बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

देश में कई हैं छोटे-छोटे औरंगाबाद!


डॉ. महेश परिमल
भारत एक गरीब देश है, यह बात अब सच दिखाई नहीं देती। पर यह भी सच है कि भारत देश में गरीब लोग रहते हैं। हर देश की तरह हमारे देश में गरीबों की संख्या अमीरों से बहुत अधिक है। पर अमीर इस तरह से समाज में छा गए हैं कि उन्हें न तो गरीब दिखाई देते हैं और न ही गरीबी। इंडिया और भारत की विभाजन रेखा यहीं से शुरू होती है। हाल ही में यह पता चला कि औरंगाबाद में 151 मर्सीडीज कारों का ऑर्डर मिला है। यूं तो बेशकीमती गाड़ियों के शो रूम केवल मेट्रोपोलिटन सिटी में ही होते हैं। जैसे दिल्ली, मुम्बई, बेंगलोर आदि में, पर अब औरंगाबाद जैसे विकसित शहर में भी इस तरह के शो-रूम दिखाई देने लगे हैं। इस तरह से देश में कई और औरंगाबाद हो गए हैं। इन लक्जरी गाड़ियों के कारण छोटे-छोटे शहरों से भी बड़ी गाड़ियों की माँग बढ़ने लगी है।
देश में अमीरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 24 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या अगले दो साल के अंदर तीेगुनी होने वाली है। लक्जरी और ब्रांडेड चीजों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है। अब मध्यमवर्गीय परिवार भी मारुति कार खरीदने की कूब्बत रखता है। देश में एक करोड़ मारुति कार है, इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में अमीरों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है। देश में केवल मारुति ही नहीं, बल्कि अन्य कारों के मॉडलों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। देश में फरारी, पोत्र्श, बीएमडब्ल्यू आदि कारों की बिक्री बेतहाशा बढ़ी है। उच्च मध्यमवर्ग और धनकुबेरों में लक्जरी कार खरीदने का क्रेज बढ़ा है। महँगाई की मार से भले ही आम आदमी कराहता हो, पर जिस तरह से लक्जरी चीजों का बाजार फैल रहा है, इससे लगता है कि इसी विरोधाभास के कारण समाज दो भागों में विभाजित हो गया है। इसमें से एक वर्ग ऐसा है, जो केवल सौ रुपए के बूट पहनता है, दूसरा वगअपने बूट के लिए दस हजार रुपए खर्च कर सकता है।
देश में समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ लक्जरी चीजों की खरीदी में भी वृद्धि हुई है। इंटरनेशनल ब्रांडेड आइटमों को खरीदने में लोग अधिक रुचि लेने लगे हैं। ये केवल बड़े शहरों की ही बात नहीं है, छोटे शहरों में भी इस तरह की चीजों की माँग बढ़ने लगी है। इसमें विशेष रूप से यंग जनरेशन में इस तरह की चीजों के प्रति विशेष रूप से आकर्षित है। हाल का सर्वेक्षण बताता है कि भारत की औसतन आय 50 हजार रुपए है। एक तरफ देश में रिटेल क्षेत्र में एफडीआई पर संसद की मंजूरी नहीं मिली है। यह विवाद जारी है। दूसरी तरफ ब्रांडेड आइटम्स के लिए लोग मुँहमाँगा दाम देने को तैयार हैं। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई को लेकर यह कहा जा रहा था कि इससे स्थानीय स्तर के छोटे व्यापारियों को नुकसान होगा, पर लक्जरी आइटम खरीदने के लिए और उसके सेंटर की स्थापना करने की स्पर्धा जारी है। जो नए-नए करोड़पति हुए हैं, उनमें ब्रांडेड चीजों के प्रति विशेष लगाव देखा जा रहा है। ऐसे बाजार को इन्हीं लोगों से प्रोत्साहन मिला है। एक अंदाज के अनुसार भारत में लक्जरी मार्केट हर साल 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2012 में इस मार्केट ने 8 अरब डॉलर को छू देगा, ऐसा विश्वास किया जा रहा है। देश में ब्रांडेड आइटम्स की चीजों का बाजार पिछले 5 वर्ष में अधिक बढ़ा है। युवाओं में ही इस तरह की चीजों का रुझान बढ़ा है। वे भी ब्रांडेड चीजों को खरीदने का आग्रह रखते हैं।
देश में लक्जरी चीजों की खूब बिक्री हो रही है। पिछले 5 महीनों में 20 फरारी, एक वर्ष में 300 पोत्र्श और 151 मर्सीडीज गाड़ियों की बिक्री हुई है। प्राइवेट लक्जरी प्लेन भी हमें आकाशीय मार्ग में देखने को मिल जाएँगे। केवल कानपुर जैसे शहर में ही दस पोत्र्श गाड़ियों की खरीदी हुई है। अब ब्रांडेड चीजों के शो रूम मुम्बई, दिल्ली और बेंगलोर ही हो, ऐसी बात नहीं है। अब तो छोटे शहर भी इसमें शामिल होने लगे हैं। औरंगाबाद में एक व्यापारी ने अपने मित्रों के साथ एक वर्ष पहले 151 मर्सीडीज बेंज का ऑर्डर दिया, तो सभी को आश्चर्य हुआ। आजकल लक्जरी चीजों के खरीदने वाले बड़े शहरों में ही नहीं होते। महँगी चीजें खरीदने वाले 50 प्रतिशत लोग छोटे शहरों में ही रहते हैं। देश में छोटे-छोटे औरंगाबाद बनने लगे हैं। ऐसे ही एक छोटे शहर के बड़े उद्योगपति के पास महँगी कारों का काफिला है। वे सोमवार से रविवार तब अलग-अलग गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। उनके काफिले में पोत्र्श, मर्सीडीस, एस एंड सी क्लास, ओडी आदि का समावेश होता है। कार के ऐसे शौकीन अहमदाबाद और लुधियाना जैसे शहरों में भी रहते हैं।
यहाँ केवल लक्जरी कारों की ही बात नहीं की जा रही है। घड़ी से लेकर शूज तक और बाइक से लेकर आधुनिक सुविधाओं से युक्त चीजों का समावेश किया जा रहा है। ईश्वर की मूर्ति से लेर बूट-चप्पल तक की खरीदी के लिए लोग ऊँची रकम देने में नहीं हिचकते। एक बार चीज भा गई, फिर उसे खरीदने का जो जुनून आज दिखाई देता है, वह पहले दिखाई नहीं देता था। इसी जुनून के कारण लक्जरी आइटम का बाजार दिनों-दिन प्रगति कर रहा है। हमारे यहाँ एक बंगला बने न्यारा का सपना हर कोई देखता है, पर पुणो, बेंगलोर, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहरों में अब महल जैसे बंगले बन रहे हैं और उसे खरीदने के लिए लोगों की लाइन लगती है। यही स्थिति होटल उद्योग की है। इसी तरह घड़ी, वोल पेपर, टेबल लैम्प आदि चीजों के भी इंटरनेशनल ब्रांड हैं। इन चीजों का एक विशेष वर्ग है। इंटरनेशनल ब्रांड में बेलेंसीगा (चश्मा), लोजीनीस (वॉच), लाड्रो (हेप्पीनेसपीस), चेनली (व्हाइज नवाज कलेक्शन), क्रिश्चयन लोबुटीन (लेग्ज सेंडल), बरबेरी (बूट) आदि का समावेश होता है। एक अंदाज के मुताबिक देश में 25 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या 2014 तक तीगुनी हो जाएगी। जो यह बताता है कि देश में लक्जरी मार्केट का बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ेगा। इंटरनेशनल लक्जरी ब्रांड की एफडीआई 51 प्रतिशत होने के कारण इंटरनेशनल ब्रांड के लिए ग्राहक को देश से बाहर नहीं जाना पड़ता। एक तरपु बेल्ट, वोलेट, परफ्यूम, बेग्स, वॉच आदि की माँग है, तो ढाई लाख से साढ़े चार लाख रुपए की पेन की भी माँग है। इसके चलते यह कहा जा सकता है कि हमारा देश अब कतई गरीब नहीं रहा। लोगों के पास धन अथाह है, जो अपनी गति से आ रहा है। यह धन कब, कहाँ, कैसे, किस तरह से लोगों तक पहँुच रहा है, यह भले ही शोध का विषय हो, पर यह सच है कि हमारे देश में आज एक आफिस का चपरासी भी दस करोड़ और एक क्लर्क 40 करोड़ की सम्पत्ति का मालिक होता है।
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

आखिर किंगफिशर पर इतनी मेहरबानी क्यों?

डॉ. महेश परिमल
किंगफिशर एयरलाइंस लगातार बदनाम होती जा रही है। बिना बताए उसकी कई उड़ानें लगातार रद्द होती जा रही हैं। लोग परेशान हैं, यही नहीं उसके कई पायलट भी इस अव्यवस्था से परेशान होकर इस्तीफा दे चुके हैं। सभी जानते हैं कि यह एयरलाइंस कंपनी का दिवाला निकलने वाला है, फिर भी इसे अनजानी सहायता मिल ही रही है। इसमें भले ही सरकार प्रत्यक्ष रूप से न जुड़ी हो, नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह का बयान भी आ गया हो, पर जिस तरह से विजय माल्या व्यवहार कर रहे हैं, इससे लगता है कि किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं से सरकार का उन पर वरदहस्त है। आखिर कुछ तो बात होगी, जिसके कारण किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयर 750 करोड़ रुपए में राष्ट्रीयकृत बंकों ने खरीदे। इससे एयर लाइंस को तो लाभ ही हुआ, पर निवेशकों को हानि उठानी पड़ी।
किंगफिशर की माली हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है, इसे सभी जानते हैं, इसके बाद भी उद्योगपति विजय माल्या की बिगड़ी हुई संतान की तरह यह कंपनी करदाताओं के धन से ऐश करती रही, यह बहुत कम लोगों का पता है। कोई भी यात्री जब किंगफिशर में यात्रा करता है, तो उससे टिकट के उपरांत भी सर्विस टैक्स के नाम पर कुछ और राशि वसूल की जाती है। इस सर्विस टैक्स को उन्हें सरकारी तिजोरी में डालना चाहिए, पर कंपनी ऐसा नहीं करती। इस राशि को अनाप-शनाप रूप से खर्च कर दिया जाता था। इस बात की जानकारी जब सर्विस टैक्स विभाग को मिली, तब उन्होंने किंगफिशर के बैंक के सारे खातों को सील कर दिया। इस कारण कंपनी अपने पायलटों को वेतन नहीं दे पाई। इसलिए कई पायलट नौकरी छोड़कर जाने लगे। इस कारण किंगफिशर की कई उड़ानें रद्द करनी पड़ी, यह सिलसिला लगातार अब भी जारी है। हालत यह है कि ¨कंगफिशर में हजारों यात्रियों ने पहले से ही धन जमा करके अपनी सीट बुक करवा ली है, वे अब परेशान हैं। पिछले साल नवम्बर से ही यह जानकारी मिलने लगी थी कि किेंगफिशर की देनदारियाँ लगातार बढ़ रहीं हैं। इसके बाद भी किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने किसी तरह से तिकड़म करके एयरलाइंस को चलाए रखा। लेकिन अब लगता है कि वे भी इससे आजिज आ चुके हैं। किंगफिशर अब अपनी अंतिम साँसें ले रहा है।
आज की स्थिति में किंगफिशर देश के विभिन्न शहरों में रोज करीब 240 फ्लाइट चला रहा है। रविवार को उसकी 80 फ्लाइट रद्द हो गई थी, उसके बाद करीब 40 फ्लाइट रोज ही रद्द हो रही है। केंद्र के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जब किंगफिशर को एयरलाइंस का लायसेंस दिया, तब यह शर्त रखी थी कि सरकार की अनुमति के बिना वह एक फ्लाइट भी रद्द नहीं कर सकती। अब उसकी फ्लाइट लगातार रद्द हो रही है, लेकिन इसकी जानकारी न तो सरकार को है और न ही यात्रियों को। उधर आइल कंपनियों ने किंगफिशर को फ्यूल देना बंद कर दिया, दूसरी ओर पायलट भी लगातार इस्तीफा देते जा रहे हैं। इसके बाद भी किंगफिशर पर सरकार ने अभी तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की है। इसकी जगह कोई दूसरी एयरलाइंस होती, तो उस पर कई बार कार्रवाई हो चुकी होती। इस समय किंगफिशर की देनदारी कुल 7 हजार करोड़ रुपए की है। इसमें से 1400 करोड़ रुपए माफ करने की खबर है। पिछले साल इसी तरह किंगफिशर ने 1027 करोड़ रुपए का नुकसान किया था। सन 2003 में जब इस एयरलाइंस की स्थापना की गई थी, तब से अब तक कंपनी ने कुल 5690 करोड़ रुपए का नुकसान किया है। इसके बजाए कोई दूसरी कंपनी होती, तो वह कब की बंद हो गई होती।
किंगफिशर ने आइल कंपनियों से 890 करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। पर उसका भुगतान नहीं किया है। इस कारण बीपीसीएल और एचपीसीएल नामक कंपनियों ने किंगफिशर को ईंधन देना ही बंद कर दिया। अभी इंडियन आइल कंपनी किंगफिशर को धन प्राप्त करने के बाद ही ईंधन दे रही है। बीपीसीएल ने ईंधन की राशि चुकाने के लिए किंगफिशर के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। किंगफिशर की अनियमितता केवल इस क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि एयरपोर्ट अथारिटी के क्षेत्र में भी देखी गई। नियम यह है कि किसी भी एयरपोर्ट पर कोई भी निजी विमान को उतारना हो, तो उसके लिए एयरपोर्ट अथारिटी को एक निश्चित राशि चुकानी होती है। इस राशि को चुकाने के मामले में भी किंगफिशर लगातार अनियमितताएँ कर रही है। हाल ही में किंगफिशर ने एयरपोर्ट अथारिटी को जो 151 करोड़ का चेक दिया था, वह बाउंस हो गया। आज की तारीख में एयरपोर्ट को किंगफिशर से कितनी रकम लेनी है, यह किसी को पता नहीं है। किंगफिशर के पास ऐसी कोई सम्पत्ति नहीं है, जिसे गिरवी रखकर वह अपनी पूँजी बना सके। उसके पास जितने भी विमान हैं, वे सभी किराए से लिए हुए हैं। आश्चर्य इस बात का है कि किंगफिशर इन विमानों का किराया भी नहीं चुका पा रही है। कुछ दिनों पहले ही कंपनी ने किराए के 5 विमान वापस करने पड़े। 2009 के बाद अब तक कुल 19 विमान कंपनी वापस कर चुकी है। सरकार को इतना जंगी नुकसान पहुँचाने वाली यह कंपनी अब तक कैसे चल रही है, यह समझ से परे है। संभव है कि इसमें भी 2 जी स्पेक्ट्रम जैसा कोई कांड छिपा हो।
सन् 2003 में जब किंगफिशर एयरलाइंस की स्थापना हुई, तब से यह केवल नुकसान में ही अपना काम कर रही है। सन 2005-2006 में काफी बदनाम रही एयर इंडिया ने भी लाभ कमाया, पर किंगफिशर कभी फायदे में नहीं रही। किंगफिशर के प्रेसीडेंट विजय माल्या बार-बार कहते रहे हैं कि वे करदाताओं के धन से एयरलाइंस नहीं चलाना चाहते। पर सच्चई यही है कंपनी को उबारने के लिए जिन राष्ट्र्रीयकृत बैंकों ने पैकेज के रूप में करोड़ों का कर्ज दिया है, उन बैंकों के करोड़ों रुपए डूब चुके हैं। इसके अलावा जिन पूँजी निवेशकों ने यूबी समूह के शेयरों में निवेश किया है, उनका धन डूबत खाते में चला गया है। सन् 2010 में सकरारी बैंकों ने किंगफिशर को दिए गए धन को वसूलने के लिए जब सख्ती की, तब विजय माल्या ने सभी बैंकों के मैनेजरों की बैठक बुलाई। उसके बाद किंगफिशर को उबारने के लिए पैकेज की घोषणा की गई। उस समय किंगफिशर की देनदारियाँ कुल 8414 करोड़ रुपए थी। इस देनदारी को चुकाने के लिए कंपनी के 23 प्रतिशत शेयर बैंकों को देकर देनदारियों को चुकता करने का वादा किया गया। इन शेयरों की बाजार कीमत उस समय 750 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इस तरह से किंगफिशर का एक शेयर बैंकों को 64.48 रुपए में पड़ा। मजे की बात यह है कि उस समय किंगफिशर के शेयरों के भाव बाजार में 39.90 रुपए थी। इस तरह से बैंकों ने किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयरों को 750 करोड़ रुपए में खरीदे। सीधे शब्दों में कहा जाए, तो बैंकों ने किंगफिशर को 284 करोड़ रुपए की भेंट दे दी। इस सौदे से विजय माल्या की मानो लाटरी ही लग गई। बैंकों द्वारा इस तरह से किंगफिशर को उपकृत करने के बारे में पूछा गया, तो बैंकों का कहना था कि यह सच है कि हमने किंगफिशर के कम कीमत के शेयरों को अधिक दाम में खरीदा, पर हमें आशा थी कि उनके शेयरों के दाम शीघ्र ही बढ़ेंगे। पर ऐसा हो नहीं पाया, आज किंगफिशर के शेयरों की कीमत 25 रुपए है। इस तरह से राष्ट्रीयकृत बैंकों को कुल 3000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यही नहीं बैंकों ने कंपनी को लाभ पहुँचाने के लिए कर्ज की ब्याज दर भी दो से ढाई प्रतिशत कम कर दी। इससे बैंकों को अब हर वर्ष 150 से 180 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इस महीने में किंगफिशर कई बैंकों के करीब 450 करोड़ रुपए की पूँजी हजम कर चुकी है।
किंगफिशर को कई बार उनकी अनियमितताओं को ध्यान न देते हुए उसे तरजीह दी गई है। कंपनी को उबारने के लिए बैंकों के माध्यम से उसे 1000 करोड़ रुपए का लोन भी दिया गया। इसके बाद भी कंपनी उबर नहीं पाई। कंपनी को अभी भी यह आशा है कि सरकार की तरफ से उसे निश्चित रूप से और सहायता मिलेगी और कंपनी उबर जाएगी। पर उड्डयन मंत्री अजित सिंह ने जिस तरह से बयान दिया है, उससे नहीं लगता कि कंपनी को अब और राहत दी जाएगी। श्री सिंह ने किंगफिशर को और अधिक पैकेज देने से इंकार किया है। एक निजी एयरलाइंस कंपनी लगातार सरकार का नुकसान करे, तो क्या सरकार का कोई कर्तव्य नहीं है कि उस पर किसी तरह की कार्रवाई करे? आखिर किंगफिशर ने जो भी नुकसान किया है, उसका खामियाजा वह स्वयं ही भुगते। पर इस मामले में ऐसा नहीं है, उसका खामियाजा कंपनी के शेयरधारक भुगत रहे हैं। आखिर किसके आदेश से बैंकों ने भी किंगफिशर को इतनी अधिक प्राथमिकता दी कि जब उसके शेयरों के बाजार भाव 39 रुपए चल रहे हों, तब 64 रुपए में खरीदने की क्या आवश्यकता थी? कहीं बैंकों के उच्च पदस्थ अधिकारी किसी कांड में तो लिप्त नहीं हैं? जिससे किंगफिशर को लगातार सहूलियतें मिलती रही और कंपनी इसका बेजा लाभ उठाती रही? आखिर कहीं कुछ तो है, जिससे न केवल सरकार बल्कि बैंकें भी विजय माल्या के आगे नतमस्तक हो गई।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-02-22&pageno=9#id=111733901832393290_49_2012-02-22

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देश की नदियों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा!

डॉ. महेश परिमल
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए आतंकवादी हमले में जितने लोग मारे गए, उतने इंसान तो रोज गंदा पानी पीने से मर जाते हैं। हमारे देश में 20 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अशुद्ध पानी पीते हैं। पानी के लिए झगड़े, फसाद होते रहे हैं, पर अब जल्द ही युद्ध भी होने लगेंगे। इस क्षेत्र में दबे पाँव बहुराष्ट्रीय कंपनियों आ रही हैं, जिससे हालात और भी खराब होने वाले हैं। सरकार इस दिशा में इन्हीं विदेशी कंपनियों के अधीन होती जा रही है। इस कार्य में विश्व बैंक की अहम भूमिका है।
कुछ समय पहले ही जर्मनी की राजधानी बोन में पानी की समस्या को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में 130 देशों के करीब 3 हजार उपस्थित थे। इस समेलन में चौंकाने वाली जानकारी यह दी गई कि 21 वीं सदी में जिस तरह से टैंकर और पाइप लाइनों से क्रूड आयल का वितरण किया जा रहा है, ठीक उसी तरह पानी का भी वितरण किया जाएगा। बहुत ही जल्द पानी के लिए युद्ध होंगे। विश्व में 1.30 अरब लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। अशुद्ध पानी से विश्व में रोज 6 हजार मौतें हो रहीं हैं। हालात ऐसे ही रहे, तो पूरे विश्व में पानी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाएगा। हमारी पृथ्वी में जितना पानी है, उसका 97 प्रतिशत समुद्र के खारे पानी के रूप में है। केवल 3 प्रतिशत पानी ही मीठा और पीने लायक है। इसमें से 25 प्रतिशत हिमनदियों में बर्फ के रूप में जमा हुआ है। इस तरह से कुल5 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध है। इसमें से भी अधिकांश भाग अमेरिका और केनेडा की सीमाओं पर स्थित बड़े-बड़े तालाबों में है। शेष विश्व में बढ़ती जनसंया, शहरीकरण, औद्योगीकरण और प्रदूषण के कारण पानी के ज्ञात स्रोतों में लगातार कमी आ रही है। देश के कई राज्यों में पानी के लिए दंगे होना शुरू हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 3 हजार घनफीट जितना पानी ही लोगों को मिल पाएगा। इसमें भी भारत की आवश्यकता औसतन 2,500 घनमीटर ही है।
उत्तर प्रदेश में यह परंपरा है कि कन्या द्वारा जब कुएँ की पूजा की जाती है, तभी लग्न विधि पूर्ण मानी जाती है। अब तो कुओं की संया लगातार घट रही है, इसलिए गाँवों में कुएँ के बदले टैंकर की ही पूजा करवाकर लग्नविधि पूर्ण कर ली जाती है। लोगों ने समय की जरुरत को समझा और ऐसा करना शुरू किया। पर पानी की बचत करनी चाहिए, इस तरह का संदेश देने के लिए कोई परंपरा अभी तक शुरू नहीं हो पाई है, यदि शुरू हो भी गई हो, तो उसे अमल में नहीं लाया गया है। जब तक हमें पानी सहजता से मिल रहा है, तब तक हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाएँगे। हमारे देश में पानी की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप लेती जा रही है। देश में कुल 20 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। पेयजल के जितने भी स्रोत हैं, उसमें से 80 प्रतिशत स्रोत उद्योगों द्वारा छोड़ा गया रसायनयुक्त गंदा पानी मिल जाने के कारण प्रदूषित हो गए हैं। इसके बावजूद किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे ऐसी फसलों का उत्पादन करें, जिसका दाम अधिक मिलता हो। किसानों को राजनैतिक दलों द्वारा वोट की खातिर मुत में बिजली दी जाती है, जिससे वे अपने बोरवेल में पंप लगाकर दिन-रात पानी निकालते रहते हैं। इससे भूगर्भ का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। इससे हजारों कुएँ नाकारा हो जाते हैं। पानी की कमी के कारण भारत का कृषि उत्पादन भी लगातार घट रहा है। यही कारण है कि हम अब बनाज का आयात करने लगे हैं।
देश को जब आजादी मिली, तब एक-एक गाँवों में पीने के पानी का कम से कम एक स्रोत तो ऐसा था ही, जिससे पूरे गाँव की पेयजल समस्या दूर हो जाती थी। जहाँ पेयजल समस्या होती थी, सरकारी भाषा में इन गाँवों को ‘नो सोर्स विलेज’ कहा जाता है। सन् 1964 में ‘नो सोर्स विलेज’ की संया 750 थी, जो 1995 में बढ़कर 64 हजार से ऊपर पहुँच गई। इसका आशय यही हुआ कि आजादी के पहले जिन 64 हजार गाँवों के पास अपने पेयजल के स्रोत थे, वे सूख गए। या फिर औद्योगिकरण की भेंट चढ़ गए। बड़ी नदियों पर जब बाँध बनाए जाते हैं, तब नदी के किनारे रहने वालों के लिए मुश्किल हो जाती है, उन्हें पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। शहरों की नगर पालिकाएँ नदी के किनारे बहने वाले नालों में गटर का पानी डालने लगती है, इससे सैकड़ों गाँवों में पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उद्योग भी नदी के किनारे ही लगाए जाते हैं। इससे निकलने वाला प्रदूषणयुक्त पानी नदी के पानी को और भी प्रदूषित बनाता है। इस पानी को पीने वाले अनेक बीमारियों का शिकार होते हैं। पानी को इस तरह से प्रदूषित करने वाले उद्योगपतियों को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं हुई। नगर पालिकाएँ भी गटर के पानी को बिना शुद्ध किए नदियों में बहा देने के लिए आखिर क्यों छूट मिली हुई है। इस दिशा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खामोश है।
देश को जब आजादी मिली, तब देश की जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह से प्रजा के हाथ में थी। हरेक गाँव की ग्राम पंचायत तालाबों एवं कुओं की देखभाल करती थी, ग्रामीण नदियों को प्रकृति का वरदान समझते थे, इसलिए उसे गंदा करने की सोचते भी नहीं थे। आजादी क्या मिली, सभी नदियों पर बाँध बनाने का काम शुरू हो गया। लोगों ने इसे विकास की दिशा में कदम माना, पर यह कदम अनियमितताओं के चलते तानाशाहीपूर्ण रवैए में बदल गया। नदियाँ प्रदूषित होती गई। अब इन नदियों को प्रदूषणमुक्त करने की योजना बनाई जा रही है। इसकी जवाबदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही है। देश की प्रजा का अरबों रुपए अब इन कंपनियों के पास चला जाएगा। कुछ सपन्न देशों में नदियों की देखभाल निजी कंपनियाँ कर रही हैं। विश्व की दस बड़ी कंपनियों में से चार कंपनियाँ तो पानी का ही व्यापार कर रही हैं। इन कंपनियों में जर्मनी की आरडब्ल्यूई, फ्रांस की विवाल्डो और स्वेज लियोन और अमेरिक की एनरॉन कापरेरेशन का समावेश होता है। एनरॉन तो अब दीवालिया हो चुकी है, पर इसके पहले उसने विभिन्न देशों में पानी का ही धंधा कर करीब 80 अरब डॉलर की कमाई कर चुकी है। माइक्रोसाप्ट कंपनी द्वारा जो वार्षिक बिक्री की जाती है, उससे चार गुना व्यापार एनरॉन कंपनी ही करती थी।
हमारे देश में पानी की तंगी होती है, लोग पानी के लिए तरसते हैं, उसमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ है। देश के दिल्ली और मुबई जैसे महानगरों में जल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इन कंपनियों के एजेंट की भूमिका विश्व बैंक निभा रहा है। किसी भी शहर की युनिसिपलिटी अपनी जल योजना के लिए विश्व बैंक के पास कर्ज माँगने जाती है, तो विश्व बैंक की यही शर्त होती है कि इस योजना में जल वितरण व्यवस्था की जवाबदारी निजी कंपनियों को सौंपनी होगी। विश्व बैंक के अनुसार निजी कंपनी का आशय बहुराष्ट्रीय कंपनी ही होता है। इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर ही हमारे देश की जल नीति तैयार की जाती है। इस नीति के तहत धीरे-धीरे सिंचाई के लिए तमाम बाँधों और नदियों को भी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। यह भी एक तरह की गुलामी ही होगी, क्योंकि एक बार यदि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनी को पेयजल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी दे दी गई, तो फिर पानी की गुणवत्ता और आपूर्ति की नियमितता पर सरकार को कोई अंकुश नहीं रहता। पानी का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों को अरबों रुपए की रिश्वत देकर यह ठेका प्राप्त करती हैं। पानी का व्यापार करने वाली इन कंपनियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके हैं। महानगरों की जल वितरण व्यवस्था को भी इन कंपनियों ने भ्रष्टाचार के सहारे ही अपने हाथ में लिया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2003 में एक आदेश के तहत अपनी नई जल नीति की घोषणा की थी। इस नीति के अनुसार सभी जल परियोजनाएँ निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया गया है। विधानसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया। इस विधेयक के अनुसार महाराष्ट्र स्टेट वॉटर रेग्युलेटरी अथारिटी की रचना की गई, इसका कार्य नदियों के बेचे जाने वाले पानी का भाव तय करना है। इस तरह से पिछले 5 वर्षो से सरकार राज्य की नदियाँ बेचने के मामले में कानूनी रूप से कार्यवाही कर रही है। देर से ही सही, प्रजा को सरकार की इस चालाकी की जानकारी हो गई है। फिर भी वह लाचार है। यह तो तय है कि महाराष्ट्र की नदियों का निजीकरण करने की योजनाओं के पीछे विश्व बैंक और पानी का अरबों डॉलर का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही हाथ है। विश्व बैंक ने 5 साल पहले महाराष्ट्र सरकार को पानी के क्षेत्र में सुधार के लिए 32.5 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। कर्ज के साथ यह शर्त भी जुड़ी थी कि महाराष्ट्र सरकार अपनी अपनी नदियों और जल परियोजनाओं का निजीकरण और व्यापारीकरण करेगी। इस शर्त के बंधन में बँधकर सरकार ने नई जल नीति तैयार की। इस नीति के तहत पुणो और मुम्बई में जल वितरण योजनाएँ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की तैयारी है। दूसरी ओर नदियों को बेचने की योजनाएँ शुरू हो गई हैं। जल योजना के तहत अभी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गंगा और जमुना जैसी पवित्र नदियों पर अपना कब्जा जमा लिया है। हमारी सरकार निजीकरण के लालच में बदहवाश हो गई है। अब जल वितरण व्यवस्था के तहत ये कंपनियाँ अधिक कमाई चक्कर में पानी की कीमत इतना अधिक बढ़ा देंगी कि गरीबों की जीना ही मुश्किल हो जाएगा। वह फिर गंदा पानी पीने लगेगा और बीमारी से मरेगा। क्योंकि ये कंपनियाँ नागरिकों को शुद्ध पानी देने की कोई गारंटी नहीं देती।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

बढ़ा है लक्‍जरी ब्रांडेड आइटम का क्रेज


नवभारत रायपुर- बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

2 जी घोटाला, घिरी सरकार, महँगी होगी सेवाऍं





हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख
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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

अब होगी मोबाइल सेवा और महँगी




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

एक रन पर धोनी ने कमाए ढाई लाख रुपए

डॉ. महेश परिमल
क्या आपको पता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वार्षिक आय कितनी है? शायद आप नहीं जानते, जानना भी नहीं चाहते। फिर भी आप जान ही लें, क्योंकि यही वे व्यक्ति हैं, जो एक तरफ अपना बल्ला घुमाते हैं, तो रन बटोरते हैं। दूसरी तरफ विज्ञापनों में काम करते हुए हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। पिछले साल यानी 2011 में उन्होंने जितने रन बनाए, उसका हिसाब किया जाए, तो प्रत्येक रन पर उन्हें 2.55 लाख रुपए मिले हैं। हमारे देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनकी वार्षिक आय 2.55 लाख रुपए नहीं है। दूसरी ओर इतना धन तो धोनी एक रन बनाकर प्राप्त कर लेते हैं। यह राशि उन्हें क्रिकेट बोर्ड, आईपीएल और विज्ञापनों से प्राप्त होती है। टीवी पर जो विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं, उसे मध्यम वर्ग ही अधिक देखता है। इन विज्ञापनों के ामध्यम से अनावश्यक और कई बार स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले प्रोडक्ट भी होते हैं। मध्यम वर्ग के खून-पसीने की कमाई से बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जो कमाई कर रही हैं, उसका एक छोटा सा हिस्सा वे अपने ब्रांड एम्बेसेडर को देती हैं। इस तरह से हमारे क्रिकेटरों की जो बेशुमार कमाई होती है, उसका अधिकांश भाग मध्यम वर्ग के शोषण से ही प्राप्त होता है। मध्यम वर्ग अपने मनोरंजन के लिए क्रिकेट के मैच और टीवी धारावाहिक देखता है। इस दौरान अज्ञानतावश उसका ब्रेनवॉश हो जाता है, उसके हिस्से आती है अनावश्यक वस्तुएँ, जिसके बिना भी वह अपना जीवन गुजार सकता है।सच है कि अब क्रिकेट मैच एक खेल न होकर मार्केट का राक्षसी तंत्र बन गया है। मार्केटिंग करने वाली कंपनियाँ ग्राहकों को लुभाने के लिए येनकेनप्रकारेण अपना माल बेचना चाहती हैं। इसके लिए वह क्रिकेटरों का इस्तेमाल करती है। टीवी पर मैच का लाइव प्रसारण देखकर देश के करोड़ों मानव घंटों की बरबादी होती है, यही नहीं अरबों रुपए का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि हमारे क्रिकेटरों पर विज्ञापनों में काम करने की पाबंदी लगा दी जाए, तो संभव है देश के क्रिकेट का उद्धार हो जाए।
ऑस्ट्रेलिया के ऐडिलेड शहर से ही भारत के लिए दो परस्पर विरोधी खबरें आयीं। Rिकेट में विश्व चैंपियन भारतीय टीम ने 4-0 से टेस्ट श्रंखला गंवाकर देश का सिर शर्म से झुका दिया तो ऑस्ट्रेलियाई ओपन टेनिस में लिएंडर पेस ने पुरुष डबल्स का खिताब जीत कर करियर ग्रैंड स्लैम पूरा कर अपने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हमारी टीम हार गई, इससे हम भले ही दु:खी हों, पर हमारे क्रिकेटरों को इस बात का जरा भी मलाल नहीं है। वे टीम जीते, इसलिए खेल ही नहीं रहे थे, इससे अधिक चिंता तो उन्हें विज्ञापनों के कांट्रेक्ट साइन करने, मीटिंग करने, एड फिल्मों की शूटिंग करने, कंपनियों के प्रमोशनल कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराने, अपनी कमाई को सही स्थान पर इस्तेमाल करने आदि को लेकर होती है। अपनी शक्ति का अधिकांश भाग वे इसी में खर्च कर देते है, बची-खुची शक्ति आईपीएल में खप जाती है। इसके बाद कहाँ से रह जाता है हौसला? सच में देखा जाए, तो हमारे क्रिकेटर एड फिल्मों में काम करके देश का तो भला नहीं ही करते, उससे हमारा भी भला नहीं होता। भला होता है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और स्वयं उनका। ऐसे में क्यों न उन पर फिल्मों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? विज्ञापन फिल्मों में काम करके हमारे क्रिकेटर प्रजा की सेवा तो नहीं कर रहे हैं। बात करते हैं हमारे क्रिकेट टीम के कप्तान की। इस समय वे सबसे अधिक कमाई करने वाले क्रिकेटर हैं। हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। 22 ब्रांडों के एम्बेसेडर हैं। इसमें पेप्सीको, रिबोक, एयरसेल, रिवाइटल और गोदरेज जैसी ब्रांडों का समावेश होता है। कुछ समय पहले धोनीे ने तीन स्पोर्ट्स कंपनियों के साथ कांट्रेक्ट किया है। इनका विज्ञापन करके वे तीन वर्ष में 200 करोड़ रुपए कमाएँगे। हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने सन् 2006 में आईकोनिक्स कंपनी के साथ जब अनुबंध किया था, तब उन्हें 180 करोड़ रुपए मिले थे। धोन जिस रिवाइटल नामक टॉनिक के लिए विज्ञापन करते हैं, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में मांसाहार का प्रचार करने का है। अब जब भारतीय क्रिकेट टीम को जीताने में वे विफल सिद्ध हुए हैं, तो कंपनी ने उनके स्थान पर अब सलमान खान को ले लिया है।
सन् 2009 की फोब्र्स मैगजीन ने विश्व के दस सबसे अधिक कमाने वाले क्रिकेटरों की सूची प्रकाशित की, उसमें एक करोड़ डॉलर के साथ धोनी सबसे आगे थे। 80 लाख डॉलर के साथ सचिन तेंदुलकर दूसरे नम्बर पर थे। अब लगता है कि सचिन भारत को विजयश्री दिलाने नहीं, बल्कि अपना सौवां शतक लगाने के लिए मैदान में उतरते हैं। वे अपना सौंवा शतक पूरा करें या न करें, उन्हें तो 61.4 करोड़ रुपए मिलने ही हैं। वे कभ रिटायर नहीं होंगे। जब तक उन्हें जबर्दस्ती रिटायर न कर दिया जाए। सचिन ने पेप्सी, कोका कोला, बूस्ट, रिनॉल्ड, कोलगेट, फिलिप्स, विसा, केस्ट्रॉल, एयरटेल, केनन आदि के ब्रांड रह चुके हैं। इसके अलावा नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने रोज अंडे खाओ का भी विज्ञापन किया था। हाल ही में उन्होंने बांद्रा में 9 हजार वर्गफीट के स्थान पर 39 करोड़ का जो बंगला बनवाया है, उसका वार्षिक प्रीमियम ही 40 लाख रुपए है। सचिन की अधिकांश कमाई विज्ञापन फिल्मों से ही हुई है।
हमारे क्रिकेटर जब भी धन के लालच में विज्ञापन फिल्मों का कांट्रेक्ट करते हैं,तो देश या प्रजा के बारे में सोचते ही नहीं हैं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में खुले आम शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है, उसके बाद भी शराब बनाने वाली कंपनियाँ उसी ब्रांड का सोडा बनाती हैं, जिसका विज्ञापन हमारे क्रिकेटर करते हैं। हाल ही में धोनी और हरभजन सिंह ने देश की प्रसिद्ध व्हिस्की के ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं। शराब कंपनियाँ अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिए सरोगेट एड का सहारा लेते हैं। इससे कानून का पालन भी हो जाता है और उत्पाद का विज्ञापन भी हो जाता है। विभिन्न कंपनियों की इस चाल को हमारे क्रिकेटर तो समझते हैं, पर देश की प्रजा अभी तक नहीं समझ पाई है। इन विज्ञापनों से युवा पीढ़ी गुमहरा हो रही है, पर क्रिकेटरों को इसकी चिंता कहाँ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा खिलाड़ियों को जो मोटी रकम दी जाती है, उस पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। बोर्ड ने 9 खिलाड़ियों को ‘ए’ केटेगरी पर रखा गया है। इस केटेगरी के खिलाड़ियों को हर वर्ष एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं, चाहे वे खेलें या न खेलें। इन नवरत्नों में महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सुरेश रैना, हरभजन सिंह और जहीर खान का समावेश होता है। ‘बी’ केटेगरी में शामिल क्रिकेटरों को 50 लाख रुपए वार्षिक और ‘सी’ के खिलाड़ियों को 25 लाख रुपए वार्षिक आय होती है। इसके अलावा उनहें एक टेस्ट मैच पर सात लाख रुपए, वन डे इंटरनेशनल पर चार लाख और 20-20 पर दो लाख रुपए अतिरिक्त मिलते हैं। कोई खिलाड़ी टेस्ट की दोनों इनिंग में शून्य रन भी बनाता है, तो भी उसे सात लाख रुपए दिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया से हम भले ही बुरी तरह से हार गए हों, पर सभी खिलाड़ियों के खाते में 28 लाख रुपए तो जमा हो ही गए।
आईपीएल में मिलने वाली मोटी राशि के चलते कुछ खिलाड़ी जिस तरह टेस्ट और एक दिवसीय Rिकेट के लिए अपनी फिटनेस को दाँंव पर लगा रहे हैं, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों की बढ़ती उम्र को लेकर मचाया जा रहा शोर अतार्किक है। आखिर 39 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग ने इसी श्रंखला में एक दोहरे शतक समेत दो शतक लगाए हैं। टेनिस में Rिकेट से कई गुना जयादा ऊर्जा और फिटनेस की जरूरत होती है। फिर भी 38 साल की उम्र में भारत के ही लिएंडर पेस ने ऐडिलेड में ऑस्ट्रेलियाई ओपन पुरुष डबल्स के रूप में अपने करिअर का 13 वां ग्रंैड स्लैम जीतकर साबित कर दिया है कि सबसे जरूरी है खेल के प्रति प्रतिबद्धता, जीत की दृढ़ इच्छाशक्ति और फिर उसे पूरा करने के लिए जरूरी फिटनेस और कोशिश। कहना नहीं होगा कि भारतीय Rिकेटरों को पेस से सबकसीखना चाहिए, वरना बोर्ड को चाहिए कि वह भी टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों को प्रदर्शन करो या जाओ का अल्टीमेटम दे दे, जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड ने पोंटिंग को दिया था। क्या देश का धन पर केवल खिलाड़ियों और नेताओं का ही वर्चस्व रहेगा, या आम आदमी के लिए उसका उपयोग होगा? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसे हमारे क्रिकेटर, नेता, क्रिकेट बोर्ड, चयन समिति समझे या न समझे, पर अब हमारे देश की प्रजा समझ रही है। यही प्रजा जिसने विश्वकप जीतने पर दीवाली मनाई थी, संभव है हमारे क्रिकेटरों के देश आगमन पर होली भी मना ले।
डॉ. महेश परिमल

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