे जानवरों की भी हत्या की जाती है. जो रोगग्रस्त होते हैं या जिनमें रोग के जीवाणु पल रहे होते हैं। इस तरह दूषित मांसाहार के जरिए रोगाणु या जहरीले हानिकारक पदार्थ शरीर में पहुंचकर रोग का कारण बनते हैं। मांस में मौजूद प्रोटीन की अधिक मात्ना को पाचन के लिए जठर पाचक रस और अम्ल की अधिक मात्ना की आवश्यकता पडती है। इसलिए मांसाहारी व्यक्तियों में अम्ल का स्राव अधिक मात्ना में होता है. जिससे आमाशय और ग्रहणी की श्लेष्मिक कला में मौजूद अम्ल में सुरक्षा प्रदान करने वाला तंत्न धीरे.धीरे कमजोर पडने लगता है और आमाशय व्रण तथा ग्रहणी व्रण होने की संभावना बढने लगती है।

गुलशन अरोडा

Monday, May 10, 2010

देशी नार्को टेस्ट पर तो रोक नहीं लगी है ना



डॉ. महेश परिमल
कोर्ट ने कसाब को आखिर फाँसी की सजा सुना ही दी। इसके बाद भी फाँसी का फंदा कसाब की गर्दन से बरसों दूर है। कसाब तो उम्र में काफी छोटा है, इस देश में इससे भी शतिर अपराधी हुए हैं, जो किसी भी प्रताडऩा से टूटते नहीं हैं। गुजरात के दंगों के बाद से इस देश में नार्को टेस्ट की शुरुआत हुई। आज यह अपने बदले हुए स्वरूप में है। लेकिन ऐसे बहुत से मामले हैं, जिसमें इस टेस्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब यदि इसे अपराधी पर ही छोड़ दिया जाए कि वह नार्को टेस्ट से गुजरना चाहता है या नहीं, तो यह तय है कि शातिर अपराधी यह कभी नहीं चाहेगा कि उसके भीतर का राज बाहर आए। वैसे जिन मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिका के संदर्भ में सुप्रीमकोर्ट ने यह निर्णय दिया है, वे संस्थाएँ जरा अपने आसपास ही देख लें, जहाँ रोज ही मानव अधिकारों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है। सुप्रीमकोर्ट के एक नहीं अनेक निर्णय आज भी अमल में नहीं लाए जा रहे हैं। पुलिस थानों में आज भी जो देशी नार्को टेस्ट होते हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। पर अपराधियों को तोडऩे के लिए कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा, जिससे उनके भीतर का सच बाहर आ सके।
कानून होता ही है अपराधियों को सजा देने के लिए। पर जब उसी कानून का सहारा लेकर अपराधी सजा से बचने लगे, तो फिर कानून का क्या मतलब? कुछ ऐसी ही आशंकाएँ प्रकट की जा रहीं हैं, नार्को टेस्ट को लेकर सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को लेकर। सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि अब किसी भी अपराधी का नार्को टेस्ट उसकी अनुमति के बिना नहीं लिया जा सकता। अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि बिना इजाजत किसी व्यक्ति के नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग परीक्षण नहीं किया जा सकता। इसे गैरकानूनी घोषित करके सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों की निजी स्वतंत्रता और निजता के अधिकार की रक्षा की है, जो हमारे संविधान में बुनियादी अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। जांच एजेंसियों के लिए संदेश यह है कि वे जांच के तौर-तरीकों में ज्यादा कुशाग्रता व दक्षता लाएं। वे अक्सर घटनाओं की पड़ताल में घोर लापरवाही बरतती हैं और फिर उसकी भरपाई संदिग्ध व्यक्तियों के नार्को जैसे परीक्षणों से करती हैं। मुकम्मल जांच हो तो इन परीक्षणों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, जो वैसे भी प्रमाण के तौर पर वैध नहीं माने जाते।
अदालत ने आदेश दे दिया है, इस पर अब अमल भी शुरू हो जाएगा। पर इस फैसले का सबसे अधिक लाभ शातिर अपराधी ही उठाएँगे, यह तय है। यह सभी जानते हैं कि जब भी कोई बड़ा अपराधी पकड़ा जाता है, तो उससे सच उगलवाने के लिए नार्को टेस्ट किया जाता है। इससे अपराध की कई कडिय़ाँ जुड़ जाती हैं। इसे सभी स्वीकारते हैं कि यदि अबू सलेम और करीम तेलगी का नार्को टेस्ट न किया जाता, तो वह एक शब्द भी नहीं बोल पाते। इसी नार्को टेस्ट ने ही कई राज खुलवाए हैं। अपराधी यदि शातिर हो, तो अपनी ओर से पूरी कोशिश करता है कि सारी बातें छिपा ली जाएँ। पर नार्को टेस्ट पर उसका बस नहीं चलता। वह सच उगल देता है। उनका यही सच कई रहस्यों को उजागर करता है। लेकिन अब कोई भी अपराधी यह नहीं चाहेगा कि उसका नार्को टेस्ट हो। वह सच छिपा ले जाएगा। आतंकवाद से जुड़े कई रहस्य परदे के पीछे ही रह जाएँगे।
यह मामला मानवाधिकार का पोषण करने वाली अनेक संस्थाओं के प्रयासों से सामने आया है। ये संस्थाएँ यदि अपने ही आसपास नजर डालें, तो उनके सामने रोज ही मानव अधिकारों का हनन होने की घटनाएँ दिख जाएँगी। परिवार के साथ आप यदि कहीं जा रहे हों और आपका स्कूटर बिगड़ जाए, ऐसे में उसे मेकेनिक के पास ले जाना वाजिब हो, वहाँ पर मेकेनिक के नाम पर एक छोटा बच्चा मिलेगा, जिसमें यह क्षमता होती है कि वह आपका स्कूटर ठीक कर देगा। इस वक्त क्या आप यह सोचेंगे कि यह तो बाल श्रमिक है, इससे काम करवाना कानून के खिलाफ है। उस समय आपकी सबसे बड़ी जरुरत बिगड़ा स्कूटर बनवाना है। स्रुप्रीमकोर्ट ने तो कह दिया है कि शाम छह बजे के बाद होने वाले शोर पर नियंत्रण हो, पर क्या वह हो पा रहा है? सड़क किनारे ठेलो, गुमटियों पर बिकने वाली खाद्य सामग्री पर रोक लगाए तो बरसों हो गए, क्या उस पर अमल हो पाया? वाहनों में लगने वाले तेज आवाज करने वाले हार्न पर तो कब का प्रतिबंध लग चुका है, क्या आपने सचमुच कई बरसों से प्रेशन हार्न की आवाज नहीं सुनी? ऐसे कई निर्णय हैं, जो आज तक अमल में नहीं लाए जा सके हैं। फिर भी यदि सुप्रीमकोर्ट ने नार्को टेस्ट पर प्रतिबंध लगाया है, तो इसका स्वागत करना ही होगा। इसके बाद भी अपराधियों पर देशी नार्को टेस्ट पर तो रोक नहीं लगाई गई है। अपराधी न मानें, तो इस देशी टेस्ट के लिए भला कौन रोक सकता है? जाते-जाते यह भी जान लें कि आखिर क्या हैं, ये या है नार्को, पोलीग्राफ, और ब्रेन-मैपिंग टेस्ट!
क्या है नार्को, पोलीग्राफ, और ब्रेन-मैपिंग टेस्ट!
नार्को-परीक्षण में संदिग्ध से महत्वपूर्ण जानकारियां निकलवाने के लिए उसकी शिराओं के भीतर कृत्रिम निद्रावस्था की दवाएं (ट्रूथ ड्रग्स) दी जाती हैं। पोलीग्राफ को लाई डिटेक्ट टेस्ट या झूठ पकडऩे वाले परीक्षण के रूप में जाना जाता है। इसमें संदिग्ध से प्रश्नों की एक श्रृंखला पूछे जाने के दौरान उसमें होने वाले दैहिक परिवर्तनों जैसे रक्तचाप, नाड़ी, श्वसन और त्वचा संबंधी बदलावों पर नजर रखी जाती है। जब संदिग्ध प्रश्नों के भ्रामक या गलत जवाब देता है तो उसकी इन शारीरिक गतिविधियों में जो बदलाव देखे जाते हैं, वे सही जवाब देते समय होने वाले बदलावों से अलग होते हैं।
ब्रेन-मैपिंग में मस्तिष्क में उठने वाली विभिन्न आवृत्तियों की तरंगों का अध्ययन किया जाता है। परीक्षण में अपराध शाखा के विशेषज्ञ तंत्रिका विज्ञान की विभिन्न तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। अपराध के दृश्यों को पहचानने वाले संदिग्ध के मस्तिष्क की तरंगों में जो परिवर्तन देखे जाते हैं वे निर्दोष व्यक्ति के मस्तिष्क की तरंगों से अलग होते हैं।
ब्रेन-मैपिंग में व्यक्ति के सिर से सेंसर्स को जोड़ दिया जाता है और उसे एक कंप्यूटर के सामने बिठा दिया जाता है। इसके बाद संदिग्ध को अपराध से जुड़ी तस्वीरें दिखाई जाती हैं या उससे जुड़ी ध्वनियां सुनाई जाती हैं। सिर से जुड़े सेंसर तस्वीरों को देखते समय या ध्वनियां सुनते समय मस्तिष्क में उठने वाली तरंगों को दर्ज कर लेते हैं।
डॉ. महेश परिमल

Friday, May 7, 2010

मॉं

माँ पर श्री अनिल गोयल, भोपाल की कुछ कवितायेँ ....... पढने, समझने और कुछ करने के लिए


















Thursday, May 6, 2010

कसाब की सजा सवालों के सलीब पर


डॉ. महेश परिमल
सभी की निगाहें आज अदालत के उस फैसले की ओर लगी हुई है, जहाँ २६/११ के आतंकी कसाब के भविष्य का निर्णय करेगी। देखा जाए, तो कसाब को फाँसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वही उसे मिलनी चाहिए। वह एक दरिंदा है, जो लोगों को तड़पता और मरता देखकर खुश होता है। वह एहसानफरामोश है, जो भला करता है, उसी की हत्या करने में भी देर नहीं करता। सवाल यह उठता है कि आखिर हम आतंकवादियों को क्यों पालते हैं? अफजल गुरु ही नहीं, ऐसे बीस आतंकी हमारे देश में हैं, जिनका गुनाह तो सिद्ध हो चुका है, सजा भी हो चुकी है, पर हम उन्हें सजा नहीं दे पा रहे हैं। कसाब को लेकर भी कई तरह की चर्चाएँ हैं, जिसका उत्तर सरकार को देना है। आज कसाब की सजा सवालों के सलीब पर है, क्यों न इस मामले में जो भी सजा मुकर्रर हो, उसे तत्काल ही अमल में लाया जाए।
फाँसी से भी बड़ी कोई सजा हो सकती है क्या? आज हर तरफ २६/११ के आतंकी आमिर अजमल कसाब को दी जाने वाली सजा की ही चर्चा है। इस सजा से कई सवाल और खड़े हो गए हैं। आज देश का बच्च-बच्च यही चाहता है कि फाँसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह कसाब को मिलनी चाहिए। क्योंकि कसाब के लिए फाँसी तो बहुत ही छोटी सजा है। उसने जो अपराध किया है, वह दरिंदगी की सीमाओं को पार करता है। करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का यदि सम्मान किया जाए, तो कसाब को सजा देने के लिए जितना समय लगा, उससे भी कम समय में उसे फाँसी हो जानी चाहिए। कसाब को फाँसी की सजा से यह संदेश जाना चाहिए कि अब भविष्य में कोई भी आतंकी अपने काम को अंजाम देने के पहले सौ बार सोचे। लेकिन कसाब को दी गई सजा में विलम्ब और उस पर अमल को लेकर अभी भी लोगों में संशय है।
कसाब को लेकर जो सबसे अधिक चिंता की बात है, वह यह कि कसाब को सजा सुनाने में आखिर इतना वक्त कैसे लग गया? क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि देश के दुश्मन को भी सजा देने में इतना समय लगाया जाए। सच्च न्याय तो वही होता है, जो समय पर मिले। देर से मिलने वाले न्याय का कोई महत्व नहीं होता। जब सजा सुनाने में इतना समय लग सकता है, तो उस पर अमल करने में आखिर कितना समय लगेगा?
संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फाँसी की सजा सुनाने में बरसों बीत गए, इसके बाद भी वह जिंदा है। उसे फाँसी पर लटकाने में केंद्र सरकार साँसत में है। वह इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। जब यह बात जोर-शोर से उठी कि अफजल को फाँसी क्यों नहीं दी जा रही है, तो सरकार का कहना था कि अफजल गुरु क आगे फाँसी की सजा पाने वाले करीब २क् लोग और भी हैं। जब अफजल की बारी आएगी, तो उसे फाँसी दे दी जाएगी। सोच लो, जब फाँसी की सजा सुनाने के बाद अफजल इतने वर्षो तक जिंदा रह सकता है, तो फिर कसाब के जीवन की रेखा कितनी लंबी होगी?
कसाब को फाँसी की सजा होना यह अंत नहीं है। फिर कोई आतंकवादी ऐसी हिम्मत न कर पाए, यह कोशिश होनी चाहिए। ऐसे हमले निष्फल हो जाएँ, इसकी मंशा भी सजा में होनी चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब अगर पड़ोसी देश से आतंकवादी हमारे देश में घुसते हैं, तो उन्हें इस बात का डर होना चाहिए कि यदि यहाँ पकड़े गए, तो वह जिंदगी मौत से भी बदतर होगी। लेकिन हमारे न्यायतंत्र की प्रक्रिया को देखकर ऐसा नहीं लगता कि आतंकवादी हमारी न्याय व्यवस्था से डरेंगे। अब आतंकवादी यह अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि भारत में किसी भी प्रकार की आतंकी कार्रवाई की भी जाए, तो उसका फैसला देर से होता है और उस पर अमल होने में तो और भी देर होती है। तब तक जिंदगी के पूरे मजे ले लो।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इन आतंकवादियों पर हमारे देश का कितना धन बरबाद हो रहा है। २६/११ के दौरान जो आतंकवादी हमारे देश में घुस आए थे, कसाब को छोड़कर सभी मारे गए। इन आतंकवादी की लाशें अभी तक सुरक्षित रखी हुईं हैं, इन पर अभी तक करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। कसाब के इलाज पर भी अब तक लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं। इन लोगों पर देश का जितना धन खर्च हुआ है, उतना तो २६/११ के दौरान मारे गए लोगों को मुआवजे के रूप में नहीं मिला है। कसाब के खिलाफ फैसला देने में कुल २७१ दिन लगे, इस दौरान कागजी कार्रवाई में ही लाखों रुपए खर्च हो गए। अंडा सेल इतनी मजबूत है कि विस्फोटक से भरा ट्रक भी इससे टकरा जाए तो यह नहीं टूटती। लगभग एक करोड़ खर्च करके जेजे अस्पताल में कसाब के लिए बुलेटप्रूफ सेल बनवाई गई है जहां उसका इलाज हो सके। हालांकि, कसाब को स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर स्वयं अस्पताल आते थे। घायल कसाब का इलाज 16 से 24 डॉक्टर करने में लगे थे। कसाब की सुरक्षा में भी लाखों खर्च हो रहे हैं। कसाब के खाने-पीने, वकील और इलाज में लाखों खर्च हो चुके हैं।
कसाब को भले ही विशेष अदालत ने दोषी मान लिया हो, लेकिन अभी केस और लंबा लटक सकता है। सरकारी वकील उज्जवल निकम ने भी कहा है कि केस अभी लंबा खिंच सकता है। कसाब के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प है और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट अगर उसे मौत की सजा सुना भी देती है तो वह राष्ट्रपति के पास मौत से बचने के लिए दया याचिका लगा सकता है। यानी स्वयं पर करोड़ांे खर्च करा चुका कसाब अभी और पैसा खर्च करवाएगा।
हमे शर्म आनी चाहिए कि इस देश में वीरों से अधिक सम्मान तो आतंकवादियों को मिलता है। आतंकवादियों को दी जाने वाली सुविधा के सामने सीमा पर तैनात हमारे जाँबाजों को मिलने वाली सुविधा तो बहुत ही बौनी है। आखिर आतंकवादियों हमारे लिए इतने अधिक महत्वपूर्ण क्यों होने लगे? कसाब को मिलनी वाली तमाम सुख-सुविधाओं को देखते हुए आम युवाओं में यही संदेश जाएगा कि देश का सैनिक बनने से तो बेहतर है, आतंकवादी बनना। मौत कितनी भी भयानक हो, पर जिंदगी तो बहुत ही खुशगवार होगी। युवाओं की इसी तरह की सोच के ही कारण आज देश के युवा भटक रहे हैं। देश के लिए सबसे शर्म की बात तो तब सामने आई, जब सेना में भर्ती के लिए सरकार ने विज्ञापन प्रकाशित किए। यह विज्ञापन नहीं, देश के युवाओं में जमे हुए रक्त का हस्ताक्षर है। आज कोई युवा सेना में जाना ही नहीं चाहता। मोहल्ले, कस्बे में थोड़ी सी नेतागिरी से ही इतनी आय तो हो ही जाती है, जो एक सैनिक की आय तो बहुत ही अधिक होती है।
डॉ. महेश परिमल

Wednesday, May 5, 2010

अब तक का सारा इतिहास वर्ग संघर्ष का है- कार्ल मार्क्‍स



कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन पर विशेष

फ्रेडरिक एंगेल्स

विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपना नाम अमर किया है, उनमें से हम यहाँ दो का ही उल्लेख कर सकते हैं।
पहली तो विश्व इतिहास की सम्पूर्ण धारणा में ही वह क्रान्ति है, जो उन्होंने सम्पन्न की। इतिहास का पहले का पूरा दृष्टिकोण इस धारणा पर आधारित था कि सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों का मूल कारण मनुष्यों के परिवर्तनशील विचारों में ही मिलेगा और सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों में सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन ही हैं तथा सम्पूर्ण इतिहास में उन्हीं की प्रधानता है। लेकिन लोगों ने यह प्रश्न न किया था कि मनुष्य के दिमाग़ में ये विचार आते कहाँ से हैं और राजनीतिक परिवर्तनों की प्रेरक शक्तियाँ क्या हैं। केवल फ्रांसीसी और कुछ-कुछ अंग्रेज़ इतिहासकारों की नवीनतर शाखा में यह विश्वास बरबस प्रविष्ट हुआ था कि कम से कम मध्ययुग से, सामाजिक और राजनीतिक प्रभुत्व के लिए उदीयमान पूँजीपति वर्ग का सामन्ती अभिजात वर्ग के साथ संघर्ष यूरोप के इतिहास की प्रेरक शक्ति रहा है। मार्क्‍स ने सिद्ध कर दिया कि अब तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है, अब तक के सभी विविधरूपी और जटिल राजनीतिक संघर्षों की जड़ में केवल सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्या, पुराने वर्गों द्वारा अपना प्रभुत्व बनाये रखने तथा नये पनपते हुए वर्गों द्वारा इस प्रभुत्व को हस्तगत करने की समस्या ही रही है। लेकिन इन वर्गों के जन्म लेने और कायम रहने के कारण क्या हैं? इनका कारण वे शुद्ध भौतिक, गोचर परिस्थितियाँ हैं, जिनके अन्तर्गत समाज किसी भी युग में अपने जीवन-यापन के साधनों का उत्पादन और विनिमय करता है। मध्ययुग के सामन्ती शासन का आधार छोटे-छोटे कृषक समुदायों की स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था था, जो अपनी ज़रूरत की प्रायः सभी चीज़ों का स्वयं उत्पादन कर लेते थे। इनमें विनिमय का प्रायः पूर्ण अभाव था, शस्त्रधारी सामन्त बाहर के आक्रमणों से इनकी रक्षा करते थे, उन्हें जातीय या कम से कम राजनीतिक एकता प्रदान करते थे। नगरों के अभ्युदय के साथ अलग-अलग दस्तकारियों और परस्पर व्यापार का विकास हुआ जो पहले आन्तरिक क्षेत्र में सीमित था और आगे चलकर अन्तरराष्ट्रीय हो गया। इस सबके साथ नगर के पूँजीपति वर्ग का विकास हुआ और मध्यवर्ग में ही उसने सामन्तों से लड़-भिड़कर सामन्ती व्यवस्था के अन्दर एक विशेषाधिकार प्राप्त श्रेणी के रूप में अपने लिए स्थान बना लिया। परन्तु 15वीं शताब्दी के मध्य के बाद से, यूरोप के बाहर की दुनिया का पता लगने पर, इस पूँजीपति वर्ग को अपने व्यापार के लिए कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र मिल गया। इससे उसे अपने उद्योग-धन्धों के लिए नयी स्फूर्ति मिली। प्रमुख शाखाओं में दस्तकारी का स्थान मैनुफेक्चर ने ले लिया जो अब फैक्टरियों के पैमाने पर स्थापित था। फिर इसकी जगह बड़े पैमाने के उद्योग ने ले ली जो पिछली सदी के आविष्कारों, ख़ासकर भाप से चलनेवाले इंजन के आविष्कार से सम्भव हो गया था। बड़े पैमाने के उद्योग का व्यापार पर यह प्रभाव पड़ा कि पिछड़े हुए देशों में पुराना हाथ का काम ठप हो गया और उन्नत देशों में उसने संचार के आधुनिक नये साधन - भाप से चलने वाले जहाज़, रेल, वैद्युतिक तार - उत्पन्न किये। इस प्रकार पूँजीपति वर्ग सामाजिक सम्पत्ति और सामाजिक शक्ति दोनों को अधिकाधिक अपने हाथों में केन्द्रित करने लगा, यद्यपि काफी अरसे तक राजनीतिक सत्ता से वह वंचित रहा जो सामन्तों और उनके द्वारा समर्थित राजतन्त्र के हाथ में थी। लेकिन विकास की एक मंज़िल ऐसी आयी - फ्रांस में महान क्रान्ति के बाद - जब उसने राजनीतिक सत्ता को भी हथिया लिया, और तब वे वह सर्वहारा वर्ग और छोटे किसानों के ऊपर शासन करनेवाला वर्ग बन गया। इस दृष्टिकोण से, समाज की विशेष आर्थिक स्थिति का सम्यक ज्ञान होने से सथी ऐतिहासिक घटनाओं की बड़ी सरलता से व्याख्या की जा सकती है, यद्यपि यह सही है कि हमारे पेशेवर इतिहासकारों में इस ज्ञान का सर्वथा अभाव है। इसी प्रकार हर ऐतिहासिक युग की धारणाओं और उसके विचारों की व्याख्या बड़ी सरलता से, उस युग की आर्थिक जीवनावस्थाओं और सामाजिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों के आधार पर (ये सम्बन्ध भी आर्थिक परिस्थितियों द्वारा ही निर्धारित होते हैं) की जा सकती है। इतिहास को पहली बार अपना वास्तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्पष्ट सत्य है जिसकी ओर पहले लोगों का ध्यान बिल्कुल नहीं गया था, यानी यह सत्य कि मनुष्यों को सबसे पहले खाना-पीना, ओढ़ना-पहनना और सिर के ऊपर साया चाहिए, इसलिए पहले उन्हें लाज़िमी तोर पर काम करना होता है, जिसके बाद ही वे प्रभुत्व के लिए एक-दूसरे से झगड़ सकते हैं, और राजनीति, धर्म, दर्शन, आदि को अपना समय दे सकते हैं। आखि़रकार इस स्पष्ट सत्य को अपना ऐतिहासिक अधिकार प्राप्त हुआ।
समाजवादी दृष्टिकोण के लिए इतिहास की यह नयी धारणा सर्वोच्च महत्त्व की थी। इससे पता लगा कि पहले के सम्पूर्ण इतिहास की गति वर्ग-विरोधों और वर्ग-संघर्षों के बीच में रही है, कि शासक और शासित, शोषक और शोषित वर्गों का अस्तित्व बराबर रहा है और यह कि मानव-जाति के अधिकांश भाग के पल्ले सदा से कड़ी मशक्कत पड़ी है, आनन्दोपभोग बहुत कम। ऐसा क्यों हुआ? इसीलिए कि मानव-जाति के विकास की सभी पिछली मंज़िलों में उत्पादन का विकास इतना कम हुआ था कि ऐतिहासिक विकास इस अन्तरविरोधी रूप में ही हो सकता था, ऐतिहासिक प्रगति कुल मिलाकर एक विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक समुदाय के क्रियाकलाप का ही विषय बना दी गयी थी, और बहुसंख्यकों के भाग्य में अपने श्रम द्वारा जीवन-निर्वाह के अपने स्वल्प साधन और इसके अतिरिक्त विशेषाधिकार सम्पन्न समुदाय के लिए अधिकाधिक प्रचुर साधन उत्पादित करना रह गया था। परन्तु इतिहास की यही जाँच-पड़ताल, जो हमें इस प्रकार पहले के वर्ग शासन की स्वाभाविक एवं बुद्धिसम्मत व्याख्या प्रदान करती है (अन्यथा हम मानव-स्वभाव की दुष्टता द्वारा ही उसकी व्याख्या कर सकते थे), साथ ही साथ हमें यह बोध कराती है कि वर्तमान युग में उत्पादक शक्तियों के अति प्रचण्ड विकास के कारण मानव-जाति को शासक और शासित, शोषक और शोषित में बाँट रखने का अन्तिम बहाना भी, कम से कम सबसे उन्नत देशों में, मिट चुका है; कि शासक बड़े पूँजीपति अपनी ऐतिहासिक भूमिका समाप्त कर चुके हैं, और जैसा कि व्यापारिक संकटों, और ख़ासकर पिछली भयानक गिरावट और सभी देशों में फैली मन्दी से सिद्ध हो चुका है, वे समाज का नेतृत्व करने के योग्य अब नहीं रह गये हैं, बल्कि उत्पादन के विकास में बाधक बन गये हैं; कि ऐतिहासिक नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथ में चला गया है, ऐसे वर्ग के हाथ में चला गया है जो समाज में अपनी समग्र स्थिति के कारण सम्पूर्ण वर्ग शासन, सम्पूर्ण दासता एवं सम्पूर्ण शोषण का अन्त करके ही अपने को मुक्त कर सकता है; और यह कि सामाजिक उत्पादक शक्तियाँ, जो इतनी विकसित हो गयी हैं कि पूँजीपति वर्ग के काबू से बाहर हैं, बस इस प्रतीक्षा में हैं कि एकजुट सर्वहारा उन्हें अपने हाथों में ले ले जिससे कि ऐसी अवस्था कायम की जा सके जिसमें समाज का प्रत्येक सदस्य न केवल सामाजिक सम्पदा के उत्पादन में, बल्कि वितरण और प्रबन्ध में भी हाथ बँटा सकेगा, और जो अवस्था सम्पूर्ण उत्पादन के नियोजित संचालन द्वारा सामाजिक उत्पादक शक्तियों और उनकी उपज को इतना बढ़ा देगी कि प्रत्येक व्यक्ति की सभी उचित आवश्यकताओं की उत्तरोत्तर बढ़ती मात्रा में पूर्ति सुनिश्चित हो जायेगी।
मार्क्‍स ने जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण बात का पता लगाया है, वह पूँजी और श्रम के सम्बन्ध का निश्चित स्पष्टीकरण है। दूसरे शब्दों में, उन्होंने यह दिखाया कि वर्तमान समाज में और उत्पादन की मौजूदा पूँजीवादी प्रणाली के अन्तर्गत किस तरह पूँजीपति मज़दूर का शोषण करता है। जब से राजनीतिक अर्थशास्त्र ने यह प्रस्थापना प्रस्तुत की कि समस्त सम्पदा और समस्त मूल्य का मूल स्रोत श्रम ही है, तभी से यह प्रश्न भी अनिवार्य रूप से सामने आया कि इस बात से हम इस तथ्य का मेल कैसे बैठायें कि उजरती मज़दूर अपने श्रम से जिस मूल्य को उत्पन्न करता है, वह पूरा का पूरा उसे नहीं मिलता, वरन उसका एक अंश उसे पूँजीपति को दे देना पड़ता है? पूँजीवादी और समाजवादी, दोनों ही तरह के अर्थशास्त्रियों ने इस प्रश्न का ऐसा उत्तर देने का प्रयत्न किया, जो वैज्ञानिक दृष्टि से संगत हो, परन्तु वे विफल रहे। अन्त में मार्क्‍स ने ही उसका सही उत्तर दिया। वह उत्तर इस प्रकार है : उत्पादन की वर्तमान पूँजीवादी प्रणाली में समाज के दो वर्ग हैं - एक ओर पूँजीपतियों का वर्ग है, जिसके हाथ में उत्पादन और जीवन-निर्वाह के साधन हैं, दूसरी ओर सर्वहारा वर्ग है, जिसके पास इन साधनों से वंचित रहने के कारण बेचने के लिए केवल एक माल - अपनी श्रम-शक्ति - ही है और इसलिए जो जीवन-निर्वाह के साधन प्राप्त करने के लिए अपनी इस श्रम-शक्ति को बेचने के लिए मजबूर है। परन्तु किसी माल का मूल्य उसके उत्पादन में, और इसीलिए उसके पुनरुत्पादन में भी, लगी सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। अतः एक औसत मनुष्य की एक दिन, एक महीना या एक वर्ष की श्रम-शक्ति का मूल्य इस श्रम-शक्ति को एक दिन, एक महीना या एक वर्ष तक कायम रखने के लिए आवश्यक जीवन-निर्वाह के साधनों में लगे श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। मान लीजिये कि किसी मज़दूर को एक दिन के जीवन-निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए छः घण्टे का श्रम चाहिए, या उसी बात को यों कहें कि उनमें लगा श्रम छः घण्टे के श्रम की मात्रा के बराबर है, तो श्रम-शक्ति का एक दिन का मूल्य ऐसी रकम में व्यक्त होगा जिसमें भी छः घण्टे का श्रम लगा हो। अब यह भी मान लीजिये कि इस मज़दूर को काम पर लगानेवाला पूँजीपति उसे बदले में यह रकम देता है, और इसलिए उसकी श्रम-शक्ति का पूरा मूल्य उसे अदा करता है। अब अगर मज़दूर दिन में छः घण्टे पूँजीपति के लिए काम करता है तो वह पूँजीपति की पूरी लागत को चुकता कर देता है - छः घण्टे के श्रम के बदले छः घण्टे का श्रम देता है। पर ऐसी हालत में पूँजीपति के लिए कुछ नहीं रहता, और इसलिए वह तो इसे बिल्कुल दूसरे ही ढंग से देखता है। वह कहता है : मैंने इस मज़दूर की श्रम-शक्ति छः घण्टे के लिए नहीं बल्कि पूरे दिन के लिए ख़रीदी है, और इसलिए वह मज़दूर से 8, 10, 12, 14 या इससे भी अधिक घण्टों की उपज अशोधित श्रम की, ऐसी श्रम की जिसका भुगतान नहीं किया गया होता, उपज होती है, और यह सीधे पूँजीपति की जेब में पहुँच जाती है। इस तरह पूँजीपति की नौकरी करनेवाला मज़दूर केवल उस श्रम-शक्ति का मूल्य ही नहीं पुनरुत्पादित करता जिसके लिए उसे मज़दूरी मिलती है, बल्कि इसके अलावा वह अतिरिक्त मूल्य भी पैदा करता है जिसे पहले पूँजीपति हस्तगत करता है और जो बाद में निश्चित आर्थिक नियमों के अनुसार समूचे पूँजीपति वर्ग के बीच वितरित होता है। यह अतिरिक्त मूल्य वह मूल कोष होता है जिससे लगान, मुनाफा, पूँजी का संचय बनता है - संक्षेप में वह सारी दौलत बनती है जिसका ग़ैर-मेहनतकश वर्ग उपभोग अथवा संचय करते हैं। इससे यह सिद्ध हो गया कि आज के पूँजीपतियों द्वारा धन संचय उसी प्रकार दूसरों के अशोधित श्रम का हस्तगतकरण है जिस प्रकार दास-स्वामियों या भू-दास श्रम का शोषण करनेवाले सामन्ती प्रभुओं का धन-संचय था, और शोषण के इन सभी रूपों में अन्तर केवल अशोधित श्रम के हस्तगतकरण के तरीके और ढंग का ही है। पर इस बात ने सम्पत्तिधारी वर्गों के ढोंग से भरे शब्दजाल का अन्तिम औचित्य भी समाप्त कर दिया, जिसका आशय यह होता था कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में कानून और न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों की समानता तथा हितों के सामंजस्य का बोलबाला है, और यह प्रकट कर दिया कि वर्तमान पूँजीवादी समाज, अपने पूर्ववर्ती समाजों की ही भाँति और उनसे किसी भी तरह कम नहीं, जनता की विशाल की बहुसंख्या के निरन्तर घटते ही जाते अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शोषण की एक भीमकाय संस्था मात्रा है।


एंगेल्स द्वारा जून, 1877 के मध्य में लिखित लेख का अंश।
नामक वार्षिकी में,
जो ब्रुंसविक में 1878 में निकली थी, प्रकाशित।