बुधवार, 30 नवंबर 2011

अपनों के ही खून से रँगे हैं सेना और पुलिस के हाथ

डॉ. महेश परिमल
कश्‍मीर घाटी बरसों से खून की होली खेल रही है। इस होली में कई चेहरे रंग से पुते हुए हैं, जिन्हें कश्मीरी अपना मानते हैं। सरकार ने उन्हें कश्मीरियों की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। जनता इन पर विश्वास करना चाहती है, पर सरकार ने ही इन्हें ऐसे विशेषाधिकार दे रखे हैं, जिसका लगातार दुरुपयोग हो रहा है। सेना के वे जवान और अधिकारी जिन पर हमें हमेशा नाज रहता है, आज वही अपने विशेषाधिकार के कारण चर्चा में हैं। कई बार कश्मीरी जनता को लगता है कि इससे तो बेहतर सीमा पार से आने वाले आतंकी हैं, जो कम से कम जो भी करते हैं, बोलकर करते हैं। हमारे ये अधिकारी तो जो भी करते हैं, अपने विशेषाधिकार के तहत करते हैं। इस पूरे मामले कंेद्र सरकार की लापरवाही बार-बार सामने आ रही है। जो अधिकारी या जवान जनता पर कहर बरपाते हैं, उन पर स्थानीय पुलिस कार्रवाई नहीं कर सकती। इसके लिए प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहुँचाया जाता है, पर केंद्र सरकार इसकी इजाजत ही नहीं देती। जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है। कई युवाओं ने तो बंदूक भी उठा ली है। थोड़ी सी सजगता दिखाते हुए केंद्र सरकार दोषी अधिकारियों एवं जवानों को जो भी सजा दे, उसका ऐसा प्रचार करे, ताकि जनता को पता चल जाए कि उन पर जुल्म करने वाले का क्या हश्र हुआ। इससे भारतीय कानून पर उनका विश्वास दृढ़ होगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। सरकार कश्मीरी जनता पर अत्याचार करने वाले को संरक्षण दे रही है।कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे के लिए आम्र्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत सेना को जो विशेष अधिकार दिए गए हैं, उससे घाटी की जनता यह मानने लगी है कि इस कानून का उपयोग कम और दुरुपयोग अधिक हो रहा है। सेना के जवान और अधिकारी जनता पर अत्याचार करते हैं और उन पर कार्रवाई तक नहीं होती। ऐसे में विरोध स्वाभाविक है। यह सच है कि इसी कानून के तहत आज घाटी शांत है। इसी कानून के खौफ से कई आतंक संगठनों का सफाया हो चुका है। अब केवल कुछ ही आंतकवादी शेष हैं, जो सीमा पार से संचालित हैं। इसलिए इस कानून का दुरुपयोग ही हो रहा है, यह कहना उचित नहीं है। हाँ पर केंद्र सरकार की हीला-हवाली के कारण यह कानून अब बदनाम हो रहा है। अगर इस कानून का दुरुपयोग करने वाले सेना के अधिकारी और जवानों पर तत्काल कार्रवाई की जाती, तो संभव है कश्मीरी जनता का विश्वास न खोती। पर केंद्र सरकार अपनी आदतों से मजबूर है। जो मुस्तैदी कानून का दुरुपयोग करने वालों ने दिखाई, उससे दोगुनी मुस्तैदी सरकार को दिखानी थी। लेकिन अब देर हो चुकी है, चारों ओर इसके खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। यहाँ तक कि कश्मीर के मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल हो गए हैं।देश की सीमाओं पर आने वाले कुछ राज्यों में सेना को विशेषाधिकार देने के लिए 1958 से आम्र्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट नामक विशेष कानून अमल में लाया गया। इसका प्रयोग सबसे पहले असम और मणिपुर में किया गया। इस कानून में यह प्रावधान है कि सेना को कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति के घर में घुसकर तलाशी ले सकता है, उसके मालिक को बंदी बना सकता है। इस कानून का मूल उद्देश्य तो आतंकवाद पर काबू पाना था, पर कुछ वर्षो से इसके दुरुपयोग की खबरेंआने लगी हैं। घाटी के इस कानून के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। अब अन्य राज्यों में इसके खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी है। मणिपुर में तो बरसों से आंदोलन चल रहा है। पर सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर पा रही है। इससे सेना के अधिकारी बौखला गए हैं, उनका मानना है कि यदि इस कानून को वापस ले लिया गा, तो आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं हो पाएगा। आतंकवादी बेखौफ हो जाएँगे। निर्दोष मारे जाएँगे। सेना के उच्च अधिकारियों के इस तर्क के आगे सरकार दुविधा में है। बरसों से सरकार की इस दुविधा का लाभ सेना के अधिकारी और जवान बखूबी उठा रहे हैं।सरकार की दुविधा इस बात को लेकर है कि इससे नागरिकों के मूल अधिकारों की भावना आहत होती है। सेना पर आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग करते हुए अधिकारियों एवं जवानों ने कश्मीरी जनता फर्जी एनकांउटर किया है। कई युवतियों एवं महिलाओं पर बलात्कार किया है। ऐसे अपराध करने वालों पर राज्य सरकार सीधी कार्रवाई नहीं कर सकती। इसके लिए पहले उसे केंद्र सरकार के गृह विभाग और रक्षा विभाग से मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी लेनी पड़ती है। मंजूरी के बिना आरोपी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यही कारण है कि सेना के अधिकारी और जवान बेलगाम हो गए हैं। नागरिकों पर अत्याचार, युवतियों से बलात्कार आदि अपराध उनके लिए बाएँ हाथ का काम हो गए हैं। किसी के घर घुसकर उनकी धरपकड़ करना, हत्या करना उनके लिए बहुत ही आसान है। यदि वे किसी की हत्या भी कर देते हैं, तो कुछ दिनों बाद उसकी लाश आबादी से दूर कहीं लावारिस हालत में मिलती है। यदि किसी खूबसूरत कन्या पर उनकी निगाहें ठहर जाती हैं, तो पूछताछ के बहाने पुलिस छावनी में बुलाकर उससे बलात्कार किया जाता है। 2003 में राज्य सरकार ने ऐसे 35 मामलों में कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार से अनुमति माँगी, पर एक मामले के लिए भी अनुमति नहीं मिली। इसे केंद्र सरकार की लापरवाही न कहें तो और क्या कहें?घाटी में सेना एवं अर्ध सैनिक बलों द्वारा कश्मीरी कन्याओं से बलात्कार की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। 1997 में अनंतनाग जिले में सेना के जवान ने एक गृहिणी के घर में घुसकर उस पर बलात्कार किया। इसकी एफआईआर पुलिस ने लिखी। पुलिस ने सेना के जवान पर कार्रवाई करने के लिए 2006 में कें्रद्र सरकार से अनुमति माँगी। पर केंद्र सरकार ने आज तक इसकी अनुमति नहीं दी। इसी लापरवाही के कारण सेना के जवानों का हौसला बढ़ता है। वे बेखौफ होकर इस तरह की करतूतें करते रहते हैं। इससे नागरिकों में असुरक्षा की भावना घर कर जाती है। 1999 में राफियाबाद जिले में सेना के एक मेजर ने भी एक घर में घुसकर गृहिणी से बलात्कार किया था,उसके खिलाफ भी कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से अनुमति माँगी थी, पर आज तक अनुमति नहीं मिली। जम्मू-कश्मीर में पुलिस और सेना मिलकर ज्वाइंट आपरेशन फर्जी एनकाउंटर करने के कई उदाहरण सामने आए हैं। इसमें यदि किसी पुलिस अधिकारी पर हत्या का आरोप लगता है, तो उसे सजा हो जाती है। पर यही आरोप सेना के अधिकारी पर लगाया जाए, तो उसे सजा नहीं होती। केंद्र सरकार से अनुमति न मिलने के कारण इन पर कार्रवाई नहीं हो पाती बेखौफ होकर आजाद घूमते रहते हैं। 2007 में फर्जी एनकाउंटर की अनेक घटनाएँ इस क्षेत्र में हुई हैं। इनमें से चार में से एक घटना तो ाीनगर के संबल में घटी थी। इस घटना में पुलिस और सेना के जवानों ने मिलकर एक ग्रामीण को उसके घर से उठाया। उसे जंगल ले जाया गया। वहाँ उसे मार डाला गया। दूसरे दिन पुलिस ने यह घोषणा कर दी कि विदेशी आतंकवादियों ने मुठभेड़ में वह मारा गया। 2006 में अब्दुल पदरु नामक मिस्त्री गुम हो गया। उसके परिजनों ने पुलिस में इसकी रिपोर्ट लिखवार्ठ। इस मिस्त्री के मोबाइल रिकॉर्ड से पता चला कि पुलिस ही उसे गाँव से बाहर ले गई थी। बाद में उसे मार डाला गया था। इस संबंध में जब जाँच हुई तो गिरफ्तार पुलिस अधिकारी ने बताया कि उसने इस तरह की 5 वारदात को अंजाम दिया है। इन सभी को पाकिस्तानी नागरिक बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया। जब इनकी लाशे कब्र से निकाली गई और उसका डीएनए टेस्ट लिया गया, तो पता चला कि वे सभी भारतीय थे। इनमें से एक लाश तो श्रीनगर के इमाम की थी। जिन्हें पाकिस्तानी आतंकवादी बताकर मार डाला गया था। इस मामले में पुलिस के 12 कर्मचारियों की धरकपड़ भी की गई थी। पाथरीबाल में हुए पाँच फर्जी एनकाउंटर में सेना के अनेक अधिकारियोंे की मिलीभगत थी। इस कारण इसी जाँच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने सेना के 5 अधिकारियों पर अपहरण, हत्या, षडच्यंत्र रचने और सबूतों को नष्ट करने के आरोप में मामला चलाया। इस दौरान एक कर्नल को पदोन्नत कर ब्रिगेडियर बना दिया गया। शुरुआत में सेना ने ही इस अधिकारी के खिलाफ जाँच का आदेश दिया था, अब सीबीआई यह कह रही है कि सेना के अधिकारी उन्हें जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। यह मामला अभी सुप्रीमकोर्ट में है, और मामले से संबद्ध अधिकारियों की धरपकड़ नहीं हो पाई है।घाटी में हो रही इस तरह की वारदात के खिलाफ अनेक स्वयं सेवी संस्थाएँ आवाज उठा रही हैं। सेना के अधिकारी इन संस्थाओं के कार्यकत्र्ताओं को परेशान करने का कोई मौका नहीं चूकते। 1995 सेना के मेजर अवतार सिंह ने श्रीनगर के वकील जलील अंद्रबी की धरपकड़ की थी। 19 दिन बाद उस वकील की लाश मिली। इस मामले की जाँच हाईकोर्ट की विशेष टीम से करवाई। इस टीम ने जलील की मौत के लिए मेजर अवतार सिंह को दोषी माना। सेना के अधिकारियों ने बताया कि मेजर अवतार सिंह जब तक सेवा में थे, तब तक उन्होंने कोई अपराध नहीं किया। यह जाँच चल ही रही थी कि मेजर अवतार सिंह अमेरिका चले गए। बाद में पता चला कि इस तरह के फर्जी मुठभेड़ की 11 घटनाओं में मेजर अवतार सिंह का हाथ था। ऐसे में यह विश्वास कैसे किया जाए कि सेना जो कुछ करती है, वह सही होता है?यह सच है कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता। यदि घाटी के नागरिकों के सामने यह विकल्प रखा जाए कि वे चाहें तो पाकिस्तान में रहें या फिर भारत में, तो वहाँ की जनता भारत में ही रहना चाहेगी। इन हालात में सेना को जो विशेषाधिकार दिया गया है, उसका दुरुपयोग न हो, जनता पर अत्याचार न हो, नागरिकों का विश्वास सेना और पुलिस पर बना रहे, इसके लिए आवश्यक है कि यदि विशेषाधिकार का दुरुपयोग होता है, तो उस पर जल्द और सख्त कार्रवाई की जाए। यदि इस विशेषाधिकार को खत्म कर दिया जाता है, तो आतंकवादी इसका फायदा उठाने से नही चूकेंगे। यह आवश्यक है कि इस तरह के सख्त कानून हों, पर इसके दुरुपयोग पर दोषी जवान या अधिकारी को जो सजा मिले, उसकी सूचना घाटी के नागरिकों को मिले, ताकि उन्हें लगे कि उन पर अत्याचार करने वाले को आखिर सजा मिली। गंेद अब केंद्र सरकार के पाले में है, देखते हैं वह क्याकरती है। घाटी के नागरिकों की सुरक्षा के लिए वह जो भी कदम उठाएगी, वह निश्चित रूप से देशहित में होगा। यदि सरकार ऐसा नहीं कर पाती, तो सेना और पुलिस के अत्याचार के खिलाफ लोग और भी आक्रामक होने लगेंगे। युवा अपने हाथों में हथियार उठा लेंगे, तब जो भी होगा, बहुत बुरा होगा। ऐसी स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब कश्मीरी यह समझने लगे कि यह देश हमारा होते हुए भी पराया गन गया है। अपने ही देश में अपनों के साथ ही परायापन आखिर कब तक सहन होगा?
डॉ. महेश परिमल

रविवार, 20 नवंबर 2011

शनिवार, 12 नवंबर 2011

सरकार की ठंड उड़ा देगा शीतकालीन सत्र



डॉ. महेश परिमल
ममता की धमकी, केरल हाईकोर्ट की नाराजगी, अन्ना की हुंकार, सहयोगी दलों के सांसदों की बेरुखी और मौके की ताक पर बैठे विपक्ष की बेकरारी यह संकेत करती है कि संसद का शीतकालीन सत्र सरकार की ठंड को उड़ा देगा। इस सत्र के दौरान अन्ना हजारे की भी अग्निपरीक्षा हो जाएगी। अभी तो सरकार चारों तरफ से घिरी हुई है। एक तरफ वह अपने ही साथियों की नाराजगी झेल रही है, दूसरी तरफ उसका पूरा प्रयास है कि अन्ना के साथियों में बिखराब आ जाए। सरकार जितना अधिक प्रयास करती है उलझनों से बाहर निकलने की, वह उसमें उतनी ही उलझती जा रही है। इसके बाद भी प्रणब मुखर्जी जैसे बड़े नेता यह कहने लगे कि महँगाई अभी और बढ़ेगी, तो आम आदमी का हौसला पस्त होने लगता है। यह अवश्य है कि उनके बयानों से व्यापारियों के पौ-बारह हो जाते हैं। वे जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हो जाते हैं।
इšार अन्ना हजारे की हुंकार के बाद उनके समर्थकों पर प्रहार तेज हो गए हैं। किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल ने धन वापस करके एक मिसाल तो पेश की ही है। फिर भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लगी ही है। पूरे देश की नजरें इस समय शीतकालीन सत्र पर है। इसमें यूपीए सरकार के अलावा टीम अन्ना की भी अग्निपरीक्षा होनी है। यह सच है कि कोई साल भर लगातार बोलता ही रहे, तो लोग उससे आजिज आ जाते हैं। पर लम्बी खामोशी के बाद यदि कुछ कहा जाता, तो उसका महत्व होता है। अन्ना हजारे ने 19 दिनों का मौन रखकर जब कुछ कहा, तो वह कांग्रेस के खिलाफ ही गया। इसका भी महत्व है। अब उन्होंने कहा है कि यदि जन लोकपाल बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पारित नहीं किया गया, तो वे तीसरी बार अनशन करेंगे। उšार सरकार की पूरी कोशिश है कि सत्र के पहले अन्ना की टीम को किसी भी तरह से कमजोर कर दिया जाए। दिग्विजय सिंह की तीखी कटह्वार अभी भी चल ही रही है। अभी तक उस पर कोई अंकुश नहीं है। वे कांग्रेस प्रवक्ता से अधिक बोल रहे हैं। उन्होंने संघ परिवार पर हमला करते हुए यह भी कह दिया है कि संघ अपने तीसरे प्लान के अनुसार श्रीश्री रविशंकर को भी मैदान में उतारना चाहता है। अन्ना पर संघ परिवार का वरदहस्त है, इससे तो अन्ना के साथी भी इंकार नहीं कर रह हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि हमें देश की कोई भी संस्था अपना समर्थन दे सकती है। इसमें गलत क्या है? दूसरी ओर अन्ना के साथी समय-समय पर संघ परिवार पर प्रहार करने से भी नहीं चूकते। अन्ना टीम और संघ परिवार के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है, इसका सबूत यही है कि भाजपाशासित उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी निशंक सरकार को पदभ्रष्ट करने के बाद खंडूरी सरकार अन्ना हजारे के मन मुताबिम लोकायुक्त बिल विधानसभा से पारित किया। मौनव्रत तोड़ने के बाद अन्ना ने उत्तराखंड सरकार की खूब प्रशंसा की और वहाँ जाने की भी इच्छा जताई। उत्तराखुड में जो लोकायुक्त बिल पारित किया गया, वह अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के कार्बन कॉपी की तरह ही है। इस बिल में विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, सरकारी अधिकारी एवं न्यायाधीशों को भी दायरे में लाया गया है। उšार संसद में सरकार जो बिल लाने वाली है, वह अन्ना के मुताबिक न होने के कारण अन्ना ने अभी से ही अपनी भाषा को मुखर बना दिया है। सच तो यह है कि अब यदि अन्ना उसवास करते भी हैं, तो आमरण अनशन नहीं करेंगे, यह तय है। इस बार उन्होंने जो धमकी दी है, उसमें कहा गया है कि यदि शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल बिल पास नहीं किया गया, तो वे पहले तीन दिनों तक प्रतीक उसवास रखेंगे, उसके बाद जिन पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ जाकर वे कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। यदि अन्ना अपनी पूरी ताकत से उक्त पांच राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करते हैं, तो यह रामलीला मैदान से भी अधिक हानिकारक साबित होगा। जिन पाँच राज्यों में चुनाव होने हैं, उसमें से चार तो ऐसे राज्य हैं, जहाँ कांग्रेस की सरकार ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, इस राज्य में दूसरे स्थान पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी है,भाजपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर है। कांग्रेस महामंत्री राहुल गांधी इस राज्य में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। यदि यहाँ के मतदाता अन्ना की सुनते हैं, तो कांग्रेस की रही सही आशाओं पर पानी फिर जाएगा, इसका पूरा फायदा भाजपा और मायावती को मिलेगा। इसके बाद बच जाते हैं, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर। इसमें से उत्तराखंड में तो भाजपा की सरकार है ही। पंजाब में अकाली दल के साथ भाजपा का समझौता है। उत्तराखंड में भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते वहाँ स्थिति डगमगा गई थी, पर समय रहते वहाँ मुख्यमंत्री बदलकर स्थिति को काफी हद तक अंकुश में लाया गया है। लोकायुक्त बिल पारित करके सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया है, इसका पूरा लाभ चुनाव में मिलेगा, यह तय है। इन हालात में यदि अन्ना कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ प्रचार करते हैं, तो इसका पूरा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। गोवा में कांग्रेसी मोर्चे की सरकार है। यहाँ के मुख्यमंत्री दिगंबर कामथ भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। उनके मंत्रिमंडल पर 25 जार करोड़ रुपए का खनिज घोटाला का आरोप है। गोवा के बाजू में ही स्थित कर्नाटक में जो खनिज घोटाला हुआ, उसमें मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को अपने पद से हाथ धोना पड़ा, आज वे जेल की हवा खा रहे हैं। यहाँ अपनी छवि साफ करके भाजपा गोवा में कब्जा करना चाहती है। यहाँ भी यदि लोग अन्ना की सुनते हैं, तो इसका पूरा लाभ भाजपा को ही मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं। ऐसे में यदि गोवा में भी भाजपा की सरकार आ जाए, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अंत में बचता है पूर्वाेत्तर राज्य मणिपुर। यहां कांग्रेस की सरकार है, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुूई है। यहाँ की सरकार में सीपीआई और आरजेडी की भागीदारी है। हाल ही में आतंकवादियों द्वारा मणिपुर का हाईवे जाम कर देने से यह राज्य गंभीर आर्थिक स्थिति से जूझ रहा है। केंद्र सरकार बरसों से इस राज्य की उपेक्षा कर रही है। पर अब चुनाव करीब आते ही वह सक्रिय हो गई है। कांग्रेसी नेताओं ने मणिपुर की ¨चंता करनी शुरू कर दी है। यहाँ भाजपा सीमित है, इसलिए अन्ना की अपील का कोई असर होगा, कहा नहीं जा सकता।
भ्रष्टाचार के विरोध में टीम अन्ना की लड़ाई में जो पागलपन दिखाई दे रहा है,उसमें भी एक तथ्य है। इस तथ्य के अनुसार भाजपा और संघ परिवार का टीम अन्ना से क्या रिश्ता है, यह रहस्य के आवरण में है। टीम अन्ना के समर्थक यह मानते हैं कि अन्ना हजारे और उनके साथी संघ परिवार और भाजपा के नेटवर्क का चालाकीपूर्ण उपयोग करके अपना मिशन चला रहे हैं। दूसरी ओर संघ परिवार के समर्थक यह मानते हैं कि भाजपा और संघ परिवार ने टीम अन्ना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है और वे संघ परिवार के एजेंडा के अनुसार ही चल रहे हैं। राजघाट में अन्ना हजारे ने अपने भाषण में कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा यदि ग्रेजुएट है, तो कांग्रेस पीएचडी है। टीम अन्ना, कांग्रेस और भाजपा के बीच कितना प्यार और कितनी नफरत है, यह तो शीतकालीन सत्र में सामने आ ही जाएगा। बहरहाल देखना यह है कि कांग्रेस अन्ना के खिलाफ क्या कर सकती है? वैसे सरकार तो खुद ही उलझी हुई है। ममता का अड़ियलपन एक बार फिर सामने आ गया है। सहयोगी दल भी अपने तेवर दिखा रहा है। चुनाव आते ही समीकरण बदलने लगे हैं, सभी को जनता के सामने जवाब देने जाना है। कांग्रेस ने उन्हें कहीं का नहीं रखा। ममता ने तो अपनी ताकत दिखा दी, अन्य दल भी अपना पूरा जोर लगाएँगे ही। इन हालात में संसद का शीतकालीन सत्र देश को एक नए मोड़ पर ला देगा, इसकी पूरी संभावना है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 9 नवंबर 2011

कर्मभूमि से दूर होनी चाहिए जन्‍मभूमि


















आज भास्‍कर और हरिभूमि के संपादकीय पेज पर दो अलग अलग प्रवृत्तियों वाले आलेखों का प्रकाशन हुआ है।
लिंक



http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

अदालतें जब हो जाती हैं असहाय / 11/11/11 को लेकर इतनी आतुरता क्‍यों ?























जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण और हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक
http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-11-04&pageno=9


गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जनसंख्या विस्फोट से सांस्कृतिक संघर्ष की आशंका


डॉ. महेश परिमल

विश्व के सात अरबवें बच्चे का जन्म हो गया। इस अवसर पर खुशी मनाई जाए या दु:खी हुआ जाए। इस खबर से खुशी तो कम किंतु दु:ख अवश्य मनाया जा सकता है। आबादी अभी और बढ़नी ही है। लेकिन इसके साथ-साथ समाज में जो विषमताएँ आएँगी, वे बहुत ही भयावह होंगी। जनसंख्या विस्फोट से जिस सांस्कृतिक संघर्ष की शुरुआत होगी, वह त्रासदायी होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में उत्तर और दक्षिण के बीच कटुता और वैमनस्यता में बढ़ोत्तरी होगी।
अब जब हम सात अरब हो चुके हैं, तो इसे भारतीय संदर्भ में देखें, तो स्पष्ट होगा कि देश के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में वैमनस्यता बढ़ने के पूरे आसार हैं। दूसरी तरफ उत्तर से अकुशल कर्मचारियों का बहाव दक्षिण भारत की तरफ रहेगा। इससे सांस्कृतिक संर्घष बढ़ेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व की 17 प्रतिशत मानव आबादी में स्थान रखने वाला हमारा देश सदी के उत्तरार्ध के प्रारंभ में एक अरब 21 करोड़ से बढ़कर एक अरब 80 करोड़ की आबादी वाला देश बन जाएगा। इससे न केवल भौगोलिक विभाजन बल्कि सामाजिक, आर्थिक विभाजन की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस प्रचंड जनसंख्या के साथ एक ओर भारत विश्व परिदृश्य में शहरीकरण की तरफ बढ़ेगा। शहरों की आबादी बेशुमार बढ़ेगी, इससे लोगों को हवा ओर पानी और पोषणयुक्त आहार के लिए भारी मशक्कत करनी होगी। यही वजह होगी, जब आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लोग परस्पर झगड़ेंगे। तनाव बढ़ेंगे और अपराध को प्रश्रय मिलेगा।
बेंगलोर स्थित थिट टेंक इंस्टीटच्यूट फॉर सोशल एंड इकानॉमी चेंज (आईएसईसी) के जनसंख्या शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर के.एस. जेम्स के अनुसार भारत के उत्तर क्षेत्र से अकुशल कर्मचारियों का प्रवाह दक्षिण की ओर होना शुरू हो गया है। अब शहरों में महिला कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ने लगी है। यह स्थिति कई विषमताओं को जन्म देगी। जैसे अपराध, सांस्कृतिक हमले, जातिगत तनाव आदि। पश्चिमी देशों का उल्लेख करते हुए प्रो. जेम्स कहते हैं कि वहाँ देर से शादी और बढ़ते तलाक के साथ-साथ बिना शादी के साथ-साथ रहने की जीवनशैली से पूरे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अंतरजातीय विवाह होने से परिवारों में विभिन्न जाति-धर्म के लोग परस्पर सांस्कृतिक विषमताएँ पैदा करेंगे। जिससे समाज में शांति का अभाव होगा।
आज जिस तरह से मायानगरी में उत्तर भारतीय या बिहारियों का विरोध हो रहा है, उससे कटुता बढ़ने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। उक्त राज्योंे में बेरोजगारी के कारण लोगों को हुजूम अन्य राज्यों के शहरों की ओर बढ़ रहा है। इससे वहाँ के मूल लोगों का अधिकार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वहाँ के लोग काम में कुशल होने के कारण अधिक मजदूरी की माँग करते हैं, जबकि वही काम कम कुशल व्यक्ति करता है, तो सामाजिक कटुता बढ़ना स्वाभाविक है। कम कुशल व्यक्ति कम मजदूरी में काम तो कर लेता है, पर उसका वह काम लंबे समय तक नहीं टिक पाता। इसे उपभोक्ता बाद में समझ पाता है। जब एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में बढ़ने लगते हैं, तो उनमें एक राज्यीय होने की भावना को बल मिलता है। इससे एक नए समाज का निर्माण होता है। यह समाज जाति से परे होता है। इसमें राज्य का होना ही महत्वपूर्ण होता है। ये लोग एक होकर अपनी माँगे मनवाने के लिए मिलकर काम करते हैं। इससे अन्य राज्य के लोग भी प्रेरित होते है। फलस्वरूप मूल निवासियों में असुरक्षा की भावना बढ़ने लगती है। यही से शुरू होता है राज्यीय संघर्ष। आज मायानगरी में जो कुछ हो रहा है, वही अब बड़े स्तर पर जनसंख्या विस्फोट के बाद अन्य शहरों में भी होगा।
किसी घर में नए बच्चे का आगमन खुशी की बात होती है, लेकिन इसके साथ नई जिम्मेदारियां और चुनौतियां भी आती हैं। ज्ञात इतिहास में पहली बार सिर्फ 13 साल में आबादी एक अरब बढ़ गई है, तो इसका कारण अनेक क्षेत्रों में इंसान की कामयाबियां हैं। स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल, बुनियादी चीजों की अधिक उपलब्धता एवं अप्राकृतिक मौतों में कमी के कारण आज मनुष्य का औसत जीवनकाल 68 साल है, जबकि 1950 में यह महज 48 साल था। इन्हीं वजहों से आबादी अभी और बढ़ेगी। अनुमान है कि 2080 के आसपास यह सवा नौ से लेकर दस अरब तक पहुंच सकती है। ज्यादा लोगों का मतलब खाद्यान्न, पानी और अन्य सुविधाओं की अधिक आवश्यकता के साथ-साथ धरती के तापमान में ज्यादा इजाफे का अंदेशा है, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है। गौरतलब है कि दुनिया का हर छठा मनुष्य भारतवासी है। अगर दुनिया में अनाज या पानी की कमी गंभीर रूप लेती है तो उसकी सीधी मार भारत के जनजीवन एवं विकास की अपेक्षाओं पर पड़ेगी। इसलिए हमारे योजनाकारों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार होना होगा। वैसे भी यह चुनौती अनंत नहीं है। परिवार नियोजन संबंधी आविष्कारों तथा मानव समाज में बढ़ती जागरूकता ने जनसंख्या वृद्धि की दर घटा दी है। आज विश्व जनसंख्या प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि 1960 के दशक के आखिर तक यह दर दो फीसदी थी। 1970 में दुनिया में प्रति महिला 4.45 बच्चे का जन्म होता था, जो दर अब 2.45 तक गिर चुकी है। यह आशा वास्तविक है कि प्रति महिला 2.1 बच्चे की जन्म दर का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा, जिससे आबादी स्थिर हो जाएगी। यानी अगर निकट एवं मध्यकालीन भविष्य तक स्थितियों को संभाल लिया गया, तो फिर मानवता के सुखद भविष्य की उम्मीदों को साकार किया जा सकता है।
यह सच है कि जागरुकता बढ़ने लगी है। एक निरक्षर दम्पति भी दो से अधिक संतानों की चाहत नहीं रखते। यह एक सुखद संकेत है, लेकिन दुश्वारियों के बढ़ने से जीवन मूल्यों में आ रहे परिवर्तन से कोई भी अछूता नहीं है। सामाजिक चेतना के अभाव में राज्यों के बजट भी प्रभावित होने लगे हैं। आबादी सारी योजनाओं को धता बता देती है। ऐसे में जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिये का दायरा बढ़े, तो कुछ बेहतर परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

बेलगाम जनसंख्‍या की चुनौती












दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-11-01&pageno=9#id=111725135231014738_49_2011-11-01

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