शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

आओ चलें बचपन के गाँव में

भारती परिमल
आओ चलें बचपन के गाँव में, यादों की छाँव में.. कलकल करती लहरों से खेलें, कच्ची अमियाँ और बेर से रिश्ता जोड़े। रेत के घरोंदे बनाकर उसे अपनी कल्पनाओं से सजाएँ। कड़ी धूप में फिर चुपके से निकल जाएँ घर से बाहर और साथियों के  संग लुकाछिपी का खेल खेलें। सावन की पहली फुहार में भीगते हुए माटी की सौंधी महक साँसों में भर लें। ठंड की ठिठुरन, गरमी की चुभन और भादों का भीगापन सब कुछ फिर ले आएं चुराकर और जी लें हर उस बीते पल को, जो केवल हमारी यादों में समाया हुआ है। 
वो सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों और अजान की आवाज के साथ खुलती नींद और दूसरे ही क्षण ठंडी बयार के संग आता आलस का झोंका, जो गठरी बन बिस्तर में दुबकने को विवश कर देता, वो झोंका अब भी याद आता है। माँ की आवाज के साथ. खिड़की के परदों के सरकने से झाँकती सूरज की पहली रश्मियों के साथ. दरवाजे के नीचे से आते अखबार की सरसराहट के साथ. चिड़ियों की चीं चीं के साथ. दादी के सुरीले भजन के साथ. दादा के हुक्के की गुड़गुड़ के साथ. सजग हुए कानों को दोनों हाथों से दबाए फिर से आँखे नींद से रिश्ता जोड़ लेती थीं। आँखों और नींद का यह रिश्ता आज भी भोर की बेला में गहरा हो जाता है। इसी गहराई में डूबने आओ एक बार फिर चलें बचपन के गाँव में।
बरगद की जटाओं को पकड़े हवाओं से बातें करना. कच्चे अमरुद के लिए पक्की दोस्ती को कट्टी में बदलना. टूटी हुई चूड़ियों को सहेज कर रखना. बागों में तितलियाँ और पतंगे पकड़ना. गुड्डे-गुड़िया के ब्याह करवाना. पल में रूठ कर क्षण में मान जाना. बारिश की बूँदों को पलकों पे सजाना. पेड़ों से झाँकती धूप को हथेलियों में भरने की ख्वाहिश करना. बादल के संग उड़कर परियों के देश जाने का मन करना. तारों में बैठ कर चाँद को छूने की चाहत रखना. बचपन कल्पना के इन्हीं इंद‎्रधनुषी रंगों से सजा होता है। सारी चिंताओं और प‎्रoAों से दूर ये केवल हँसना जानता है, खिलखिलाना जानता है, अठखेलियाँ करना और झूमना जानता है। तभी तो जीवन की आपाधापी में हारा और थका मन जब-जब उदास होता है, यही कहता है- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन. बीते हुए दिन की कल्पना मात्र से ही आँखों के आगे बचपन के दृश्य सजीव होने लगते हैं। बचपन एक मीठी याद सा हमारे आसपास मंडराने लगता है। एकांत में हमारी आँखों की कोर में आँसू बनकर समा जाता है, तो कभी मुस्कान बन कर होठों पर छा जाता है। कभी ये बचपन चंचलता का लिबास पहने हमें वर्तमान में भी बालक सा चंचल बना देता है, तो कभी सागर की गहराइयों सा गंभीर ये जीवन क्षण भर के लिए इसकी एक बूँद में ही समा जाने को व्याकुल हो जाता है।
एक बार किसी विद्वान से किसी महापुरुष ने पूछा कि यदि तुम्हें ईश्वर वरदान माँगने के लिए कहे, तो तुम क्या माँगोगे? विद्वान ने तपाक से कहा- अपना बचपन। निश्चित ही ईश्वर सब-कुछ दे सकता है, लेकिन किसी का बचपन नहीं लौटा सकता। सच है, बचपन ऐसी सम्पत्ति है, जो एक बार ही मिलती है, लेकिन इंसान उसे जीवन भर खर्च करता रहता है। बड़ी से बड़ी बातें करते हुए अचानक वह अपने बचपन में लौट जाएगा और यही कहेगा कि हम बचपन में ऐसा करते थे। यहाँ हम का आशय उसके अहम् से कतई नहीं है, हम का आशय वे और उसके सारे दोस्त, जो हर कौम, हर वर्ग के थे। कोई भेदभाव नहीं था, उनके बीच। सब एक साथ एक होकर रहते और मस्ती करते। हम सभी का बचपन बिंदास होता है। बचपन की यादें इंसान का पीछा कभी नहीं छोड़ती। वह कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाए, बचपन सदैव उसके आगे-आगे चलता रहता है। बचपन की शिक्षा भी पूरे जीवन भर साथ रहती है। बचपन का प्यार हो या फिर नफरत, इंसान कभी नहीं भूलता। बचपन की गलियाँ तो उसे हमेशा याद रहती हैं, जब भी वक्त मिलता है, इंसान उन गलियों में विचरने से अपने को नहीं रोक सकता। बचपन में किसी के द्वारा किया गया अहसान एक न भूलने वाला अध्याय होता है। वक्त आने पर वह उसे चुकाने के लिए तत्पर रहता है। कई शहरों के भूगोल को अच्छी तरह से समझने वाला व्यक्ति उन शहरों में भी अपने बचपन की गलियों को अपने से अलग नहीं कर पाता।
बचपन, अमीरी और गरीबी की सीमाओं से परे मासूमियत से भरा होता है। बचपन के सुनहरे संसार में पैसों का मोल नहीं होता। रेशम का कोमल स्पर्श और टाट के पैबंद का खुरदुरापन दोनों को ही बचपन एक जैसा महसूस करता है। याद करें बचपन में कम से कम रुपयों में पिकनिक का मजा और वर्तमान में अधिक से अधिक खर्च करने के बाद भी कुछ न कर पाने का मलाल। हर किसी के बचपन में माँ, पिता, भाई, बहन, दोस्त एक खलनायक की तरह होता है, उस समय उनकी सारी हिदायतें दादागीरी की तरह लगती है। उसे अनसुना करना हम अपना कत्र्तव्य समझते। पर उम्र के साथ-साथ वे सारी हिदायतें गीता के किसी श्लोक से कम नहीं होती, जिसका पालन करना हम अपना कत्र्तव्य समझते हैं। आखिर ऐसा क्या है बचपन में, जो हमें बार-बार अपने पास बुलाता है? बचपन जीवन के वे निष्पाप क्षण होते हैं, जिसमें हमारे संस्कार पलते-बढ़ते हैं। बचपन कच्ची मिट्टी का वह पात्र होता है, जो धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण करता होता है। बचपन उस इबारत का नाम है, जो उस समय धुंधली होती है, पर समय के साथ-साथ वह स्पष्ट होती जाती है।
बचपन की यादों में, बचपन के वादों में, बचपन की लहरों में डूबना-उतराना हमारी खुशकिस्मती है। इसलिए जब भी अवसर मिले बचपन की यादों को वर्तमान की अँजुरी में भर लें और भिगो लंे अपनी पलकों को, क्योंकि ये भीगी पलकें एक मजबूत सहारा है, इस दौड़ती-भागती जिंदगी में खुद को पहचानने का. खुद से रिश्ता जोड़ने का। कभी साँझ की सुहानी बेला में एकांत के क्षणों में अपने आप से रिश्ता जोड़िए और देखिए कुछ देर बाद ही दुनियाभर की यादें हमसे मिलने आ जाएगी और हमारे आसपास यादों का मेला लग जाएगा। इन यादों में बचपन की यादों के झूले होंगे, रिमझिम फुहारों में भीगा मन होगा, कागज की नावें होंगी, तितलियाँ होंगी, माँ की लोरियाँ और पिता का दुलार होगा, मित्रों का स्नेहबंघन होगा और होगा ढेर सारा यादों की मीठी मुस्कानों का कारवाँ, जो ले चलेगा सौंधी माटी के आँचल में। तो आओ सारे रिश्तों से दूर. बचपन से रिश्ता जोड़े और चलें बचपन के एक प्यारे से गाँव में. यादों की छाँव में.।
भारती परिमल

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

इस बार मिठाई सबसे ज्यादा जेब काटेगी

डॉ. महेश परिमल
त्योहार का मौसम शुरू हो गया है। लोगों ने खरीदारी करनी शुरू कर दी है। लेकिन महंगाई का असर हर तरफ देखा जा रहा है। सरकार इस मोर्चे पर बुरी तरह से विफल हो चुकी है। वह न तो महंगाई पर अंकुश रख पाई है और न ही घोटालों पर। अब तो यह हालत है कि राबर्ट वाड्रा के मामले में कांग्रेस के सभी नेता दामाद को बचाने में लग गए। किसी ने यह मांग नहीं की कि यदि ऐसा है,तो इसकी जांच होनी चाहिए। यह मामला यदि किसी आम आदमी का होता, तो उस पर आय से अधिक सम्पत्ति रखने का मामला तो बन ही जाता। संभव है जांच के आदेश भी हो जाते। पर आम आदमी की क्या बिसात, जो इस महंगाई से बच पाए। सरकारी आंकड़ों पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। जो बाजार जाते ही नहीं, उन्हें क्या पता कि कौन सी जरुरत की चीज कितनी महंगी हो गई है। आज बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमत आसमान छू रही हैं।
दिवाली पर आपकी जेब सबसे ज्यादा मिठाई काटेगी, क्योंकि चीनी पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशती महंगी है। चीनी विRेता कंपनी एसएनबी एंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बताया कि दिल्ली में त्योहारी मांग के कारण चार-पांच दिन में ही चीनी 100 रुपए चढ़कर 3,800 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंच गई है। दिवाली तक इसमें 50 रुपए प्रति क्विंटल की तेजी और आ सकती है।
मेवे भी डॉलर की मजबूती से उछल रहे हैं।  मेवों का आयात महंगा हो रहा है। इसलिए बादाम 40 रुपए महंगा होकर 470 से 550 रुपए और काजू भी इतना ही उछलकर 560 से 800 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई 10 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंचते हुए 7.81 प्रतिशत हो गई है। इस ऊंची महंगाई दर का कारण सितम्बर माह में गेहूं, मोटा अनाज, दलहन, तिलहन, शक्कर, सब्जी और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होना बताया गया है। 24-27 सितम्बर के बीच ‘ग्लोबल रिसर्च इप्सोस’ द्वारा ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे किया गया था। उसके मुताबिक 78 प्रतिशत से अधिक लोगों ने यह माना कि इस बार त्योहारों पर बढ़ती महंगाई की वजह से वे बहुत संभलकर खर्च करेंगे। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने वर्ष 2012-13 की मैRो इकोनॉमिक एंड मानिटरी डेवलपमेंट रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अन्य विकासशील देशों की तुलना में खाद्य महंगाई दर दोगुनी है और अर्थव्यवस्था में अभी महंगाई बढ़ने की प्रवृत्ति मौजूद है।
वस्तुत: इस समय देश में महंगाई आंतरिक कारणों के साथ-साथ वैश्विक कारणों से भी प्रभावित हो रही है। दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थ के बढ़ते हुए दाम भारत में भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ा रहे हैं। दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी देश में भी खाद्य महंगाई को बढ़ाने का एक प्रमुख कारण है। अमेरिका में भयावह सूखे के कारण खाद्यान्न आयातक देशों के द्वारा अनाज की बड़े पैमाने पर अग्रिम खरीद की जा रही है। अमेरिका के 48 राज्यों के 60 प्रतिशत इलाकों में सूखा पड़ चुका है। वर्ष 1956 के बाद का यह अमेरिका का सबसे बड़ा सूखा है। चीन भी सूखे को लेकर चिंतित है क्योंकि चार वर्ष पहले उसे जिस खाद्यान्न आयात के कारण खाद्य महंगाई का सामना करना पड़ा था, उसी तरह उसे अब ज्यादा खाद्यान्न का आयात करना पड़ रहा है। रूस में भी खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति ठीक नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया और यूRेन भी कम बारिश के कारण खाद्यान्न संकट का सामना कर रहे हैं। हालांकि खाद्यान्न की बढ़ती कीमत में अमेरिका और अन्य विकसित देशों के बायो-फ्यूल का भी हाथ है। स्थिति यह है कि दुनिया में खाद्यान्न की महंगाई ठीक उसी तरह नजर आ रही है, जैसी 2008 के वैश्विक खाद्यान्न संकट के समय थी। वस्तुत: हमारे देश में पिछले दो-तीन वषरे में महंगाई धीरे-धीरे बढ़ती रही है। अब अर्थव्यवस्था की यह स्थिति है कि महंगाई दर ऊंची है, ब्याज दर भी ऊंची है; साथ ही विकास दर में भी गिरावट है। ऐसे में अब केवल आरबीआई के मौद्रिक कदमों से महंगाई का मामला सुलझने वाला नहीं है। महंगाई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चूंकि अब देश में आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर शुरू हो गया है और इसके कारण विभिन्न सब्सिडियां कम होने से लोगों को महंगाई का अहसास और अधिक होगा। ऐसे में जहां सरकार के द्वारा महंगाई नियंत्रण के सारे प्रयास जरूरी होंगे, वहीं लोगों को भी महंगाई से निबटने के लिए व्यक्तिगत प्रयास करने होंगे। हम खाद्यान्न की बढ़ती हुई महंगाई की चुनौती का मुकाबला करने के लिए दक्षिण कोरिया से सबक ले सकते हैं।  मौजूदा वर्ष में कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया भी कमोबेश महंगाई की भारत जैसी ही समस्या का सामना कर रहा था। वह बढ़ते मूल्यों के साथ ऊंची ब्याज दर और मंदी से जूझ रहा था। इस स्थिति से निपटने और महंगाई पर नियंत्रण के ठोस उपायों को बताने हेतु दक्षिण कोरिया के नॉलेज इकोनामी मंत्रालय ने एक कार्यबल गठित किया था। इस कार्यबल ने पाया कि कुछ बड़े कारोबारियों ने गैस स्टेशनों के साथ सौदे करके ईधन की खुदरा कीमतों को वास्तविक कीमत से कहीं ऊपर कर दिया था। इसी तरह कई और कारोबारियों ने जरूरत की वस्तुओं की आपूर्ति में गतिरोध डालकर उनकी कीमतें बढ़ा दी थी।
कार्यबल की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने कड़े नियमों और कठोर कार्रवाइयों से आपूर्ति क्षेत्र के गतिरोधों को तत्काल दूर कर दिया। परिणाम यह हुआ कि दक्षिण कोरिया में अब खाद्यान्न कीमतों पर नियंत्रण दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं, दक्षिण कोरिया में सितम्बर 2012 में महंगाई दर दो प्रतिशत के इर्द-गिर्द ही रही है। निश्चित रूप से इस समय भारत में खाद्यान्न के पर्याप्त उत्पादन के बाद भी महंगाई की जो स्थिति है उसके लिए काफी हद तक आपूर्ति क्षेत्र की समस्याएं जिम्मेदार हैं। खाद्यान्न की थोक व फुटकर कीमतों में अंतर पहले की तुलना में बढ़ा है, स्टॉकिस्ट व सटोरिए बाजार पर हावी हैं। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि खाद्यान्न उत्पादक और उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थ भारी मुनाफा लेते हुए मूल्य वृद्धि का कारण बने हुए हैं। सार्वजनिक वितरण पण्राली (पीडीएस) कारगर भूमिका नहीं निभा पा रही है। ऐसे में सरकार को खाद्यान्न की कीमतों को नियंत्रित करने, मध्यस्थों के मुनाफे को कम करने तथा आपूर्ति बढ़ाने के परिप्रेक्ष्य में दक्षिण कोरिया की तरह कड़े कदम उठाने चाहिए। सरकार को खुले बाजार में खाद्यान्न की सप्लाई बढ़ा देनी चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आवंटित किए जाने वाले अनाज का वितरण लाभार्थियों तक सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अब दाल, खाद्य तेल और चीनी की भंडारण सीमा तय की जानी चाहिए। चूंकि स्टॉक लिमिट का अधिकार राज्य सरकारों के पास है, इसलिए राज्यों को महंगाई थामने में केंद्र की मदद करनी चाहिए।
चूंकि कृषि जिंसों के वायदा बाजार में सटोरिए पूरी तरह सRिय हैं, इसलिए कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर प्रतिबंध जरूरी है। इस समय उड़द, अरहर व चावल के वायदा कारोबार पर प्रतिबंध है, लेकिन गेहूं, चीनी, सोया तेल, सरसों बीज, सोयाबीन आदि कृषि जिंसों का वायदा खुला हुआ है। अत: इन आवश्यक कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर रोक लगाई जानी चाहिए। कृषि जिंसों की कीमतें बढ़ने से संबंधित अधिकांश अध्ययन रिपोर्ट्स में यह निष्कर्ष उभरकर आ रहा है कि भारत में जबसे कृषि जिंसों का वायदा व्यापार शुरू किया गया है, तभी से खाद्यान्नों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
यह उल्लेखनीय है कि पेट्रोलियम पदार्थ की कीमतों से भारत ही नहीं अमेरिका व दुनिया के दूसरे विकसित देश भी प्रभावित हो रहे हैं। इन देशों के लोग पेट्रोल, डीजल व गैस की महंगाई से बचने के लिए साइकिलों का उपयोग बढ़ा रहे हैं। न्यूयॉर्क शहर में एक योजना बन रही है, जिसके तहत शहर में 15 हजार साइकिलें उपलब्ध कराई जाएंगी। जिन्हें कोई भी किराए पर लेकर इस्तेमाल कर सकेगा। यूरोप और चीन में भी पेट्रोल और डीजल की मूल्यवृद्धि से बचाव के लिए लोग खूब साइकिलिंग कर रहे हैं। हम भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों से राहत हेतु कम दूरी के लिए साइकिल के उपयोग को प्रोत्साहन दे सकते हैं। अधिक दूरी के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इससे लोगों को परिवहन संबंधी खर्च में कमी का लाभ मिल सकेगा। गौरतलब है कि दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन पण्राली से लोग बड़ी संख्या में लाभान्वित हो रहे हैं और अर्थव्यवस्था को भी लाभ हो रहा है। उदाहरण के लिए जापान की राजधानी टोकियो में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था प्रतिदिन 80 लाख लोगों को लाभान्वित करती है। इसी तरह दुनिया के कई चमकीले शहरों जैसे लंदन, सिंगापुर, सिडनी आदि में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था इतनी अच्छी हो चुकी है कि लोग कार्यालय आने-जाने में सार्वजनिक परिवहन का ही उपयोग करते हैं। हमें देश के सभी शहरों में कारगर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता है। देश में करीब पांच हजार शहरों में कारगर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था लोगों के आवागमन खर्च को कम कर सकती है। नि:संदेह ऐसे कदमों से देश में करोड़ों लोगों को मूल्यवृद्धि की पीड़ा से राहत दिलाई जा सकेगी।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

फेलिक्‍स के पराक्रम की प्रासंगिकता




हरिभूमि के संपादकीय पेज पर  प्रक‍ाशित मेरा आलेख 
http://epaper.haribhoomi.com/epapermain.aspx

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

हमें हमारी रातें वापस कर दो, हम जीना चाहते हैं

डॉ. महेश परिमल
प्रकाश प्रदूषण, भला यह भी कोई बात हुई। अब तक तो हमने ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि सुना था, अब यह प्रकाश प्रदूषण क्या बला है? आज जिस तेजी से हमारे बीच प्रकाश प्रदूषण फैल रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। पर हमारा ध्यान इस दिशा में कभी गया ही नहीं। जिस तरह से पृथ्वी पर जीवसृष्टि और वनस्पति के लिए प्रकाश का महत्व है, उतना ही महत्व अंधेरे का है। पर अंधेरा है कहाँ? सोडियम, मर्करी आदि जैसी तेज लाइटों के कारण आज वन्य जीवों का जीना दूभर हो गया है। जहाँ जाओ, वहाँ तेज रोशनी का उजाला, आखिर कई काम ऐसे होते हैं, जिसे अंधेरे में ही होने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। इस प्रकाश प्रदूषण से आज पक्षी जगत, पशु जगत बुरी तरह से हलाकान है। वे सब चीख-चीखकर कह रहे हैं हमें हमारे अंधेर वापस दिला दो, हम जीना चाहते हैं। हमें हमारी रातें वापव कर दो, नहीं चाहिए हमें ये आँखें चौंधियाने वाली रोशनी। हम अंधेरे में ही भले।  
        पिछले साल जुलाई में कनाडा के एडमोंटन में सोसायटी फॉर कंजर्वेशन बायोलॉजी की एक बैठक प्रकाश प्रदूषण को लेकर हुई। इस बैठक में कई देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। सभी ने एक राय से यह कहा कि अब समय आ गया है कि वन्यजीवों को उनकी रातें वापस की जाए। आजकल हो यह रहा है कि अमावस्या की काली रातें भी अब प्रकाशमय होने लगी हैं। शहरों, राजमार्गो, पर्यटन स्थलों, चौराहे आदि अब जगमगाने लगे हैं। जंगलों से होकर गुजरने वाली सड़कें भी भले सुनसान रहे, पर रोशनी से जगमगाती अवश्य हैं। इस दौरान इस हिस्सों में रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति आदि का जीवनचक्र प्रभावित होने लगा है। अब तो शहरों में भी तारों भरी अंधेरी रात दिखने को नहीं मिलती। हम तेज रोशनी के इतने अधिक आदी हो चुके हैं कि अंधेरी रातें हमें काट खाने को दौड़ती हैं। ऐसे में अमेरिका के उटार के ‘ओवाकोमब्रीज’को ‘डार्कस्काय पार्क’ नाम दिया गया है। यह नाम इंटरनेशनल डार्कस्काय ऐसोसिएशन ने दिया है। डार्कस्काय पार्क यानी अंधेरे आकाश का बगीचा। वहाँ अभी भी तारों भरी अंधेरी रात देखने को मिलती है। निशाचर प्राणियों के लिए यह एक वरदान है कि उनके हिस्से अंधेरी रातें हैं। इंसान अपना अधिकांश काम दिन में करता है, इसलिए उसे रोशनी पंसद है। पर वनस्पतियों और निशाचरों के लिए अंधेरे का काफी महत्व है। रात में उजाला होने से कई लाभ हो सकते हैं, पर हानियाँ भी कई हैं। इसे ही कहते हैं प्रकाश प्रदूषण। इससे इंसान तो ठीक, पर निशाचर अपनी कई क्रियाएँ जैसे प्रजनन, स्थानांतरण, बच्चों को खिलाना जैसे काम नहीं कर पा रहे हैं। तेज रोशनी हमारे भीतर इस तरह से बस गई है कि ये रोशनी दूसरे अन्य प्राणियों के लिए कितना विध्वंसक असर कर रही है, इसका अंदाजा शायद हमें नहीं है। संसार में कई जीव ऐसे हैं, जो अपने कई काम अंधेरे में ही करते हैं। आपको मालूम है कछुए की तरह चलने वाला एक दरियाई प्राणी है। उसके अंडों से निकलने वाले ताजा बच्चे चाँदनी में समुद्र तट पर जाने के बजाए तेज रोशनी वाले रिसोर्ट की तरफ आकर्षित होने लगे हैं। यही हाल पक्षियों का है, वे भी इस रोशनी से आकर्षित होते हैं, लेकिन बिजली के तारों में उलझकर अपने प्राण गँवाते हैं।
जंगलों का लगातार होता नाश, बढ़ता शहरीकरण, दूर-दूर आबादी ही आबादी, ऐसे में निशाचर प्राणियों की वंशवृद्धि, व्यवहार कैसे संयमित हो पाएगा? प्रकाश प्रदूषण ने उनके जीवन मंे खलल पैदा कर दिया है। कनाडा में हुई उक्त बैठक में यह तय किया गया कि अब जब भी रोशनी स्थापित करने की बात हो, तो वन्य जीवों की तरफ भी ध्यान दिया जाए, ताकि उनका जीवन सुचारू रूप से चलता रहे। इस बैठक की अध्यक्षता करने वाले ट्रेविस बोंगकोर ने आवेशपूर्ण शब्दों में कहा कि तेज रोशनी के कारण कई पक्षी अपना रास्ता बदलने लगे हैं। सोडियम लैप की पीली रोशनी में कई चमगादड़ अपना रास्ता भटक गए, बाद में पता चला कि इसमें से अधिकांश गर्भवती थीं। बोंगकोर इंग्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ केलिफोर्निया में प्रोफेसर हैं। कई प्रजाति के पक्षी रात में भी प्रवास करते हैं, जगमगाते टॉवरों, इमारतों के कारण वे भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें भ्रांति हो जाती है, वे उस जगमगाते टॉवरों, इमारतों के चारों ओर चक्कर लगाने लगते हैं। कई बार इससे टकराकर अपने प्राण गवाँ देते हैं। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अमेरिका के लोरिडा स्थित एक टीवी टॉवर के पिछले 25 वर्षो के सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि 189 जाति के 42 हजार से अधिक पक्षी मौत के घाट उतर गए।
अमेरिका के न्यूयार्कसिटी की फ्रोर्धान यूनिवर्सिटी की सूचना के अनुसार अब शहरी पर्यावरण पक्षियों के रास्तों की जानकारी लेने के लिए माइक्रोफोन और राडार का उपयोग किया जाता है। शोध से यह बात सामने आई कि अधिकांश पक्षी अपना रास्ता अधिक शांत और गहरी काली रात में ही तय करते हैं। लेकिन जगमगाती रोशनी के कारण ये भटकने लगे हैं, इन्हें दिशा ज्ञान नहीं रहता, तब ये विचित्र आवाजें करने लगते हैं, जिसका आशय यही होता है कि ये तेज रोशनी के कारण ये भटक गए हैं। शोध में यह बात भी सामने आई है कि एलआईडी लाइट को छोड़कर शेष सभी लाइटें वन्य प्राणियों के लिए हानिकारक होती हैं। हमने भी देखा होगा कि ऊँची-ऊँची इमारतों के आसपास पक्षियों के शव बिखरे पड़े होते हैं। जहाँ भी तेज लाइटें होती है, ऐसे स्थानों पर इस तरह के हादसे आम हैं। समुद्र किनारे आने वाले पक्षियों की स्थिति पर अध्ययन होने लगा है। कई रोशनी कुछ प्राणियों के लिए लाभदायक होती हैं, तो कुछ के लिए हानिकारक। इसलिए यदि रात की रोशनी को कुछ हल्का कर दिया जाए, तो निशाचरों के लिए आसानी होगी।
यह तो तय है कि तेज रोशनी इंसानों को भी विचलित कर देती है। फिर पशु-पक्षियों की क्या बिसात? लेकिन इसके बिना आज मानव जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इंसानों के लिए आजकल रात-दिन समान होने लगे हैं। कई लोग रात ड्यूटी ही पसंद करते हैं। बरसों से उन्हें दिन ड़्यूटी मिली ही नहीं, ऐसे मंे उनका जीवन चक्र गड़बड़ा जाता है। यही हाल पशु-पक्षियों का है, वन्य प्राणियों की हालत तो और भी खराब है। वन रहे नहीं, आबादी का दबाव चारों ओर से बढ़ रहा है। ऐसे में कहाँ जाएँ? अभयारण्यों में वह माहौल नहीं मिल पाता, वहाँ भी रोशनी का साम्राज्य है। इसलिए अब चारों तरफ से यही आवाजें आने लगीं हैं कि हमें हमारी रातें वापस कर दो, हमें अंधेरा चाहिए, हम जीना चाहते हैं, हमें इस तेज रोशनी से मुक्ति दो!
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

क्या हरियाणा रेप हब बनने जा रहा है?

डॉ. महेश परिमल
अब तक लोग पुणे को एजुकेशनल हब, बेंगलुरु को आई टी हब कहते नहीं अघाते थे, लेकिन अब हरियाणा को रेप हब कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बलात्कार का मनोविज्ञान कहता है कि युवतियाँ जींस और टी शर्ट पहनतीं हैं, इसलिए बलात्कार की घटनाएं बढ़ रहीं हैं। यह दलील नारीवादियों को अस्वीकार्य है। सवाल यह उठता है कि देश में अगर ओम प्रकाश चौटाला जैसे नेता हों, जो यह कहते हों कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष से पहले कर दी जानी चाहिए। तो ऐसे बयान देने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं होते। क्या भूतपूर्व मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि इस देश में बाल विवाह पर प्रतिबंध है। भड़काऊ बयान देने वालों पर सख्ती न होने के कारण ही इस तरह के बयान बार-बार सामने आ रहे हैं। फिर हरियाणा में दलित युवतियों के साथ ही अनाचार हो रहे हैं, तो फिर क्या वे इतनी सक्षम हैं कि जींस-टी शर्ट पहनें? एक ही महीने में 15 से अधिक अनाचार की खबरों से हरियाणा की कांग्रेस सरकार हड़बड़ा गई है। इसी सरकार को बचाने के लिए ही कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनाचार का भोग बनी दलित महिलाओं से भेंट की। वहां जाकर उन्होंने यही बयान दिया कि अनाचार केवल हरियाणा में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में हो रहे हैं।
इस गंभीर मामले पर केवल बयानबाजी ही हो रही है। समस्या की गहराई में जाने की फुरसत किसी के पास नहीं है। कोई इसे राजनीति का रंग दे रहा है, तो कोई इसे मानवीय समस्या बता रहा है। वास्तव में यह समस्या असमान आर्थिक विकास के कारण सामने आई है। दिल्ली से लगे हरियाणा सरकार एक तरफ तो उद्योगपतियों और बिल्डरों को तमाम सुविधाएं दे रही है। इसलिए समाज में धनाढ्य वर्ग उभरकर सामने आ रहा है। इसके अलावा कई किसानों ने अपनी जमीन उद्योगपतियों को बेचकर काफी सम्पत्ति अर्जित की है। इस वर्ग के युवाओं में निरंकुशता देखी जा रही है। यह वर्ग अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल कर अपराधों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर भी हैं, जो इस समय पूरी तरह से कंगाल हो गए हैं। इन्हीं दलितों और गरीबों की कन्याओं और महिलाओं को उच्च वर्ग के युवाओं द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। इनके पास धन-सम्पत्ति क अलावा ऊंची राजनीतिक पहुंच होने के कारण दलितों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बारे में कहा जाता है कि वे दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगाने की दिशा में गंभीर नहीं हैं। उनके साथियों को भी यही लग रहा है कि वे कानून अपने हाथ में लेने वाली खाप पंचायतों को लेकर एक अलग ही विचार रखते हैं। इसलिए सोनिया गांधी ने अपने भाषण में खाप पंचायतों को जमकर लताड़ा था। हरियाणा में स्थिति यह है कि खाप पंचायतों के सहयोग के बिना कोई भी दल सत्ता में नहीं आ सकता। इसे शायद कांग्रेसाध्यक्ष नहीं समझ पा रही हैं।
हमारे देश में खाप पंचायतों की स्थापना का इतिहास काफी पुराना है। ये ग्राम पंचायतें अपने आप में एक स्वतंत्र सत्ता थी। आजादी के बाद जब गांधीजी ने ग्राम सुराज की कल्पना की, तो उसके केंद्र में यही ग्राम पंचायतें ही थीं। पंचायती पद्धति के इस स्वराज्य के बदले में हमारे यहां अंग्रेज पद्धति का संसदीय शासन आया। इस प्रणाली में सत्ता के सारे अधिकार केंद्र और राज्य में होती है। हरियाणा की खाप पंचायतें उसी प्राचीन परंपरा की निशानी हैं। पर आधुनिक काल में ये पहले से अधिक निरंकुश हो गई हैं। इनके फैसले आजकल विवादास्पद होने लगे हैं। इस समय हरियाणा में जिस तरह से अनाचार के मामलों में वृद्धि हो रही है, उस पर खाप पंचायतों के अपने विचार हैं। वे इस पर अंकुश लगाने के लिए सुझाव देती हैं। उनका कहना है कि आजकल युवतियां जींस-टी शर्ट जैसे कामोत्तेजक कपड़े पहनती हैं, इसलिए पुरुषों का ध्यान उन पर जाता है। उनके अनुसार युवतियों के हाथ में मोबाइल आने से प्रेम प्रकरणों में भी काफी वृद्धि हुई है। इसके अलावा फिल्में एवं धारावाहिकों में जिस तरह से खुले सेक्स की बात की जाती है, उसके कारण भी अनाचार की घटनाएं हो रही हैं। अनाचार पर अंकुश लगाना है, तो बेटियों की शादी 15 साल की उम्र में ही कर दी जाए। खाप पंचायतें सरकार से मांग कर रही हैं कि लड़कियों की शादी की उम्र 18 से कम कर 15 कर दी जाए। खाप पंचायतों की इस मांग को मानने में सरकार किसी भी तरह से तैयार नहीं है। लेकिन अब सरकार के इस दिशा में गंभीरता से सोचना ही होगा। समाजशास्त्री ही नहीं, अब चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आज की कन्याएँ समय से पहले ही परिपक्व होने लगी है। एक तो फास्ट फूड दूसरे आकाशीय माध्यम से होने वाली ज्ञान वर्षा यानी टीवी और कंप्यूटर से लोगों के ज्ञान में तेजी से वृद्धि हो रही है। लड़कियां छोटी उम्र में ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। इसके अलावा विजातीय आकर्षक भी उनमें समय से पहले आ रहा है। टीवी-कंप्यूटर के माध्यम से वे अपने शरीर के अवयवों के बारे में अच्छी तरह से समझने लगी हैं। इसके अलावा हम उम्र से बातचीत में भी वे काफी कुछ समझने लगी हैं। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि लड़की की उम्र कम है, इसलिए वह परिपक्व नहीं हुई है। छोटी उम्र में ही मासिक स्राव ही इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब सरकार ही 16 वर्ष की कन्या से यौन संबंध बनाने के लिए हां कहती है, तो फिर उस उम्र में शादी के लिए इंकार क्यों कर रही है?
हाल ही में हरियाणा में 100 शक्तिशाली खाप पंचायतों की महापरिषद का आयोजन हुआ था। इसमें स्त्री भ्रूण हत्या के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था। अब तक खाप पंचायतों की बुराई करने वाला मीडिया इस खबर से अनजान रहा। यदि जानकारी होगी भी तो इसे अधिक प्रचारित नहीं किया गया। सरकार पहले खाप पंचायतों की ताकत को समझे, उसकी बुराई करना छोड़ दे। उसकी ताकत का इस्तेमाल यदि सकारात्मक रूप से लिया जाए, तो संभव है हम सब इस खाप पंचायत को सम्मान की दृष्टि से देखें। खाप पंचायत द्वारा जो प्रस्ताव पारित किया गया है, उसका असर बहुत ही जल्द दिखाई भी देगा।
खाप पंचायतों का गलत स्वरूप ही समाज के सामने लाया गया है। हमें इसके फैसले पर गौर करना होगा। इसमें बुजुर्ग लोग ही मुखिया होते हैं। वे अपने अनुभव के आधार पर निर्णय लेते हैं। उनके नकारात्मक निर्णय तुरंत ही मीडिया में छा जाते हैं, लेकिन समाज को बदलने वाले, मान्यताओं को झुठलाने वाले, परंपरा से हटकर लिए गए फैसले मीडिया में नहीं आते। इसलिए अब समय है कि पहले हरियाणा को समझा जाए, उसकी बदलती तासीर को समझा जाए, फिर खाप पंचायतों को समझने की कोशिश की जाए। अनाचार से बड़ा अपराध है, अनाचार के लिए माहौल बनाना। ये माहौल इस समय हरियाणा में बन रहा है। अब सभी जगह बनेगा या बन रहा है। सरकार यह कोशिश करे कि ऐसा माहौल ही न बन पाए। नारी की अस्मिता को समझने की कोशिश की जाए। नारी विहीन समाज की कल्पना करके बताया जाए कि बिना नारी के समाज कैसा कुरूप होगा। इसके बाद कानून को खिलौना न बनने दिया जाए। आज रसूखदारों के लिए कानून खरीदना आम बात हो गई है। अनाचारियों को जो सजा होती है, उसे खूब प्रचारित किया जाए, तो लोगों में कानून का खौप हो। जब तक लोग कानून से डरना नहीं सीखेंगे, तब तक अनाचार ही क्यों अन्य बड़े अपराध भी होते ही रहेंगे।
   डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा.

डॉ. महेश परिमल
जिस तरह से घर में मंदिर आवश्यक है, ठीक उसी तरह से घर में शौचालय का होना भी अतिआवश्यक है। हम अपनी तमाम उपलब्धियों पर भले ही गर्व कर लें, सीना ठोंक लें, पर जब तक देश की आधी आबादी मुक्ताकाशी शौच के लिए विवश है, तब तक हमारी सारी उपलब्धियाँ किसी काम की नहीं। घर की महिलाएं शौच के लिए बाहर जाएं, इससे बड़ा कलंक तो हो ही नहीं सकता? जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा। शौचालय में हमारे ही शरीर की गंदगी जाती है, इसलिए वह किसी मंदिर से कम नहीं। आखिर मंदिर में भी हम अपनी बुराई दूर करने की कामना ही तो करते हैं। शौचालय तो हमारे शरीर की गंदगी ग्रहण करता है। फिर भला वह कैसे अपवित्र हुआ? हमारे देश की आबादी अभी 121 करोड़ है। इस आंकड़े के अनुसार देश की 49.8 प्रतिशत लोगों के पास शौचालय नहीं है। यानी कि 60 करोड़ से अधिक लोग आज भी मुक्ताकाशी शौच करते हैं। इसमें महिलाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा बीमार पड़े बुजुर्ग भी इसी हालत में हैं। जनगणना रजिस्ट्रार जनरल सी. चंद्रमौली कहत हैं कि यह एक अनोखा विरोधाभास है कि हमारे देश में 63.2 प्रतिशत लोगों के पास टेलीफोन कनेक्शन हैं, इसमें 53 प्रतिशत के पास मोबाइल कनेक्शन हैं। आंकड़े के अनुसार झारखंड में सबसे अधिक 77 प्रतिशत लोगों को शौचालय नसीब नहीं है।
इसे देश की विडम्बना ही कहा जाए कि जब हम चीन के साथ अपनी हार की पचासवीं बर्षगांठ (5 अक्टूबर 1962) मना रहे हैं, तब भी हमारे देश की महिलाएं खुले में शौच के लिए विवश हैं। हम देश में बढ़ रही मोबाइल फोन की संख्या को गर्व से गले पर लटका देश के विकास की बात कर रहे हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कतई गलत नहीं हैं। उन्होंने ऐसा क्या गलत कह दिया कि लोगों की धार्मिक भावनाएं बलवती हो उठीं? उनके बयान से मंदिरों का अपमान नहीं हुआ, बल्कि उनका हुआ है, जो इसी ताक पर बैठे रहते हैं कि किस तरह से लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करें। यदि किसी की जरा सी बात पर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो फिर निश्चित रूप से वह धर्म कच्च है। हिंदू धर्म के बारे में तो ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह धर्म तो सदियों से चला आ रहा है। क्या आज वह इतना कमजारे हो गया है कि छोटी सी बात पर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने लगी हैं। इसका मतलब साफ है कि धर्म कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि लोग कमजोर हो गए हैं। हमारे ही घर के आसपास देखते ही देखते एक बड़ा मंदिर बन जाता है, पर किसी झुग्गबी बस्ती में एक शोचालय नहीं बन पाता। इसे क्या कहें कि मंदिर बनने से धर्म मजबूत बन गया। महिलाएं खुले में शौच कर रही हैं, तो कहां चला जाता है धर्म? क्यों मांगें जयराम रामेश लोगों से माफी? मोबाइल और मंदिर से आवश्यक है शौचालय, इसे समझने में और कितने साल लगेंगे हमको? यदि कहीं शौचालय मिल भी जाए, तो उसकी हालत देखी है आपने? लोग शौच करना भूल जाते हैं, वहाँ जाकर। मंदिर की सफाई का ध्यान है, पर शौचालय की सफाई की ओर किसी का ध्यान नही है। देश में मंदिरों की कमी नहीं है, पर शौचालयों की अवश्य कमी है। भारतवासी के लिए स समय गर्व का क्षण होगा, जब देश की हर महिला को शौचालय नसीब होगा।
जयराम रमेश ने कुछ भी गलत नहीं कहा। अब वे कुछ करने की सोच रहे हैं। उन्होंने संकलप लिया है कि आगामी दस वर्षो में हमारे देश में सभी के पास शौचालय उपलब्ध होगा। इस दिशा में अभी तक सरकार के 45 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। आगामी पाँच वर्षो में एक लाख करोड़ खर्च करने की योजना है। माइक्रोसाफ्ट कंपनी के संस्थापक बिल गेट्स अरबों रुपए सामाजिक कार्यो के लिए दान में देते हैं। उनका एक मिशन भारत में शौचालयों की व्यवस्था करना भी है। वे कहते हैं कि मेरा सपना ऐसे शौचालय बनाने का है, जिसमें पानी कम लगे और गंदगी भी न हो। दरुगध कम हो और सस्ता भी पड़े। सेंटर फॉर सिविल लिबर्टी का 2009 का सर्वे कहता है कि दिल्ली में पुरुषों के 1534 शौचालयों की तुलना में महिलाओं के लिए मात्र 132 शौचालय ही है। मुंबई में लघुशंका के लिए धनराशि देनी पड़ती है।
यह सच है कि शौचालयों का निर्माण कराना सरकार का काम है। पर क्या सब कुछ सरकार पर ही छोड़ दिया जाए? हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है? आखिर हम भी तो एक सामाजिक प्राणी हैं। इस नाते हमें क्या करना है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए। मंदिर बनाने के लिए हमारी जेब से धनराशि कितनी आसानी से निकल जाती है, तो क्या शोचालय के लिए नहीं निकलनी चाहिए। इसके पीछे शायद यही सोच है कि मंदिरों के लिए दिया गया दान वापस पुण्य के रूप में आएगा। हमें स्वर्ग मिलेगा। हमारा भविष्य सुधरेगा। महिलाओं को खुले में शौच करता देखकर क्या वास्तव में आपका और हमारा भविष्य सुधरेगा? हमें तो शर्म से मर जाना चाहिए।  क्योंकि बिखरी हुई गंदगी से होकर गुजरना किसी नर्क यात्रा से कम नहीं है। दान देकर हमें भले ही स्वर्ग की प्राप्ति होती हो, पर जीते जी यह नर्क यात्रा भी हमें ही झेलनी है। कितनी धार्मिक संस्थाएं ऐसी हैं, जो मंदिर तो नहीं, पर पेशाब घर और शौचालय बनाती हैं। हर वर्ष गणोश जी, दुर्गाजी आदि के लिए हमारे पास लोग चंदा लेने के लिए आते हैं, कभी कोई व्यक्ति ऐसा भी आया, जिसने मोहल्ले में शौचालय के लिए चंदे की मांग की हो? नहीं, संभव ही नहीं है। जब तक हम शौचालय को गंदगी मानते रहेंगे, हमारी मानसिकता बदलने वाली नहीं है। शौचालय की सफाई उतनी ही आवश्यक है, जितनी शरीर की। आखिर शरीर भी एक मंदिर ही है। कहा जाता है कि जिन घर का शौचायल साफ होगा, वह घर संस्कारवान होगा। गंदे शौचालय हमारी गंदी सोच का ही परिणाम हैं। जो हमारी बुराई को ग्रहण कर ले, वह हमारी दृष्टि में महान हो सकता है, पर जो हमारी गंदगी को स्वीकार कर ले, वह महान क्यों नहीं हो सकता?
शौचालय पर हमारी सोच को बदलना होगा। शौचालय के बिना जीवन संभव ही नहीं है। यदि हम ऐसा मानते हैं, तो हमें यह भी मानना होगा कि शौचालय जीवन के लिए अतिआवश्यक है। मंदिर की तरह। मंदिर में पूजा के लिए जाने के पहले स्वयं को शौचालय जाकर स्वच्छ करने का काम आप ही करते हैं। कोई भी शुभ कार्य आप स्नान से पहले नहीं करते, स्नान से पहले शौचालय जाकर स्वयं को स्वच्छ करते ही हैं। सोचो कितना महत्वपूर्ण है, शौचालय हमारे जीवन के लिए। बस हमें यही करना है कि यदि देश का एक आदमी या महिला मुक्ताकाशी शौच के लिए विवश है, तो हमें किसी बात पर गर्व नहीं करना चाहिए।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

अमिताभ बच्चन के जीवन के सत्तर यादगार लम्हे

1- जन्म पर पिता हरिवंश राय बच्चन की लिखी कविता

फुल्ल कमल,

गोद नवल,

मोद नवल,

गेहूं में विनोद नवल।

बाल नवल,

लाल नवल,

दीपक में ज्वाल नवल।

दूध नवल,

पूत नवल,

वंश में विभूति नवल।

नवल दृश्य,

नवल दृष्टि,

जीवन का नव भविष्य,

जीवन की नवल सृष्टि

2- ब्रीचकैंडी अस्पताल में अमिताभ बच्चन द्वारा लिखी अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद-

(अनुवाद उनके पिता द्वारा किया गया था)

बाहर-ऊपर, मंडराते डरपाते।

अंधियाला छाते-से बादल।

नीचे, काली, कठोर, भद्दी चट्टानों पर

उच्छल, मटमैली जलधि-तरंगो का क्रीड़ा।

भीतर- सब उज्‍जवल, शुद्ध साफ

चादर सफेद, कोमल तकिये,

धीमे-धीमे स्वर से सिंचित

ममतामय सारी देख-रेख

औ मेरी एकाकी पीड़ा।

3- अमिताभ से पहले उनका नाम इंकलाब राय पडने वाला था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अमरनाथ झा का दिया यह नाम उनके पिता को बहुत पसंद भी था, लेकिन सुमित्रानंदन पंत के दिए नाम अमिताभ का असर लोगों पर अधिक हुआ और उनका नाम अमिताभ बच्चन पड़ गया।

4- अभिनेता बनने से पहले वह इंजीनियर बनना चाहते थे। यहा तक कि उन्होंने इंडियन एयरफोर्स च्वाइन करने की तैयारी भी कर ली थी।

5- बिग बी दोनों हाथों से लिख सकते हैं। वह विज्ञान के साथ ही कई भाषाओं के जानकार भी हैं।

6- उन्होंने अपनी पहली नौकरी शॉ एंड वॉलेस कंपनी के साथ शुरू की थी। उन्होंने एक शिपिंग कंपनी के साथ ब्रोकर के तौर पर भी काम किया था।

7- उनकी पहली तनख्वाह 500 रुपए थी। टैक्स कटने के बाद उनके हाथ में 480 रुपए आए थे।

8- आनंद फिल्म की भूमिका के बाद उन्होंने दस फ्लॉप फिल्में दी। इस दो साल के असफल कॅरियर के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जंजीर से सफलता का सोलो स्वाद चखा।

9- पहली बार अमिताभ और जया भादुड़ी एफटीआईआई पुणे मे मिले थे, उसके बाद हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी के सेट पर मिले।

10- गुड्डी के लिए मेल एक्टर का किरदार अमिताभ को ही ऑफर हुआ था, लेकिन वह किन्हीं वजहों से कर नहीं सके।

11- करीबियों की मानें तो अमिताभ और जया ने कभी भी डेटिंग नहीं की। वे जब भी मिले दोस्तों के समूह में मिले।

12- कुली की शूटिंग के दौरान जब वह ब्रीचकैंडी अस्पताल में भर्ती थे, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी उन्हें देखने अस्पताल आई थीं। मुंबई पुलिस की आधा संख्या बल ब्रीचकैंडी के आसपास उस दिन तैनात किया गया था।

13- बीमारी के दौरान जया बच्चन ब्रीचकैंडी अस्पताल से सिद्धिविनायक मंदिर तक रोजाना पैदल जाया करती थीं। यह दूरी छह किमी की थी।

14- मुकद्दर का सिकंदर की शूटिंग के एक सीन में विनोद खन्ना के साथ स्टंट में अमिताभ ने उनके चेहरे पर काच फोड़ दिया था। जिसकी वजह से उनके चेहरे पर टाके लगे थे।

15- अमिताभ शाकाहारी हैं। उन्हें आलू-पूड़ी, पकौड़ा, ढोकला और पराठा बेहद पसंद है।

16- अमिताभ के हिसाब से वहीदा रहमान फिल्म इंडस्ट्री की सबसे खूबसूरत महिला हैं।

17- राजेश खन्ना के साथ की गई दोनों फिल्में नमक हराम और आनंद में उनके अभिनय के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

18- मुकुल आनंद की फिल्म खुदा गवाह की शूटिंग के दौरान तत्कालीन अफगानी राष्ट्रपति नजीबुल्लाह ने अमिताभ की सुरक्षा में मुल्क की आधे सुरक्षा तंत्र को तैनात कर दिया था। खुदा गवाह अफगानिस्तान में चलने वाली सबसे हिट फिल्म है।

19- हृषिकेश मुखर्जी की सुपर हिट फिल्म चुपके-चुपके के लिए अमिताभ सेकेंड लीड की पहली च्वाइस नहीं थे।

20- मिठाई में उन्हें गुलाब जामुन बहुत पसंद है।

21- सुपरस्टार की हैसियत पाने के बाद हृषिकेश मुखर्जी उन्हें महाराज कहकर बुलाते थे।

22- फिल्म शोले में जय का किरदार पहले शत्रुघ्न सिन्हा को ऑफर किया गया था।

23- व्यस्त शूटिंग के बाद भी वह एक वक्त का खाना घर में ही खाना पसंद करते हैं।

24- ईश्वर में आस्था रखने वाले अमिताभ श्रीमद्भागवत गीता का पाठ नियमित रूप से करते हैं।

25- उनके पास घडिय़ों और चश्मों का विश्व प्रसिद्ध ब्राड कलेक्शन है।

26- उनके लुक को सबसे ज्यादा तारीफ या आलोचना उनके दोनों बच्चों से मिलती हैं। बिग बी की मानें तो वह कई बार अपने कपड़ों का चयन अभिषेक या श्वेता के हिसाब से करते हैं।

27- 17 फिल्मों में उनका नाम विजय और 9 फिल्मों में अमित है।

28- मेहुल कुमार की कोहराम और अनिल शर्मा की अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों में उन्होंने सरदार की भूमिकाएं निभाई हैं।

29- निर्देशक एस. रामानाथन की फिल्म महान में उन्होंने तिहरी भूिमका अदा की है।

30- निर्देशक आर. बाल्की की फिल्म पा में उन्होंने अपने रियल लाइफ बेटे अभिषेक बच्चन के बेटे का किरदार निभाया है।

31- उन्होंने अपने कॅरियर की पहली भूमिका ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिंदुस्तानी में निभाई थी, लेकिन उनके काम को सुनील दत्त प्रोडक्शन की रेशमा और शेरा में नोटिस किया गया।

32- उनके भाई अजिताभ बच्चन उनके सबसे अच्छे दोस्त हैं।

33- मा तेजी बच्चन हमेशा उन्हें मुन्ना कहकर ही पुकारती थीं। उन्होंने कभी भी अमिताभ नाम से उन्हें नहीं पुकारा।

34- दिलीप कुमार, मोतीलाल और बलराज साहनी उनके आदर्श अभिनेता हैं।

35- बिग बी अपनी शार्प मेमोरी के लिए जाने जाते हैं। वह अपने करीबियों के जन्मदिन तक याद रखते हैं।

36- शोले की शूटिंग के दौरान ही उन्हें पता चला है कि वह अपने पहले बच्चे के पिता बन चुके हैं।

37- प्रोफेशनल सिंगर न होने के बावजूद उन्होंने अपनी कई फिल्मों में गाने गाए हैं, जिसमें से मेरे अंगने में', रंग बरसे' और होली खेले रघुबीरा' मशहूर हैं।

38- अस्सी के दशक के मध्य में अमिताभ बच्चन को आधार बनाकर एक सुपर हीरो कॉमिक बुक लिखी गई थी, जिसका आइडिया उनकी फिल्म तूफान से लिया गया था।

39- फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेताओं की लेट-लतीफी के इतर अमिताभ हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं। आज भी वह किसी इवेंट में देर से नहीं पहुंचते हैं।

40- एक बार तो उन्होंने जुहू, नरीमन प्वाइंट और हीरानंदानी तीनों ही जगहों पर कुछ ही घटे के अंदर तीन इवेंट अटेंड किए थे और किसी भी जगह पर एक मिनट भी देर से नहीं पहुंचे थे।

41- प्रकाश मेहरा की जंजीर अमिताभ से पहले राज कुमार, धमर्ेंद्र और देव आनंद को ऑफर हुई थी, लेकिन गेंद आखिरकार अमिताभ बच्चन के पाले में गई और यहीं से उनके कॅरियर ने टर्न ले लिया।

42- 1996 में उनकी कंपनी एबीसीएल ने मिस व‌र्ल्ड प्रतियोगिता का आयोजन भारत में करवाया। आयोजन सफल रहा, लेकिन महिला संगठनों ने संस्कृति को आधार बनाकर उनकी आलोचना भी की।

43- एक बीबीसी ऑनलाइन सर्वे में उन्हें स्टार ऑफ द मिलेनियम का दर्जा दिया गया था। इस सर्वे में उन्होंने चार्ली चैप्लीन, मर्लिन ब्राडो और लॉरेंस ओलिवर की लोकप्रियता को भी धता बता दिया था।

44- हू वाट्स टू बी मिलेनियर के भारतीय संस्करण कौन बनेगा करोड़पति से न सिर्फ उनकी वापसी हुई, बल्कि टीवी की दुनिया में वे एक बेहतरीन एंकर के तौर पर भी उभर कर सामने आए।

45- 1984 में उन्होंने तत्कालीन दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को हराकर राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। चार साल बाद ही उन्होंने उठापटक के बाद राजनीति से सन्यास ले लिया।

46- वह बीबीसी के चर्चित कार्यक्रम वैगन शो में भाग लेने वाले एक मात्र एशियाई हैं।

47- बहुचर्चित और प्रयोगधर्मी फिल्म अक्स के बनने से पहले ही वह अपनी म्यूजिक कंपनी बिग बी म्यूजिक के बैनर तले अपना पहला म्यूजिक अलबम ऐबी बेबी लेकर आए थे, जिसका एक वीडियो इर-बीर-फत्ते' काफी चर्चित हुआ।

48- राकेश मेहरा की पहली फिल्म अक्स में उन्होंने सह-अभिनेता मनोज बाजपेयी के साथ 58 की उम्र में 30 फीट ऊंचाई से कूदते हुए एक स्टंट सीन दिया था।

49- बिग बी ने किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है, जहा इनके हॉस्टल का रूम नंबर 65 था।

50- लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में अमिताभ बच्चन की एक मोम की मूर्ति रखी है।

51- अपने थिएटर के दिनों के दोस्त अर्जुन संजनानी की फिल्म अग्नि वर्षा में अपना पहला पौराणिक किरदार इंद्र के रूप में निभाया था।

52- सफल कॅरियर और एंग्री यंगमैन की भूमिका निभाने के दौरान उन्होंने किसी भी उत्पाद का विज्ञापन करने से मना कर दिया था, लेकिन कॅरियर के दूसरे अवतार में वे ढेर सारे उत्पादों के विज्ञापन कर रहे हैं।

53- कुछ समय पहले फ्रेंच परफ्यूम कंपनी लोमानी ने उनके नाम का ही एक विशेष परफ्यूम लॉन्च किया था, जिसे बाजार में हाथों-हाथ लिया गया।

54- उनके जन्मदिन की 60वीं वर्षगाठ पर पत्नी जया ने उन्हें 400 पेज की कॉफी टेबल बुक भेंट की थी, जिसमें अभिषेक और श्वेता ने भी उनके बारे में कुछ चैप्टर लिखे थे।

55- पाइरेसी का पुरजोर विरोध करने वालों में बिग बी का नाम अग्रिम कतार में आता है। राजनीति के जमाने में ही इस सिलसिले में वे तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से मिले थे।

56- राजीव गाधी और अमिताभ की पहली मुलाकात इलाहाबाद के एडेल्फी होम कम हॉस्टल में हुई थी। अमिताभ उस समय चार साल के थे और राजीव गाधी दो साल के।

57- अमिताभ की प्रारंभिक शिक्षा को लेकर मा तेजी बच्चन और पिता हरिवंश राय बच्चन में काफी बहसें हुई थीं। हरिवंश अमिताभ को हिंदी स्कूल में पढ़ाना चाहते थे, लेकिन तेजी उन्हें अंग्रेजी स्कूल में भेजना चाहती थीं। अंतत तेजी की ही सुनी गई।

58- अमिताभ नामकरण के बाद सुमित्रानंदन पंत चार साल बाद अमिताभ से मिले और उसी समय बाएं हाथ से लिखने वाले अमिताभ को दाएं हाथ से लिखने की बात कही।

59- पिता की कलमदान से कलम निकालने पर अमिताभ को पहली बार पिता से बहुत डाट पड़ी थी। पिता ने इस काम को चोरी का दर्जा दिया था।

60- उनकी सबसे प्रयोगधर्मी फिल्म मैं आजाद हूं का शीर्षक पहले सच था।

61- सत्तर के दशक में अमिताभ शूटिंग से मिले ब्रेक में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे।

62- इलाहाबाद के अमरूद का असर उनके ऊपर काफी सालों तक रहा। शहर छूटने के बाद वे इसे काफी समय तक मिस करते रहे। हालाकि, उन्हें पके अमरूद से चिढ़ थी। कई साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है।

63- मा तेजी बच्चन को बागवानी का बहुत शौक था। आठ साल की उम्र में अमिताभ ने एक बागवानी प्रतियोगिता में उनके साथ भाग लिया था।

64- पैसे की कीमत अमिताभ बच्चन को नौ साल की उम्र में पहली बार तब पता चली जब हरिवंश राय बच्चन को ब्रिटिश काउंसिल की तरफ से लंदन में रिसर्च करने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन उनके पास उस समय पाच हजार रुपए नहीं थे। हालाकि, बाद में वह इस यात्रा में अपने दोस्तों की मदद से निशुल्क गए थे।

66- बेहद खुशी के मौके पर पिता हरिवंश राय बच्चन अमिताभ को लेकर तुलसी कृत रामचरित मानस का पाठ करते थे।

67- उन्होंने अपने कॅरियर में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीतें हैं। सात हिंदुस्तानी, अग्निपथ और पा की भूमिकाओं के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिले।

68- अपने कॅरियर में सर्वाधिक फिल्में उन्होंने शशि कपूर के साथ की हैं।

69- उनकी पहली ऑडिशन तस्वीर उनके भाई अजिताभ ने खींची थी, जो फिल्म फेयर-माधुरी कॉन्टेस्ट के लिए भेजी गई थी।

70- उन्हें पहला एक्टिंग पुरस्कार शशि कपूर के ससुर जेफरी कैंडल के हाथों मिला।

71- 1990 से 1995 तक उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया।

72- 1978-1979 में लगभग एक साथ उन्होंने सिगरेट, शराब और मास से तौबा कर ली।

73- इस बार उनके जन्मदिन पर मुंबई में एक भव्य पार्टी का आयोजन किया जा रहा है, जहा 1000 के करीब विदेशी मेहमानों के आने की संभावना है।
दुर्गेश सिंह और झकार टीम
 (दैनिक जागरण से साभार)

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

केजरीवाल का अगला निशाना कौन ?

डॉ. महेश परिमल
अन्ना हजारे से अलग होकर अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेसाध्यक्ष के दामाद राबर्ट बढेरा पर गलत तरीके से सम्पत्ति बटोरने का आरोप लगाकर कांग्रेसी खेमे में हलचल पैदा कर दी है। अब हर कांग्रेस अपने तरीके से इस आरोप को झुठलाने में लगा है। अभी तक किसी ने ऐसा बयान नहीं दिया है कि इसकी जांच की जाएगी। सभी उनकी ढाल बनने में लगे हैं। उधर भाजपा की हालत भी खराब ही है। वह इस पर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है। क्योंकि केजरीवाल के समर्थन में बोलकर वह अपनी फजीहत नहीं कराना चाहती। केजरीवाल के आरोपों के विरोध में माहौल बनना शुरू हो गया है। हिमाचल प्रदेश में भाजपा के ही नेता शांता कुमार ने वढेरा की हिमाचल में सम्पत्ति के संबंध में केजरीवाल को दिए गए पत्र को लेकर अपनी आँख ही बंद कर ली है। वित्त मंत्री चिदम्बरम ने पहले ही वढेरा के खिलाफ किसी प्रकार की जांच से इंकार कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अवसर का लाभ न उठाते हुए राकांपा नेता शरद पवार बढेरा की मदद के लिए दौड़ पड़े हैं। उन्होंने राबर्ट को सलाह भी दे डाली कि वे केजरीवाल के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इस पूरे मामले में आखिर भाजपा शांत क्यों है? यह एक रहस्य ही है।
भाजपा चुप क्यों है?
कांग्रेस के खिलाफ बोलने का कोई मौका न चूकने वाले गुजरात के नरेंद्र मोदी भी इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। अभी तक उन्होंने कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ खूब बोला है, पर इस मामले में उनकी खामोशी संदेह पैदा करती है। उधर वढेरा ने केजरीवाल पर आरोप लगाया है कि वे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए उन पर इस तरह का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा को इस मामले में कुछ भी मसाला नहीं मिल रहा है। उसका रुख भ ी समझ में नहीं आ रहा है। एक तरफ वह विजय गोयल के नेतृत्व में दिल्ली में भारी-भरकम बिजली बिलों के खिलाफ आंदोलन चलाती है, तो दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल जब बिजली बिलों की होली जलाते हैं, तो उसमें भाग नहीं लेती। भाजपा के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि केजरीवाल के पास कोई व्यवस्थित समूह नहीं है। उन्हें किसी पार्टी का समर्थन भी प्राप्त नहीं है। केजरीवाल के पास केवल छोटे शहरों के लोगों का ही समर्थन है। अगर केजरीवाल इतने ही सच्चे होते, तो अन्ना उन्हें क्यों छोड़ते? इस तरह के बयान देकर भाजपा नेता अपना पल्लू झाड़ रहे हैं। वैसे इसके पहले भी भाजपा ने राबर्ट वढेरा के मामले पर लोकसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान वढेरा के डीएलएफ के साथ हुए सौदे के संबंध में चर्चा के लिए नोटिस दिया था। पर अंतिम क्षणों में अपनी यह मांग वापस ले ली थी। इससे भाजपा और आरएसएस के अनेक लोगों का दिल दुखा था। इस समय भी वढेरा का मामला गर्म है, तो भाजपा को इसका लाभ लेना चाहिए। एक समूह का कहना है कि यह सब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चल रही विधानसभा चुनाव को लेकर की गई तैयारी का एक भाग है। ताकि समय आने पर इसका लाभ उठाया जाए।
वढेरा के बाद कौन?
केजरीवाल द्वारा वढेरा की सम्पत्ति के मामले उठाए गए कदम से सभी दलों के नेताओं की नींद ही उड़ गई है। अभी दस अक्टूबर को एक और धमाका होने वाला है। इस प्रकरण से कांग्रेस को थोड़ी परेशानी हुई है। क्योंकि वढेरा की सम्पत्ति केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि राजस्थान और हरियाणा में भी है। प्रश्न स्वाभाविक है कि दूसरा धमाका क्या कांग्रेस या किसी अन्य दल को परेशानी में डाल सकता है? कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस बार केजरीवाल किसी भाजपा नेता को ही निशाना बना सकते हैं। केजरीवाल ने शुरू से ही कांग्रेस-भाजपा से एक निश्चित दूरी बनाकर रखी है।
वैसे कांग्रेसी नेताओं को ढाल बनने की अपेक्षा केजरीवाल के आरोपों की तह पर जाना चाहिए। आज उनके निशाने पर राबर्ट हैं, कल कोई और हो सकता है। तो क्या सबके लिए ढाल बनना आवश्यक है? आखिर कब तक लीपापोती की जाएगी। सत्ता बदलते देर नहीं लगती। इसलिए वढेरा की सम्पत्ति की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आखिर यह कैसे हो गया कि पांच साल पहले जिसके पास केवल 50 लाख रुपए थे, आज उसके पास 300 करोड़ की सम्पत्ति है। अगर राबर्ट ने यह सम्पत्ति एक उद्यमशील युवा के रूप में अर्जित की है, तो कांग्रेस को इसका प्रचार करना चाहिए कि राबर्ट एक सफल उद्यमी है। उसने अपनी मेहनत से अपने कारोबार को बढ़ाया है? अगर वास्तव में ऐसा ही है, तो कांग्रेस इसे आज के युवाओं के सामने एक प्रेरणा के रूप में ले। उसाक उदाहरण अन्य युवाओं को दे। सभी नेता जब राबर्ट को बचाने में लग जाएं, तो यह समझना ही होगा कि मामला गड़बड़ है। वैसे भी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि इस मामले की जाँच निष्पक्ष होगी। हमारे देश में ऐसी कोई एजेंसी या संस्था नहीं है, जो निष्पक्ष जांच कर सके। सरकार तो कैग की रिपोर्ट को गलत ठहरा सकती है,तो एजेंसी की रिपोर्ट को भी गलत ठहराने में देर क्या लगती है? ऐसा होना नहीं चाहिए, पर जब सरकार हर मोर्चे पर विफल हो, तो जांच करवाने में कैसे सफल हो सकती है? इसलिए सरकार से किसी अच्छे की उम्मीद करना बेकार है। यदि केजरीवाल अपना अभियान जारी रखते हैं, तो धीरे-धीरे ही सही, लोग उनके साथ हो सकते हैं। सरकार की विफलता को सभी ने देख ही लिया है। अब यदि एक अभियान एक अच्छे उद्देश्य के लिए शुरू हुआ है, तो उसे पूरा होना ही है। अभी केजरीवाल के साथ भीड़ नहीं है। यह सच है, पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आज पूरा देश है। यदि केजरीवाल अपना लक्ष्य केवल भ्रष्टाचार पर ही केंद्रित करें, तो संभव है कल उनके समर्थक बढ़ सकते हैं। कोई अभियान अकेले ही शुरू होता है। लोग तो बाद में जुड़ते हैं।
  डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले दो साधारण चेहरे

डॉ. महेश परिमल
यूं तो आम आदमी हमेशा अपनी ही समस्याओं से जूझता रहता है। वह चाहकर भी अपनी समस्याओं से निजात नहीं पा सकता। लेकिन यही आम आदमी यदि कुछ ईग करने की सोच ले, तो वह क्या नहीं कर सकता। यही आम आदमी चाहे तो राजनेताओं को भी धूल चटा सकता है। महाराष्ट्र का सिचांई घोटाला सामने आया है, उसमें दो आम आदमी की महत्वपूर्ण भूमिका है। सत्य की ताकत अंजलि दमनिया और विजय पंढारे की हिम्मत के कारण महाराष्ट्र के भ्रष्ट नेताओं के चेहरे बेनकाब हुए हैं। इससे यह साबित होता है कि एक छोटा सा दीया किस तरह से अंधेरे को चीरकर उस स्थान को प्रकाशवान बना सकता है। शायद इसीलिए कहा गया है कि असत्य जितना भी शक्तिशाली हो, पर सत्य की ताकत के आगे कभी टिक नहीं सकता। भ्रष्टाचारी कितने भी बलशाली हों, पर थोड़ी-सी हिम्मत और थोड़ी-सी निडरता के आगे वे नेस्तनाबूत हो जाते हैं। महाराष्ट्र में सिंचाई योजनाओं के 35 हजार करोड़ के घोटाले को लेकर राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार को इस्तीफा देना पड़ा। उसके पीछे अंजलि दमनिया और विजय पंढारे जैसे आम आदमी ही हैं, जिनके सत्याग्रह ने इस घोटाले को उजागर किया।
अंजलि और विजय का नाम हममें से शायद ही किसी ने सुना होगा। उनकी तस्वीरें भी अखबारों के पहले पन्ने पर कभी नहीं आई। टीवी पर भी उन्हें कभी किसी चर्चा के लिए नहीं बुलाया गया। पर जब उन्हें अपने ही राज्य में सिंचाई घोटाले की गंध आई, तो वे दोनों एक तरह से हाथ-धोकर उसके पीछे पड़ गए। इस काम में दोनों ने जबर्दस्त हिम्मत और धर्य का प्रदर्शन किया। इन्हीं दोनों के साहस से सरकारी फाइलों में दबा सिंचाई घोटाला सामने आया। इस घोटाले ने महाराष्ट्र सरकार की नींव ही हिलाकर रख दी। विजय पेशे से इंजीनियर हैं। वे महाराष्ट्र सरकार के सिंचाई विभाग में ही पिछले 32 वर्ष से नौकरी कर रहे हैं। सिंचाई योजनाओं में कांट्रेक्टर और मंत्री मिलकर किस तरह से भ्रष्टाचार करते हैं, उसकी पूरी जानकारी वे रखते हैं। इसे हम आद्योपांत ज्ञान कह सकते हैं। विजय पंढारे को जब  अमरावती और जलगांव जिला पंचायत में काम करने का अवसर मिला, तो उनके हाथ में जिल पंचायत की सिंचाई का काम देखने को कहा गया। काम के दौरान उनके सामने जो दस्तावेज आए, उससे उन्हें लगा कि आखिर क्या बात है कि सिंचाई योजनाओं के कार्यान्वयन में जितना अधिक कांट्रेक्टर दिलचस्पी लेते हैं, उससे अधिक मंत्री की दिलचस्पी होती है। सिंचाई योजनाओं के जल्द से जल्द पूरे होने में इनकी दिलचस्पी होती, तो विजय को कतई बुरा नहीं लगता। पर इनकी दिलचस्पी प्रोजेक्ट के पूरे नहीं होने में अधिक होती थी। इससे उनका माथा ठनका। उन्होंने बारीकी से दस्तावेज का अध्ययन किया, तो स्पष्ट हुआ कि इसमें तो जबर्दस्त घोटाले ही घोटाले हैं। उनका पहला प्रोजेक्ट तापी डेम था। इसमें उन्होंने देखा कि डेम के निर्माण कार्य में सीमेंट के बदले मिट्टी का इस्तेमाल किया गया। इस पर उन्होंने 500 पेज की रिपोर्ट सरकार को भेजी। पर उस रिपोर्ट को अनदेखा कर दिया गया। विजय ने हिम्मत नहीं हारी, उन्होंने अपना काम जारी रखा। इस दौरान उन्होंने पाया कि कांट्रेक्टर को जितनी राशि दी जाती है, उसका आधा हिस्सा मंत्रियों को जा रहा है। उन्हें समझ में आ गया कि यह हालत केवल इस क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की है। उन्होंने राज्य की अन्य सिंचाई योजनाओं का अध्ययन करना शुरू किया। उन्होंने राज्यपाल को भी पत्र लिखा, पर कोई लाभ नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र लिखा। मुख्यमंत्री ने विजय पंढारे के पत्र को गंभीरता से लेते हुए राज्य की सिंचाई योजनाओं पर एक श्वेत पत्र लाने की घोषणा की।
अब जानते हैं अंजलि दमनिया के बारे में। मूल रूप से गुजरात की 42 वर्षीय अंजलि महाराष्ट्र की बहू बनीं हैं। वे एक साधारण सी गृहिणी हैं। कर्जत तहसील में उनका 59 एकड़ का फार्म हाउस है। अपनी 18 वर्षाे के परिश्रम से उन्होंने फार्म हाउस को तैयार किया था। एक सुबह अंजलि को पता चला कि उनके फार्म हाउस  वाली जगह पर सरकारी बांध बन रहा है। उन्हें बहुत आघात लगा। तब फार्म हाउस बचाने के लिए उन्होंने सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने शुरू कर दिए। दूसरी ओर वह बांध के बारे में जानकारी भी इक-ा करने लगी। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कर्जत इलाके में जो बांध बनने वाला था, पहले उसकी लागत केवल 59 करोड़ रुपए थी। एक महीने में यह लागत बढ़कर 328 करोड़ रुपए हो गई। तब अंजलि ने बांध के निर्माण के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। उसके आधार पर हाईकोर्ट ने यह योजना ही रद्द कर दी। उसके बाद अंजलि को खयाल आया कि महाराष्ट्र में बनने वाले तमाम बांधों में भ्रष्टाचार किया जा रहा है। साथ ही प्रजा के अरबों रुपए बेकार जा रहे हैं। उन्होंने सूचना का अधिकार का सहारा लिया। अब उनके पास राज्य के अनेक बांधों के बारे में जानकारी थी। जिसमें भ्रष्टाचार का पूरा-पूरा अंदेशा था। इस जानकारी को उन्होंने अखबारों में प्रकाशित करवाया। तब महाराष्ट्र सरकार हड़बड़ा गई। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि आखिर उपमुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। अंजलि के अभियान के कारण ही राज्य की 5 हजार करोड़ की विवादास्पद सिंचाई योजनाएं अटक गई।
अपनी इस सफलता पर अंजलि कहती हैं कि अभी तक उनके पास 9 बांधों के बारे में जानकारी है। इसमें कोंकण क्षेत्र में चल रही कुल 70 सिंचाई योजनाओं के बारे में जानकारी सिंचाई विकास निगम से मांगी है। यही निगम ही सभी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इसकी रिपोर्ट आ जाए, तो वे एक बार फिर हाईकोर्ट की शरण में होंगी। उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा कि सूचना का अधिकार एक ऐसा हथियार है, जिससे छोटे लोग बड़ी लड़ाई लड़ सकते हैं। आजाद भारत में प्रशासन भले ही भ्रष्ट हो, पर न्यायालय अभी भी ऐसे मंदिर हैं, जहां से हमें इंसाफ मिल सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे भी सूचना का अधिकार रूपी हथियार से भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूत करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। आवश्यकता है हिम्मत और धर्य की।
विजय पंढारेऔर अंजलि दमनिया ने बता दिया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में साहस और धर्य की आवश्यकता होती है। इस घटना के बाद बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि दमानिया को कानूनी नोटिस भेजा है। अंजलि  ने नितिन गडकरी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने महाराष्ट्र के सिंचाई घोटाले को दबाने का प्रयास किया है। अंजलि ने दावा किया है कि वह तीन बार सिंचाई घोटाले को लेकर गडकरी से मिलीं थी लेकिन गडकरी मे अंजलि को यह घोटाला उजागर करने से मना किया था।
गडकरी ने भेजा नोटिस
उनके इन सभी आरोपों का खंडन करते हुए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें नोटिस भेजकर माफी मांगने के लिए कहा है और ऐसा नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। गडकरी ने अपने वकील एस एस शमशेरी के माध्यम से अंजलि को नोटिस भेजा जिसकी प्रति मीडियाकर्मियों को भी दी गई। नोटिस में लिखा है कि गडकरी की देश में और जनता में व्यापक तौर पर अच्छी छवि है. उन्होंने देश में कृष के क्षेत्र में काफी काम किया है लेकिन अंजलि ने उन पर झूठा, निराधार और अपमानजनक बयान देकर उनकी छवि खराब करने का प्रयास किया है। जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी होगी।
अंजलि ने दिया था बयान
 अंजलि नेएक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए बिना किसी का नाम लिए कहा था कि वह इस मामले में एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष से मिली थीं, लेकिन उन्होंने शरद पवार से रिश्तों की दुहाई देते हुए इस मामले को दबाने की बात की थी। बाद में एक निजी चौनल पर उन्होंने इस मामले में नितिन गडकरी का नाम लिया और साफ तौर पर कहा कि वह बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी से मिली थीं. अंजलि के मुताबिक गडकरी ने कहा कि शरद पवार उनके कुछ काम करते हैं, तो वह भी शरद पवार के कुछ काम करते हैं, लिहाजा इस मामले को दबाने में ही फायदा है। इस सिंचाई घोटाले के कारण महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार को इस्तीफा देना पड़ा है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

अब मुंडेर पर नहीं बोलता कागा


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख


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अब मुंडेर पर नहीं बोलता कागा
डॉ- महेश परिमल 
श्राद्ध पक्ष आते ही कौवों की तलाश शुरू हो जाती है। हम अपने पुरखों को याद करते हैं। कौवों को खीर-पूड़ी देकर उन्हें व्यंजन खिलाते हैं। इस बहाने उन झुर्रीदार चेहरों को याद कर लेते हैं, जो एक समय हमारे घर के एक कोने पर भूखे-प्यासे सिमटे से पड़े रहते थे। खैर रसखान कह गए हैं कि काग के भाग बड़े सजनी, जिसे यह मौका मिला कि वह ईश्वर के हाथ की रोटी ले भागा। यह बात तब की है, जब इस देश में कौवे थे, आज वे कहां हैं, किसे दें हम खीर-पूड़ी? कैसे मनाएं उन्हें? हमने ही तो बर्बाद कर दिया, अपने आसपास का पर्यावरण। सालभर तो उसकी याद तक नहीं आती, पर जब पुरखों को याद करना होता है, तब याद आती है कागा की। कागा जो हमारे साथी थे, हमारे आसपास रहते थे, आज हमने उन्हें नाराज कर दिया है। वे हमारे पास नहीं हैं। अब तो वे किसी के खत के आने का संकेत भी नहीं देते। क्यों भूल गए हम कागा को? रसखान ने इस पंक्ति के माध्यम से कागा को श्रेष्ठ पक्षी की उपमा दी है, लेकिन आज का मनुष्य जीव कितना स्वार्थी है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ढूंढ़-ढूंढ़कर खीर-पूड़ी खिलाने की चाहत रखने वाला यही मानव बाकी समय यदि अपने आसपास किसी कौवे को देख भी लेता है, तो उसे तुरंत भगाने से नहीं चूकता। इसे अपशकुनी माना जाता है, पर इसकी विशेषता से शायद हम अभी तक अनभिज्ञ हैं। एक जमाना था जब हमारी मुंडेर पर कौवा कांव-कांव करता था तो घर के बुजुर्ग यही कहते थे कि आज घर पर कोई चिट्ठी या मेहमान की आमद होने वाली है। आज ई-मेल के जमाने में यह बात हमें भले ही नागवार गुजरती हो, पर यह सच है कि आगत परिस्थितियों को पहचानने में कौवे में अद्भुत क्षमता होती है। हमारे समाज के लिए यह कतई अपशकुनी नहीं है, अपशकुनी तो हम हैं कि इन्हें वर्ष में मात्र कुछ ही दिन याद करते हैं। बाकी दिनों में इसे भुला दिया जाता है। इसे यदि हम पर्यावरण के रक्षक के रूप में देखें, तो हम पाएंगे कि यह मानव जाति का सच्चा सेवक है। एक समय वह भी था, जब कौवे सभी जगह आसानी से दिखाई दे जाते थे, लेकिन आज स्थिति यह है कि ये कौए बड़ी मुश्किल से कभी-कभी ही दिखाई देते हैं। इनकी तेजी से घटती संख्या के कारण ही आज इनकी गणना एक दुर्लभ पक्षी के रूप में की जा रही है। इसे प्रकृति की मार कहें या पर्यावरण में आया बदलाव कि आज कौए की आधी से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। शेष बची प्रजातियों में से करीब 10-20 प्रतिशत कौए जंगलों में जाकर बस गए हैं। आज शहरी वातावरण में कौए बहुत कम पाए जाते हैं। ऊंची-ऊंची इमारतों की छत पर लगे टीवी एंटीना के कोने पर अब कौवे नहीं बैठते। उनकी कांव-कांव का शोर अब कानों को नहीं बेधता। कौओं की लगातार कम होती संख्या के पीछे हमारी उपेक्षा ही जवाबदार है। हमने कभी कौओं के प्रति अपनी प्रीति दिखाई ही नहीं। कौओं के मामले में हमने यह बात सिद्ध कर दी कि मानव स्वभाव स्वार्थी होता है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में जब हमें पितरों की याद आती है, तो कौओं के माध्यम से हम अपनी श्रद्धा उन तक पहुंचाते हैं। बस तभी कागवास हेतु हमें कौए याद आते हैं, वरना तो कौए को देखते ही हम हाथों में लकड़ी लिए उसे उड़ाने का ही प्रयास करते हैं। कौआ एक घरेलू पक्षी है, उसके बाद भी हम हमेशा उसकी उपेक्षा ही करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि काली चमड़ी का कर्कश स्वर वाला यह कुरूप पक्षी चिडि़या से भी अधिक मिलनसार है। बार-बार यह हमारे आंगन में या छत पर बैठकर कांव-कांव की आवाज के साथ अपने होने का परिचय देता है। न केवल परिचय देता है, बल्कि हमारे द्वारा दुत्कारे जाने पर भी फिर से आता है और खुद हमारी तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाता है। इसे इसकी मिलनसारिता न कहें तो यह क्या है? आंगन में फुदकती चिडि़या तो दाना चुगकर अपने घोंसले में चली जाती है, पर यह तो छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों को अपना भोजन बना कर घर के आसपास की गंदगी को भी साफ करता है और हमें कई संक्रामक बीमारियों से भी बचाता है। हमारे देश में मान्यता है कि कौए में कई विशेषताएं हैं, जिस पर हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया, पर यह सच है कि कौए को यह आभास हो जाता है कि लोक और परलोक में क्या होने वाला है। इन कौवों की अपनी भाषा होती है? काग विज्ञान के प्राचीन लेखकों ने काग भाषा की 32 पद्धतियों का वर्णन किया है। शकुन-अपशकुन पर कौवे का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि यदि कौवा दाहिनी तरफ से घूमते हुए चक्कर लगाए, तो इसे शुभ माना जाता है। यदि उसे किसी डाली या पत्थर पर सर रगड़ते हुए देखा जाए, तो इसे भी शुभ माना जाता है। कौवा यदि माथे पर या घोड़े पर बैठा दिखाई दे, तो तुरंत वाहन मिलने की संभावना रहती है। मंदिर के शिखर पर या अनाज के ढेर पर बैठा कौवा भी शुभ का संकेत देता है। युद्ध में जाते हुए सैनिक को यदि सामने से आते हुए कौए दिखाई दें, तो समझा जाता है कि युद्ध में उसे पराजय का सामना करना पड़ेगा। यदि घर के आसपास दिनभर कौवे की कांव-कांव सुनाई दे, तो समझो कोई विपत्ति आने वाली है। यदि कौवा बीट कर दे, तो बीमार पड़ने या मुसीबत में फंसने की आशंका बन जाती है। पाश्चात्य देशों में मान्यता है कि यदि कौवा अकेले दिखाई दे, तो वह अशुभ है और यदि समूह में कौवे किसी एक व्यक्ति के आसपास उड़ते दिखाई दें तो समझिए कि उसका अंत समय निकट है। यदि कौवे सामूहिक रूप से जंगल से पलायन कर जाएं, तो समझो अकाल की विभीषिका या कोई और प्राकृतिक आपदा आने वाली है। भारतीय साहित्य में कहीं-कहीं कौवे के महत्व को दर्शाया गया है। तुलसीदास रामचरित मानस में राम की बारात किलने के समय होने वाले शकुन का वर्णन करते हुए लिखते हैं, दाहिन काग सुखेत सुहावा। रामचरित मानस के अनुसार राम की माता कौशल्या ने राम वन से सकुशल वापस आएं, इसके लिए कौवे के मुंह में घी-शक्कर डालने की और उसकी चोंच पर सोना चढ़ाने की इच्छा व्यक्त की थी। यह अपने आप में कोए के पौराणिक महत्व को दर्शाता है। कौए को पक्षी जगत का सबसे चालाक पक्षी माना जाता है। इसे आसानी से नहीं पकड़ा जा सकता। ये दिन में हमें भले ही यदा-कदा दिखाई दे जाएं, पर रात होते ही ये जंगल या उपवन में पेड़ पर अपना बसेरा कर लेते हैं। आजकल सिमटते जंगलों के कारण इनकी संख्या में लगातार कमी हो रही है और इसके कारण हम खुद ही हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

कितना जानते हैं हम बापू को

डॉ. महेश परिमल
आज गांधी जयंती पर लोग उन्हें बहुत याद करेंगे। उनके नाम पर देश भर में वैसे भी अवकाश घोषित कर दिया गया है। दूसरी ओर उन पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम होंगे, जिसमें उनकी वाणी, उनके उपदेश आदि को जीवन में उतारने का संकल्प लिया जाएगा। पर गांधी के सिद्धांतों पर चर्चा कर उसकी गहराई को समझने का प्रयास शायद ही कोई कर पाएंगे। गांधी केवल एक नाम ही नहीं, बल्कि एक विचार है। जो साधारण से विचार से शुरू होकर एक क्रांति पर जाकर खत्म होती है। गांधी नेताओं के भाषण में बार-बार आते हैं,पर उनके जीवन में वे कहीं भी नजर नहीं आते। अपनी सादगी से विश्व को हतप्रभ कर देने वाले महात्मा गांधी आज सिद्धांतों के मामले पर हमारे बीच प्रासंगिक नहीं हैं।
गांधीजी के सिद्धांत हमारे बीच अप्रासंगिक कैसे हो गए? यह जानना आवश्यक है। पर उससे पहले यह भी जानना आवश्यक है कि आखिर हम कितना जानते हैं इस गांधी को? जिन्होंने देश सेवा के लिए अपने प्राण त्याग दिए। आज पाठ्यक्रम में गांधी जी हैं, पर उनके विचार को जानने और समझने के लिए कोई तैयार नहीं है। आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो उनके पूरी तरह से असहमत हैं। इसके लिए उनके पास तर्क हैं। अपने तर्को से वे यह सिद्ध कर सकते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया देश हित के लिए नहीं किया। दक्षिण भारत के अछूत आज भी उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। हाल ही में उन पर बनी फिल्म पर रोक लगा दिया गया है। क्योंकि फिल्म में गांधी के पुतले का अपमान किया गया है और पुतले को जलाया भी गया है। इस तरह से गांधी पर अपना आक्रोश व्यक्त करने वाले आज भी यदा-कदा अपने आचरण का प्रदर्शन करते रहते हैं। आए दिनों उनकी प्रतिमाओं के साथ खिलवाड़ सुर्खिया बनती ही रहती हैं। इनके पास गांधी को बुरा कहने और मानने के लिए अपने तर्क हैं। पर जो गांधी के नाम पर अपनी राजनीति करते आ रहे हैं, गांधी के बिना उनका काम ही न चलता हो,पर उनके जीवन में गांधी कभी नहीं होते। आखिर उनके लिए क्यों अप्रासंगिक हैं गांधीजी? इसका यही उत्तर है कि गांधी उनके भाषण में हो सकते हैं, क्योंकि इससे लोगों को प्रभावित किया जा सकता है। लेकिन गांधी को वे अपने जीवन में नहीं उतार सकते, क्योंकि जीवन में उतारना यानी सादगी से रहना। जो कतई संभव नहीं है। गांधी के लिए दोहरे मापदंड बनाना आसान है। गांधी को भुला देना उससे भी अघिक आसान है। इनके पास ऐसा कोई भी बहाना नहीं है, जिससे वे गांधी जी के विचारों को अपने जीवन में उतार सकें।
महात्मा गांधी, हिंदी और हॉकी में एक समानता है, वो ये कि तीनों को ही राष्ट्रीयता से जोड़ा गया है, जैसे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है, हिंदी को राष्ट्र्भाषा और हॉकी को राष्ट्रीय खेल का। पर गौर करने वाली बात ये है कि बावजूद इसके तीनों को ही वो सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है, जिसके वो हकदार हैं। महात्मा गांधी ने मुल्क को आजादी दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया, उसे दोहराने की शायद जरूरत नहीं। उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में जाना जाता है जिसने शस्त्र उठाए बिना ही दुश्मन को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उनके अहिंसक प्रयासों को भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में सराहा जाता है। हालांकि ये बात सही है कि उनके विचारों और सिद्धातों से कुछ लोग हमेशा असहमत रहे मगर बापू के समर्थन में खड़े होने वाली हजारों की भीड़ ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी। पर आज उनके लिए मन में श्रद्धा का भाव रखने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। सरकार को भी उनकी याद महज दो अक्टूबर को ही आती है। इसी दिन पाकोर्ं, चौराहों पर धूल फांक रहीं बापू की प्रतिमाओं को नहलाया-धुलाया जाता है, माल्यार्पण किया जाता है और फिर साल भर के लिए ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। देश के राजनीतिज्ञ महात्मा गांधी को नाटकबाज कहकर संबोधित करते हैं। क्या यह आचरण किसी महापुरुष को दिए गये सम्मान का परिचायक है। यदि महात्मा गांधी के नाम के आगे राष्ट्र्रपिता नहीं जुड़ा होता तो ऐसे वक्तव्य और उदासीनता फिर भी एकबारगी ना चाहते हुए भी हजम की जा सकती थी। क्योंकि हमारे देश में महापुरुषों के साथ ऐसा ही सलूक किया जाता है। मगर जहां राष्ट्र्रीयता की बात आती है वहां वाजिब सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए।
फिल्म गांधी में गांधी की भूमिका निभाने वाले वेन किंग्‍सले पूरी तरह से शाकाहारी हो गए। गांधी के सिद्धांतों को लेकर विदेश से लोग भारत आते हैं। उन्हें इस बात का दु:ख होता है कि गांधी के ही देश में आज गांधी को ही नहीं जानते लोग। उन्हें लोग अपशब्द कहने से भी नहीं चूकते। यदि गांधी उनके देश में हुए होते, तो उनका देश आज विश्व में सबसे अग्रणी देश होता। आज भी कई विद्वान गांधी को अपने जीवन की धुरी मानते हैं। गांधी जी से प्रभावित होने वाले करोड़ों लोग हैं। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास कभी गांधीजी के बिना पूरा हो ही नहीं सकता। इतना तो कहा ही जा सकता है कि हमारे ही देश में गांधी के नाम पर लोगों को जिस तरह से लूटा गया है, वैसा और कहीं नहंी हुआ। आज गांधी भले ही हमारे लिए अप्रासंगिक हो, पर सच तो यही है कि उनके बिना अ¨हसा की बात करना ही बेमानी है। गांधी हमारी जेब में करंसी के रूप में हैं, हमारे लेन-देन में हैं, हमारी पाढ्यपुस्तकों में हैं, हमारी फिल्मों में हैं, उनकी तस्वीर देश के सभी शासकीय कार्यालयों में हैं, पर वे अपने सिद्धांतों के साथ कहीं नहीं हैं। न हमारे दिलों में और न हीं हमारे कार्यो में। अब गांधी को सच्चे अर्थो में जानने के लिए हमें विदेश जाना होगा, जहां गांधावादी लोग हमें बताएंगे कि कौन थे गांधी और क्या थे उनके सिद्धांत?
डॉ. महेश परिमल

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