गुरुवार, 29 सितंबर 2011

चीन की ओर पाकिस्तान झुकाव का मतलब?

डॉ. महेश परिमल
कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। आज पाकिस्तान जिस तरह से चीन की तरफ लगातार बढ़ रहा है, दोस्ती का हाथ पसार रहा है और चीन से करोड़ों की आर्थिक सहायता ले रहा है, उससे तो यही लगता है कि समय रहते पाकिस्तान अमेरिका का साथ छोड़ सकता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ जरदारी हर तीसरे महीने चीन की यात्रा पर जा रहे हैं। 1962 के युद्ध के बाद चीन ने अभी तक भारत से ऐसा कोई समझौता नहीं किया है, जिसे उपलब्धि कहा जाए। दोनों देशों के नेता कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में मिलते रहे हैं, परस्पर शुभकामनाएँ भी दी हैं, पर ऐसा कोई आधार तय नहीं कर पाए हैं, जिससे संबंध मजबूत बनें।
आज चीन को सबसे अधिक आवश्यकता है बिजली की। पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता से अपने देश में जो पॉवर प्लांट तैयार किए हैं, उससे वह चीन को काफी मात्रा में बिजली दे रहा है। इसके बदले में चीन भी पाकिस्तान को भरपूर कर रहा है। दोनों देशों के बीच मित्रता समय के साथ-साथ प्रगाढ़ होती जा रही है। वियेतनाम में अपने मुँह की खाने के बाद भी अमेरिका आज विश्वफलक में भारत से अधिक चीन को ही महत्व देता है। यही हालत विश्व के अन्य देश भी भारत से अधिक चीन को महत्व देते हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के भूतपूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक जब तक सत्ता में रहे, तब तक 88 बार चीन की यात्रा की। ऑस्ट्रेलिया यह अच्छी तरह से जानता है कि पाकिस्तान में जरदारी जैसे कमजोर नेता अधिक समय तक देश को सुरक्षित नहीं रख सकते। ऐसे कमजोर नेताओं के बदले यदि वहाँ सैन्य शासन हो जाए, तो बेहतर। इसलिए चीन से अधिक खतरनाक है पाकिस्तान की डाँवाडोल स्थिति। वह तो अमेरिका को भी यही सलाह देता है कि चीन की आर्थिक प्रगति को अनदेखा न करे। उसे दोस्त के रूप में देखा जाए, दुश्मन के रूप में नहीं। इसके अलावा विश्व के धनाढच्य लोगों में अपना नाम शुमार करने वाले बिल गेट्स भी अमेरिका को यही सलाह देते हैं कि चीन से अच्छा व्यवहार करें। उन्होंने भी चीन की यात्रा भारत की अपेक्षा अधिक ही की है।
अभी कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ जरदारी अपने पुत्र बिलावल और पुत्री के साथ चीन की यात्रा पर थे। वहॉं जाकर उन्होंने बहुत कुछ कहा, पर यह कहना नहीं भूले कि संभव है 100 दिनों के भीतर वे एक बार फिर चीन पहुँचे। वे बार-बार चीन आना चाहेंगे। जरदारी के साथ आजाद कश्मीर के तथाकथित प्रधानमंत्री चौधरी अब्दुल भी उनके साथ थे। परोक्ष रूप से वे भारत और अमेरिका को यह बताना चाहते हैं कि आपका दुश्मन मेरे लंबे समय का मित्र है। अपनी मित्रता को दृढ़ करने के लिए पाकिस्तान ने अपनी धरती पर चीन के लिए बिजली घर की स्थापना की है। जाहिर है इससे उत्पन्न बिजली चीन ही जाएगी। चीन के पास आज सबसे अधिक कमी बिजली की है, जो पाकिस्तान के माध्यम से उसे मिल रही है। इसके बदले में चीन पािकस्तान की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हाल ही में उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में काफी इजाफा किया है। उधर अमेरिका ने अपने हित के लिए पाकिस्तान को जो आर्थिक मदद की, उसका पूरा लाभ चीन को ही मिल रहा है। चीन के लिए एक तरह से पाकिस्तान ने हर तरह की सहायता का वचन ही दे दिया है।
आसिफ जरदारी सातवीं बार चीन पहुँचे, तब चीन ने उनका भारी स्वागत किया। कहीं भी यह नहीं लगा कि पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वह आज जो अमेरिका के लिए कर रहा है, संभव है भविष्य में चीन के लिए भी कर सकता है। पर चीन का स्वार्थ अभी पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है, इसलिए चीन ऐसा सोच भी नहीं सकता। चीन के भावी नेता के रूप में जेओ का नाम चर्चा में है। उन्होंने ही जरदारी के साथ उपप्रधानमंत्री ली आंग को लगा रखा था। इसके चीन ने पाकिस्तान को 20 अरब डॉलर की सहायता देने का वचन दिया था, पर इस यात्रा के बाद यह रकम दोगुनी कर दी गई। एक तरफ पूरा यूरोप आर्थिक मंदी से जूझ रहा है, तो दूसरी तरफ चीन कई एशियाई देशों को आर्थिक और वाणिज्य सहायता कर रहा है।
चीन की इस कार्रवाई से यह होगा कि यूरोप एवं अन्य एशियाई देशों से उसके वाणिज्यिक संबंधों को गति मिलेगी। भविष्य में चीन करांची में अपना बंदरगाह स्थापित करेगा, यह निश्चित है। तब तक वह पाकिस्तान को पूरी तरह से लाचार और नाकारा कर ही देगा। बंदरगाह स्थापित होने के बाद अरब महासागर में उसका रुतबा बढ़ेगा ही। अपनी कुशल राजनीति के बल पर चीन अमेरिका और पािकस्तान के बीच दरार डालने का काम कर रहा है, जो भविष्य में साफ दिखाई देने लगेगा। इसके लिए चीन सारी सीमाएँ पार भी कर सकता है।
सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान अपनी राजनैतिक स्थिरता को दाँव पर लगाकर चीन की सहायता करता रहेगा? अभी के हालात तो यह कहते हैं कि चीन की सारी कोशिशें नाकाम हो सकती हैं। पाकिस्तान को अमेरिका से दूर करना बहुत मुश्किल है। पाकिस्तान भी चालाक है। वह दोनों देशों की विवशताओं को समझता है। वह अमेरिका और चीन दोनों को ही अपने खेल खेलने का मौका दे रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि दोनों ही देश पाकिस्तान के हाथों खेल रहे हैं। सीधी सी बात है भारत का दुश्मन चीन है और चीन पाकिस्तान का दोस्त है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, यह तो अपनी नीति में चाणक्य भी कह चुके हैं। आज दो हजार वर्ष बाद भी यह नीति हमारे सामने ही दिखाई दे रही है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 28 सितंबर 2011

बदलते रहते हैं सफलता के मापदंड

डॉ. महेश परिमल
कहा जाता है कि सफलता कभी स्थायी नहीं होती। वह एक हाथ से दूसरे हाथ पर जाती रहती है। इसलिए उसके मापदंडों में भी परिवर्तन आता रहता है। इन मापदंडों में हर दशक में एक परिवर्तन तो आता ही है। यही कारण है कि आज जो फिल्में बॉक्स ऑफिस में हिट होती हैं, उसकी कमाई के आँकड़े तो आकर्षक होते हैं, पर वे प्रभावित नहीं करते। इसकी वजह साफ है कि आज रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले लगातार घट रही है।
हाल ही में सलमान खान और करीना कपूर अभिनीत फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ रिलीज हुई। इसकी आय को बेवजह विवाद को जन्म दिया। आज हर कोई स्वयं को सफल एक्टर स्थापित करने में लगा हुआ है। बॉडीगार्ड में सलमान, कभी आमिर खान, कभी ऋत्विक रोशन, कभी शाहरुख खान आदि स्वयं को श्रेष्ठ बताने में लगे हैं। इनकी फिल्मों से फिल्मी लाइन से जुड़े अंतिम व्यक्ति को लाभ पहुँचता हो, यह पता नहीं चलता। दूसरी ओर फिल्म उद्योग में सबसे अधिक कमाई कराने वाले कलाकारों में धर्मेद्र और अमिताभ बच्चन का नाम सबसे ऊपर है। आज फिल्म हिट होने की व्याख्या बदल गई है। एक समय था जब बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘किस्मत’ कोलकाता में लगातार तीन साल तक चलती रही। इसी तरह रमेश सिप्पी की शोले मुम्बई के मिनर्वा थिएटर में लगातार 5 साल तक चलती रही। उस समय अखबारों में यह प्रकाशित होता रहा कि फिल्म शोले की टिकटों की कालाबाजारी करने वाले टपोरी आज करोड़पति बन गए हैं। इसी तरह यश चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, मुम्बई के मराठा मंदिर थिएटर में मेटिनी शो में 5 साल तक चलती रही। यहाँ महत्वपूर्ण मेटिनी शो है, 24 घंटे में मात्र एक ही शो। आज से 20 वर्ष पहले जो मेटिनी शो का आकषर्क था, अब वैसा नहीं रहा।
वास्तविकता यह है कि 1940 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक किसी भी फिल्म के सुपरहिट होने का मापदंड यह होता था कि वह अमुक थिएटर में कितने ह़फ्ते चली। ऐसी फिल्मों को बनाने वाले फिल्म निर्माताओं के बारे में यह कहा जाता था कि उनके हाथ में धूल को भी सोना बनाने की कूब्बत है। मेहबूब खान, व्ही. शांताराम राजकपूर, बी.आर. चोपड़ा आदि ऐसे नाम थे, जिनकी फिल्में एक साथ आधे दर्जन थिएटर में रिलीज होती और कमोबेश सभी थिएटरों में 25 सप्ताह चलती। कई फिल्में 50 सप्ताह भी चल जाती। हमें अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं, व्ही. शांताराम की ‘झनक-झनक पायल बाजे ‘ मेहबूब खां की मदर इंडिया, बी आर चोपड़ा की नया दौर, सुबोध मुखर्जी की जंगली, श्रीधर की दिल एक मंदिर, राजकपूर की संगम, देवआनंद की गाइड आदि ऐसी फिल्में थीं, जो 25 से 50 सप्ताह तक तो आराम से चलती थीं। रही बात बॉक्स ऑफिस पर धन जुटाने की, तो इन दोनों पर विचार किया जाना चाहिए। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म हिट होने के बाद जो आँकड़े दिखाए जाते हैं, वे करोड़ों के होते हैं। हमें ये राशि हतप्रभ नहीं करती, क्योंकि आज रुपए की कीमत है ही कितनी?
1950 के दशक में ब्रिटेन की रानी की तस्वीर वाले रुपए की बाजार में कीमत थी। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार ने एक बार कहा था कि उस समय एक रुपए में करीब एक सेर शक्कर मिलती थी, तब हमें हर महीने वेतन के रूप में 500 रुपए मिलते थे। तब के 500 रुपए आज के 50 हजार रुपए से भी अधिक मूल्यवान थे। बांद्रा के सी फेज पर संगीतकार नौशाद का बंगला उस समय मात्र 12 हजार रुपए में बनकर तैयार हुआ था। आज उसी बंगले की कीमत 30 करोड़ रुपए है। आज के बॉक्स ऑफिस आँकड़े इसलिए आकर्षक नहीं लगते। वजह यही है कि आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत एकदम से घट गई है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पहले एक फिलम को दोबारा देखा जा सकता था, अर्थात उसकी रिपीट वेल्यू भी थी, पर आज की फिल्में एक बार भी पूरी देखना मुश्किल हो जाता है, दोबारा की बात ही नहीं की जा सकती।
अभी कुछ ही दिन पहले लोगों ने ईद मनाई, तो दो मित्र आपस में बातचीत करते हुए कह रहे थे कि आज हमारी शाम बेहतर गुजरेगी, क्योंकि अमुक चैनल पर फिल्म मुगले आजम दिखाई जा रही है। पहले की फिल्मों की रिपीट वेल्यू हुआ करती थी, लोग आज भी पुरानी फिल्मों को देखने के लिए टूट पड़ते हें। आज कहीं भी मदर इंडिया लगी हो, तो भीड़ को काबू में लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही अमिताभ की फिल्मों के लिए भी कहा जा सकता है। अमिताभ उस समय के अन्ना हजारे थे। उन्होंने अपनी कई फिल्मों में अव्यवस्था से लड़ने वाले योद्धा के रूप में अपने आप को पेश किया है। क्या आज मुन्ना भाई, सिंघम और बॉडीगार्ड देखने के बाद उसे फिर से देखने की इच्छा होगी? आज यदि सिंघम या बॉडीगार्ड हिट होती है, तो उसका लाभ किसे मिलता है, अधिक से अधिक हीरो को और निर्माता को। लाइटमेन या ट्राली मेन को तो कतई नहीं। लेकिन धर्मेद्र और अमिताभ की फिल्मों से फिल्म व्यवसाय से जुड़े सभी तबको को भी फिल्म के हिट होने का लाभ मिलता था। फिर चाहे वह गीतकार हो, संगीतकार हो, वितरक हो, या फिर लेखक हो। यहाँ तक कि लाइटमेन और ट्रालीमेन भी मुनाफे में रहते थे।
इस तरह से बदलते जीवन मूल्यों के साथ अब फिल्मों के हिट होने के मापदंड भी बदलने लगे हैं। अब तो एक दिन या एक सप्ताह की कमाई ही महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है। फिल्म थिएटर में कितने दिन या सप्ताह चली, यह महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए कलाकार भी अपनी फिल्म को हिट करने के लिए सभी शहरों में अपने गुर्गों को भेज देते हैं, जो टिकटों की कालाबाजारी कर फिल्म देखने के लिए दर्शकों को विवश कर देते हैं। फिल्मों को हिट करने का यही फंडा काम आ रहा है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

एक तीर से कई निशाने साधे हैं प्रणव दा ने




डॉ. महेश परिमल
कांग्रेस के भीतर दो शिविर हैं, एक में प्रणव मुखर्जी हैं, तो दूसरे में पी. चिदम्बरम। इनके बीच चलने वाले शीतयुद्ध की भनक पहले लगती तो थी, पर बात समय के साथ दब भी जाती थी। पर इस बार प्रणव दा ने जिस तरह से दाँव खेला है, उससे चिदम्बरम चारों खाने चित हो गए हैं। ए. राजा, कनिमोझी के बाद अब जेल जाने की उन्हीं की बारी है। चिदम्बरम कई मोर्चों पर विफल साबित हुए हैं। इसके पहले अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने के मामले में उन्होंने कपिल सिब्बल के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय सरकार की काफी फजीहत हुई थी। उधर जब ए. राजा बार-बार कह रहे हैं कि 2 जी घोटाले में वे अकेले दोषी नहीं हैं, चिदम्बरम भी पूरी तरह से दोषी हैं, उन्हें भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। अनजाने में एक ऊँगली तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी उठ रही है। इसीलिए चिदम्बरम पर किसी तरह की कार्रवाई पर मामला एक सप्ताह के लिए टल गया है। सीबीआई भी इस बार बुरी तरह से फँस गई है। अब तक वह पूरी ताकत से चिदम्बरम को बचा रही थी, पर वह गोपनीय पत्र बाहर आ जाने से उसे भी जवाब नहीं सूझ रहा है। इस पत्र से यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के भीतर जो शीतयुद्ध चल रहा था, वह अभी पूरी तरह से बाहर आ गया है। उधर जयललिता भी कठोर हो गई हैं। वे तो पहले से ही चिदम्बरम से इस्तीफे की माँग कर रहीं थीं, इसके बाद तो उन्हें अपनी बात रखने का सुनहरा अवसर मिल गया है।


अब यह भी स्पष्ट होने लगा है िक 2 जी घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कई बातें सामने आईं हें जिसमें प्रमुख हैं:-
- मारन के दबाव में प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह की कार्यवाही के बिंदु कमजोर करने में सहमति जताई।
- कार्यवाही के बिंदुओं (टर्म्स ऑफ रिफरेंस) की जानकारी केवल तीनकिरदारों के पास थी। खुद टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन, दूसरे प्रणब की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह और तीसरे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। बिंदु या तो दयानिधि मारन ने बदले, लेकिन यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था, जो उनके लिए असंभव था। तो फिर मंत्रियों के समूह ने बदला होगा। किंतु वे ऐसा क्यों करेंगे? वे भला अपनी ही कार्यवाहियों को क्यों बदलने चले? उसके बाद मारन जब प्रधानमंत्री से मिले, तब कार्यवाही के बिंदु बदल गए।
- चूंकि केबिनेट सचिवालय न तो संचार मंत्री को रिपोर्ट करता है और न मंत्रियों के समूह को। वह सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। प्रधानमंत्री की सहमति के बाद ही केबिनेट सचिवालय से नोटिफिकेशन जारी हो सकता है।
- आठ प्रभावशाली मंत्रियों वाले इस समूह ने कार्यवाही के बिंदु बदले जाने पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई? इसके लिए तीन ही बातें हो सकती हैं:-
- या तो बिंदु बदलने से उनका कुछ लेना-देना नहीं था।
-या उन्हें जानकारी नहीं थी। ये दोनों ही बातें असंभव हैं।
- या यह प्रधानमंत्री का आदेश था, जिसकी वे अवहेलना नहीं कर सकते थे।
-सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन सारी बातों से वित्तमंत्री को नजरअंदाज क्यों किया गया? सरकारी कामकाज के नियम 1961 के मुताबिक ऐसे किसी भी फैसले को लेने के पहले जिसमें पैसों का मामला हो, वित्त मंत्रालय से सलाह मशविरा आवश्यक है। लेकिन इस मामले में तत्कालीन वित्तमंत्री की पूरी तरह से अनदेखी की गई। यह तभी संभव था, जब प्रधानमंत्री ने खुद ही आदेश दिए हों।
इन सबका खुलासा तब हुआ, जब सामाजिक कार्यकर्ता विवेक गर्ग ने सूचना के अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेज हासिल किए। इस घोटाले से देश को 1.76 लाख करोड़ का जो नुकसान हुआ है, वह आज की भ्रष्ट राजनीति को सबसे बड़ा मामला है। यह तो तय था कि इतने बड़े घोटाले को अकेले ए.राज या फिर कनिमोझी तो अंजाम नहीं दे सकते थे। इनके बीच अवश्य ही कोई बड़ी शक्ति है। अब यह शक्ति हमारे सामने आ रही है। सीबीआई ने इस वर्ष के फरवरी में ए. राजा की जब धरपकड़ की, उसके दो महीने बाद वित्त मंत्रालय से एक 14 पन्नों का पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा गया। इसमें यह स्पष्ट लिखा गया था कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम यदि चाहते, तब भी स्पेक्ट्रम का नीलाम करवा सकते थे। इस पत्र से यह भी स्पष्ट हो गया कि चिदम्बरम की भूमिका पर प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री के सामने कई सवाल खड़े किए। इस पत्र में यह भी लिखा है कि जब टेलीकॉम के क्षेत्र में नए लायसेंस देने के मामले पर निर्णय करने का समय आया, तब 31 दिसम्बर 2008 तक के लायसेंस के लिए 2001 में प्रवर्तमान एंट्री फीस तय की गई थी। इसमें पी. चिदम्बरम की भी सहमति थी। वित्त मंत्रालय के इस पत्र का सार यही है कि उस समय यदि चिदम्बरम सहमत न हुए होते, तो ए. राजा की स्पेक्ट्रम की नीलामी करने की आवश्यकता पड़ी होती और देश की तिजोरी को नुकसान नहीं हुआ होता। अनजाने में प्रणब दा ने यह इशारा कर दिया कि यदि चिदम्बरम ए. राजा के साथ मिल नहीं गए होते, तो यह घोटाला हो ही नहीं पाता।
इस मामले में सीबीआई ने राजा के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं, उसका मुख्य तत्व यही है कि राजा को स्पेक्ट्रम का नीलाम करने के बजाए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ का नुस्खा अपनाया, इससे सरकारी तिजोरी को अरबों रुपए का नुकसान हो गया। अपने बचाव पर राजा कहते हैं कि उन्होंने स्पेक्ट्रम का जो आवंटन किया, उसमें उनकी अकेले की ही भूमिका नहीं है। इसमें वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री की पूरी मिलीभगत है। इस मामले पर यदि सुप्रीमकोर्ट सीबीआई को स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका की जाँच करने का आदेश दे, तो चिदम्बरम काफी मुश्किल में पड़ सकते हैं।
वित्त मंत्रालय का यह पत्र उस समय बाहर आया है, जब न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और न ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी दिल्ली में थे। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री तब न्यूयार्क में थे। चिदम्बरम सिक्किम में राहत कार्यो का निरीक्षण करने गए हुए थे। न्यूयार्क में जब प्रणब दा से इस संबंध में पूछा गया, तो उन्होंने यह कहकर अपना पल्लू झाड़ लिया कि अभी मामला अदालत में है, इसलिए इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। यह उन्होंने अवश्य बताया कि सुब्रमण्यम स्वामी ने उक्त पत्र सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त किया है। उधर जब सिक्किम में चिदम्बरम से इस मामले पर पूछा गया, तो उन्होंने गुस्से से पत्रकारों को अस्पताल से बाहर जाने के लिए कह दिया। बाद में पत्रकार वार्ता में भी उन्होंने इस तरह के सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।
अब यदि सुप्रीमकोर्ट सीबीआई को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर चिदम्बरम की भूमिका की जाँच का आदेश देती है, तो चिदम्बरम के साथ-साथ सीबीआई भी मुश्किल में पड़ सकती है। यदि सीबीआई को आदेश मिलता है कि चिदम्बरम से पूछताछ की जाए, तो सबसे पहले चिदम्बरम को इस्तीफा देना होगा। फिर उन्हें जेल भी जाना होगा। जब सीबीआई को यह पहले से ही पता था कि वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बिना टेलीकॉम मंत्रालय स्पेक्ट्रम का आवंटन नहीं कर सकती, तो फिर सीबीआई ने अभी तक तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम से पूछताछ क्यों नहीं की? यह सवाल सुप्रीमकोर्ट निश्चित रूप से पूछ सकती है। स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका पर पहले भी आरोप लगाए जाते रहे हैं। पूर्व में भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी भी आरोप लगा चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस उनके बचाव में आ गई थी। कांग्रेस प्रवक्ताओं द्वारा चिदम्बरम का जोरदार बचाव किया गया। 18 जून को ही चिदम्बरम का बचाव करते हुए वर्तमान टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि भ्रष्टाचार के किसी भी खेल में चिदम्बरम का कोई हाथ नहीं है। इस मामले में ए. राजा के आरोप गलत हैं। विपक्ष हताशा में आकर इस प्रकार के आरोप लगा रहा है। अब जब प्रणब मुखर्जी ने चिदम्बरम पर इस प्रकार के आरोप लगाए हैं, तो उसका जवाब सिब्बल किस तरह देंगे, यह देखना है। अब तो यही लगता है कि चिदम्बरम पूरी तरह से घिर गए हैं।
इस पूरे मामले में प्रणब मुखर्जी की भूमिका को ध्यान में रखना होगा। वे इस मामले में सबके साथ चलते रहे, पर स्वयं को सबसे अलग भी रखा। अन्ना की गिरफ्तारी के बाद सरकार की जो फजीहत हुई, उससे उबारने में प्रणब दा की भूमिका महत्वपूर्ण रही। अपनी चाल पूरी तरह से चलते हुए इस बार उन्होंने जो दाँव खेला है, उससे सभी लपेटे में आ गए हैं। इस तरह से उन्होंने यही संकेत दिया है कि देश और पार्टी के साथ गद्दारी करने वाले कभी न कभी तो कानून के शिकंजे में आ ही जाते हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तीन चिंतन

निंदक नियरे राखिए
एक बहुत प्रसिद्ध दोहा है- निंदक नियरे राखिए आंगन कुटि छबाय। बिन पानी बिन साबुन निर्मल करे सुहाय।। इस दोहे में यही कहा गया है कि अपनी निंदा, आलोचना, बुराई करने वालों सदा अपने पास रखना चाहिए। अपनी आलोचना सुनकर उसे सुधारने से हमारा स्वभाव अच्छा होता है और हमारी कमियां दूर होती हैं। यह दोहा अति प्राचीन है और आज के युग में कोई अपनी बुराई कतई सुनना नहीं चाहता। भला मेरे काम में कमी कैसी? यही सोच है अधिकांश लोगों की। सभी चाहते हैं कि चारों ओर उनकी प्रशंसा हो, उनके कार्य में कमियां ना निकाले। परंतु जब उम्मीद के विपरित कोई बुराई या कमी निकाल देता है तो वहां उनका अहं जाग जाता है। लोगों को मजा भी बुराई निकालने में ही आता है। दूसरों की बुराई करने को आज भी भाषा में निंदारस कहा जाने लगा है। बुराई करना जैसे एक फैशन हो गया है। किसी के अच्छे कार्यों को कोई एक बार भले याद ना करें, परंतु यदि किसी से कोई चूक या गलती हो गई तो जैसे उसने गुनाह कर दिया। दरअसल व्यक्ति दूसरों की बुराई करके अपनी कमजोरियों को छुपाना चाहता है। वह यही दिखाना चाहता है कि कमियां सिर्फ मुझ ही में नहीं है। कुछ लोगों की सोच होती है जो कार्य मैं नहीं कर सकता या मुझसे नहीं हुआ तो उसे कोई और कैसे कर सकता है? परंतु जब कोई वह कार्य कर देता है तो उसे अपनी कमजोरी का अहसास होता है और वह उसके कार्य में बुराई या कमी तलाश करने में लग जाता है। इसी तरह की भावनाओं से ग्रस्त होकर दूसरों में बुराई ढूंढ़ी जाती है और फिर उसे प्रचारित करने में उन्हें एक अद्भूत आंनद की प्राप्ति होती है। यदि कोई आपकी बुराई करता है या कमियाँ निकालता है तो कोशिश करनी चाहिए उसे सकारात्मक रूप में लेने की और अपनी कमजोरी दूर करें। साथ ही दूसरों की बुराई करने से बचें। इससे होता कुछ नहीं है, उलटा आपकी छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रहीम से भी एक कदम आगे बढ़कर यह कहना चाहूंगा कि कमियॉं निकालने वाले व्यक्ति को अपने मकान के परिसर में ही उसके रहने के लिए एक कुटिया बना दो, जिससे वह उसमें रहकर हमारे दोष देखता रहे और हमें सदा सावधान करता रहे। भावना और कल्पना का यथार्थ से दूर का भी संबंध नहीं है। जिन दिनों कवि ने इस दोहे की रचना की थी, उन दिनों देश में न तो सघन जनसंख्या थी और न ही आवास समस्या।
यदि आपको स्वयं की क्षमता और उपलब्धियों का आकलन करने में मुश्किल हो रही है, तो यह काम किसी आलोचक से करवाएं। जो आपकी कमियों और खूबियों की भली-भांति व्याख्या कर सके। उसके द्वारा की गई आलोचना से ही आपको समझ आएगा कि आप कितने पानी में हैं। आप बहुत भाग्यशाली हैं, जो आपको ऐसा स्पष्ट बोलने वाला आलोचक बनाम शुभचिंतक मिला वरना यह सबके नसीब में नहीं होता। यदि आप स्वयं मंे बदलाव करना चाहते हैं, तो इसके लिए अतीत में आपने जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, उन्हें याद करें, इससे अपनी योग्यता को परख पाएँगे और आपके आत्मविश्वास में भी इजाफा होगा। नेपोलियन ने कहा था कि मैं सौ हितैषी अखबारों की अपेक्षा उस एक अखबार को महत्वपूर्ण मानता हूँ, जिसमें मेरे कार्यो की आलोचना होती है। मेरे लिए वह आईने का काम करता है। मुझे अपने आप में सुधार का रास्ता दिखाता है। जो आपकी बुराई करे, तो सबसे पहले आप यह देखें कि इसके पीछे उसकी नीयत कैसी है? यदि आपकी बुराई से उसे किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल रहा हे, तो उसके इस कार्य को महत्वपूर्ण मानना होगा। जब उसे कोई लाभ ही नहीं हो रहा है, तो भला वह आपकी बुराई क्यों करेगा? चूँकि वह आपका भला चाहता है, इसलिए वह आपको सचेत कर रहा है। ताकि आप अपनी गलती न दोहराएँ। ऐसे विरले ही होते हैं, जो अपनी आलोचना सुनना पसंद करते हैं। इस रास्ते पर चलते हुए बार-बार हमें एक चीज परेशान करती है, वह है अहंकार। यह एक ऐसी चीज है, जिसका कभी अंत नहीं होता। मानव स्वभाव में यह निश्चित रूप से अपना अलग स्थान रखता है। इसके सामने आँख का कोई काम नहीं, क्योंकि अहंकार के वश में जो भी काम होते हैं, वह मानव स्वभाव के विपरीत ही होते हैं। जो व्यक्ति इस पर जितनी अधिक विजय प्राप्त करता है, वह उतना सहनशील होता है और सर्वजयी होता है। जो व्यक्ति हमारी रुचि का नहीं, वह हमारा शत्रु है, यह मानना हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। हम उसे अपना आईना समझें। ऐसे लोगोंे से हमें अपने आप में सुधार का मौका मिलेगा। हितैषी तो वही कहेंगे, जो हम उनसे सुनना चाहते हैं। लेकिन विरोधी वही कहेगा, जो सच है। सच के सहारे चलने वाला इंसान संतोषी होता है। झूठ का सहारा लेने वाला सदैव दु:ख पाता है। तो क्यों न सच को अपना साथी मानकर विरोधियों को अपना ही मानें। मीठा झूठ भी इंसान के लिए खतरनाक होता है। इसका रूप-रंग बिलकुल सच की तरह होता है। कई बार धोखा भी खा सकते हैं। पर इसे वही पहचान सकता है, जो अनुभवी है। सच की तरह सीधी-सच्ची सादगी किसी में नहीं है। यह हमारे पास दु:ख का सागर पार करके आता है, इसलिए सच को सहजता से स्वीकारो और जीवन को एक नया आयाम दो।

दूसरों का सम्मान
अपने कर्तव्य की लता में श्रम का पानी दो और ईमानदारी की खाद डालो, फिर देखो आपके आंगन में शान्ति के सुगन्धित पुष्प खिलेंगे, जो गहरी डुबकी लगाता है, वही सागर के धरातल को छू पाता है। अमूल्य रत्न उसे ही प्राप्त होते हैं। जब आप दूसरों की बुराई छोड़ देंगे, आपकी भलाई अपने आप शुरू हो जाएगी। जब आप घृणा करना छोड़ देंगे तो प्रेम की सुगन्ध अपने आप फूटने लगेगी, जिनका जीवन अहंकार और कामनाओं से सना है, वह अपने चारों ओर अशान्ति की तरंगे ही फैलाते हैं। सम्मान केवल इच्छा कर लेने मात्र से प्राप्त नहीं होता, बल्कि दूसरों का सम्मान करने के लिए आपको स्वयं पहल करनी चाहिए, फिर देखो आपको भी उसी प्रकार सम्मान प्राप्त होना शुरू हो जाएगा, यह भी याद रखो कि सुपात्र को सम्मान न देकर कुपात्र पर कृपाएं लुटाने से बरबादियों का रास्ता खुलता है।
अपने को श्रेष्ठ मानने और दूसरों को सम्मान न देने के इस दौर में अपने जमाने के महान Rिकेट खिलाड़ी रहे सुनील गावसकर ने मुंबई के पाटिल स्टेडियम में जो बड़प्पन दिखाया, वह वाकई प्रशंसनीय है। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर के सामने लिटिल मास्टर गावसकर का सार्वजनिक रूप से नतमस्तक होना ऐसा सुखद अहसास है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। सचिन के एक दिवसीय Rिकेट मैच का पहला दोहरा शतक जमाने के बाद गावसकर ने उनके समक्ष नतमस्तक होने की इच्छा जताई थी और उन्होंने वास्तव में ऐसा कर दिखाया। खेल हो, राजनीति या व्यवसाय, एक-दूसरे से आगे निकलने की आपाधापी में ऐसे लम्हे शायद ही देखने को मिलते हों। जब सचिन ने Rिकेट मैदान पर कदम नहीं रखा था, तब दुनियाभर में सुनील मनोहर गावसकर की ही तूती बोलती थी। यह मानने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपने दौर में गावसकर ही Rिकेट के सचिन थे। ऐसे महान खिलाड़ी का महानतम खिलाड़ी को इस तरह सम्मान देना खिलाड़ियों के साथ-साथ उन सभी लोगों के लिए भी प्रेरणा का संदेश है, जो अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर बैठे हैं।
इससे युवाओं को अवश्य प्रेरणा लेना चाहिए। जीवन में केवल सफलता ही सब कुछ नहीं है, सफलता के साथ-साथ सज्जनता और सहजता का भाव भी होना चाहिए, तभी व्यक्ति को सच्चा सम्मान हासिल होता है। वास्तव में हम दूसरों का सम्मान करते हुए ही अपना सम्मान बढ़ाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि आज आपने जिसे सम्मान दिया हैा, वह तुरंत ही आपको सम्मान देगा। सम्मान देना उस धन की तरह है, जिसे आपने देकर बैंक में सुरक्षित रख दिया। अब वह धन जब भी लौटेगा, कुछ नया लेकर ही लौटेगा। आज आपने जिसे सम्मान दिया, संभवत: किसी दूसरे अनजाने शहर में वह आपको मिल जाए। तब देखो वह किस तरह से आपका सम्मान करता है। सम्मान देने से ही नहीं, बल्कि देते रहने से बढ़ता है। सम्मान की भावना हृदय की गहराइयौं से आती है। इसलिए जब भी किसी का सम्मान करो, दिल से करो। यह न सोचो कि इसके बदले में हमें क्या मिलेगा? सम्मान के बदले में मिलने वाली जो भी वस्तु होगी, वह हमें प्रसन्नता ही दिलाएगी, इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
जीवन की अच्छाई और बुराई रबर की गेंद की तरह है। जो लौटकर आएगी ही। जब बुरंे कार्य लौटकर आते हैं, तो उसका अंजाम भी बुरा ही होता है। तो क्यों न अच्छे कार्य ही किए जाएँ, ताकि जब वे लौटकर आएँ, तो सुपरिणाम लेकर आएँ। इन परिणामों से हम सम्बल मिलेगा और हम उससे भी अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे। इस तरह से सकारात्मक विचारों का एक ऐसा प्रवाह शुरू होगा, जिससे कई लोग लाभान्वित होंगे। सम्मान की एक डोर अपने आप से ही जुड़ी होती है। सम्मान देंगे, तो सम्मान के अधिकारी होंगे। किसी को अपमानित कर उससे सम्मान प्राप्त करने का सपना देखना अनुचित है। अहंकार में डूबकर कई बार लोग यह कहते नजर आते हैं कि उसके घर में हमें पानी भी नही मिला। संभव है उस घर में कुछ ऐसा हो गया हो, जिससे सदस्य मेहमानवाजी भूल गए हों, या फिर वे भी वही कर रहे हों, जैसा आपने उनके लिए किया था। जब ऐसी स्थिति आए, तो थोड़ा रुककर यह विचार करें कि कहीं हमसे तो कोई चूक नहीं हो गई? यह ध्यान रखें कि व्यक्ति कभी दोषी नहीं होता, हालात दोषी होते हैं। मानव परिस्थितियों के वश में होता है, तो कई बार कुछ ऐसा कर जाता है, जिसे उसे नहीं करना था। सम्मानित होने के लिए बरसों की तपस्या करनी पड़ती है और अपमानित करने के लिए कुछ पल ही काफी होते हैं। यदि हम एक बच्चे से भी कुछ प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं, तो वह हमारे लिए सम्माननीय है। हमें उसका आदर करना चाहिए। सम्मान का भाव भीतर से आता है। इसलिए इसे मस्तिष्क से नहीं जोड़ना चाहिए। हृदय की कोमल भावनाएँ सम्मान के भाव के साथ जुड़ी होती हैं। इसलिए सदैव स्मरण रखें कि सम्मान दोगे, तभी सम्मान पाओगे।

अपनी जड़ें
अक्सर देखा जाता है कि जिस पेड़ की जड़ें जितनी अधिक गहरी होंगी, वह पेड़ उतनी ही मजबूती के साथ टिका रहता है। तूफान भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते, जो अपनी जड़ों को मजबूत रखते हैं। जड़ों का मजबूत होना इस बात का परिचायक है कि उसके संस्कारों ने उसे सींचा है, तभी जड़ें इतनी मजबूत हैं। मानव की जड़ों को समझना हो, तो हमें उसके संस्कारों को देखना होगा। तभी हम उसके व्यक्तित्व को अच्छी तरह से समझ पाएँंगे। जड़ों का आशय अतीत से भी है। वर्तमान की कोख में अतीत का बीज होता है। भविष्य की नींव भी अतीत से ही तैयार होती है। जो अपना अतीत भूल जाता है, वह आगे चलकर सब कुछ भूल जाता है। अतीत की गलतियाँ ही मानव को तराशती हैं। इतिहास हमें इसीलिए ही पढ़ाया जाता है, ताकि हम उन गलतियों से सबक सीख सकें, जो हमारे पूर्वजों ने की थी। उन गलतियों को न दोहराना ही हमारा पहला कर्तव्य है। जो जड़ों से दूर होता है, वह अपने भविष्य की बुनियाद को ही तोड़ देता है। हमारे बीच ऐसे बहुत से महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने लम्बे संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त की। इसके बाद भी वह अपने पुराने दिनों को नहीं भूल पाए।
एक घटना याद आती है। एक बहुत बड़ी प्रेस के मालिक ने अपनी बहुत बड़ी प्रिन्टर मशीन के पास एक पुरानी प्रिन्टर मशीन को रखा करते थे। लोगों ने कई बार इसका कारण पूछा, वे हमेशा टाल देते। एक बार उनकी संतानों ने उस मशीन को हटवा दिया। इससे वे काफी नाराज हुए। बच्चों को डॉंटते हुए उन्होंने कहा कि मैंने अपने इस व्यवसाय की शुरुआत इसी मशीन से की थी। इसी मशीन से ही मैं आज बड़ी प्रिंटिंग प्रेस का मालिक बन पाया हूँ। मैं अपने अतीत को याद रखते हुए ही सफलता के इस मुकाम पर पहुँचा हूँ। ये मशीन मुझे अपने संघर्ष के दिनों की याद दिलाती है। इससे मेरा लगाव तुम बच्चों से भी अधिक है। मेरी कोमल भावनाएँ इससे जुड़ी हुई हैं। आज इस व्यवसाय में मुझे बड़ा घाटा भी हो जाए, तो यह मशीन मुझे संबल देगी। मुझे विश्वास है कि मैं इसी मशीन से फिर वही मुकाम हासिल कर लूँगा। ये मशीन मुझे कभी दु:खी होने नहीं देगी। तब बच्चों ने समझा कि आखिर यह पुरानी मशीन इस नई मशीन के पास क्यों रखी है।
जीवन में भी यही होता है। अपनी जड़ों से दूर होने वाले दु:खी होते हैं। जिस वृक्ष की जड़ें सूख जाती हैं, वह कमजोर होकर एक दिन उखड़ जाता है। मजबूत जड़ों के वृक्ष कभी धराशायी नहीं होते। सुनहरे भविष्य की ओर तभी बढ़ा जा सकता है, जब हम अतीत को याद रखते हुए आगे बढ़ते हैं। ठीक उस नाविक की तरह जो वर्तमान यानी पानी में रहते हुए पतवार चलाता है, उसकी नजरें अतीत की ओर टिकी होती हैं, पर वह भविष्य की ओर बढ़ता रहता है। बरसों बाद यदि कोई अपनी मातृभूमि की ओर लौटता है, तो उस क्षेत्र की माटी का एक-एक कण उसे अपनी ओर बुलाता है। इंसान भावनाओं में बहकर उस माटी से जुड़ जाना चाहता है। उसे बार-बार चूमता है। वह उसी माटी में रम जाना चाहता है। इसे ही कहते हैं जड़ों से जुड़ाव
असल में अपनी धरती, अपनी माटी की खुशबू, अपनी बोली, अपना पहनावा ये सब तत्व मिलकर जड़ का निर्माण करते हैं। हर किसी के अंदर रचा-बसा होता है, और सारी दुनिया एक तरफ़ और अपनी जड़ से जुड़े होने का अहसास एक तरफ़। लेकिन जिस प्रकार अपनी जड़ों से जुड़े होने की खुशी अतुलनीय है, ठीक उसी प्रकार उनसे दूर होने का ग़म भी। हमारी जड़ें लगभग पेड़-पौधों की जड़ों जैसी ही होती हैं। जिस तरह पेड़-पौधों की जड़ें न दिखाई देते हुए भी उनका अभिन्न एवं महत्वपूर्ण अंग होती हैं, उसी तरह इंसान की जड़ें भी हमेशा उसके अंदर ही विद्यमान होती हैं। अंतर केवल इतना है कि पेड़-पौधे चाहे आसमान की बुलंदियों को क्यों न छू लें, वे सदैव अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। इसे एक तरह से आप उनके लिए प्रकृृति का वरदान कह सकते हैं। लेकिन मनुष्य शायद प्रकृति के इस वरदान से वंचित रह गया। इस सिंसार में कभी पेट की खातिर तो कभी किन्हीं और कारणों से उसे अपनी जड़ों से दूर होना पड़ता है। और यकीन मानिये ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जो एकाएक अपनी जड़ों से दूर होने पर इस चीज़ का अहसास कर पाते हैं। अधिकतर या तो सुख-सुविधाओं की चकाचौंध में खो जाते हैं या फि़र कुछ इतने मजबूर होते हैं कि उनके पास ये सब सोचने का वक्त ही नहीं होता। लेकिन इस दुनिया की भागदौड़ में इंसान कितना भी क्यों न भाग ले, देर-सबेर उसे अपनी जड़ें ही याद आती हैं।
जब पशु-पक्षी भी अपनी जड़ों के प्रति इतना प्रेम रख सकते हैं तो फि़र बुद्धिजीवी कहलाने वाला मनुष्य क्यों नहीं? जो अपनी जड़ों के प्रति असंवेदनशील हैं उन्हें पाशु-पक्षियों से कुछ सीख अवश्य लेनी चाहिए।
इसी बात पर किसी कवि ने क्या खूब कहा है
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश (जड़) का प्यार नहीं॥

डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 24 सितंबर 2011

असीमित अधिकार ही हैं भ्रष्टाचार का मूल कारण

डॉ. महेश परिमल
आपने कभी सोचा है कि सरकारी दफ्तर का बाबू आपसे इतना अकड़ और रुआब से बात क्यों करता है? शोधकर्ताओं ने इसका राज खोला है। अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों का ओहदा उन्हें प्रदत्त अधिकार के हिसाब से छोटा होता है, वे अक्सर लोगों के लिए समस्याएं पैदा करने वाली गतिविधियों में लगे रहते हैं। यानी मौका मिलते ही लोगों को नीचा दिखाने जैसी हरकत करने से बाज नहीं आते हैं। धीरे-धीरे यह बात उनकी आदत में शामिल हो जाती है और वे भ्रष्ट होने लगते हैं। देश में भ्रष्टाचार सचमुच बढ़ गया है, तभी तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएँगे। भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा। अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री का यह कहना सचमुच यह बताता है कि देश में भ्रष्टाचारियों की संख्या बढ़ गई है। वैसे देखा जाए, तो भ्रष्टाचार हमारी देन है ही नहीं, इसलिए देश के नेता इससे निपटने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यह तो अंगरेजों से हमें विरासत में मिली है। आज यदि देश की जनता अपना सही काम करवाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेती है, तो उसके पीछे बेशुमार अधिकार के स्वामी देश के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और नेता हैं। एक रिश्वत न देने वाले आम आदमी को परेशान करने के लिए इनके पास इतने अधिकार हैं कि वह अपने सही काम को कराने के लिए लाख एड़ियाँ रगड़ ले, उसका काम कभी नहीं होगा। इस दौरान वह कई नियम-कायदों से बँधा होगा, लेकिन रिश्वत देते ही वह सारे कायदों से मुक्त हो जाता है। यह देश की विडम्बना है।
हमारे देश में भ्रष्टाचार कितना फैल चुका है, यह जानने के लिए किसी सर्वेक्षण की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए तो अमेरिका की गेलप नामक कंसल्टंसी फर्म की रिपोर्ट ही पर्याप्त है। इसने भारत में फैले भ्रष्टाचार के मामले पर एक सर्वेक्षण किया, जिसमें देश के विभिन्न शहरों के करीब 6 हजार लोगों से बात की। 47 प्रतिशत लोगों ने माना कि देश में भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फैल गया है। यह स्थिति पिछले 5-10 वर्ष पहले से अधिक गंभीर है। अन्य 27 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार को एक गंभीर समस्या निरुपित किया। इन लोगों का मानना था कि 5 साल पहले भी यही स्थिति थी। हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह से लोगों ने अपना नैतिक समर्थन दिया, उससे यह स्पष्ट हे कि देश का आम आदमी इस भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए अब वह उथल-पुथल के मूड में दिखाई दे रहा है।
इस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि देश के 78 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र में अधिक फैला हुआ है। 71 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि देश के उद्योगपति भी भ्रष्टाचार के लिए जवाबदार हैं। हाल ही में टाइम मैगजीन ने जो सर्वे किया, उसमें 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लिप्त ए. राजा को विश्व को दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी माना है। इसके पहले जो कॉमनवेल्थ गेम का घोटाला सामने आया, उससे देश के नागरिकों की सहिष्णुता को एक तरह से खत्म ही कर दिया। टेलिकॉम घोटाले ने उस पर अपनी मुहर ही लगा दी। भारतीय जनता यह मानती है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे बड़ा कारण सरकारतंत्र है। गेलप के सर्वेक्षण के मुताबिक भ्रष्टाचारियों को दंड देने में सरकार पूरी तरह से विफल साबित हुई है। इन भ्रष्टाचारियों से सबसे अधिक परेशान बेरोजगार युवा हैं। 21 प्रतिशत नागरिकों ने स्वीकार किया कि वे अपने काम को करवाने के लिए रिश्वत का सहारा लेते हैं।
भारत में भ्रष्टाचार, ये विषय आजकल लोगों में विशेषरूप से लोकप्रिय हो गया है। ब्र्ंे डाट इन नामक वेबसाइट द्वारा भारत में भ्रष्टाचार विषय पर एक रोचक तथ्य जारी किया है। उसके अनुसार भारत में सरकारी तंत्र की रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त है। नागरिकों को जिन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, उनमें 91 प्रतिशत सरकारी अधिकारी हैं। इसमें भी 33 प्रतिशत केंद्रीय कर्मचारी हैं। 30 प्रतिशत पुलिस अधिकारी और 15 प्रतिशत राज्य के कर्मचारी हैं। दस प्रतिशत नगरपालिक, नगरनिगम या ग्राम पंचायत के कर्मचारी हैं। भारतीय प्रजा के माथे पर तीन प्रकार की गुलामी लिखी हुई है। पहली गुलामी केंद्र सरकार की, जिसमें आयकर, आबकारी, कस्टम आदि विभाग आते हैं। दूसरी गुलामी राज्य सरकार की है, जिसके हाथ में बिक्रीकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग आते हैं। तीसरी गुलामी स्थानीय संस्थाओं की है। जिसके पास पानी, गटर, जमीन, मकान, सम्पत्ति कर आदि दस्तावेज बनाने के अधिकार हैं। इस तीन प्रकार की संस्थाओं को इतने अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं कि वे प्रजा को कायदा-कानून बताकर इतना अधिक डरा देते हैं कि न चाहते हुए भी प्रजा को रिश्वत देनी ही पड़ती है। इस तरह की खुली लूट हमें अंगरेजों द्वारा विरासत में मिली हुई है। आज इनके पास जो अधिकार हैं, वे वास्तव में अंगरेजों ने प्रजा को लूटने के लिए दिए गए थे। कानून का डर बताकर आम जनता को परेशान करने की यह प्रवृत्ति अंगरेजों से शुरू होकर आज उनके चाटुकारों तक पहुँच गई है, जो किसी न किसी तरह जनता को लूट रहे हैं। देश को आजादी मिलने के बाद इस तरह के कानूनों को रद्द करने के बजाए इसे और अधिक पल्लवित किया गया। उसके बाद तो यह कानून और अधिक धारदार हो गए। भारतीय दंड संहिता के अनुसार पुलिस को इतने अधिक अधिकार दे दिए गए कि एक साधारण सा सिपाही भी किसी आम आदमी को कानून का डर दिखाकर उससे रिश्वत की माँग कर सकता है। आज प्रजा जिन्हें रिश्वत देती है, उसमें 30 प्रतिशत पुलिस विभाग के कर्मचारी ही हैं।
ट्रेक डॉट इन के सर्वेक्षण के अनुसार देश के लोग सरकारी तंत्र को जो रिश्वत दते हैं, उसमें 77 प्रतिशत रिश्वत तो अपने सही काम को करवाने के लिए देते हैं। यानी सरकारी कर्मचारियों को जिस काम के लिए सरकार वेतन देती है, उसी काम को करने के लिए ये कर्मचारी लोगों से रिश्वत लेते हैं। यदि इन्हें रिश्वत न दी जाए, तो आम जनता के काम ताक पर रख दिए जाते हैं। इससे जनता को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। समझ में नहीं आता कि इन कर्मचारियों को इतने अधिकार आखिर क्यों दे दिए गए हैं? यदि कोई काम नहीं हो पाताऔर जनता को नुकसान उठाना पड़ता है, तब इन्हें सजा क्यों नहीं होती? प्रजा के पास इनके खिलाफ अदालत जाने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं है। आज अदालतों की जो हालत है, उसे देखकर नहीं लगता कि आम आदमी को सही समय पर न्याय मिल पाएगा? यही कारण है कि आज सरकारी कर्मचारी निरंकुश हो गए हैं। सर्वेक्षण के अनुसार प्रजा जो रिश्वत देती है, वह रकम काफी बड़ी नहीं होती, छोटे-छोटे काम की छोटी-छोटी राशि। देश के 14 प्रतिशत नागरिक करीब ढाई लाख रुपए सरकारी कर्मचारियों को हर महीने बतौर रिश्वत देते हैं। जिस अधिकारी के पास जितने अधिक अधिकार होते हैं, उसे उतनी अधिक रिश्वत मिलती है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला इसीलिए हो पाया कि ए. राजा के पास इतने अधिक अधिकार थे कि वह जिसे चाहे जितनी अधिक रिश्वत लेकर उन्हें उपकृत कर सकता था। इसलिए यह धंधा खूब फला और फूला। यह सब सत्ता के केंद्रीयकरण के कारण ही संभव हो पाया।
भ्रष्टाचार का मूल स्रोत हमारे द्वारा सरकार को दिया जाने वाले अरबों रुपए के तमाम टैक्स हैं। जनता ईमानदारी के साथ टैक्स चुकाती है, वही राशि कर्मचारियों के मन में लालच पैछा करती है। देश के रग-रग में बसे इस भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए एक नई आजादी की आवश्यकता है। गांधीजी ने जिस तरह असहयोग आंदोलन चलाया था, उसी तरह यदि जनता कोई ऐसा उपाय करे, जिससे सरकार परेशान हो जाए, तो निश्चित रूप से इस देश को एक नई दिशा मिल सकती है। पर इसके लिए जिस नेतृत्व की आवश्यकता है, वह ईमानदारी नेता हमारे बीच नहीं है। कई अन्ना हजारे मिलकर ही यह काम कर सकते हैं। अधिकारियों को मिलने वाले असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया जाए, शायद तभी देश भ्रष्टाचारमुक्त हो पाए और ईमानदारी के एक नए सूरज का स्वागत करने के लिए यह पीढ़ी तैयार रहे।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

विरोध का औचित्य










दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में संपादकीय पेज पर प्रका‍शित मेरा आलेख

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http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-09-22&pageno=8

शनिवार, 17 सितंबर 2011

आम आदमी पर तेल कंपनियों के घाटे की मार










दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

सँभलकर पूरी करें संतान की चाहत










नई दुनिया रायपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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http://www.naidunia.com/epapermain.aspx

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

मौतों को स्वीकारना हमारी विवशता





डॉ. महेश परिमल


हमारा देश की रिवायत बड़ी अजीब है। आतंकवादियों के हाथों यदि कुछ लोग मारे जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोक संवेदनाएँ जारी होने लगती है। नेता से लेकर नागरिक तक संवेदनाओं में डूब जाते हैं। सचमुच वह मौत भी भयानक होती है। पर सोचो कोई अपने पूरे परिवार के साथ कही घूमने निकला है, रास्ते में कोई ट्रक आकर उनके वाहन को कुचल देता है। सभी लोग मारे जाते हैं। क्या बीतती होगी, उनके परिजनों पर? यही हाल काम के लिए दफ्तर जाने को निकला घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य रास्ते में किसी अज्ञात वाहन की चपेट में आ गया, उसने वहीं दम तोड़ दिया, क्या होगा उस परिवार का? उस वाहन ने एक नहीं कई जिंदगियां ले ली। सड़क पर एक हादसा, कई परिवार को उजाड़ देता है। इसे अभी तक हम नहीं समझ पाए हैं। शायद समझने मे ंबरसों लग जाए। क्योंकि इसे समझने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। देश में आतंकवादी यदि 50 लोगों को मार डालते हैं, तो सड़क पर दौड़ने वाले ये हत्यारे तो साल भर में पौने दो लाख लोगों को मार डालते हैं, फिर भी हमारे चेहरे पर शिकन तक नहीं। कहाँ चली जाती है हमारी संवेदनाएँ? ये मौतें हमारे अपनों द्वारा ही हमें दी जा रही है और हम इसे शान से स्वीकार कर रहे हैं। भला कहीं देखी है ऐसी सहिष्णुता!
हमारे देश की सड़कों पर वाहनों के रूप हत्यारे दौड़ते हैं। ये हत्यारे हर घंटे 14 लोगों को मार डालते हैं। आँकड़ों के आधार पर आगे बढें़, तो स्पष्ट होगा कि एक वर्ष में डेढ़ लाख लोग सड़कों पर दुर्घटनाओं के दौरान मारे जाते हैं। इतनी अधिक मौतें तो जापान जैसे आपदा वाले देश में भी नहीं होती। हाल ही जापान में आए सूनामी के दौरान भी इतनी मौतें नहीं हुई, जितनी हमारे यहाँ सड़कों पर हो जाती है। यदि हमारे देश के नागरिकों में यातायात के नियमों का सख्ती से पालन करने की प्रवृत्ति जागे, तो इसमें कमी आ सकती है।
आँकड़ों पर ध्यान दें, तो यह बात सामने आई कि 2010 में सड़क दुर्घटनाओं में एक लाख 90 हजार लोगों ने अपनी जान गवाँ दी। इनमें से अधिकांश की उम्र 5 वर्ष से 29 वर्ष के बीच है। सड़कों पर दौड़ने वाले हत्यारों ने पिछले वर्ष हमारे देश में एक लाख 18 हजार लोगों के प्राण लिए थे। इस बार इसमें 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दिनों-दिन इसमें वृद्धि होते ही जा रही है। ऐसा क्यों होता है? क्या वाहन चालक अधीर बन गए हैं, या उनमें अनुशासन की भावना ही खत्म हो गई है? क्या वह यातायात नियमों की ध"िायाँ उड़ाने में अपनी शान समझते हैं? क्या शराब पीकर वाहन चलाने वालों की संख्या बढ़ रही है? क्या पैदल चलने वालों की अपेक्षा वाहन चालकों की संख्या बढ़ गई है? क्या यातायात पुलिस अपने कर्तव्य वहन में पीछे रह गई है? ऐसे बहुत से सवाल हैं, जो जवाब के इंतजार में हैं, पर जवाब कौन दे?
विश्व में सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक मौतें हमारे ही देश में होती हैं। यह आघातजनक है। किसी भी देश के विकास में सड़कों का महत्वपूर्ण योगदान है। सड़कों की हालत को बेहतर से बेहतर बनाए रखने के लिए विश्व के सभी देश एक मोटी राशि खर्च करते हैं। इसके अलावा सड़कों की सुरक्षा पर भी काफी खर्च करते हैं। हमारे देश में भी ऐसा ही हो रहा है। सड़कों पर काफी खर्च होने के बाद भी सड़क दुर्घटनाएँ बढ़ रहीं हैं, तो इसका मतलब यही हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ है। हाल ही में यूनो का एक सर्वेक्षण सामने आया है। जिसमें यह कहा गया है कि 2021 में सबसे अधिक मौतें सड़क दुर्घटनाओं से ही होगी। वैसे इसके बहुत से कारण हैं। इसे हम सभी बहुत ही अच्छी तरह से समझते हैं, फिर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि आज शहरों के फुटपाथों पर ठेले खड़े होने लगे हैं। दुर्घटनाओं का यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इसके पीछे कारण यही है कि सरकार की नीयत साफ नहीं है। सरकार कुछ करना ही नहीं चाहती। यदि चाहती भी है, तो छुटभैये नेता उसे ऐसा नहीं करने देते। आखिर यह वोट का मामला जो है।
दूसरी ओर शराब पीकर वाहन चलाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। इसमें हम ही सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रखना चाहते। कहा जाता है कि जो सोया है, उसे तो उठाया जा सकता है, लेकिन जो जागा हुआ है, उसे कैसे जगाया जाए? कानून तोड़ना हमारे लिए आज एक मजाक बनकर रह गया है। पालक बनकर हमें अपने ब"ाों के नन्हें हाथों पर वाहन देकर गर्व का अनुभव करते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हमने कानून को अपने हाथ में लिया है। एक गलत हाथों पर वाहन का होना यह दर्शाता है कि वह कई मौतों का वायज बन सकता है।
यहाँ यह बात ध्यान देने लायक है कि यूरोपीय देशों की तुलना में हमारे देश के शहरों में वाहनों संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। शहरों में एक परिवार में तीन वाहनों का होना अब आम बात है। जितने सदस्य उतने वाहन। दिल्ली में 50 लाख वाहन हैं। इसमें रोज डेढ़ सौ वाहनों की वृद्धि रही है। इतने अधिक वाहनों को अपने भीतर समाने की क्षमता दिल्ली शहर में नहीं है। यही हाल मुंबई ही नहीं,बल्कि अन्य शहरों का है। इसके अलावा आज लोगों में इतना अधिक उतावलापन आ गया है कि एक सेकेंड की देर भी उन्हें बर्दाश्त नहंीं। इसलिए वे अपने वाहन को तेज और तेज करना चाहते हैं। तेज वाहन चलाने वाले यह भूल जाते हैं कि अगले ही मोड़ पर मौत उनका इंतजार कर रही होती है। दूसरी ओर आजकल लोग मोबाइल पर बातें करते हुए वाहन चलाने लगे हैं। यह भी मौत का एक कारण है। मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाने वाला अपनी जान तो गँवाता ही है, बल्कि दूसरों की मौत का भी कारण अनजाने में बन जाता है।
सड़क दुर्घटनाओं में ऐसे कई लोग हैं, जो निर्दोष होते हुए भी कई बार घायल हो जाते हैं। ऐसे लोगों की संख्या काफी अधिक है, जो विकलांग होकर अपना जीवन ढोने को विवश हैं। हम मौतों पर अधिक ध्यान देते हैं, पर दुर्घटनाओं में घायल होने वालों को छोड़ देते हैं, जिनकी हालत जिंदा लाश की तरह होती है। सरकारी मशीनरी मुस्तैदी से अपना काम करे, उन पर कोई राजनीतिक दबाव न हो, यातायात पुलिस भी ईमानदारी दिखाए, और हम कानून की ध"िायाँ उड़ाने में अपनी शान न समझें, तो संभव है कि हम सड़क पर दौड़ने वाले इन हत्यारों पर लगाम कस सकते हैं। कहीं न कहीं से शुरुआत तो करनी ही होगी।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 10 सितंबर 2011

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

बाहुबलियों पर कार्रवाई:सीबीआई का बाहुबल

डॉ. महेश परिमल
भाजपा के लिए अब मुश्किल भरे दिनों की शुरुआत हो गई है। अवैध खनन को संरक्षण देने के आरोप में पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को अपना पद छोड़ना पड़ा था, अब सीबीआई ने रेड्डी बंधुओं को गिरफ्तार कर पार्टी को परेशानी में डाल दिया है। अब तक भ्रष्टाचार को लेकर अपना परचम ऊँचा करने वाली भाजपा घिर गई है। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर है। यह सभी जानते हैं। पर यही रेड्डी बंधु भाजपा के गले की हड्डी बन गए हैं। फिर भी उसे यह उम्मीद है कि जर्नादन रेड्डी पाक साफ निकलेंगे। साथ ही यह कहने में नहीं चूकती कि पूरा मामला उनके निजी व्यवसाय से सबंधित है, न कि पार्टी से। भाजपा प्रवक्ता धनंजय कुमार का यह बयान हताशापूर्ण अधिक लगता है। क्योंकि जिसे सब जानते हैं, उन्हें वे पाक-साफ बताने पर तुले हुए हैं। अभी तो पूछताछ शुरू ही हुई है। संभवत: सीबीआई उनसे कुछ न उगलवा पाए। अपने बाहुबल से वे काफी कुछ ऐसा कर सकते हैं, जिससे उन पर किसी तरह की आँच न आए।
सीबीआई के मुताबिक जनार्दन रेड्डी के घर छापे के दौरान 1.5 करोड़ नकद जबकि उनके भाई श्रीनिवास रेड्डी के घर 30 किलो से अधिक सोना और 3 करोड़ से अधिक रुपए बरामद किए गए हैं। जनार्दन रेड्डी के घर छापे के दौरान सीबीआई ने उनका निजी हेलीकॉप्टर ‘रुक्मिणी’ भी जब्त किया है। जांच एजेंसी के अधिकारियों ने उनकी पत्नी लक्ष्मी अरुणा से भी पूछताछ की है। ओबुलापुरम माइनिंग कॉरपोरेशन (ओएमसी) के प्रबंध निदेशक बी वी श्रीनिवास रेड्डी को भी गिरफ्तार किया है। इस कॉरपोरेशन के मालिक जनार्दन रेड्डी हैं। सीबीआई की 10 अफसरों की टीम ने सोमवार को तड़के रेड्डी के घर पर छापा मारा और उन्हें किसी अज्ञात जगह पर ले जाकर पूछताछ की जो रिश्ते में जनार्दन के भाई लगते हैं। श्रीनिवास रेड्डी से भी पूछताछ की गई है। छापे के दौरान सीबीआई को कई अहम सबूत मिले हैं। डीआईजी पी वी लक्ष्मी नारायण की अगुवाई में जांच एजेंसी की टीम रेड्डी बंधुओं को हैदराबाद ले गई है।
कर्नाटक में खनन के बेताज बादशाह माने जानेवाले रेड्डी बंधुओं पर गैरकानूनी तौर पर पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में खनन का काम किया है। पहले भी उनका नाम खनन से जुड़े कई मामलों में आ चुका है। कर्नाटक की राजनीति में अपनी धाक रखने वाले रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक लोकायुक्त की रिपोर्ट में दोषी करार दिये जाने के बाद डी. वी. सदानंद गौड़ा के नेतृत्व में करीब एक महीने पहले गठित कैबिनेट से बाहर रखा गया था। पहले रेड्डी बंधु राजनीति से दूर रहे थे लेकिन बाद में वो बीजेपी में शामिल हुए। कुछ ही महीने पहले रेड्डी बंधुओं के नजदीकी माने जाने वाले एक मंत्री ने तत्कालीन मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। उल्लेखनीय है कि गत 27 जुलाई को सौंपी गई कर्नाटक लोकायुक्त की रिपोर्ट में रेड्डी बंधुओं को अवैध खनन के मामले में आरोपी बनाया गया था। रेड्डी बंधुओं के खिलाफ कार्रवाई पर कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्तजस्टिस हेगड़े ने कहा है, ‘ऐसा लगता है कि सीबीआई ने मेरी रिपोर्ट पर संज्ञान लिया है।’ भाजपा ने कांग्रेस पर सीबीआई को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। रेड्डी बंधुओं की गिरफ्तारी से ऐसा लग रहा है कि भाजपा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक दिन पहले ही रविवार को राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और रेड्डी बंधुओं के करीबी श्रीरामुलु ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। बताया जाता है कि श्रीरामुलु दोबारा मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज थे। लोकायुक्त की रिपोर्ट में खनन घोटाले में रेड्डी बंधुओं- जी. जनार्दन और जी. करुणाकार रेड्डी के साथ-साथ उन पर भी उंगली उठाई गई है।
बेल्लारी बंधु के तौर पर मशहूर जनार्दन, करुणाकर और सोमशेखर रेड्डी सुषमा स्वराज के करीबी माने जाते हैं। पहली बार सुषमा स्वराज और रेड्डी बंधुओं की नजदीकी 1999 में सामने आई थी, जब बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। आरोप है कि सुषमा के चुनाव का पूरा खर्च भी रेड्डी बंधुओं ने ही उठाया था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित केंद्रीय उच्चाधिकार समिति (सीईसी) ने बेल्लारी जिले में अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहे अवैध खनन को उजागर किया। देश के चीफ जस्टिस एसएच कपाडिया को सौंपी अपनी अंतरिम रिपोर्ट में सीईसी ने कहा कि 2003 से 2009-10 के बीच वैध परमिट के बिना करीब 304.91 लाख मैट्रिक टन लौह अयस्क का खनन किया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए सीईसी की अंतरिम रिपोर्ट पर जवाब मांगा।
रेड्डी बंधुओं के बारे में यह माना यह जा रहा है कि पिछले 10 वर्षो में गैरकानूनी रूप से खनन के कारोबार में रेड्डी बंधुओं ने करीब 4,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक में जब भाजपा की पहली स्वतंत्र सरकार बनी, तो इसमें रेड्डी बंधुओं का विशेष हाथ था। पूरे दक्षिण भारत में रेड्डी बंधुओं की छाप माइनिंग माफिया के रूप में है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में असंवैधानिक रूप से खनिजों का खनन कर रेड्डी बंधुओं ने अरबों रुपए इकट्ठे किए हैं। इसी संपत्ति के कारण उनका बाहुबल इतना बढ़ गया कि वे कर्नाटक की राजनीति को अपनी जेब में रखते रहें। इसलिए मुख्यमंत्री भी उनसे पंगा लेना नहीं चाहते। भाजपा भले ही भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर पूरे देश में आंदोलन करती रहे, पर कर्नाटक में इस मामले में उसकी फजीहत ही होती है।
अब तो सभी को पता चल ही गया है कि आंध्र प्रदेश में एक मध्यम वर्गीय पुलिस कांस्टेबल के परिवार में रेड्डी बंधुओं का जन्म हुआ। उसी बेल्लारी ने इन रेड्डी बंधुओं को साइकिल पर घूमते हुए देखा गया है। आज से 13 वर्ष पूर्व 1998 में रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक के बेल्लारी एक फाइनेंस कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी धन के दोगुना करने का लालच देती थी। इससे उन्होंने करोड़ों की ठगी की। 2003 में रेड्डी बंधुओं ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के नाम पर 50 लाख रुपए का निवेश कर खदान का धंधा शुरू किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. राजशेखर रेड्डी का उन पर वरदहस्त था। परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के पुत्र राजशेखर रेड्डी उनके कारोबार में सहभागी थे। इसी समय चीन के बीजिंग में ओलम्पिक खेलों के लिए लोहे की आवश्यकता हुई, इसके लिए रेड्डी बंधु सामने आए और उन्होंने चीन को लोहे की भरपूर आपूर्ति की। इससे सन् 2003 से लेकर 2008 के बीच रेड्डी बंधुओं ने करीब 4000 करोड़ रुपए अर्जित किए। इन रेड्डी बंधुओं पर यह आरोप है कि इन्हें आंध्र प्रदेश में खनिज काम के लिए 450 हेक्टेयर जमीन दी गई थी, इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने आंध्रप्रदेश के पड़ोस में स्थित कर्नाटक के बेल्लारी जिले के जंगल की हजारों फीट जमीन पर कब्जा जमा लिया। फिर वहाँ से खनिज निकालने का काम शुरू किया। बेल्लारी जिले की एक माइनिंग कंपनी एमएसपीएल ने सरकार को आगाह किया कि रेड्डी बंधुओं ने उनकी जमीन पर असंवैधानिक रूप से खनन काम कर रहे हैं। पर रेड्डी बंधुओं की राजनीतिक पहुँच के कारण कुछ नहीं हो पाया। जंगल विभाग भी किसी की नहीं सुनता।
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर था। सरकार की तरफ से उन्हें हड़प्पा जिले में 24 हजार करोड़ रुपए की लागत से स्टल प्लांट स्थापित करने के लिए 10 हजार एकड़ जमीन दी गई। यही नहीं इसके बाद फिर 4 जार एकड़ जमीन उन्हें एयरपोर्ट के लिए दी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीधे-सीधे आरोप लगाया है कि रेड्डी बंधुओं के कारोबार में जगनमोहन रेड्डी भी भागीदार हैं। रेड्डी बंधुओं को दी गई जमीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर की गई। इससे सुप्रीमकोर्ट ने माइनिंग की लीज के खिलाफ स्टे ऑर्डर दिया था, पर बाद में इसे रद्द कर दिया गया। रेड्डी बंधुओं पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक राज्य की सीमा पर घुसपैठ कर वहाँ भी असंवैधानिक रूप से खनन कार्य किया है। इसके लिए उन्होंने दो राज्यों के बीच लगने वाले खंभों को भी उखाड़ दिया है। पहले रेड्डी बंधु कांग्रेस के समर्थक थे। पर 1999 जब सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज ने बेल्लारी से लोकसभा चुनाव लड़ा, तब से वे भाजपा केम्प में शामिल हो गए। इस चुनाव में सोनिया गांधी चुनाव जीत गई। पर अमेठी से भी जीतने के कारण उन्हें बेल्लारी की सीट छोड़नी पड़ी। इसका पूरा लाभ उठाते हुए रेड्डी बंधुओं की ताकत का इस्तेमाल करते हुए बेल्लारी लोकसभा सीट पर भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया।
रेड्डी बंधुओं ने अपनी आर्थिक ताकत का उपयोग राजकीय ताकत बढ़ाने के लिए किया। सन् 2000 में सोमशेखर रेड्डी बेल्लारी के नगर निगम चुनाव जीता। बेल्लारी की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने बी. श्रीरामुलु नामक दलित राजनेता की सहायता ली। इन्हें लोग चौथा रेड्डी बंधु के नाम से जानते हैं। सन् 2004 में करुणकर रेड्डी लोकसभा चुनाव बेल्लारी की सीट से जीता। उधर श्रीरामुलु विधानसभा की सीट से जीत गए। जनार्दन रेड्डी विधानपरिषद का चुनाव जीतकर एकएलसी बन गए। इस समय कर्नाटक में भाजपा-जेडी(यु)की गठबंधन सरकार थी। श्रीरामुलु उसके अध्यक्ष बन गए। इस समय जनार्दन रेड्डी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी पर 150 करोड़ रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगाकर बवाल मचा दिया। इसके चलते रेड्डी बंधु पूरे देश में पहचाने जाने लगे। 2008 में जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए, तब रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी जिले की 9 में से 8 सीटों पर भाजपा को जीत दिलाई। इसके बाद सरकार बनाने के लिए उन्होंने निर्दलीय विधायकों के लिए खजाना ही खोल दिया। इसका असर यह हुआ कि दक्षिण भारत में भाजपा ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान रेड्डी बंधुओं की ताकत इतनी बढ़ी कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को ब्लेकमेल करने लगे। 2009 में रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा से नाराज होकर उनकी सरकार ही गिराने की कोशिश की। तब सुषमा स्वराज ने बीच में आकर येद्दियुरप्पा की सरकार को बचा लिया। अब यदि रेड्डी बंधु यह कह दें कि वे कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, तो संभव है उन पर लगाम ढीली पड़ जाए।
डॉ. महेश परिमल

बाहुबलियों पर कार्रवाई:सीबीआई का बाहुबल


डॉ. महेश परिमल
भाजपा के लिए अब मुश्किल भरे दिनों की शुरुआत हो गई है। अवैध खनन को संरक्षण देने के आरोप में पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को अपना पद छोड़ना पड़ा था, अब सीबीआई ने रेड्डी बंधुओं को गिरफ्तार कर पार्टी को परेशानी में डाल दिया है। अब तक भ्रष्टाचार को लेकर अपना परचम ऊँचा करने वाली भाजपा घिर गई है। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर है। यह सभी जानते हैं। पर यही रेड्डी बंधु भाजपा के गले की हड्डी बन गए हैं। फिर भी उसे यह उम्मीद है कि जर्नादन रेड्डी पाक साफ निकलेंगे। साथ ही यह कहने में नहीं चूकती कि पूरा मामला उनके निजी व्यवसाय से सबंधित है, न कि पार्टी से। भाजपा प्रवक्ता धनंजय कुमार का यह बयान हताशापूर्ण अधिक लगता है। क्योंकि जिसे सब जानते हैं, उन्हें वे पाक-साफ बताने पर तुले हुए हैं। अभी तो पूछताछ शुरू ही हुई है। संभवत: सीबीआई उनसे कुछ न उगलवा पाए। अपने बाहुबल से वे काफी कुछ ऐसा कर सकते हैं, जिससे उन पर किसी तरह की आँच न आए।
सीबीआई के मुताबिक जनार्दन रेड्डी के घर छापे के दौरान 1.5 करोड़ नकद जबकि उनके भाई श्रीनिवास रेड्डी के घर 30 किलो से अधिक सोना और 3 करोड़ से अधिक रुपए बरामद किए गए हैं। जनार्दन रेड्डी के घर छापे के दौरान सीबीआई ने उनका निजी हेलीकॉप्टर ‘रुक्मिणी’ भी जब्त किया है। जांच एजेंसी के अधिकारियों ने उनकी पत्नी लक्ष्मी अरुणा से भी पूछताछ की है। ओबुलापुरम माइनिंग कॉरपोरेशन (ओएमसी) के प्रबंध निदेशक बी वी श्रीनिवास रेड्डी को भी गिरफ्तार किया है। इस कॉरपोरेशन के मालिक जनार्दन रेड्डी हैं। सीबीआई की 10 अफसरों की टीम ने सोमवार को तड़के रेड्डी के घर पर छापा मारा और उन्हें किसी अज्ञात जगह पर ले जाकर पूछताछ की जो रिश्ते में जनार्दन के भाई लगते हैं। श्रीनिवास रेड्डी से भी पूछताछ की गई है। छापे के दौरान सीबीआई को कई अहम सबूत मिले हैं। डीआईजी पी वी लक्ष्मी नारायण की अगुवाई में जांच एजेंसी की टीम रेड्डी बंधुओं को हैदराबाद ले गई है।
कर्नाटक में खनन के बेताज बादशाह माने जानेवाले रेड्डी बंधुओं पर गैरकानूनी तौर पर पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में खनन का काम किया है। पहले भी उनका नाम खनन से जुड़े कई मामलों में आ चुका है। कर्नाटक की राजनीति में अपनी धाक रखने वाले रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक लोकायुक्त की रिपोर्ट में दोषी करार दिये जाने के बाद डी. वी. सदानंद गौड़ा के नेतृत्व में करीब एक महीने पहले गठित कैबिनेट से बाहर रखा गया था। पहले रेड्डी बंधु राजनीति से दूर रहे थे लेकिन बाद में वो बीजेपी में शामिल हुए। कुछ ही महीने पहले रेड्डी बंधुओं के नजदीकी माने जाने वाले एक मंत्री ने तत्कालीन मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। उल्लेखनीय है कि गत 27 जुलाई को सौंपी गई कर्नाटक लोकायुक्त की रिपोर्ट में रेड्डी बंधुओं को अवैध खनन के मामले में आरोपी बनाया गया था। रेड्डी बंधुओं के खिलाफ कार्रवाई पर कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्तजस्टिस हेगड़े ने कहा है, ‘ऐसा लगता है कि सीबीआई ने मेरी रिपोर्ट पर संज्ञान लिया है।’ भाजपा ने कांग्रेस पर सीबीआई को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। रेड्डी बंधुओं की गिरफ्तारी से ऐसा लग रहा है कि भाजपा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक दिन पहले ही रविवार को राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और रेड्डी बंधुओं के करीबी श्रीरामुलु ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। बताया जाता है कि श्रीरामुलु दोबारा मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज थे। लोकायुक्त की रिपोर्ट में खनन घोटाले में रेड्डी बंधुओं- जी. जनार्दन और जी. करुणाकार रेड्डी के साथ-साथ उन पर भी उंगली उठाई गई है।
बेल्लारी बंधु के तौर पर मशहूर जनार्दन, करुणाकर और सोमशेखर रेड्डी सुषमा स्वराज के करीबी माने जाते हैं। पहली बार सुषमा स्वराज और रेड्डी बंधुओं की नजदीकी 1999 में सामने आई थी, जब बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। आरोप है कि सुषमा के चुनाव का पूरा खर्च भी रेड्डी बंधुओं ने ही उठाया था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित केंद्रीय उच्चाधिकार समिति (सीईसी) ने बेल्लारी जिले में अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहे अवैध खनन को उजागर किया। देश के चीफ जस्टिस एसएच कपाडिया को सौंपी अपनी अंतरिम रिपोर्ट में सीईसी ने कहा कि 2003 से 2009-10 के बीच वैध परमिट के बिना करीब 304.91 लाख मैट्रिक टन लौह अयस्क का खनन किया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए सीईसी की अंतरिम रिपोर्ट पर जवाब मांगा।
रेड्डी बंधुओं के बारे में यह माना यह जा रहा है कि पिछले 10 वर्षो में गैरकानूनी रूप से खनन के कारोबार में रेड्डी बंधुओं ने करीब 4,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक में जब भाजपा की पहली स्वतंत्र सरकार बनी, तो इसमें रेड्डी बंधुओं का विशेष हाथ था। पूरे दक्षिण भारत में रेड्डी बंधुओं की छाप माइनिंग माफिया के रूप में है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में असंवैधानिक रूप से खनिजों का खनन कर रेड्डी बंधुओं ने अरबों रुपए इकट्ठे किए हैं। इसी संपत्ति के कारण उनका बाहुबल इतना बढ़ गया कि वे कर्नाटक की राजनीति को अपनी जेब में रखते रहें। इसलिए मुख्यमंत्री भी उनसे पंगा लेना नहीं चाहते। भाजपा भले ही भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर पूरे देश में आंदोलन करती रहे, पर कर्नाटक में इस मामले में उसकी फजीहत ही होती है।
अब तो सभी को पता चल ही गया है कि आंध्र प्रदेश में एक मध्यम वर्गीय पुलिस कांस्टेबल के परिवार में रेड्डी बंधुओं का जन्म हुआ। उसी बेल्लारी ने इन रेड्डी बंधुओं को साइकिल पर घूमते हुए देखा गया है। आज से 13 वर्ष पूर्व 1998 में रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक के बेल्लारी एक फाइनेंस कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी धन के दोगुना करने का लालच देती थी। इससे उन्होंने करोड़ों की ठगी की। 2003 में रेड्डी बंधुओं ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के नाम पर 50 लाख रुपए का निवेश कर खदान का धंधा शुरू किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. राजशेखर रेड्डी का उन पर वरदहस्त था। परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के पुत्र राजशेखर रेड्डी उनके कारोबार में सहभागी थे। इसी समय चीन के बीजिंग में ओलम्पिक खेलों के लिए लोहे की आवश्यकता हुई, इसके लिए रेड्डी बंधु सामने आए और उन्होंने चीन को लोहे की भरपूर आपूर्ति की। इससे सन् 2003 से लेकर 2008 के बीच रेड्डी बंधुओं ने करीब 4000 करोड़ रुपए अर्जित किए। इन रेड्डी बंधुओं पर यह आरोप है कि इन्हें आंध्र प्रदेश में खनिज काम के लिए 450 हेक्टेयर जमीन दी गई थी, इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने आंध्रप्रदेश के पड़ोस में स्थित कर्नाटक के बेल्लारी जिले के जंगल की हजारों फीट जमीन पर कब्जा जमा लिया। फिर वहाँ से खनिज निकालने का काम शुरू किया। बेल्लारी जिले की एक माइनिंग कंपनी एमएसपीएल ने सरकार को आगाह किया कि रेड्डी बंधुओं ने उनकी जमीन पर असंवैधानिक रूप से खनन काम कर रहे हैं। पर रेड्डी बंधुओं की राजनीतिक पहुँच के कारण कुछ नहीं हो पाया। जंगल विभाग भी किसी की नहीं सुनता।
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर था। सरकार की तरफ से उन्हें हड़प्पा जिले में 24 हजार करोड़ रुपए की लागत से स्टल प्लांट स्थापित करने के लिए 10 हजार एकड़ जमीन दी गई। यही नहीं इसके बाद फिर 4 जार एकड़ जमीन उन्हें एयरपोर्ट के लिए दी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीधे-सीधे आरोप लगाया है कि रेड्डी बंधुओं के कारोबार में जगनमोहन रेड्डी भी भागीदार हैं। रेड्डी बंधुओं को दी गई जमीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर की गई। इससे सुप्रीमकोर्ट ने माइनिंग की लीज के खिलाफ स्टे ऑर्डर दिया था, पर बाद में इसे रद्द कर दिया गया। रेड्डी बंधुओं पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक राज्य की सीमा पर घुसपैठ कर वहाँ भी असंवैधानिक रूप से खनन कार्य किया है। इसके लिए उन्होंने दो राज्यों के बीच लगने वाले खंभों को भी उखाड़ दिया है। पहले रेड्डी बंधु कांग्रेस के समर्थक थे। पर 1999 जब सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज ने बेल्लारी से लोकसभा चुनाव लड़ा, तब से वे भाजपा केम्प में शामिल हो गए। इस चुनाव में सोनिया गांधी चुनाव जीत गई। पर अमेठी से भी जीतने के कारण उन्हें बेल्लारी की सीट छोड़नी पड़ी। इसका पूरा लाभ उठाते हुए रेड्डी बंधुओं की ताकत का इस्तेमाल करते हुए बेल्लारी लोकसभा सीट पर भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया।
रेड्डी बंधुओं ने अपनी आर्थिक ताकत का उपयोग राजकीय ताकत बढ़ाने के लिए किया। सन् 2000 में सोमशेखर रेड्डी बेल्लारी के नगर निगम चुनाव जीता। बेल्लारी की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने बी. श्रीरामुलु नामक दलित राजनेता की सहायता ली। इन्हें लोग चौथा रेड्डी बंधु के नाम से जानते हैं। सन् 2004 में करुणकर रेड्डी लोकसभा चुनाव बेल्लारी की सीट से जीता। उधर श्रीरामुलु विधानसभा की सीट से जीत गए। जनार्दन रेड्डी विधानपरिषद का चुनाव जीतकर एकएलसी बन गए। इस समय कर्नाटक में भाजपा-जेडी(यु)की गठबंधन सरकार थी। श्रीरामुलु उसके अध्यक्ष बन गए। इस समय जनार्दन रेड्डी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी पर 150 करोड़ रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगाकर बवाल मचा दिया। इसके चलते रेड्डी बंधु पूरे देश में पहचाने जाने लगे। 2008 में जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए, तब रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी जिले की 9 में से 8 सीटों पर भाजपा को जीत दिलाई। इसके बाद सरकार बनाने के लिए उन्होंने निर्दलीय विधायकों के लिए खजाना ही खोल दिया। इसका असर यह हुआ कि दक्षिण भारत में भाजपा ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान रेड्डी बंधुओं की ताकत इतनी बढ़ी कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को ब्लेकमेल करने लगे। 2009 में रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा से नाराज होकर उनकी सरकार ही गिराने की कोशिश की। तब सुषमा स्वराज ने बीच में आकर येद्दियुरप्पा की सरकार को बचा लिया। अब यदि रेड्डी बंधु यह कह दें कि वे कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, तो संभव है उन पर लगाम ढीली पड़ जाए।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

कौन हरेगा विघ्नहर्ता का विघ्न?




डॉ. महेश परिमल
विघ्नहर्ता गणोश जी पधार रहे हैं। बस थोड़ा सा इंतजार। वे आएँगे, हमें कष्टों से मुक्ति दिलाएँगे। हम भी उन्हें मनाने के लिए अपने घर पर उनकी मूर्ति की स्थापना करेंगे। सुबह-शाम आरती होगी। लगातार 11 दिनों तक उत्सव का माहौल होगा। बाजारों में भीड़ बढ़ जाएगी। लोग गणोश जी को मनाने के लिए तरह-तरह के भोग लगाएँगे। बच्चों की तो पूछो ही नहीं, उनके लिए तो यह उत्सव वास्तव में उत्सव ही होगा। क्योंकि इस समय स्कूल जाने के साथ-साथ गणोश जी के कामों की भी जिम्मेदारी निभानी होती है। मोहल्ले में भी कहीं-कहीं गणोश जी की मूर्ति की स्थापना होती है। वहाँ का काम भी करना होता है। कुल मिलाकर समाज के सभी वर्गो को गणोश जी व्यस्त कर देंगे।
हम सभी गणोश जी से यह प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे दु:खों को हर लें। हम सभी भगवानों से यही प्रार्थना करते हैं। हमारे पास दु:खों का भंडार जो है। बेशुमार दौलत के ढेर पर बैठकर भी हम दु:खी हैं। एक जून रोटी खाकर भी हम दु:खी हैं। अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए भी हम दु:खी हैं। यदि सभी दु:खी हैं, तो फिर सुखी कौन है? वास्तव में हम दु:खी इसलिए हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि सामने वाला सुखी है। हमारे आधे दु:ख का यही कारण है। हम जिसे सुखी मानते हैं, वह भी वास्तव में सुखी कदापि नहीं है। वह भी सामने वाले की खुशी से दु:खी है। इस तरह से देखा जाए, तो सुखी कोई भी नहीं है। सुखी वह है, जो सबसे निर्लिप्त है। जिसकी आवश्यकताएँ सीमित हैं। जो देने में विश्वास करता है। जिसके भीतर न तो कटुता है और न ही कलुषता। हम कितनी भी प्रार्थनाएँ कर लें, कितनी भी आरती कर लें, जब तक हम अपने से ही संतुष्ट नहीं हो जाते, तब तक दु:खी ही रहेंगे।

आखिर दु:ख हरने वाले को भी दु:ख होता तो होगा ही। तो भला गणोश जी को भी क्यों न हो? मेरा विश्वास है कि अगर आप विसर्जन के बाद गणोश जी की स्थिति देख लें, तो आप भी उनके दु:ख से दु:खी हो जाएँगे। कभी देखा है, विसर्जन के बाद उनकी प्रतिमाओं को? टूटी-फूटी मूतियांँ, कटे हुए हाथ-पाँव, कहीं धड़, कहीं शरीर का एक टुकड़ा, कहीं दूसरा टुकड़ा बिखरा पड़ा होता है। बड़ी कोफ्त होती है गणोश जी को इस स्थिति में देखकर। ये तो हमारे आराध्य हैं, इनकी ऐसी हालत भला क्यों हुई? कभी जानने की एक छोटी-सी कोशिश की आपने? शायद इससे लोगों को बुरा लगा होगा। हमारा काम तो प्रतिमा की पूजा करना और फिर उसका विसर्जन करना है। बस यहाँ आकर हमारी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। वास्तव में हमारी सही जिम्मेदारी तो यहीं से शुरू होती है। अपने आराध्य का क्षत-विक्षत रूप देखकर हमें दु:ख नहीं होता, तो फिर आपको गणोश जी की ही नहीं, बल्कि किसी भी देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए। देवता भी ऐसे भक्तों की परवाह नहीं करते, जो बाहर से कुछ और भीतर से कुछ और होते हैं। आखिर क्यों होता है ऐसा?
क्या जगह-जगह गणोश जी की मूर्तियों की स्थापना करना आवश्यक है? एक मोहल्ले में एक ही प्रतिमा की स्थापना हो, तो क्या बुरा है? फिर घर पर तो हम मूर्ति की स्थापना करते ही हैं। हमारे भीतर भी तो सभी आराध्यों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। तो फिर बाहर का दिखावा क्यों? सच्च भक्त अपने देवता की बुरी हालत को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। यह स्थिति देखकर तो वह संकल्प ही ले लेगा कि अब वह कभी भी अधिक से अधिक प्रतिमाओं की स्थापना की धारणा को तोड़ने का काम करेगा। वह क्यों चंदा दे, गली-गली में स्थापित होने वाले गणोश जी के कार्यक्रमों के लिए? इसके अलावा गणोश जी माटी के बनें हो तो कितना अच्छा होगा। पानी में घुलकर माटी फिर से तलहटी पर चली जाएगी। पर प्रतिमा पर लगा रंग तो पानी को प्रदूषित ही करेगा। लोग प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाएँ खरीदते हैं, जो पानी में नहीं घुलती। इससे पानी तो प्रदूषित होगा ही। गहरे केमिकल भी पानी को स्वच्छ नहीं रहने देंगे। क्या इस तरह से हम कोई अपराध तो नहीं कर रहे हैं। पुलिस कार्रवाई तो बाद में होगी, पर हमारे आराध्य हमसे नाराज ही हो जाएँगे, तब हम क्या करेंगे? हम उन्हें नाराज करने का ही काम कर रहे हैं।
हर साल गणोश जी की प्रतिमाएँ बड़ी से बड़ी होती जा रहीं हैं। भला उस मोहल्ले की प्रतिमा हमारे मोहल्ले की प्रतिमा से छोटी क्यों रहे। पिछले साल हमने 12 फीट ऊँची प्रतिमा बनवाई थी, इस बार 15 फीट प्रतिमा का ऑर्डर दिया है। चंदा भी खूब हुआ है। प्रतिमा तो बड़ी होगी ही। यह बात अलग है कि चंदा लेने में न जाने कितने भले लोगों को धमकी भी दी है। धमकी सहने वाले सभी इज्जतदार लोग हैं, उनकी भी माँ-बेटियाँ हैं। उन्हें भी समाज में रहना है। चंदा लेने वाले देने वाले की पीड़ा तो समझना ही नहीं चाहते। उन्हें तो गणोश जी प्यारे और चंदा प्यारा! बाद में चंदे के धन का किस तरह से दुरुपयोग होता है, यह सभी जानते हैं। हर साल से यही परंपरा चल रही है। हम चंदा देकर इस गलत परंपरा को केवल निभा रहे हैं।
उस दिन एक गरीब आदमी प्रतिमा स्थल के पास हमारे आराध्य की टूटी-फूटी मूर्तियाँ इकट्ठा कर रहा था। साथ-साथ रोता भी जा रहा था। वहीं से गुजरते हुए मैंने जब उससे पूछा कि आखिर तुम रो क्यों रहे हो? उसका कहना था कि अपने आराध्य की यह स्थिति देखकर कौन नहीं रोएगा? सचमुच उसके द्वारा जमा की गई चीजों में आराध्य के कई अंग बिखरे पड़े थे। अरे! हम तो इंसानों के ऐसे अंगों को देखकर दहल जाते हैं, फिर ये तो हमारे आराध्य हैं। हम इनकी पूजा करते हैं। उनकी यह हालत! आखिर ये हमारी मूर्खताओं का ही परिणाम है। क्यों करते हैं हम ऐसा? इसी कारण हम पर जब दु:खों का पहाड़ टूटता है, तो हम ईश्वर को कोसते हैं। आखिर हम पर ही क्यों विपदा आई? कभी सोचा है जब हम अपने आराध्य को इस हालत में पहुँचाएँगे, तो क्या वे हमें माफ कर देंगे? नहीं ना। तो फिर ऐसा काम ही क्यों किया जाए, जिससे आराध्य हमसे रुठ जाएँ।
साथियो! आज ही यह संकल्प लें कि अब हम कभी कोई काम ऐसा नहीं करेंगे, जिससे हमारे देवता हमसे नाराज हो जाएँ। हम गली-गली स्थापित होने वाले मूर्ति स्थापना का विरोध करेंगे। मोहल्ले की एक ही कमेटी को चंदा देंगे। जो जबर्दस्ती करेगा, उसका विरोध करेंगे। माटी की प्रतिमाएँ खरीदने का आग्रह करेंगे। प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ तो खरीदेंगे ही नहीं, जो खरीदना चाहेगा, उसे इसके नुकसान बताएँगे। हम एक ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करेंगे, जिससे समाज जाग्रत हो, एकजुटता की भावना को बल मिले। भाई-चारा बढ़े। यदि हम ऐसा करेंगे, तो निश्चित जानें गणोश भी हमारी सहायता करेंगे। क्यों नहीं करेंगे, आखिर हम उनके भक्त हैं।
डॉ. महेश परिमल

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