शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

फार्मूला वन का तमाशा






हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

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गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

ईश्‍वर किसी गरीब को जेल न भेजे










दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में 26 अक्‍टूबर को प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

महकते पर्वों के दौर में रंग महँगाई का













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नई दुनिया रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

तो फिर शिवानी की हत्या किसने करवाई?



डॉ. महेश परिमल
दिल्ली हाईकोर्ट ने शिवानी की हत्या के आरोपी एव आईपीएस अधिकारी रविकांत शर्मा एवं अन्य तीनों आरोपियों को निर्दोष मानते हुए रिहा कर दिया है। तो प्रश्न यह उठता है कि जब रविकांत शर्मा निर्दोष है, तो फिर शिवानी की हत्या किसने करवाई। यदि इसमें भाजपा नेता प्रमोद महाजन का हाथ है, तो उन पर किसी तरह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। उधर तीर्थ यात्रा करने की उम्र में रथयात्रा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ जाग्रत कर रहे हैं। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने इस मामले में प्रमोद महाजन को संरक्षण नहीं दिया। उस समय के हालात तो यही कहते हैं किे उन्होंने प्रमोद महाजन को पूरा संरक्षण दिया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को भी लंबे समय तक संरक्षण दिया गया। वहीं रेड्डी बंधुओं को सुषमा स्वराज ने संरक्षण दिया। इस तरह से भाजपा भी यदि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देती रहेगी, तो फिर उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह सत्ता पर आने के बाद भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहन नहीं देगी?
देश की राजधानी हाईप्रोफाइल लोगों और हाईप्रोफाइल हत्याओं की राजधानी बन गई है। जेसिका लाल, आरुषि तलवार और शिवानी भटनागर की रहस्यमय हत्याओं के कारण दिल्ली के धनाढच्य और विख्यात लोगों की जिंदगी में किस प्रकार के झंझावात आ रहे हैं और उन्हें किस तरह से संरक्षण देने की कोशिश की जा रही है, यह इससे ही पता चल जाता है। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने शिवानी भटनागर की हत्या के मुख्य आरोपी 1976 बेच के आईपीएस अधिकारी रवि कांत शर्मा ने निर्दोष बरी कर दिया गया है। 1999 में हुई इस रहस्यमय हत्या के मामले में अब नया मोड़ आया है। इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार शिवानी का चरित्र भी शंका से परे नहेीं है। इस मामले में यह सामने आया है कि रविकांत शर्मा के अलावा तत्कालीन दूरसंचार मंत्री प्रमोद महाजन भी शिवानी से प्रेम करते थे। इस मामले में वीआईपी के शामिल होने के कारण आज की तारीख में यह तय नहीं हो पाया है कि आखिर शिवानी की हत्या किसने करवाई? इसके पूर्व जेसिका लाल की हत्या में तो यह भी कहा जा रहा है कि उनकी हत्या हुई भी है या नहीं? शिवानी के मामले में तो अभी बहुत कुछ सामने आना शेष है।
युवा और खूबसूरत शिवानी भटनागर खोजीे पत्रकार थी। पहले वह एशियन ऐज में काम करती थी। 1997 में इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण में मुख्य संवाददाता के रूप में काम करना शुरू किया। उसे सीबीआई और इंटेलिजेंस बूयरो की बीट दी गई। अपनी जवाबदारी को पूरा करने के लिए वह प्रधानमंत्री के कार्यालय में होने वाली विभिन्न गतिविधियों पर नजर रखती थीं। इस दौरान उसकी पहचान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यालय में कार्यरत ओएसडी यानी आफिसर ऑन स्पेशल डच्यूटी रविकांत शर्मा से हुई। शिवानी का पति राकेश भटनागर भी पत्रकार था, वह टाइम्स ऑफ इंडिया में बड़े पद पर था। दोनों दिल्ली के प्रतापगंज क्षेत्र में स्थित नवकुंज अपार्टमेंट में रहते थे। 22 जनवरी 1999 को जब शिवानी अपने घर में अकेली थी, तब उसकी हत्या की गई थी। उसके पहले दोपहर 3.30 बजे शिवानी ने अपने पति राकेश भटनागर को फोन पर बताया था कि चंडीगढ़ से प्रकाशित ट्रिब्यून से किसी व्यक्ति का शादी का कार्ड लेकर कोई आने वाला है। जब राकेश ने उक्त व्यक्ति से फोन पर बात की, तब उसने अपना नाम शर्मा बताया। उसी दिन जब शाम साढ़े पाँच बजे राकेश के जीजा बी.एस. भटनागर का फोन आया कि शिवानी घर का दरवाजा नहीं खोल रही है। तब राकेश ने दरवाजा बाहर से तोड़ देने की सलाह दी। उसके बाद राकेश के जीजाजी ने बताया कि शिवानी की किसी ने चाकू से घोंपकर हत्या कर दी है। खून से लथपथ उसकी लाश पड़ी है। जब राकेश घर आया, तब उसकी देखा कि शिवनी की लाश बेडरुम में पड़ी है और उसका गला कटा हुआ है। उसके गले पर किचन का एक चाकू और दूसरा चाकू उसके शरीर पर रखा हुआ है। इसके अलावा उसके शरीर के पास पीले रंग का एक वायर भी रखा हुआ था। इस घटना की जानकारी जब पुलिस को दी गई, तब 6.35 को पुलिस वहाँ पहुँची। शिवानी को पहले स्वामी दयानंद हास्पिटल और फिर बाद में अपोलो अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पुलिस जाँच में यह सामने आया कि जो व्यक्ति शादी का कार्ड लेकर आने वाला था, उसी ने उसकी हत्या की है। यह व्यक्ति नवकुंज अपार्टमेंट में 2.40 बजे आया था और 3.10 बजे चला गया था। सोसायटी के रजिस्टर में उसने अपना नाम राजीव भटनागर और पता 311 ट्रिब्यून लिखा गया था। बाद में पता चला कि इस व्यक्ति का नाम प्रदीप शर्मा था और वह हरियाणा के एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी का संबंधी है। शिवानी के पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह पता चला कि उसकी हत्या गला दबाकर की गई थी, जब उसका गला काटा गया था, तब तक वह मर चुकी थी।
पुलिस जाँच में यह भी पता चला कि शिवानी के संबंध आईपीएस अधिकारी रविकांत शर्मा से भी थे। जब शिवानी की हत्या हुई, तब रविकांत मुम्बई एयर इंडिया के विजिलेंस अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। हत्या के तीन महीने पहले शिवानी जब लंदन गई थी, तब वह गर्भवती थी। वह मेटर्निटी लीव पर थी। इस दौरान रविकांत शर्मा ने उससे 90 बार फोन पर बात की थी। शिवानी ने भी उससे 196 बार फोन किया था। शिवानी की हत्या के ढाई वर्ष बाद तक पुलिस ने किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की। 23 जुलाई 2002 को इस मामले में गुड़गाँव के होटल मालिक भगवान की धरपकड़ हुई। भगवान ने पुलिस को बताया कि शिवानी रविकांत शर्मा पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी, इसलिए उसने उसकी हत्या करवा दी। इसके करीब एक सप्ताह बाद 2 अगस्त को पुलिस ने भगवान के बयान के आधार पर प्रदीप शर्मा की गिरफ्तारी की। वास्तव में वह कंप्यूटर इंजीनियर है। उसने तीन लाख रुपए के लालच में शिवानी की हत्या कर दी। एडवांस के रूप में उसे केवल 50 हजार रुपए ही मिले थे। 17 अगस्त को पुलिस ने सत्यप्रकाश नाम तीसरे संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार किया। पुलिस ने रविकांत शर्मा को भगोड़ा साबित करते हुए उसके खिलाफ वारंट जारी किया। उसके बारे में जानकारी देने वाले को 50 हजार रुपए इनाम की भी घोषणा की गई। बाद में रविकांत शर्मा ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
रविकांत शर्मा जब भगोड़ा घोषित किए गए, तब उनकी पत्नी मधु ने एक पत्रकार वार्ता में यह चौंकाने वाला बयान दिया कि शिवानी की हत्या तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने करवाई थी। गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी उन्हें पूरा संरक्षण दे रहे थे। मधु ने यह भी जानकारी दी कि हत्या के दिन शिवानी और प्रमोद महाजन के बीच करीब 45 मिनट फोन पर बात हुई थी। मधु ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि शिवानी के पुत्र के वास्तविक पिता प्रमोद महाजन ही हैं। यदि बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जाए, तो यह बात सिद्ध हो सकती है। महाजन के मंत्री होने के कारण पुलिस ने यह तर्क दिया कि उसका इरादा किसी की निजी जिंदगी में दखल देना नहीं है। मधु ने यह भी माँग रखी कि प्रमोद महाजन का लाइ डिटेक्शन टेस्ट कराया जाए, पर पुलिस ने यह माँग भी ठुकरा दी। मधु का मानना था कि शिवानी की हत्या प्रमोद महाजन ने ही करवाई है, लेकिन उनके पति रविकांत शर्मा को बलि का बकरा बनाया गया है।
रविकांत शर्मा एवं अन्य तीन पर दिल्ली के सेशन कोर्ट में मुकदमा चला। प्रासिक्यूशन का मामला ऐसा था कि शिवानी भटनागर को रविकांत शर्मा ने सरकार के कई गुप्त दस्तावेज दिए थे। शिवानी शर्मा पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी, शर्मा इसके लिए तैयार नहीं थे। फिर शिवानी ब्लेकमेलिंग पर उतर आई। उसने शर्मा को धमकी दी कि यदि उसने शादी नहीं की, तो वह उन गुप्त दस्तावेज के आधार पर उसे बरबाद कर देगी। तब अपने रास्ते से हटाने के लिए रविकांत शर्मा ने शिवानी की हत्या करवा दी। 18 मार्च 2008 को ट्रायल कोर्ट ने रविकांत शर्मा एवं अन्य तीन को दोषी मानते हुए सजा सुनाई। रविकांत शर्मा शुरू से ही यह दलील दे रहे थे कि इस मामले में भूतपूर्व टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन की मिलीभगत है। मुझे नाहक ही फँसाया जा रहा है। अपनी इस दलील के साथ उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया है कि रविकांत शर्मा ने शिवानी की हत्या का षडच्यंत्र रचा, इसका कोई सबूत नहीं मिला। हाईकोर्ट ने शिवानी की हत्या करने वाले प्रदीप शर्मा को छोड़कर अन्य तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि यदि रविकांत शर्मा सचमुच में निर्दोष हैं, तो शिवानी की हत्या किसने करवाई?
शिवानी भटनागर एक महत्वाकांक्षी पत्रकार थी। अन्य खोजी पत्रकारों की तरह वह भी पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती थी। इसके लिए उसने राजनीति और सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर बैठे लोगों से मधुर संबंध बनाए। यही मधुर संबंध उसकी हत्या का कारण बने। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का फैसला किया है। इससे स्पष्ट है कि यह मामला अभी और तूल पकड़ेगा। वैसे भी हमारे देश का इतिहास रहा है कि कभी किसी नेता या मंत्री को सजा नहीं हुई। उन्हें बेदाग बचाने की पूरी कोशिशें होती हैं। संभव है भविष्य में और कोई बलि का बकरा मिल जाए। जिससे इस मामले में फिर एक नया मोड़ आ जाए।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

हिसार में कांग्रेस भले हारे, पर अन्ना जीतने वाले नहीं

डॉ. महेश परिमल
अगस्त में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे ने जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाया था, उससे लोगों में एक जोश देखा गया था। आज बदलते हुए हालात को देखकर यही लगता है कि अन्ना अपनी राह से भटक गए हैं। हिसार में कांग्रेस के प्रत्याशी का विरोध कर वे एक तरह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही दे रहे हैं, क्योंकि अन्य दो प्रमुख प्रत्याशी पूरी तरह से ईमानदार हैं, यह कहना मुश्किल है। अन्ना की टीम सचमुच ही यदि भ्रष्टाचार से लड़ना चाहती है, तो उसे अपना प्रत्याशी खड़ा करना था। हिसार में यह तो तय है कि वहाँ कांग्रेस हारेगी, पर अन्ना नहीं जीतेंगे, यह भी तय है।
प्रजातंत्र में आपको जनता का कितना समर्थन प्राप्त है, इसकी सही कसौटी तो चुनाव के माध्यम से ही होती है। जिस उम्मीदवार को जितने अधिक वोट मिलते हैं, वह उतना ही लोकप्रिय माना जाता है। सन् 1977 में जबलपुर में जयप्रकाश नारायण ने शरद यादव को कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ खड़ा कर यह साबित किया कि वे इंदिरा गांधी से अधिक विश्वसनीय हैं। यदि अन्ना ने ऐसा ही किया होता, तो लोग उन पर और अधिक विश्वास करते। उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए उनका कांग्रेस प्रत्याशी का विरोध करना बचकाना लगता है। भारत भूमि अभी इतनी बाँझ नहीं है कि यहाँ ईमानदार प्रत्याशी न मिलें। ऐसे प्रत्याशी मिल सकते हैं, बशर्ते उन्हें सही रूप में पहचाना जाए। समाज में आंदोलन का बिगुल फूँकना अलग बात है और चुनाव लड़ना अलग। आंदोलन से आप प्रजा का भरमा सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतकर आप सही रूप में जनता के प्रतिनिधि साबित होते हैं।
केजरीवाल हरियाणा के हैं। यदि अन्ना चाहते, तो उन्हें खड़ा कर सकते थे। उन्हें जीताकर वे अपनी क्षमता सिद्ध भी कर सकते थे। अब अन्ना ने हिसार को एक प्रयोगशाला के रूप में तैयार किया है। यदि वहाँ से लोकदल के प्रत्याशी अजय चौटाला या फिर हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रत्याशी कुलदीप विoAोई में से कोई एक जीत जाता है, तो कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर अन्ना को अवश्य पड़ेगा। वैसे भी वे कमजोर प्रत्याशी हैं। अब यदि कुछ लोग भी अन्ना की गुहार सुनते हैं, तो उन्हें मिलने वाले वोट और कम हो जाएँगे। वैसे अन्य दोनों प्रत्याशी कोई दूध के धुले नहीं हैं। अजय चौटाला पर तो भ्रष्टाचार के मामले पर चार्जशीट फाइल की जा चुकी है। जब से हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है, तब से मामला कुछ उलझ गया है।
लोकसभा चुनाव में जिस प्रत्याशी की जीत का संभावनाएँ प्रबल हो और वह चुनाव हार जाए, तो यह आश्चर्यजनक हो सकता है। हाँ यदि कमजोर प्रत्याशी जीत जाए, तो वह इसका पूरा श्रेय लेने से नहीं चूकता। हिसार में तो कांग्रेस का उम्मीदवार जयप्रकाश तीसरी पोजीशन में है। यदि वे हार भी जाते हैं, तो इसका श्रेय अन्ना को नहीं मिलेगा। इसे दूसरे नजरिए से देखें तो जयप्रकाश की हार के लिए कोशिश करने का मतलब यही है कि अन्य प्रत्याशियों को जिताने के लिए रास्ता साफ करना। ये दोनों प्रत्याशी भ्रष्ट हैं, यह तो सभी को पता है। पर शायद अन्ना को यह पता नहीं कि वे अनजाने में ही भ्रष्ट लोगों की सहायता ही कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले जब भ्रष्ट लोगों के संरक्षक बन जाए, तो इसे क्या कहा जाए?
आखिर जबलपुर में क्या हुआ था?
सन् 1974 में लोकनायक स्व. जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के भ्रष्टाचार के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन चलाया था। यह आंदोलन चल ही रहा था कि मध्यप्रदेश के जबलपुर में उपचुनाव की घोषणा हो गई। 1971 में यहाँ से कांग्रेस के गोविंद दास ने भारी बहुमत से सफलता प्राप्त की थी। उनके निधन से इस सीट पर उपचुनाव 1974 में हुए। कांग्रेस ने सेठ गोविंददास के पोते रविमोहन को टिकट दी। उनकी जीत लगभग तय थी। इस बीच जयप्रकाश नारायण ने अपने अभियान के तहत उस समय के छात्र नेता शरद यादव को भारतीय लोकदल की टिकट पर रविमोहन के खिलाफ खड़ा किया। उस समय जयप्रकाश का प्रभाव इतना अधिक था कि शरद यादव के सामने कांग्रेस के सक्षम प्रत्याशी रविमोहन हार गए। इससे शरद यादव के पौ बारह हो गए। वे सांसद बनकर संसद पहुँच गए। कई लोग हिसार की तुलना जबलपुर से कर रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जबलपुर सीट कांग्रेस के हाथ में ही थी। जयप्रकाश ने उसके खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा किया और उन्हें विजयश्री हासिल की। यदि अन्ना वास्तव में यह चाहते हैं कि हिसार में भी जबलपुर जैसे हालात की पुनरावृति हो, तो उन्हें हिसार मंे अपना प्रत्याशी खड़ा करना था। उनके साथी अरविंद केजरीवाल हरियाणा के ही हैं। यदि अन्ना उन्हें हिसार से खड़ा करते और उन्हें जीतवा पाते, तो उनकी काबिलियत सामने आती। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। वहाँ तो कांग्रेस को हराने के लिए अजय चौटाला और कुलदीप विoAोई ही सक्षम हैं। यदि वहाँ से कांग्रेस हारती है, तो इसे अन्ना की जीत कतई नहीं कहा जा सकता।
अन्ना संघ प्रेरित
कांग्रेस के खिलाफ जाकर अन्ना संघ के करीब आ गए हैं। अनजाने में वे भाजपा के सहयोगी ही साबित हो रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि भाजपा ने अभी तक अन्ना के जनलोकपाल बिल को अपना समर्थन नहीं दिया है। अन्ना की टीम एक तरफ संघ पर कटाक्ष कर रही है, तो दूसरी तरफ भाजपा समर्थित प्रत्याशी को अपना समर्थन भी दे रही है। इस तरह से वे क्या संघ परिवार का कोई कर्ज अदा कर रहे है? हिसार में यदि अजय चौटाला जीत जाते हैं, तो वे अन्ना के प्रति आभारी ही रहेंगे। अब अन्ना की टीम सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने की बात करने लगी है। जब तक इसे अमल में नहीं लाया जाएगा, तब तक टीम अन्ना का कर्तव्य नागरिकों के सामने स्वच्छ छवि वाले प्रत्याशियों का खोजना है। उधर यदि कांग्रेस ने अपना पूरा जोर लगा दिया और वहाँ से जीत हासिल कर लेती है, तो अन्ना की जो फजीहत होगी, वह देखने लायक होगी। बहुत ही जल्द पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। वहाँ मायावती की बहुजन समाज पार्टी को हराकर कांग्रेस को जीताने के लिए राहुल गांधी पिछले 6 सालों से लगातार प्रयास कर रहे हैं। वहाँ विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस बहुमत प्राप्त कर लेती है या फिर दूसरे नम्बर पर रहती है, तो 2014 में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। टीम अन्ना ने अभी से यह घोषण कर दी है कि इन राज्यों में उनकी टीम केवल कांग्रेस प्रत्याशियों का ही विरोध करेगी। टीम अन्ना की इस हरकत से राहुल गांधी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि अन्ना अब रास्ते से भटक रहे हैं। उनकी अपनी सोच सीमित है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तक उनकी सोच में साफगोई थी, पर अब वे अपनों से ही संचालित होने लगे हैं। उनकी टीम आंदोलन करने में सक्षम हो सकती है, पर चुनावी मैदान में उतरकर लोगों को रिझाने में नाकामयाब है, यह तय है। अन्ना की टीम को अपने आप पर ही विश्वास नहीं है। टीम के अंतर्कलह भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में आखिर वे कब तक खींच पाएँगे, विभिन्न विचारधाराओं की इस नाव को? भाजपा यदि भ्रष्ट न होती और अन्ना उनके प्रत्याशियों का समर्थन करते, तो संभव है, लोग उन्हें गंभीरता से लेते। पर वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, इससे साफ है कि वे न तो अंतर्कलह को ही रोक पा रहे हैं और न ही चुनाव लड़ने के लिए हिम्मत ही बटोर पा रहे हैं। ऐसे में उनकी स्वच्छ छवि को उज्ज्वल बनाए रखने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

मॉं पर पीएचडी और पीएचडी पर मॉं


भास्‍कर बालॉग पर आज प्रकाशित मेरा आलेख




मेरे उक्‍त आलेख का आधार यही सिंधुताई हैं

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