शुक्रवार, 30 मार्च 2012

सोमवार, 26 मार्च 2012

कला-तकनीक में कला तत्व की विजय

डॉ. महेश परिमल

भारत में भरत मुनि से नाट्य शास्त्र की रचना की थी। इसके अनुसार विश्व में रंगभूमि का स्थापना हुई। विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ-साथ नाटच्य कलाओं में भी निखार आने लगा। इसके विभिन्न आयाम सामने आने लगे। इनमें से एक था फिल्मों का रूप। फिल्मों में भी जो कला दर्शाई जाती है, उसमंे भी मूलभूत रूप से नाटच्य शास्त्र के तत्वों को ही शामिल किया जाता है। अंतर केवल आधुनिक तकनीक का ही है। इस टेकनीक ने फिल्मों की दशा और दिशा ही बदल दी है। पहले श्वेत-श्याम और मूक फिल्मों का जमाना था। फिर इस्टमेन कलर का जमाना आया। अब थ्री डी और 4 डी का जमाना आ गया है। इसके बाद भी फिल्मों में मूल नाटक का ही तत्व आज भी शामिल है। इसे देखते हुए पुराने जमाने की टेक्नालॉजी भी मैदान मार सकती हे, यह ‘द आर्टिस्ट’ को मिले 5 ऑस्कर अवार्ड मिलने से साबित हो जाता है।
सन् 1929 में ऑस्कर अवार्ड की स्थापना हुई। तब पहले विश्व युद्ध की एक मूक फिल्म ‘विंग्स’ को पहला ऑस्क अवार्ड मिला था। इसके बाद पूरे 83 वर्ष बाद फिर एक मूक फिल्म को ऑस्कर अवार्ड मिलना एक उपलब्घि है। इस फिल्म के हीरो ज्यां दजार्दिन को बेस्ट एक्टर और दिग्दर्शक माइकल हेजाविसियस को बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड दिया गया। ‘द आर्टिस्ट’ फिल्म में दो कलाकारों की प्रेमकहानी को बेहुत ही काव्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। सन् 2012 में ‘द आर्टिस्ट’ की तरह ‘ह्यूगो’ को भी 5 ऑस्कर अर्वा मिले हैं। यह फिलम तकनीकी दृष्टि से अत्याधुनिक 3 डी फिल्म है। इस तरह से कला और तकनीक के बीच हुई स्पर्धा में कला तत्व की विजय हुई। ऐसा कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। एक समय ऐसा भी था, जब फिल्मों में कथावस्तु ही मुख्य कारक रहा करती थी। तकनीक का उपयोग से कथा और भी अधिक धारदार होकर सामने आने लगी। अब कथा गौण हो गई है और उस पर तकनीक हावी हो गई है। ऐसी फिल्मों के निर्माताओं को ‘द आर्टिस्ट’ के निर्माता ने यह संदेश दिया है कि यदि आप 2012 में भी श्वेत-श्याम फिल्म दमदार कथा के साथ बनाते हैं, तो वह फिल्म भी सफल हो सकती है। इक्कीसवीं सदी में बीसवीं सदी की तकनीक का उपयोग कर फिल्म बनाना एक जोखिमभरा निर्णय है। इस खतरे को उठाकर भी दिग्दर्शक माइकल हेजानेविसिसय ने एक ऐसी फिल्म बनाई है, जो शुरू से अंत तक दर्शकों को जकड़े रखती है। फिल्म का एक भी पल उबाऊ या बिना रोमांच का नहीं है। श्वेत-श्याम की तकनीक का फिल्म में बहुत ही सूझबूझ से उपयोग किया गया है। मूक फिल्मों के कलाकार जिस तरह से बिना संवाद बोले अपने हाव-भाव से दर्शकों को अभिभूत कर देते थे, इस अभिनय को सीखने के लिए फिल्म के हीरो जार्ज दुजार्डी ने बारीकी से एक-एक चीज को पकड़ा और उसका उपयोग किया।
5 ऑस्कर जीतने वाली ‘द ह्यूगो’ भी 3 डी तकनीक के साथ दर्शकों को जकड़े रखती है। अपनी नाटच्यात्मक कथावस्तु के कारण ही यह फिल्म मैदान मारने में सफल रही। यह फिल्म ब्रायन सेल्जनिक के उपन्यास ‘द इन्वेशन ऑफ ह्यूगा केबरे’ पर आधारित है। इस फिल्म में पेरिस के रेल्वे स्टेशन पर रहने वाले एक लड़के और खिलौने की दुकान के मालिक की अफलातून कथा है। ‘द ह्यूगो’ को जो 5 ऑस्कर मिले हैं, वे उसे उसकी तकनीक के कारण ही मिले हैं। इस पाँच में आर्ट डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी, साउंड एडिटिंग, साउंड मिक्सिंग और विजुअल इफेक्ट्स का भी समावेश होता है। हॉलीवुड में रियल लाइफ की स्टोरी पर फिल्म बनाने की परंपरा बहुत ही पुरानी है। इस परंपरा में बनी ‘द आयरन लेडी’ फिल्म ब्रिटेन की भूतपूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर के जीवन पर आधारित है। इस फिल्म में मार्गरेट थ्रेचर की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप को श्रेष्ठ अभिनेत्री का ऑस्कर अवार्ड दिया गया है। आक्टोविया स्पेंसर को ‘द हेल्प’ फिल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। श्रेष्ठ वेशभूषा के लिए पुरस्कार भी ‘द आर्टिस्ट’ को ही दिया गया है। ‘द आयरन लेडी’ के लिए श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाली अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप को आज से 29 वर्ष पहले ‘सोफिस च्वाइस’ फिलम के लिए श्रेष्ठ अभिनेत्री का अवार्ड मिला था। इसके बाद 13 बार उनका नामीनेशन ऑस्कर के लिए हुआ था, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बार 14 वीं बार उनका नामीनेशन हुआ और अवार्ड मिल गया। उन्हें धर्य के मीठे फल का स्वाद चखने को मिला। इसके पहले 1979 ों स्ट्रीप को ऐनी केमर वर्सेस केमर नामक फिल्म के लिए सहायक अभिनेत्री का ऑस्कर अवार्ड मिला था। आज तक कुल 5 कलाकारों को ही तीन बार ऑस्कर मिला है। केथेरिन हेपबर्न नामक अभिनेत्री ने चार बार ऑस्कर जीता है। हॉलीवुड की फिल्मों में अभिनेत्रियों का कैरियर केवल अभिनय पर ही निर्भर होता है। उसके सौंदर्य की अपेक्षा उसके अभिनय की कीमत आँकी जाती है। यह बात 50 वर्ष से ऊपर पहुंची ऑस्कर जीतने वाली मेरिल स्ट्रीप ने साबित कर दिखाया।
किसी कलाकार को 82 वर्ष की उम्र में ऑस्कर अवार्ड मिले, ऐसा पहली बार हुआ है। क्रिस्टोफर प्लमेर नामक कलाकार ने ‘बीगीनर्स’ फिल्म में सजातीय संबंध रखने वाले एक वृद्ध विधुर की भूमिका निभाई है। इस भूमिका के लिए उन्हें श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला है। सन् 1929 में जब ऑस्कर की स्थापना हुई, तब प्लमेर केवल दो वर्ष के थे। ऑस्कर के लिए उन्हें पूरे 82 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। ऑस्कर को गले लगाते हुए प्लेमेर सहसा कह उठे, तुम मेरे से उम्र में केवल दो वर्ष ही बड़े हो। मेरे पूरे जीवन में तुम कभी नहीं मिले। हमारी भेंट कैसे नहीं हुई? तुम्हारे लिए मैंने कितने साल प्रतीक्षा की। अब जाकर तुम मेरे इतने करीब आए हो कि तुम्हें छू सकूँ। इसके पहले ऑस्कर जीतने वाली सबसे वृद्ध कलाकार अभिनेत्री जेसिका टेंडी थी, उसे 80 वर्ष की उम्र में श्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिला था। हमारे बालीवुड में दादी की भूमिका निभाने वाली किसी अभिनेत्री को श्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिले, ऐसी कल्पना भी की जा सकती है भला?
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

सफलता की दिशा में बढ़ाया गया पहला कदम है असफलता

डॉ. महेश परिमल
मौसम के तेवर बदले हुए हैं। अब तक गर्मी की दस्तक सुनाई दे रही थी, जो अब दबे पाँव आँगन तक आ गई है। इस मौसम ने सभी को व्यस्त कर दिया है। बच्चों के लिए तो यह परीक्षा का मौसम है। तनावभरा मौसम। गुजरात में यह बच्चों की परीक्षा और पालकों के लिए अग्निपरीक्षा है। इस मौसम में एक तरह की खुश्की का अहसास दिन-भर बना रहता है। इन दिनों प्रकृति अपना चोला बदल रही होती है। विज्ञान की मानें तो मानव मस्तिष्क में भी फिरोटीन नामक रसायन का स्तर कम-ज्यादा होता रहता है। इससे व्यक्ति में जोश पैदा होता है। कई मामलों में जब इसकी मात्रा कम हो जाती है, तब एक आलस पूरे वातावरण में फैल जाता है। किसी काम में मन नहीं लगता । इसलिए हमने देखा होगा कि कुछ लोग तो पूरे जोश-खरोश के साथ काम करते दिखते हैं, दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनसे कुछ भी नहीं होता। आलसीपन उनके चेहरे पर दिखाई देता है। यह इसी फिरोटीन का ही कमाल है। जो इन दिनों हमारे शरीर को नियंत्रित करता है। उधर प्रकृति का रंग भी बदलने लगा है। हवाएँ तेज होने लगी हैं। पत्ते पीले पड़ने लगे हैं। पेड़ों से हरियाली कुछ समय के लिए विदा लेने लगी है। मानव ग्रीष्म ऋतु के स्वागत के लिए आतुर है।
बात फिर परीक्षा की। यह चलती तो केवल 15-20 दिन, पर इसका असर दो-तीन महीनों तक रहता है। मन एक अनजाने भय का अनुभव करता है। यह भय भीतर तक पहुँच जाता है। अंदर से टूटने की आवाज आती है। किसी काम में मन नहीं लगता। मन भटकता रहता है। कोई भी विचार लंबे समय तक टिक नहीं पाता। पढ़ा हुआ याद नहीं रह पाता। इस कारण गुस्सा सदैव नाक पर होता है। किसी की सलाह भी सहन नहीं होती। छोटी-छोटी बात पर नाराजगी दिखाई देती है। सब कुछ जानते हुए भी इससे मुक्ति पाने की छटपटाहट बढ़ती जाती है। कई लोग इसे बीमारी का नाम दे देते हैं। पर यह बीमारी नहीं है। तनाव के कारण मन की ऐसी दशा होती है। यह एक प्रकार की अस्थायी स्थिति है। इससे बाहर आने के लिए स्वयं को दृढ़ बनाना होगा। फिर भी यह सब-कुछ चलता रहेगा, जब तक यह परीक्षारूपी तलवार सर पर लटकती होगी। परीक्षा खत्म, सब कुछ सामान्य।
लेकिन परीक्षा तक आखिर ऐसा क्या किया जाए, जिससे मन भटके नहीं? यह तो तय है कि बिना परिश्रम के सफलता नहीं मिल सकती। सफल जीवन के लिए सबसे पहले दिनचर्या को व्यवस्थित करना होगा। इसमें शामिल है शरीर का स्वस्थ रहना। यह स्वस्थ रहेगा, तभी हम भविष्य की इबारत लिखने में कामयाब होंगे। भटकाव एक मन आधारित प्रक्रिया है। जो कुछ घट रहा है, वह मन में घट रहा है, लेकिन इसका असर शरीर पर पड़ रहा है। इसीलिए कहा गया है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ अपनी शक्ति पर विश्वास रखो, हम सब कुछ कर सकते हैं। मन पर काबू रखो, जो भी करो, पूरी निष्ठा के साथ करो। भीतर की शक्ति को पहचानो। असफलता से क्यों डरना? आप जानते हैं- जो कभी भी कहीं असफल नही हुआ वह आदमी महान नहीं हो सकता । असफलता आपको महान कार्यों के लिए तैयार करने की प्रकृति की योजना है । सफलता की सभी कथाएं बडी-बडी असफलताओं की कहानियां हैं। असफलता फिर से अधिक सूझ-बूझ के साथ कार्य आरम्भ करने का एक अवसर मात्र है । असफल होने पर, आप को निराशा का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु, प्रयास छोड़ देने पर, आप की असफलता सुनिश्चित है। हमारी प्रत्येक गलती हमें कुछ न कुछ सिखाती ही है। जो भी सीखें, अपनी गलतियों से सीखें। सफलता हमारे बहुत करीब होगी। यह तय मानो कि असफलता सफलता की दिशा में बए़ाया गया पहला कदम है। कदम कभी गलत नहीं होते, गलत होते हैं उसके परिणाम। कदम ईमानदारी भरा होगा, तो परिणाम भी ईमानदाराना होंगे। इसलिए कोई भी कदम उठाने से पहले अपने करीब से बेईमानी को दूर भगा दें, पूरी शिद्दत के साथ ईमानदारी के साथ एक कदम उठाकर तो देखो, परिणाम अपेक्षा से अधिक सुनहरा होगा। इस एक कदम के बाद हम अपने स्थान से दस कदम आगे होंगे। तो जनाव सोच क्या रहे हैं, एक कदम तो ईमानदारी से उठाओ, फिर देखो दस कदमों का कमाल!

डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 22 मार्च 2012

तब बस ऑंखों में ही रह जाएगा पानी

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख 
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 नवभारत रायपुर एवं बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 21 मार्च 2012

खनन माफिया का दुस्‍साहस

खनिज माफिया के दुस्‍साहस पर  हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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सोमवार, 19 मार्च 2012

आखिर नरेंद्र कुमार की गलती क्या थी?

डॉ. महेश परिमल
हमारे बीच बहुत से ऐसे लोग थे, जो ईमानदार होने के बाद भी बेईमानी की मौत मर गए। बेईमानी का आशय यह है कि वे ईमानदार लोग बेईमानों के चक्रव्यूह में फँस गए। यही बेईमान लोग आज नेता के रूप में बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं। अवकाश के दिन एक जांबाज अफसर अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान दे रहा है, तो दूसरी तरफ प्रदेश के नेता अपने बयानों से सियासत का खेल खेल रहे हो, तो फिर कैसे सहज बनेगी, प्रदेश की तस्वीर? इस पर यदि कांग्रेस नेता ये आरोप लगाएँ कि मध्यप्रदेश सरकार को माफिया चला रहे हैं, तो गलत क्या है? आज पूरा प्रदेश ही माफिया की चपेट में है। इन पर कार्रवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो पाती,क्योंकि ये चुनाव के समय पार्टी को चंदे के रूप में मोटी रकम देते हैं। मानो चंदा देकर इन्होंने प्रदेश के नेताओं को भी अपना गुलाम बना लिया हो। वैसे सच्चई यही है कि कहीं भी कुछ गलत होता है, तो हमारे ये नेता तुरंत पहुँचकर उसी सही कर देते हैं। प्रदेश में फैले माफियाराज की जो तस्वीर अभी सामने आई है, वह बहुत ही भयानक है। यह तस्वीर यही बताती है कि अपना काम पूरी ईमानदारी से कभी मत करो। इन माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि किसी की जान लेना इनके बाएँ हाथ का खेल है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनके खिलाफ कोई ऐसा सख्त कानून ही नहीं है, जिससे ये खौफ खाएँ। आसान सा जुर्माना और आसान सी सजा। जो इनके लिए बहुत ही सामान्य है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी न्यायिक जाँच के आदेश दे दिए हैं। इसके पहले भी प्रदेश में कई घटनाओं की जाँच के लिए आदेश किए जा चुके हैं। यह तो मुख्यमंत्री को भी नहीं मालूम होगा कि कितने मामलों की जाँच हो चुकी है, रिपोर्ट भी आ चुकी है, पर किसी पर भी अमल नहीं किया गया। प्रदेश में एक के बाद एक कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जिसमें माफिया का हाथ है, पर अभी तक कोई ऐसा शख्स पकड़ा नहीं गया, जिसे सजा हुई हो। प्रदेश में न्याय व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। हत्या की यह घटना मध्यप्रदेश सरकार के माथे का कलंक है। प्रदेश में लगातार ऐसा हो रहा है कि कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अफसरों को प्रताड़ित और हतोत्साहित किया जा रहा है। होना तो यह था कि उन्हें संरक्षण दिया जाता, ताकि वे अपना काम और भी अधिक निष्ठा के साथ निभाते। पर ऐसा हुआ नहीं। सरकार अभी तक यह समझने को तैयार ही नहीं है कि ईमानदार अधिकारियों को कर्तव्यनिष्ठा में कितनी परेशानियाँ आती हैं। अवैध खनन में राज्य सरकार को करोड़ों का घाटा हो रहा है। पर इस दिशा में सरकार तो स्वयं आँखें बंद करके बैठी है, पर जो अफसर इस दिशा में सक्रिय होकर कुछ करना चाहते हैं, उन्हें सरेआम मार डाला जाता है। सरकार केवल जाँच का आदेश देकर खामोश हो जाती है। ईमानदार अफसरों को अपनी कर्तव्य परायणता का मोल चुकाना पड़ रहा है। कई अधिकारी इस मोल को चुका चुके हैं, पर सरकार ने इस दिशा में ऐसा कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया, जिससे माफिया के चेहरे पर शिकन भी आई हो।
माफिया प्रदेश में इसलिए बेखौफ है, क्योंकि उन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। कैसी विडम्बना है, जिन्हें संरक्षण मिलना चाहिए, वे मैदानों में पदस्थ हैं, अपनी जान की परवाह न कर वे कर्तव्यनिष्ठ रहकर देश के विकास में अपना योगदान देना चाहते हैं, पर सरकार उन्हें ऐसा नहीं करने देती। इससे उनका मनोबल ही टूट जाता है। बिना मनोबल के कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। माफिया के हाथ कानून से भी लंबे हैं। इसे साबित करती है, यह घटना। ऐसा नहीं है कि इसके पहले इस तरह की कोई घटना प्रदेश में नहीं हुई। हाल ही में इस तरह की कई घटनाएँ प्रदेश में हुई हैं। जिसकी केवल जाँच ही जारी है। मामला यदि फास्ट ट्रेक कोर्ट में जाए, तभी इस दिशा में कुछ ठोस कार्रवाई संभव हो पाएगी। अभी जो भी मामले हैं, वे सभी अदालत में हैं। कई मामलों में आरोपी जमानत पर रिहा भी हो चुके हैं। ऐसे में यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि सरकार इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई करेगी?
क्यों खौफ नहीं?
अवैध उत्खनन में सिर्फ प्रति वाहन जुर्माने का प्रावधान। सजा नहीं होती। इसलिए कार्रवाई के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ता। सिद्ध करना मुश्किल, क्योंकि ठेकेदार फर्जी रसीदें पेश कर देता है।  खनन में ठेकेदार किराए के ट्रैक्टर-ट्राली लगाते हैं। मामला बढऩे पर सारा आरोप ड्राइवर पर मढ़ देते हैं या ट्रैक्टर मालिक पर। खनिज अफसरों से सांठगांठ के कारण बड़ी कार्रवाई नहीं होती।  अधिकांश खनन ठेकेदार सीधे पार्टियों व नेताओं को चंदा देते हैं इसलिए भी उन पर कार्रवाई नहीं होती। एक दशक पहले तक सामान्य व्यक्ति भी खदानें ले लेते थे, पर अब दबंग लोग इस धंधे में आ गए हैं।  रॉयल्टी एक जगह की भरते हैं और उसकी आड़ में अन्य स्थानों का खनिज का अवैध परिवहन करते हैं। सरपंचों की दादागिरी इसमें सहायक है। किसी विभाग की कार्रवाई करने पर वे दबाव बनाते हैं। ठेकेदार को सरपंच और ग्राम पंचायतों द्वारा क्षेत्र विशेष में खुदाई के लिए कह देते हैं और जब राजस्व या खनिज विभाग कार्रवाई करता है तो उस पर दबाव बनाते हैं।
खनन माफियाओं का गणित
2007 में बानमोर के बटेश्वरा क्षेत्र में तत्कालीन कलेक्टर व एसपी पर फायरिंग की थी। 2010 में रिठौरा क्षेत्र में पत्थर माफिया ने वन विभाग के कर्मचारियों व अफसरों पर फायरिंग की थी। तब चार लोग घायल हुए थे। 2011 दिसंबर में सेलटैक्स बैरियर के पास शिवनगर में टास्कफोर्स पर फायरिंग की थी। 2012 जनवरी में भाजपा नेता ने अफसर से अवैध पत्थर से भरे दो ट्रैक्टर लूट लिए थे।
.तो अधिकारी चढ़ जाता अवैध उत्खनन की भेंट
फर्शी पत्थर की खदानों से लबरेज मालथौन तहसील के गांव अटा में खनिज माफियाओं का वर्चस्व है। माफिया सागर, ललितपुर, झांसी नेशनल हाइवे को भी क्षति पहुंचाने लगे। तत्कालीन मालथौन थाना प्रभारी (वर्तमान में मुलताई में पदस्थ) मदन मोहन को सितंबर 2010 में एक ट्रक से अवैध पत्थर के परिवहन की सूचना मिली। वे ट्रक का पीछा करते हुए उप्र जिले के नाराहट सीमा में प्रवेश कर गए। बकौल मदन मोहन कई बार ट्रक चालक ने उन्हें कुचलने का प्रयास किया। यदि ओवरटेक करते तो जान भी जा सकती थी। अंतत: चालक भागने में सफल हो गया।
सच्चई यह है.
-खदान माफिया पालते हैं डकैतों को  ग्वालियर-चंबल संभाग में खदान माफिया ही डकैतों के रहने-खाने का इंतजाम करते हैं।
- खदान माफिया पुलिस और वन विभाग को अवैध कारोबार से दूर रखने के लिए करता है व्यवस्था।
- डकैत वैध खदान वालों से रंगदारी टैक्स वसूलते हैं, जबकि खदान माफिया खुद ही रसद पहुंचाते हैं।
 - जंगल में मिलने वाले संसाधनों की वजह से डकैत पनपते हैं।
 - राजेंद्र करई वाला और कल्ली गुर्जर गैंग भी अवैध खदानों से पैसा वसूल रहे हैं।
 - प्रमुख डकैत गिरोहों के खत्म होने के बाद ही सामने आई अवैध खनन की घटनाएं।
हत्या पर सियासत
  आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हो पाई है कि उनकी हत्या को लेकर मध्य प्रदेश में सियासत शुरू हो गई है। सत्ताधारी दल भाजपा उनकी हत्या को महज एक हादसा करार देने में जुटी है तो वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है, जबकि दूसरी ओर उनके हत्यारे अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। हत्या में भाजपा विधायक पर शक:-नरेंद्र के घरवालों का आरोप है कि उनकी हत्या एक साजिश के तहत की गई है। उनके पिता केशव ने इसके पीछे एक भाजपा विधायक पर शक जताया है। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले उस विधायक के दबाव में ही उनकी बहु का तबादला किया गया था। 32 वर्षीय नरेंद्र कुमार 2009 बैच के आईपीएस अधिकारी थे, उनकी पत्नी आईएएस अधिकारी हैं।  पूर्व भाजपा विधायक समेत 8 पर मामला दर्ज:-पुलिस पार्टी ने जब अवैध रुप से बेची जा रही शराब की बिRी को रोकने का प्रयास किया तो वहां मौजूद शराब माफिया ने उन पर पत्थरों एवं लाठियों से हमला कर दिया। पुलिस पार्टी को वहां से बेरंग वापस लौटना पड़ा। पुलिस ने पूर्व भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह सहित उनके आठ समर्थकों के खिलाफ नामजद एवं लगभग डेढ़ दर्जन अज्ञात आरोपियों के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज कर लिया है लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इन हालात में यह सोचा जा सकता है कि सरकार कितनी विवश है इन माफियाओं के सामने। एक तरह से सरकार नतमस्तक है। सरकार में इच्छा शक्ति का पूरी तरह से अभाव है। सरकार की इसी कमजोरी के कारण ही माफिया सर उठा रहे है। पुलिस बल पर हमला करना अब प्रदेश में आम बात है। पुलिस भी अब अपनी ड्यृटी छोड़कर कुछ ऐसे काम करने लगी है, जिससे उनकी आवक हो और उन्हें संरक्षण भी प्राप्त हो। कर्तव्यनिष्ठ साथियों का हश्र वह अपनी आँखों से देख रही है। ऐसे में कानून-व्यवस्था का लचर होना स्वाभाविक है।
              डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

बुधवार, 14 मार्च 2012

दैनिक जागरण और नवभारत में प्रकाशित आलेख

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण मे प्रकाशित मेरा आलेख
 http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-03-14&pageno=9







नवभारत रायपुर बिलासपुर में प्रकाशित मेरा आलेख 

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http://www.navabharat.org/raipur.asp

मंगलवार, 13 मार्च 2012

सोमवार, 12 मार्च 2012

गांधी जी की दांडी यात्रा

हमारी आजादी के इतिहास का सबसे उज्जवल प्रकरण मेें 'दांडीयात्राÓ को लिया जा सकता है। पूर्ण स्वराज्य के संकल्प को साकार बनाने गांधीजी ने नमक कानून भंग करने के लिए 241 मील पदयात्रा का विचार किया और इस संबंध में जो भी आयोजन किया गया, वह किसी भी आंदोलन के लिए एक मील का पत्थर है। इसीलिए हर वर्ष इस घटना की याद को ताजा करने के लिए लोग दांडीयात्रा का आयोजन करते हैं।
गुजरात के मंच पर इस ऐतिहासिक घटना ने आकार लिया। जिससे हमारी अनेक पीढिय़ाँ गर्व से इसका स्मरण करेंगी। सरदार वल्लभभाई पटेल जब इस यात्रा की पूर्व तैयारी के साथ भरुच में युद्ध का शंखनाद करते हैं, तो कहते हैं कि ''संसार ने कभी नहीं देखा होगा, ऐसा युद्ध अब होने वाला है.... गुजराती यानी व्यापार कर जीने वाले.... इन्होंने कभी अपने हाथों में हथियार नहीं उठाए, युद्धक्षेत्र देखा नहीं....यदि मृत्यु की चिंता हो, तो उसका जीवन बेकार है। इस शुभ क्षणों में जन्म हुआ है..... अवसर मिला है, तो उसका स्वागत करो, अब तो दीये में जिस तरह पतंगे गिरते हैंं, उसी तरह लड़ाई में कूद जाना है। तभी तो लोग जानेंगे कि महात्मा गांधी ने 15 साल यूँ ही नहीं बिताए हैं..... साबरमती के संत को किसी ने जाना हो, तो यह सभी बातें बिलकुल आसान हैं ... इसे अपना धर्म समझ लेना। देश से लोग जितनी अपेक्षा रखेंगे, उससे कहीं अधिक अपेक्षा लोग गुजरात से रखेंगे।इसके पहले वाइसरॉय लॉर्ड इरविन को गांधीजी ने लिखा ही था कि ''मैं जानता हूँ कि अहिंसा की लड़ाई लडऩे में मैं मूर्खतापूर्ण खतरा उठा रहा हँ! पर गंभीर खतरों के बिना सत्य की विजय संभव ही नहीं है।ÓÓ
1922 में गांधीजी को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष की सजा हुई तब ब्रिटिश संसद में लॉर्ड बर्कनहेड ने शेखी बघारते हुए कहा था कि ''गांधीजी की गिरफ्तारी से भारत में कहीं भी विरोध का स्वर सुनाई नहीं दिया और हमारा काफिला सुखपूर्वक आगे ही बढ़ रहा है। वल्लभभाई पटेल की इच्छा थी कि 1930 में हुई गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में जनता उसका मुँहतोड़ जवाब दे। सत्याग्रहियों से जेल भर जाए। टैक्स के भुगतान के बिना शासन की कार्यप्रणाली ठप्प हो जाए। इस संबंध में जब उन्होंने खेड़ा जिले के रास ग्राम में लोगों के आग्रह पर भाषण करना शुरू किया, तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 9 मार्च 1930 को रविवार का अवकाश होने के बाद भी मजिस्ट्रेट ने अदालत खुली रखकर सरदार पटेल को 3 माह की सजा सुनाई। साबरमती जेल जाते हुए गांधीजी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लिया।
9 मार्च 1930 को गांधीजी ने लिखा कि ''इसमें संदेह नहीं कि यदि गुजरात पहल करता है, तो पूरा भारत जाग उठेगा।ÓÓ इसलिए दस मार्च को अहमदाबाद में 75 हजार शहरियों ने मिलकर सरदार पटेल को हुई सजा के विरोध में लडऩे की प्रतिज्ञा की। 11 मार्च को गांधीजी ने अपना वसीयतनामा कर अपनी इच्छा जताई कि आंदोलन लगातार चलता रहे, इसके लिए सत्याग्रह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए, कानून भले ही भंग हो, पर शांति रहे। लोग स्वयं ही नेता की जवाबदारी निभाएँ।
11 मार्च की शाम की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधीजी के मुख से यह उद्गार निकले ''मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरुँ या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूँगा।
दांडी यात्रा की तैयारी देखने के लिए देश-विदेश के पत्रकार, फोटोग्राफर अहमदाबाद आए थे। आजादी के आंदोलन की यह महत्वपूर्ण घटना ''वाइज ऑफ अमेरिका के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत की गई कि आज भी उस समय के दृश्य, उसकी गंभीरता और जोश का प्रभाव देखा जा सकता है।
अहमदाबाद में एकजुट हुए लोगों में यह भय व्याप्त था कि 11-12 की दरम्यानी रात में गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। गांधीजी की जय और वंदे मातरम् के जयघोष के साथ लोगों के बीच गांधीजी ने रात बिताई और सुबह चार बजे उठकर सामान्य दिन की भाँति दिनचर्या पूर्ण कर प्रार्थना के लिए चल पड़े।
भारी भीड़ के बीच पंडित खरे जी ने अपने कोमल कंठ से यह गीत गाया :-
''शूर संग्राम को देख भागे नहीं,
देख भागे सोई शूर नाहीं
प्रार्थना पूरी करने के बाद जब सभी लोग यात्रा की तैयारी कर रहे थे, इस बीच अपने कमरे में जाकर गांधीजी ने थोड़ी देर के लिए एक झपकी भी ले ली। लोगों का सैलाब आश्रम की ओर आ रहा था। तब सभी को शांत और एकचित्त करने के लिए खरे जी ने ''रघुपति राघव राजारामÓÓ की धुन गवाई। साथ ही उन्होंने भक्त कवि प्रीतम का गीत बुलंद आवाज में गाया:-
ईश्वर का मार्ग है वीरों का
नहीं कायर का कोई काम
पहले-पहल मस्तक देकर
लेना उनका नाम
किनारे खड़े होकर तमाशा देखे
उसके हाथ कुछ न आए
महा पद पाया वह जाँबाज
छोड़ा जिसने मन का मैल।
अहमदाबाद के क्षितिज में मंगलप्रभात हुआ, भारत की गुलामी की जंजीरें तोडऩे के लिए भागीरथ प्रयत्न शुरू हुए। 12 मार्च को सुबह 6.20 पर वयोवृद्ध 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने जब यात्रा शुरू की, तब किसी को बुद्ध के वैराग्य की, तो किसी को गोकुल छोड़कर जाते हुए कृष्ण की, तो किसी को मक्का से मदीना जाते हुए पैगम्बर की याद आई। गांधीजी के तेेजस्वी और स्फूतर््िामय व्यक्तित्व के दर्शन मात्र से स्वतंत्रता के स्वर्ग की अनुभूति करते लाखों लोगों की कतारों के बीच दृढ़ और तेज गति से कदम बढ़ाते गांधीजी और 78 सत्याग्रहियों का दल अन्याय, शोषण और कुशासन को दूर करने, मानवजाति को एक नया शस्त्र, एक अलग ही तरह की ऊर्जा और अमिट आशा दे रहा था।
गांधीजी ने यात्रा के लिए और जेल जाने के लिए अलग-अलग दो थैले तैयार किए थे, जो उनकी यात्रा की तस्वीरों में देखे जा सकते हैं, क्योंकि समग्र यात्रा के दौरान कब जेल जाना पड़ जाए, यह तय नहीं था। 16 मार्च को गांधीजी ने नवजीवन में लिखा  ''ब्रिटिश शासन ने सयानापन दिखाया, एक भी सिपाही मुझे देखने को नहीं मिला। जहाँ लोग उत्सव मनाने आए हों, वहाँ सिपाही का क्या काम? सिपाही क्या करे? पूर्ण स्वराज्य यदि हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, तो हमें यह अधिकार प्राप्त करने में कितना समय लगना चाहिए? 30 कोटि मनुष्य जब स्वतंत्रता प्राप्ति का संकल्प करंे, तो वह उसे मिलती ही है।  12 मार्च की सुबह का वह दृश्य उसी संकल्प का एक सुहाना रूप था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा कि ''महात्मा जी के त्याग और देशप्रेम को हम सभी जानते ही हैं, पर इस यात्रा के द्वारा हम उन्हें एक योग्य और सफल रणनीतिकार के रूप में पहचानेंगे। गजब का आत्मविश्वास, लोकजागृति, अद्भुत धैर्य, सहनशीलता, शांत प्रतिकार के प्रतीक समान यह दांडी यात्रा 77 वर्ष बाद भी कौतुहल और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। मानवजाति के इतिहास का यह एक अनोखा स्वर्ण पर्व गुजरात की यश गाथा का मोर पंख है।

(पी के लहरी की किताब स्‍वराज्‍य ना गांधी से साभार)

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मेट्रोपोलिटन परिवार का एक अनोखा सदस्य: सुब्रमण्यम स्वामी


डॉ. महेश परिमल
देश का अब तक का सबसे बड़ा 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हमारे सामने न आया होता, यदि इसके पीछे सुब्रमण्यम स्वामी न पड़े होते। यही स्वामी हैं, जिन्होंने वाजपेयी सरकार गिराई थी, आज वही मनमोहन सरकार को गिराने में लगे हैं।  गृह मंत्री पी. चिदंबरम के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। निचली अदालत ने 2जी मामले में चिदंबरम को क्लीन चिट दे दी थी। स्वामी ने इसी को चुनौती दी है। स्वामी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि 2जी घोटाले में चिदंबरम की भूमिका को देखते हुए उन्हें भी आरोपी बनाया जाए। उन्होंने कहा है कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा के बराबर ही चिदंबरम भी गुनहगार हैं। चिदंबरम उस समय वित्तमंत्री थे। स्वामी के अनुसार स्पेक्ट्रम की कीमतें तय करने में तत्कालीन वित्त मंत्री ने अहम भूमिका निभाई थी। दूरसंचार कंपनियों को अपनी हिस्सेदारी विदेशी फमोर्ं के हवाले करने की इजाजत देने में भी उनकी भूमिका थी। उन्होंने कहा कि चिदंबरम को आरोपी बनाए जाने के लिए निचली अदालत को कुछ सबूत सौंपे गए थे। वे अपने आप में पर्याप्त थे। तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम ने भ्रष्टाचाररोधी कानून और अन्य कानूनों के तहत अपराध किया है। स्वामी की याचिका इस साल चार फरवरी को विशेष सीबीआई अदालत ने खारिज कर दी थी।
आज जनता के सामने सुब्रमण्यम स्वामी प्रजा के सामने हीरो हों। भ्रष्टाचार को लेकर उनके द्वारा चलाए गए अभियान पर वे शहर-दर-शहर प्रवचन के लिए जा रहे हैं। गृह मंत्री चिदम्बरम के बाद अब उनके निशाने पर गांधी परिवार के दामाद राबर्ट बढेरा भी आ गए हैं। इसके पहले वे राहुल गांधी को बुद्धू भी कह चुके हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी एक मेट्रोपोलिटन परिवार के सदस्य हैं। उनका  साला यहूदी, दामाद मुस्लिम, जीजा ईसाई और उनकी पत्नी पारसी है। उनकी माँ पद्मावती सुब्रमण्यम और पिता सीताराम सुब्रमण्यम दोनों ही आरएसएस के विचारों से प्रभावित हैं। जो कांग्रेसी स्वामी का पक्ष लेते हैं, उन्हें कांग्रेस विरोधी कहा जाता है। भाजपा में उनका नाम गर्व से लिया जाता है। आज सभी राजनैतिक दल उनसे दूर भाग रहे हैं। लेकिन जब उनका लाभ लेना होता है, तो सभी दल उनके करीब भी आ जाते हैं। उनका स्वभाव बड़ा गुम्फित है। उनके साथ यह कहावत प्रचलित है कि जिसके साथ वे बैठते हैं, धोखा उसे ही देते हैं। मजे की बात यह है कि जनसंघ की तरफ से ये राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी ने जिस तरह से अभियान चलाया है, उससे ऐसा लगता है कि हर राज्य में एक सुब्रमण्यम स्वामी होना ही चाहिए। पर वह आज के सुब्रमण्यम स्वामी की तरह कदापि नहीं होना चाहिए। क्योंकि इन्हीं पर आरोप है कि इन्होंने दो बार केंद्रीय सरकार को गिराया है। तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले 72 वर्षीय  श्री स्वामी अभी भी ऊर्जावान हैं। चिदम्बरम के खिलाफ वे सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाएँगे। हाल ही में हुए फ्रांस की डेसल्ट कंपनी को मिले 11 अरब डॉलर के फाइटर विमान के सौदे में भी स्वामी इटेलियन कनेक्शन देख रहे हैं। स्वामी की इन्हीं आदतों के कारण कोई भी उनसे अपना मेल-जोल नहीं बढ़ाना चाहता। वैसे देखा जाए, तो सुब्रमण्यम स्वामी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी से भी अधिक लोकप्रिय हैं। इसकी वजह यही है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अलख जगाई, उसी को अन्ना हजारे ने आगे बढ़ाया।
2 जी स्पेक्ट्रम कांड के पीछे जिस तरह से सुब्रमण्यम स्वामी पड़े,उससे यूपीए सरकार की नींद ही हराम हो गई। स्वामी की कोशिशें रंग लाई और देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया। स्वामी के कारण केंद्र सरकार के दो विकेट गिर गए। एक विकेट बमुश्किल से बच पाया। उन दो विकेटों में एक तो ए राजा और दूसरा कनिमोई का समावेश होता है। बमुश्किल बचे चिदम्बरम के लिए स्वामी आज भी आँख की किरकिरी बने हुए हैं। जिस तरह से आज अन्ना हजारे के प्रशंसकों से अधिक उनके दुश्मनों की संख्या अधिक है। ठीक इसी तरह स्वामी के प्रशंसकों से अधिक उनके दुश्मन हैं। राजनीति में उन्होंने कई लोगों को पटखनी दी है। स्वामी और जयललिता की दोस्ती बरसों पुरानी है। इतिहास बताता है कि एक बार उन्होंने जयललिता की मुलाकात सोनिया गांधी से करवाई थी। इस मुलाकात के बाद वाजपेयी की 13 माह पुरानी सरकार औंधे मुँह गिर गई थी। आज सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा के साथ खड़े दिखाई देते हैँ। भाजपा उनका सम्मान कर रही हो। पर इन्हीं स्वामी ने अटल बिहारी वाजपेयी के कुँवारेपन पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए उन्हें पियक्कड़ कहा था। कर्नाटक की राजनीति से रामकृष्ण हेगड़े का नामोनिशान खत्म करने में इन्हीं स्वामी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही स्वमी चंद्रास्वामी के करीबी लोगों में से थे। नरसिम्हा राव के केबिनेट में स्वामी का समावेश चंद्रास्वामी के कहने पर ही हुआ था। युवातुर्कऔर जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने स्वामी को 1970 में उन्हें पाटी्र से निकाल दिया था, पर बाद में स्वामी ने उन्हें मना भी लिया।
स्वामी का स्वीाव ही ऐसा है कि वे अपनी विशेष चुटीली टिप्पणियों से लोगों का मजाक उड़ाते रहते हैं। कई बार वे अतिशयोक्ति भी कर जाते हैं। उन्होंने ने ही 1999 में कहा था कि एक बार सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का ऑफर दिया था। पर उन्होंने इंकार कर दिया। बोलने में आक्रामक और स्वभाव से हँसमुख स्वामी अपने भाषण में छोटी-छोटी फुलझड़ियों से लोगों को गुदगुदाते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक लेक्चर में कहा था कि तिहाड़ जेल के रसोइयों की यह शिकायत कर रहे हैं कि स्वामी केवल दक्षिण भारतीय को ही हमारे यहाँ भेजते हैं, इसलिए हमें केवल इडली-साँभर ही बनाने का ऑर्डर मिलता है। मैंने उन्हें कह दिया है कि वे अब इटेलियन फूड बनाना सीख लें, बहुत ही जल्द उन्हें इसके भी ऑर्डर मिलने लगेंगे। स्वामी भले ही वन मेन शो हों, पर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि उनकी चाहत केवल प्रधानमंत्री पद पाने की ही है। देखना यह है कि इसमें वे कहाँ तक सफल हो पाते हैं?
डॉ. महेश परिमल

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