गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

विश्वकप जीतने से देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया?


डॉ. महेश परिमल
जब से विश्वकप जीतने का जादू देश में चला है, तब से हमारे नेताओं ने राहत की साँस ली है। उन्हें यह अच्छी तरह से पता है कि क्रिकेट का जुनून लोगों में इस कदर है कि देश में हुए तमाम घोटालों पर देशवासियों का ध्यान हट गया है। अब न तो राजा के चर्चे हैं, न कामनवेल्थ गेम के और न ही हसन अली की करतूतों पर ही कोई बात करने को तैयार है। सब कुछ इतनी आसानी से हो गया कि नेताओं को लगा कि भारतीय मतदाताओं को मुगालते में रखने का इससे बड़ा और कोई संसाधन हो ही नहीं सकता। हमारे नेता यह भूल रहे हैं कि वर्ल्डकप जीतने पर लोगों ने जिस तरह के जुनून का प्रदर्शन किया है, वह कभी उनके खिलाफ भी जा सकता है। आजादी के बाद पहली बार इतना अधिक जोश और उत्साह लोगों में देखा गया। इससे यह आशा की जा सकती है कि हमारे देश के नागरिकों में अभी भी पहले जैसा उत्साह बना हुआ है। प्रजा की विराट ताकत का जलवा हमने देखा, अब यदि प्रजा यह समझ जाए कि वोट हमारी ताकत है और इसका हम सही दिशा में इस्तेमाल करेंगे, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम शुरू हो सकती है। उधर 72 वर्षीय अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को एक बार फिर सुर्खियों में लाकर इसके खिलाफ आंदोलन ही छेड़ दिया है। हजारों लोगों के साथ जनलोकपाल विधेयक लाने के लिए दिल्ली में जम गए है। भ्रष्टाचार को देश से उखाड़ फेंकने के लिए यह एक छोटी सी शुरुआत है। जैसे-जैसे यह आंदोलन तेज होगा, वैसे-वैसे लोग इससे जुड़ते जाएँगे। संभव है क्रिकेट जैसा जुनून अब भ्रष्टाचार के खिलाफ भी दिखाई देने लगे। अन्ना हजारे के बहाने भ्रष्टाचार का जिन्न एक बार फिर सबके सामने है।
अनशन स्थल पर उमड़े जनजवार को संबोधित करते हुए श्री हजारे ने कहा कि हम सरकार से बस यही मांग रहे हैं कि एक कमेटी बनाओ जिसमें आधे लोग आपके और आधे लोग पब्लिक के हों और यह जनलोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने का काम शुरू करे। उन्होंने कहा कि सरकार अकेले ही बिल का मसौदा तैयार करती है तो यह निरंकुश है, यह लोकशाही नहीं है। अन्ना ने ऐलान किया कि जब तक बिल की मांग पूरी नहीं होती वह महाराष्ट्र नहीं जाएंगे। उन्होंने बताया कि देश भर में 500 शहरों में और महाराष्ट्र में 250 ब्लॉक में लोग आंदोलन के समर्थन पर अनशन पर बैठे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह भ्रष्ट सरकार उन्हें किसी भी तरह से रोकने में कामयाब नहीं रहेगी। ये बिल उनकी मांग के अनुसार ही परिवर्तित होकर पास होगा और वे इसके लिए पूरे प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया है लेकिन वर्तमान व्यवस्था को देखकर वे काफी दु:खी हैं। करोड़ों का धन भ्रष्ट व्यवस्था के कारण देश के बाहर जा रहा है, और सरकार भी ऐसे तत्वों की मदद कर रही है। देश भर के कार्यकर्ता इसे आजादी की दूसरी लड़ाई की संज्ञा दे रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं।
भारत ने जब विश्वकप जीता, तब प्रजा की ऊर्जा बाहर आई। शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा कि चुनाव के दौरान जिस तरह की भीड़ जुटाने के लिए नेताओं को करोड़ो ंरुपए खर्च करने पड़ते हैं, उस तरह की भीड़ तो आसानी से देश भर की सड़कों और गलियों में दिखाई देने लगी। इस भीड़ को इकट्ठा करने के लिए एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ। इस भीड़ में अधिकांश टीन एजर और युवा ही थे। हाथ में तिरंगा झंडह्वा लिए हुए ये टोलियाँ रात भर ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करती रही। इससे हमें यह नहीं समझना चाहिए कि वर्ल्डकप जीतने से देश की सारी समस्याओं का अंत हो गया। देश से भ्रष्टाचार हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया। भारत के जीत की खुशी में निकले इन युवाओं में एक बात ध्यान देने लायक थी, वह यह कि आज के क्रिकेट प्रेमियों के सामने धोनी एक सफल कप्तान के रूप में सामने आए। धोनी लोगों के लिए एक सक्षम कप्तान के रूप में सामने आए। ठीक ऐसे ही सक्षम कप्तान की आवश्यकता आज देश की राजनीति को है। ताकि वह युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा दे सके।
कई महीनों से देश में एक के बाद एक कई भ्रष्टाचार के मामले सामने आए। युवा इन सबसे पक गया था। वह कुछ नया करना चाहता था। अपने जोश और उत्साह को वह दबा नहीं पा रहा था। वर्ल्डकप जीतने के बाद मानो उसे अपनी ऊर्जा को बताने का अवसर मिल गया। इस वर्ग ने यह बता दिया कि हमारी ऊर्जा को यदि सही दिशा मिल जाए, तो हममें बहुत कुछ करने का माद्दा है। समीक्षक भले ही यह कहते रहें कि भारत ने जितनी आसानी से वर्ल्डकप जीता है, उतनी आसानी से देश की समस्याओं का हल होने से रहा। वर्ल्डकप जीतने के लिए टीम इंडिया ने जिस तरह की व्यूह रचना की थी, वैसी ही व्यूह रचना भारत की प्रजा भी अपनाए, तो भारत आर्थिक और राजनीति के मोर्चे पर वर्ल्ड कप जीत सकता है। टीम इंडिया ने जीतने के लिए एक योग्य कोच को तलाशा था, ठीक उसी तरह देश के युवाओं की शक्ति का समन्वय करते हुए और उनके भीतर की सुषुप्त शक्ति को जाग्रत करे, ऐसे कोच की आवश्यकता है। इसके लिए कोई हिंसक क्रांति की आवश्यकता कतई नहीं है। जिस तरह से कस्र्टन ने कैप्टन धोनी के साथ टीम के कुछ खिलाड़ियों को हटा दिया था, ठीक उसी तरह देश के भ्रष्ट नेताओं को भी राजनीति से उखाड़ फेंकने का काम हमें करना है। आगामी लोकसभा चुनाव में ऐसे लोगोंे को वोट दिया जाए, जो भ्रष्टाचार से विलग हो, जो समाज सेवा को अपना नैतिक धर्म मानते हों। अन्ना हजारे को आज के युवा एक ऐसे ही कोच के रूप में देख रहे हैँ।
भ्रष्टाचार का महारोग देश की सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है। राजधानी से गांव तक और संसद से पंचायत तक सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें मजबूत कर ली है। आम आदमी परेशान है। हमारे समक्ष नैतिक बल से संपन्न ऐसे आदर्श की कमी है जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-जागरण कर सकें, ऐसे में 78 साल के वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने इस मुद्दे पर सरकार को ललकारा है। लोकपाल बिल 2010 अभी संसद के पास विचाराधीन है। इस बिल में प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों के खिलाफ शिकायत करने का प्रावधान है। श्री हजारे के अनुसार बिल का वर्तमान ड्राफ्ट प्रभावहीन है और उन्होंने एक वैकल्पिक ड्राफ्ट सुझाया है। आइए, हम भी आर्थिक शुचिता के पक्षधर बनें, इस मसले पर जनजागरण करें और भ्रष्टाचारमुक्त समाज व शासन सुनिश्चित करने का संकल्प लें।
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

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