बुधवार, 28 नवंबर 2012

फिर सचिन के पीछे पड़े आलोचक




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-28&pageno=9#id=111755925932623736_49_2012-11-28
 
फिर सचिन के पीछे पड़े आलोचक
 महेश परिमल 
इन दिनों सचिन तेंदुलकर हूट हो रहे हैं। उन पर संन्यास के लिए दबाव बन रहा है। मीडिया में इस विषय पर बहस भी शुरू हो गई है। सचिन के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 19 मार्च 2006 में भी मुंबई के उसी वानखेड़े स्टेडियम में सचिन तेंदुलकर ने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट में जब 21 बॉल पर मात्र एक ही रन बनाया था, तब दर्शकों ने उन्हें काफी हूट किया था। ये वही प्रशंसक थे, जो कभी सचिन की उपलब्धियों पर पलक पांवड़े बिछाकर उसका स्वागत करते थे। लेकिन थोड़ा-सा प्रदर्शन ठीक नहीं हुआ कि लोगों का नजरिया ही बदल गया। दरअसल, उच्च स्थान पर बिठाए जाने वालों पर लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती जाती हैं। अपेक्षाएं अनंत होती हैं, वह कभी भी पूरी नहीं की जा सकतीं। इसलिए जिनका स्थान ऊंचा होता है, उन्हें इस स्थिति के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। पूरे गुजरात में श्वेत क्रांति लाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन का भी यही हाल हुआ। लोगों की जो अपेक्षाएं उनसे थी, वह पूरी नहीं हो पा ही थीं। इसलिए उन्हें हटना पड़ा। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनके अनुभव आज भी काम आ रहे हैं। जिन्हें नागरिकों ने अपने विचार के लायक समझा, जिन्हें सम्मान के साथ एक ऊंचे स्थान पर बिठाया, जिनसे अपनी भावनाएं जोड़ी, जिनके हाथों में एक सपना दिया, वे ही जब उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हो पाते, तब दिल में एक ठेस लगती है। फिर चाहे वह फिल्म का क्षेत्र हो या फिर खेल की दुनिया। सचिन तेंदुलकर के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे अपने खेल कौशल से बरसों से लोगों को लुभाते रहे हैं। उन्होंने अपने खेल के आगे अपना देश रखा। इसलिए कई कीर्तिमान उनके नाम हो गए। अब उनके लिए ऐसा समय आ गया है, जब लोगों को लगा कि उनका खेल अब अधिक निजी हो गया है। अब वे देश के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए खेल रहे हैं। बस यहीं से शुरू हो गया उपेक्षा का भाव। महान खिलाड़ी सचिन ही नहीं, बल्कि वेस्टइंडीज की ओर से खेल चुके ब्रायन लारा भी कुछ इसी तरह के दौर से गुजर चुके हैं। संभव है वे भी कहीं न कहीं हूट के शिकार हुए होंगे। लोगों के सामने अगर एक बार अच्छा कर दिया जाए तो फिर वे उसी तरह की अपेक्षाएं पाल लेते हैं। सचिन तेंदुलकर अपने खेल कैरियर के शुरुआती दिनों में लगातार लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरते रहे। कई बार तो लोगों ने उनसे शतक की उम्मीद लगाई थी तो वे उससे भी बढ़कर डेढ़ से दो सौ रन बनाए। केवल रन ही नहीं बनाए, बल्कि विकेट भी लिए। उनके सामने कई बार ऐसे दौर आए, जब बाहरी लोगों ने उन पर कटाक्ष किए। उस स्थिति का सामना उन्होंने बड़ी ही शिद्दत के साथ किया। उन्होंने कहा कुछ नहीं, अपने खेल से ही लोगों की बोलती बंद हो गई। वे कुछ नहीं बोले, उनका बल्ला बोला। पिछले कुछ पारियों में सचिन बोल्ड क्या हुए, मीडिया और खेल विशेषज्ञों ने उनको नसीहतें देनी शुरू कर दी। बड़े ओहदों पर बैठने वालों को यही सोचना चाहिए कि लोग जब सिर आंखों पर बिठाते हैं, उसे हीरो बनाते हैं तो उसे ही जीरो बनाने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखते। यह भी सच है कि अनंत अपेक्षाओं को हमेशा पूरा किया भी नहीं जा सकता। इसलिए समय रहते अपने आप को दूर कर लेना चाहिए। ऐसा भी समय आएगा, जब भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन न कर पाए तो लोग यही कहेंगे कि इस समय यदि सचिन होते तो ऐसा नहीं होता। आज भारतीय टीम के लिए सचिन एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक संबल के रूप में हैं। उनका होना ही प्रतिद्वंद्वी टीम के लिए एक चुनौती है। उनके होने से ही अन्य खिलाड़ी को भी अपना प्रदर्शन और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है, पर कुछ युवा खिलाडि़यों के आ जाने से लोगों का ध्यान सचिन से हटने लगा है। अब सचिन उनकी आंखों के तारे नहीं रहे। कई बार जब घर का युवा हार जाता है तो एक बुजुर्ग का हाथ उसके सिर पर आता है, आवाज आती है, बेटे तुम आगे तो बढ़ो, हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। बुजुर्ग का यही कहना ही युवा को उत्साह से लबरेज कर देता है। शायद इसीलिए लोग कहते हैं कि बुजुर्गो का आशीर्वाद लेते रहना चाहिए। गर्दिश के दिनों से हर किसी को गुजरना होता है। यही दिन होते हैं, जब लोग अपना विश्लेषण करते हैं, अपने भीतर की शक्ति को रिचार्ज करते हैं। ऊर्जा का कोई नया विकल्प तैयार करते हैं। इन्हीं दिनों की ऊर्जा को संचित किया जाए और निकला जाए नई ऊर्जा और नई स्फूर्ति के साथ। देखो पलक-पांवड़े बिछाकर लोग किस तरह से तैयार खड़े हैं। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
 



शनिवार, 24 नवंबर 2012

बाला साहब के न होने का मतलब?

डॉ. महेश परिमल
लगता है मुम्बई में इस समय यमराज ने डेरा ही डाल दिया है। दारासिंह, राजेश खन्ना, ए.के. हंगल, यशराज चोपड़ा की विदाई हो गई। प्रसिद्ध खलनायक और चरित्र अभिनेता प्राण और अभिनेता शशिकपूर अस्पताल में हैं। उधर बाल ठाकरे के अवसान से मुम्बई मानो निस्तेज हो गई है। रविवार को लोग दिन भर टीवी पर बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा एवं अंत्येष्टि का दृश्य देखते रहे। एक तरफ टीवी पर फिल्म ओ माइ गॉड आ रही थी, तो दूसरी तरफ बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा में 20 लाख लोगों का जनसैलाब देखकर लोग ओ माइ गॉड कह रहे थे। सोमवार को भी पूरी मुम्बई में बंद जैसा ही माहौल था। सभी के मुंह पर बाल ठाकरे की शानदार विदाई की ही चर्चा थी। सुबह जब अस्थि कलश लेने उद्धव ठाकरे गए, तब उनके साथ राज ठाकरे नहीं थे, इसी सभी ने नोटिस किया। लोग अब यह मानकर चल रहे हैं कि अभी ग्यारह दिनों तक दोनों भाई मौन ही रहेंगे। उसके बाद दोनों के राजनैतिक संबंध किस दिशा में जाएंगे, यह देखने में आएगा। यह दिशा शिवसेना की दुर्दशा होगी या फिर नई दिशा। इसके लिए कुछ समय तक राह देखनी होगी।
राजनैतिक सत्ता को ठोकर मारने वाले बाल ठाकरे को लोग नेता नहीं,बल्कि देवता मानते थे। विवादों से कभी नहीं डरने वाले बाल ठाकरे भले ही सत्ता का कोई सिंहासन स्वीकार न किया हो, पर वे जिस सिंहासन पर बैठे थे, वह सिंहासन लोगों को किंग बनाता था। लोग उन्हें किंग मेकर भी कहते थे। देश भर के नेता, खासकर एनडीए के नेताओं की कतारें, बॉलीवुड की हस्तियां एवं कापरेरेट क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग उनकी अंत्येष्टि में शामिल होकर स्वयं को गोरवान्वित समझ रहे थे। बाल ठाकरे में महाराष्ट्र को बिजनेस राज्य बना दिया। आज मुम्बई लोगों का ध्यान आकृष्ट करती है। जिस तरह से दिल्ली राजनीति के नाम से पहचानी जाती है, उसी तरह से मुम्बई बिजनेस के नाम से पहचानी जाती है। बाल ठाकरे को दी गई अंतिम विदाई एक श्रद्धाभरी विदाई थी। जिसमें सभी गमगीन थे। लोगों के मन में एक ही सवाल अब गूंजने लगा है कि इसके बाद कौन? पर जब लोगों ने उद्धव और राज को एक साथ बातचीत करते देखा, तो सभी को यही लगा कि अब दोनों भाई और करीब आ जाएंगे। यह सच है कि मुम्बई बाल ठाकरे के इशारे पर चलती थी। बाल ठाकरे की प्रसिद्धि में कांग्रेस का भी हाथ रहा है।  शिवसेना को खिलने देने में कांग्रेस का हाथ रहा है। इसकी वजह यही थी कि महाराष्ट्र ट्रेड यूनियन की पकड़ में था, कांग्रेस की शह पर बाल ठाकरे ने ऐसी चाल चली कि ट्रेड यूनियन का वर्चस्व खत्म हो गया, उसके बाद उद्योगपति राज्य के उद्योग मंत्रालय से अधिक संबंध मातोश्री से रखने लगे थे।
बाल ठाकरे लोगों की भावनाओं को समझते थे। लोगों को वे सच्चई से वाकिफ कराते थे। नागरिक क्या समझते हैं, क्या नहीं समझती, इसकी चिंता किए बिना वे अपनी बेलाग वाणी से अपने विचारों को अभिव्यक्ति दिया करते थे। वे एक ऐसे नेता थे, जिन्हें गुंडे को गुंडा कहना और सत्ता लोलुप नेताओं को दलाल कहने में कोई गुरेज नहीं था। बेलाग वाणी उनकी पहचान बन गई थी, उनके बयानों का एक राजनैतिक वजन भी होता था। उन्होंने पूरी जिंदगी कांग्रेस को वंशवाद आगे बढ़ाने के लिए कोसा, भरपूर लताड़ा भी, पर वे स्वयं भी इसी वंशवाद के पोषक रहे। पहले बेटे उद्धव ठाकरे, फिर पोते आदित्य को अपना वारिस बनाया था। उत्तर भारत के लोग उन्हें कभी नहीं भाते थे,पर अमिताभ बच्चन उन्हें मुम्बईवासी लगते। एक समय ऐसा भी था, जब नारायण राणो जैसे लोग स्वयं को बाल ठाकरे का चौथा बेटा बताते थे, वही राणो उद्धव के साथ छोटी सी तकरार में उनसे काफी दूर हो गए।  इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि इधर इस्लामिक आतंकवाद ने सर उठाया और उधर शिवसेना का उदय हुआ। शाहबानो विवाद और बाबरी ध्वंस जैसी घटनाओं के बाद शिवसैनिकों को एक नया प्लेटफार्म मिला। हिंदुत्व को लेकर कांग्रेस का रवैया नरम रहा, वहीं दूसरी और भाजपा का रवैया आक्रामक रहा। भाजपा की इस कट्टरता के कारण महाराष्ट्र में शिवसेना को उभरने का अवसर मिला। कुछ ही समय बाद पूरे महाराष्ट्र पर शिवसेना का ही कब्जा हो गया। आतंवादियों को प्रोत्साहन देने वाले पाकिस्तान को बाल ठाकरे बुरी तरह से लताड़ते और उससे सभी राजनैतिक संबंध तोड़ लेने की मांग करते। महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए ही है, अपनी इस हुंकार के बाद ही वे लोगों के हृदय सम्राट बन गए। हाल ही में जब क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने कहा था कि मैं मराठी होने के पहले भारतीय हूं, तो इसका विरोध करने में शिवसेना पीछे नहीं रही।
अब हालात बदल गए हैं, बाल ठाकरे नाम का ब्रांड अब शिवसेना के पास नहीं है, इसलिए इस पार्टी के सामने अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है। राजनीति से 13 साल तक दूर रहने के बाद अब शिवसेना में राजनैतिक विचारधारा का असर नहीं है। बाल ठाकरे के साथ ही अब शिवसेना के अस्त होने की चर्चा चल पड़ी है। इसका अंदाजा उद्धव ठाकरे को हो गया था। मुंबई में आयोजित म्युनिसिपल कापरेरेशन के चुनाव में उन्होंने कहा था कि अब हमारी पार्टी का मुख्य मुद्दा भावनाएं जगाने वाले नहीं होंगे, अब हम विकास की बात करेंगे। इस समय उद्धव का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। राज ठाकरे पहले ही अपनी पार्टी बना चुके हैं। इस परिस्थितियों में अब शिवसेना की कमान किसके हाथों में सौंपी जाए, यह आज का यक्ष प्रश्न है। राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने प्रांतवाद और मुस्लिम आतंकवाद का मुद्दा उठाकर शिवसेना का ही विकल्प बनने का प्रयास किया, किंतु उसे कोई सफलता नहीं मिली। शिवसेना में पार्टी के भीतर किसी प्रकार के चुनाव की प्रथा नहीं है। इस कारण पार्टी के कर्मठ नेता हाशिए पर चले गए हैं। छगन भुजबल, संजय निरुपम, नारायण राणो जैसे लोग इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। भाजपा से भी पार्टी के संबंध अब उतने उष्मावान नहीं रहे। आपीआई जैसी पार्टी के साथ समझौता कर शिवसेना ने दलितों का दिल जीतने की एक कोशिश की है। पर बाल ठाकरे के नहीं होने के बाद अब यह समझौता रंग लाएगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता। इन हालात में यही कहा जा सकता है कि बाला साहब ठाकरे के न रहने पर पार्टी को मजबूती से थामकर रखने का माद्दा अब किसी में नहीं है। इतने अधिक विरोधाभासों के बाद भी बाल ठाकरे के व्यक्तित्व मे कुछ तो ऐसा था, जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग रखता था। अपने बयान से न फिरने वाले बाल ठाकरे अपनी वाणी के बल पर लोगों के दिलों पर राज करते रहे। जाते-जाते वे यह भी बता गए कि लोग उनसे भले ही डरते भी हों, पर उनकी अंत्येष्टि में शामिल होकर लोग स्वयं को गोरवान्तित समझते रहे। उमड़ते जनसैलाब में सभी की आंखें नम थी, पर किसी चेहरे पर आक्रोश नहीं था, यह थी बाल ठाकरे की उपलब्धि!
  डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

कसाब के बाद कई सवाल



आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-23&pageno=9#id=111755566932481274_49_2012-11-23
 कसाब के बाद कई सवाल
महेश परिमल
 आतंकवादी अजमल कसाब को आखिर फांसी दे दी गई, लेकिन इससे यह समझना भूल होगी कि आतंकवाद खत्म हो गया। कसाब खत्म हुआ है, आतंकवाद नहीं। अभी अफजल गुरु जिंदा है। इसके अलावा ऐसे कई आतंकवादी जिंदा हैं, जो या तो जेल में हैं या फिर अपने घर में ही जयचंद बनकर रह रहे हैं। जो जेल में हैं, उनका अंजाम तय है, पर जो घर के भीतर हैं, ऐसे लोग अधिक खतरनाक हैं। हमारे न्यायतंत्र की प्रक्रिया को देखकर ऐसा नहीं लगता कि कसाब को फांसी के बाद आतंकवादी हमारी न्याय व्यवस्था से डरेंगे। अब आतंकवादी यह अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि भारत में किसी भी प्रकार की आतंकी कार्रवाई की भी जाए तो उसका फैसला देर से होता है और उस पर अमल होने में तो और भी देर होती है। कसाब जब तक जिंदा था, तो पाकिस्तानी राजनीति का प्यादा था, लेकिन मरने के बाद वह भारतीय राजनीति का प्यादा बन गया है। संसद का शीतकालीन सत्र, गुजरात का विधासभा चुनाव, एफडीआई पर विपक्ष का हावी होना, इस बात का परिचायक है कि आखिर सरकार को यही करना था, तो चार साल तक इंतजार क्यों किया? क्या यही जल्दबाजी अफजल गुरु के लिए नहीं दर्शाई जा सकती थी? कसाब तो सर पर कफन बांधकर मरने के लिए ही आया था, उसे तो मरना ही था। पर उसे जिंदा रखने के लिए जो 30 करोड़ रुपये खर्च हुए, उसका क्या? काफी लोग जानते होंगे कि जेल में बंद आतंकवादियों पर हमारे देश का कितना धन बर्बाद हो रहा है। 26/11 के दौरान जो आतंकवादी हमारे देश में घुस आए थे, कसाब को छोड़कर सभी मारे गए थे। इन आतंकवादी की लाशें कई महीनों तक सुरक्षित रखी गई थीं, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च हो हुए। कसाब के इलाज पर भी लाखों रुपये खर्च हुए। कहा तो यह भी जाता है कि कसाब की सुरक्षा और उसके खाने-पीने के इंतजाम में जितना धन खर्च हुआ है, उतना तो 26/11 के दौरान शहीद हुए लोगों को मुआवजे के रूप में भी नहीं मिला है। क्या यह शर्म की बात नहीं है कि इस देश में वीरों से अधिक सम्मान तो आतंकवादियों-अपराधियों को मिलता है। आतंकवादियों को दी जाने वाली सुविधा के सामने सीमा पर तैनात हमारे जांबाजों को मिलने वाली सुविधा तो बहुत ही बौनी है। आखिर आतंकवादी हमारे लिए इतने अधिक महत्वपूर्ण क्यों होने लगे? अफजल की बारी कब हमें गर्व होना चाहिए शहीद नानक चंद की विधवा गंगा देवी के जज्बे पर, जिन्होंने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि अफजल गुरु को उन्हें सौंप दिया जाए। अगर सरकार में हिम्मत नहीं है तो वह उसे फांसी दे देगी। गंगा देवी पर हमें इसलिए भी गर्व करना चाहिए कि उन्होंने पति के मरणोपरांत मिलने वाला कीर्ति चक्र भी लौटा दिया। उनका कहना था कि अफजल को फांसी दिए जाने तक वे कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगी। एक शहीद की विधवा को और क्या चाहिए। लोग न्याय की गुहार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिलता। पर एक शहीद की विधवा यदि प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार करे तो क्या उसे भी इस देश में न्याय नहीं मिलेगा? वर्ग भेद की राजनीति में उलझी देश की गठबंधन सरकार से किसी प्रकार की उम्मीद करना ही बेकार है। शहीद की विधवाओं की गुहार संसद तक पहुंचते-पहुंचते अनसुनी रह जाती है। जहां वोट की राजनीति होती हो, वहां कुछ बेहतर हो भी नहीं सकता। शहीद नानक चंद की विधवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है, मनमोहन सिंह जी अगर आपकी सरकार में अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत नहीं है या आपको जल्लाद नहीं मिल रहे तो यह काम आप मुझे सौंप दें। मैं शहीद की पत्नी हूं। देश के खिलाफ आंख उठाने वाले को क्या सजा दी जाए, मुझे और मेरे परिवार को मालूम है। मैं संसद के 13 नंबर गेट पर जहां मेरे पति शहीद हुए थे, वहीं अफजल को फांसी दूंगी। राठधाना गांव में अपने घर पर शहीद पति की प्रतिमा के सामने बैठी गंगा देवी ने कहा कि हमले के 11 साल बाद भी अफजल और उसके सभी साथी सुरक्षित हैं। देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है? देश के हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि आखिर देश के दुश्मनों को देश के भीतर ही कौन शह दे रहा है? क्यों पनप रहा है आतंकवाद? हमारे ही आंगन में कौन बो रहा है आतंकवाद के बीज? देश के दुश्मनों से सीमा पर लड़ना आसान है, लेकिन देश के भीतर ही छिपे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल है। आतंकी और भी वर्ष 2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की फांसी की सजा पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगने के सात साल बाद भी अमल नहीं हो पाया है, जबकि 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा पर अब तक अदालती कार्रवाई जारी है। वर्ष 2005 में छह अन्य आरोपियों समेत आरिफ को दोषी मानते हुए ट्रॉयल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। 2007 में हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी करते हुए आरिफ के खिलाफ फांसी की सजा बरकरार रखी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है। इसी तरह 2002 में गुजरात स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हमला कर 31 लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लश्कर आतंकियों को फांसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वर्ष 2005 में दीपावली के ठीक दो दिन पहले यानी धनतेरस पर दिल्ली के बाजारों में, 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर और उसी साल मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोट करने वाले आतंकियों को सजा मिलने में अभी सालों लग सकते हैं, जबकि इन आतंकी हमलों में 300 से अधिक लोग मारे गए थे। खुफिया विभाग (आइबी) के पूर्व प्रमुख और विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक अजीत डोवाल का मानना है कि आतंकवाद से सबसे अधिक पीडि़त होने के बावजूद भारत आतंकियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने में विफल रहा है। अजमल कसाब को जब फांसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई राजनीतिक शक्तियां अफजल गुरु को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं? अब तो यह भी साबित हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदेखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई राजनीतिक शक्तियां अफजल गुरु को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला भी तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसे समझते हुए उधर अफजल गुरु यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फांसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसका एक पैंतरा है। लेकिन इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने में केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी उंगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों हैं इतने लाचार हमारे राष्ट्रपति! 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
 




गुरुवार, 22 नवंबर 2012

उधर सरबजीत की फांसी तय, इधर अफजल को फांसी कब?

डॉ. महेश परिमल
अजमल कसाब को आखिर फांसी दे दी गई। इससे यह समझना भूल होगी कि आतंकवाद ही खत्म हो गया। कसाब खत्म हुआ है आतंकवाद नहीं। अभी अफजल गुरु जिंदा है। इसके अलावा ऐसे कई आतंकवादी भी जिंदा हैं, जो या तो जेल में हैं या फिर अपने घर में ही जयचंद बनकर रह रहे हैं। जो जेल में हैं, उनका अंजाम तय है, पर जो घर के भीतर हैं, ऐसे लोग अधिक खतरनाक हैं। इसे छद्म आतंकवाद की संज्ञा दी जा सकती है। बहुत ही खतरनाक होता है यह छद्म आतंकवाद। इसमें आतंकवादी अलग से दिखाई नहीं देता, वह हमारे ही बीच हमारी तरह रहकर आतंकवादी कार्य करता है। कसाब की फांसी के बाद यह तय है कि पाकिस्तान खामोश नहीं बैठेगा। उसके पास अभी सरबजीत की याचिका है, जिसे वह खारिज कर फांसी की सजा मुकर्रर कर सकता है। कसाब की प्रतिक्रिया में सरबजीत की फांसी तय है। पाकिस्तानी प्रेजिडेंट आसिफ अली जरदारी के कार्यालय की मानें तो कसाब की मौत का असर सरबजीत पर होने वाले फैसले पर पड़ सकता है। सूत्रों का मानना है कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान सरकार कसाब की मौत का बदला सरबजीत की क्षमा याचिका को खारिज कर के लेगी। आज सहायक पुलिस इंस्पेक्टर शहीद बाला साहब भोसले की आत्मा को शांति मिली होगी। उसके बेटे ने कहा है कि मुझे लगता है कि हमारी दिवाली आज शुरू हुई। मेरी मां अब चैन की नींद सो पाएंगी। जिसने मेरे बाबा को मुझसे छिन लिया, उसे सरेआम फांसी देनी चाहिए थी।
 कसाब को फांसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह उसे दी जानी थी। वह एक दरिंदा था, जो लोगों को तड़पता और मरता देखकर खुश होता था। वह एहसानफरामोश था, जो भला करता है, उसी की हत्या करने में भी देर नहीं करता था। सवाल यह उठता है कि आखिर हम आतंकवादियों को क्यों पालते हैं? अफजल गुरु ही नहीं, ऐसे बीस आतंकी हमारे देश में हैं, जिनका गुनाह तो सिद्ध हो चुका है, सजा भी हो चुकी है, पर हम उन्हें सजा नहीं दे पा रहे हैं। फांसी से भी बड़ी कोई सजा हो सकती है क्या? आज हर तरफ 26/11 के आतंकी आमिर अजमल कसाब को दी दी गई फांसी की चर्चा है। इस सजा से कई सवाल और खड़े हो गए हैं। आज देश का बच्चा-बच्चा यही चाहता है कि फांसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह कसाब को मिलनी चाहिए थी। क्योंकि कसाब के लिए फांसी तो बहुत ही छोटी सजा है। उसने जो अपराध किया है, वह दरिंदगी की सीमाओं को पार करता है। करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का यदि सम्मान किया जाए, तो कसाब को सजा देने के लिए जितना समय लगा, उससे भी कम समय में उसे फांसी हो जानी चाहिए थी। कसाब को फांसी की सजा से यह संदेश जाना चाहिए कि अब भविष्य में कोई भी आतंकी अपने काम को अंजाम देने के पहले सौ बार सोचे।
कसाब को लेकर जो सबसे अधिक चिंता की बात है, वह यह कि कसाब को फांसी देने में आखिर इतना वक्त कैसे लग गया? क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि देश के दुश्मन को भी सजा देने में इतना समय लगाया जाए। सच्चा न्याय तो वही होता है, जो समय पर मिले। देर से मिलने वाले न्याय का कोई महत्व नहीं होता।  संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाने में बरसों बीत गए, इसके बाद भी वह जिंदा है। उसे फांसी पर लटकाने में केंद्र सरकार सांसत में है। वह इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। जब यह बात जोर-शोर से उठी कि अफजल को फांसी क्यों नहीं दी जा रही है, तो सरकार का कहना था कि अफजल गुरु के आगे फांसी की सजा पाने वाले करीब 20 लोग और भी हैं। जब अफजल की बारी आएगी, तो उसे फांसी दे दी जाएगी।
कसाब को फांसी की सजा होना यह अंत नहीं है। फिर कोई आतंकवादी ऐसी हिम्मत न कर पाए, यह कोशिश होनी चाहिए। ऐसे हमले निष्फल हो जाएं, इसकी मंशा भी सजा में होनी चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब अगर पड़ोसी देश से आतंकवादी हमारे देश में घुसते हैं, तो उन्हें इस बात का डर होना चाहिए कि यदि यहां पकड़े गए, तो वह जिंदगी मौत से भी बदतर होगी। लेकिन हमारे न्यायतंत्र की प्रRिया को देखकर ऐसा नहीं लगता कि आतंकवादी हमारी न्याय व्यवस्था से डरेंगे। अब आतंकवादी यह अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि भारत में किसी भी प्रकार की आतंकी कार्रवाई की भी जाए, तो उसका फैसला देर से होता है और उस पर अमल होने में तो और भी देर होती है। तब तक जिंदगी के पूरे मजे ले लो।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इन आतंकवादियों पर हमारे देश का कितना धन बरबाद हो रहा है। 26/11 के दौरान जो आतंकवादी हमारे देश में घुस आए थे, कसाब को छोड़कर सभी मारे गए थे। इन आतंकवादी की लाशें कई महीनों तक सुरक्षित रखी गई थीं, जिस पर  करोड़ों रुपए खर्च हो हुए। कसाब के इलाज पर भी लाखों रुपए खर्च हुए। इन लोगों पर देश का जितना धन खर्च हुआ है, उतना तो 26/11 के दौरान मारे गए लोगों को मुआवजे के रूप में नहीं मिला है।  हमे शर्म आनी चाहिए कि इस देश में वीरों से अधिक सम्मान तो आतंकवादियों को मिलता है। आतंकवादियों को दी जाने वाली सुविधा के सामने सीमा पर तैनात हमारे जांबाजों को मिलने वाली सुविधा तो बहुत ही बौनी है। आखिर आतंकवादियों हमारे लिए इतने अधिक महत्वपूर्ण क्यों होने लगे? कसाब को मौत से पहले मिली वाली तमाम सुख-सुविधाओं को देखते हुए आम युवाओं में यही संदेश जाएगा कि देश का सैनिक बनने से तो बेहतर है, आतंकवादी बनना। मौत कितनी भी भयानक हो, पर जिंदगी तो बहुत ही खुशगवार होगी। युवाओं की इसी तरह की सोच के ही कारण आज देश के युवा भटक रहे हैं। देश के लिए सबसे शर्म की बात तो तब सामने आई, जब सेना में भर्ती के लिए सरकार ने विज्ञापन प्रकाशित किए। यह विज्ञापन नहीं, देश के युवाओं में जमे हुए रक्त का हस्ताक्षर है। आज कोई युवा सेना में जाना ही नहीं चाहता। यह देश का दुर्भाग्य है। एक सैनिक जितना अपनी पूरी जिंदगी में कमाता है, उससे कई गुना तो एक नेता एक महीने में ही कमा लेता है।
शहीद की विधवा के जज्बे को सलाम!
हमें गर्व होना चाहिए शहीद नानक चंद की विधवा गंगा देवी के जज्बे पर। जिसने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि अफजल गुरु को उन्हें सौंप दे। ताकि सरकार में यदि हिम्मत नहीं है, तो वह उसे फांसी दे देगी। गंगा देवी पर हमें इसलिए भी गर्व करना चाहिए कि उसने पति के मरणोपरांत मिलने वाला कीर्ति चR भी लौटा दिया। उनका कहना था कि अफजल को फांसी दिए जाने तक वे कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगी। एक शहीद की विधवा को और क्या चाहिए। लोग न्याय की गुहार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिलता। पर एक शहीद की विधवा यदि प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार करे, तो क्या उसे भी इस देश में न्याय नहीं मिलेगा? वर्ग भेद की राजनीति में उलझी देश की गठबंधन सरकार से किसी प्रकार की उम्मीद करना ही बेकार है। शहीद की विधवाओं की गुहार संसद तक पहुंचते-पहुंचते अनसुनी रह जाती है। जहां वोट की राजनीति होती हो, वहां कुछ बेहतर हो भी नहीं सकता।शहीद की विधवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है ‘मनमोहन सिंह जी अगर आपकी सरकार में अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत नहीं है, यदि आपको जल्लाद नहीं मिल रहे तो आप यह काम मुझे सौंप दें। मैं शहीद की पत्नी हूं, देश के खिलाफ आंख उठाने वाले को क्या सजा दी जाए, मुझे और मेरे परिवार को मालूम है।’ ‘मैं संसद के 13 नंबर गेट पर जहां मेरे पति शहीद हुए थे वहीं अफजल को फांसी दूंगी।’ राठधाना गांव में अपने घर पर शहीद पति की प्रतिमा के सामने बैठी गंगा देवी ने कहा कि हमले के 11 साल बाद भी अफजल और उसके सभी साथी सुरक्षित हैं। देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है?’ देश के हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि आखिर देश के दुश्मनों को देश के भीतर ही कौन शह दे रहा हे? क्यों पनप रहा है आतंकवाद? हमारे ही आंगन में कौन बो रहा है आतंकवाद की फसल? देश के दुश्मनों से सीमा पर लड़ना आसान है, पर देश के भीतर ही छिपे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल है।
अफजल की बारी कब?
2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की फांसी की सजा पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगने के 7 साल बाद भी अमल नहीं हो पाया है। जबकि 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले लश्कर-ए-तोयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा पर अब तक अदालती कार्रवाई जारी है। 2005 में छह अन्य आरोपियों समेत आरिफ को दोषी मानते हुए ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। 2007 में हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी करते हुए आरिफ के खिलाफ फांसी की सजा बरकरार रखी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है। इसी तरह 2002 में गुजरात स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हमला कर 31 लोगों को मौत का घाट उतारने वाले लश्कर आतंकियों को फांसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 2005 में दीवाली के ठीक पहले धनतेरस पर दिल्ली के बाजारों, 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोट करने वाले आतंकियों को सजा मिलने में अभी सालों लग सकते हैं। जबकि इन तीन आतंकी हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए थे। खुफिया विभाग (आईबी) के पूर्व प्रमुख व विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक एके डोभाल का मानना है कि आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित होने के बावजूद भारत आतंकियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने में विफल रहा है।अजमल कसाब को जब फांसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई शक्तियां अफजल को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं? अब तो यह भी सिद्ध हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदेखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई शक्तियां अफजल को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसको समझते हुए उधर अफजल यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फांसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसकी एक चाल हो। पर इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने मंे केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी ऊंगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों है इतने  लाचार हमारे राष्ट्रपति?
डॉ. महेश परिमल

रविवार, 18 नवंबर 2012

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

किसानों की परवाह किसे है


किसानों की परवाह किसे है
डॉ. महेश परिमल 
महाराष्ट्र में किसानों का आंदोलन उग्र होता जा रहा है। पुलिस से टकराव में दो किसानों की मौत भी हो चुकी है। विवाद गन्ने के समर्थन मूल्य पर है। किसानों की मांग है कि यह 3000 रुपये प्रति क्विंटल हो, लेकिन कहा तो यह जा रहा है कि शरद पवार की शक्कर लॉबी ऐसा नहीं होने दे रही है। पुणे, सोलापुर और अहमदनगर के साथ-साथ पूरे प्रदेश में किसान सड़कों पर उतर आए हैं। यह अकेले महाराष्ट्र की बात नहीं है। ऐसे हालात पूरे देश में बन रहे हैं। उत्पादों का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान आंदोलन को बाध्य हैं। किसान अपनी लागत भी नहींनिकाल पाते और मुनाफाखोर भारी मुनाफा कमाते हैं। सरकारी नीतियों के कारण त्योहारी मौसम में बाजार में गेहूं का मूल्य 1650-1800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंचना इसका ताजा उदाहरण है। एक तरफ तो सरकारी गोदामों में 1285 रुपये कीमत से खरीदा हुआ लाखों टन गेहूं पड़ा है और दूसरी तरफ आम आदमी की रोटी महंगी हो गई है। कहीं खाद और बीज ने समस्याएं खड़ी कर रखी हैं तो कहीं जमीन अधिग्रहण के नाम पर लूट है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा सहित दिल्ली से सटे राज्यों में तो यह गंभीर संकट बन चुका है। उद्योग के नाम पर अधिगृहीत जमीनों पर ताबड़तोड़ इमारतें बन रही हैं। इन सबके बीच देश में हर महीने औसतन 70 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 2008-2011 के बीच 3340 किसानों ने अपनी जान दी। इनमें सबसे अधिक 1862 किसान शरद पवार के गृह राज्य महाराष्ट्र के थे। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और पंजाब में भी कर्ज से तंग किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। अपने उत्पादों का उचित मूल्य हासिल करके ही किसान इस संकट से उबर सकते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों ने किसानों को चौतरफा घेर लिया है। इसके लिए सार्थक पहल की जरूरत है। उपेक्षापूर्ण नीति वर्तमान केंद्र सरकार पर भारी पड़ सकती है। सरकार उद्योगपतियों को जिस तरह से सुविधाएं दे रही है, उससे यही लगता है कि इस देश को अनाज की नहीं, उद्योगों की ज्यादा जरूरत है। सरकार की अनदेखी के कारण ही आज तक कोई स्पष्ट कृषि नीति नहीं बन पाई। यदि बनाई भी गई है, तो उस पर सख्ती से अमल नहीं हो पा रहा है। किसानों की मौत सुर्खियां तो बनती हैं, लेकिन आज तक किसी उद्योगपति ने कर्ज में डूबकर आत्महत्या की हो, ऐसी जानकारी नहीं मिली है। उद्योगों के लिए सरकार ने लाल जाजम बिछा रखे हैं, पर किसानों के लिए समय पर न तो खाद की व्यवस्था हो पाती है और न बीज की। किसान हर हाल में कष्ट झेलता रहता है। इस सरकार को उद्योगपतियों की सरकार कहना गलत नहीं होगा। आज देश में खुद को किसान नेता कहने वाले ही किसानों के शोषण में आगे हैं। इसे किसान नेताओं की विफलता ही कहा जाएगा कि वे आज तक सरकार पर स्पष्ट कृषि नीति बनाने के लिए दबाव नहीं डाल पाए। ऐसे लोग खुद को किसानों का नेता बताकर किसानों को ही धोखा दे रहे हैं। पिछले साल जब हजारों टन अनाज सड़ गया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लताड़ लगाई थी अगर अनाज को सुरक्षित नहीं रख सकते, तो उसे गरीबों में मुफ्त में बांट दो। कोर्ट के इस रवैये से केंद्र सरकार इतनी अधिक नाखुश हुई कि उसने कोर्ट से ही कह दिया कि वह अपने सुझाव अपने तक ही सीमित रखे। आज पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कमोबेश यही हालात हैं कि पिछले साल का ही अनाज इतना अधिक है कि इस साल के अनाज को रखने की जगह ही नहीं बची। अनाज का विपुल उत्पादन होने के बाद भी न तो किसानों को अनाज का सही दाम मिल रहा है और न ही नागरिकों को सस्ता अनाज मिल रहा है। क्या हमारे नेता अधिकारी इतने भी दूरंदेशी नहीं कि अनाज सड़े उसके पहले ही वह सही हाथों तक पहुंच जाए। हमारे पास अनाज का विपुल भंडार है, उसके बाद भी देश में भुखमरी है। तेल कंपनियों को होने वाले घाटे की चिंता सरकार को सबसे अधिक है। उनकी चिंता में शामिल होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ा देती है, पर कृषि प्रधान देश में सरकार किसानों के लिए कभी चिंतित होती है, ऐसा जान नहीं पड़ता। जब देश में गोदाम नहीं हैं, तो फिर गोदाम बनाना ही एकमात्र विकल्प है। शर्म आती है कि हम उस देश में रहते हैं, जहां अनाज तो खूब पैदा होता है, पर लोग भूख से भी तड़पते हुए अपनी जान दे देते हैं। यह सब सरकारी अव्यवस्था के कारण है। आखिर गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। करते रहें किसान आत्महत्या, इन मजबूरियों के आगे किसानों की जान बौनी है। बस तेल कंपनियों को कभी घाटा नहीं होना चाहिए। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शनिवार, 10 नवंबर 2012

यह भाजपा की सबसे बड़ी भूल है

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-10&pageno=9#id=111754571932600790_49_2012-11-10http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-10&pageno=9#id=111754571932600790_49_2012-11-10


 यह भाजपा की सबसे बड़ी भूल है

डॉ. महेश परिमल
 भाजपा इस समय गहरे संकट से गुजर रही है। जिन नीतिन गडकरी को वह पार्टी के लिए भाग्यशाली मान रही थी, अब वही गडकरी पार्टी के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव सामने है। ऐसे में गडकरी को बचाकर भाजपा भारी भूल कर रही है। यह भूल उसे महंगी पड़ेगी। संघ के उर्वर मस्तिष्क को भी शायद लकवा मार गया है, जो गडकरी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अगर संघ और भाजपा गडकरी को बचाते हैं, तो फिर कांग्रेस भी रॉबर्ट वाड्रा और सलमान खुर्शीद को बचाकर कोई गलत नहीं कर रही है। दोनों में फिर फर्क ही क्या रहा। इसका असर चुनाव में भी दिखाई देगा। अपनी कंपनी के चलते पहले से ही विवाद में उलझे गडकरी ने दाऊद की तुलना स्वामी विवेकानंद से करते वक्त जरा भी नहीं सोचा कि लोगों पर इसका क्या असर होगा? यह बयान सामने आते ही लोगों को लग गया था कि अब गडकरी के दिन लद गए। उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा। खुद गडकरी भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो गए थे, पर ऐन मौके पर संघ ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। पार्टी के कुछ लोगों को अच्छा लगा होगा, पर अधिकांश नाराज हैं। राम जेठमलानी और महेश जेठमलानी तो खुलकर सामने आ गए हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के विवादास्पद बयान देने वाले गडकरी अकेले ही हैं। इंदिरा गांधी को इंदिरा इज इंडिया कहने वाले भी इसी देश में हैं, लेकिन दाऊद जैसे मोस्ट वांटेड के साथ विवेकानंद की तुलना करके गडकरी ने अपना ही आईक्यू प्रजा के सामने प्रस्तुत किया है। पार्टी के नेता तो मौन हो गए हैं, पर भीतर ही भीतर कुछ पक भी रहा है। संदेश जा रहा है कि गडकरी का बचाव कर पार्टी ने गलत किया है। वैसे भी कई नेता गडकरी को दूसरा मौका नहीं देना चाहते थे। अनुशासन के नाम पर भाजपा में अनुशासनहीनता चल रही है। साधारण नेता पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ कुछ बोल नहीं पा रहे हैं। संघ शायद समझ रहा है कि लोग हमेशा की तरह गडकरी के इस बयान को भी भूल जाएंगे। इसका असर गुजरात के चुनाव में भी दिखाई देगा। यहां भाजपा विवेकानंद को अपना आदर्श मानकर चुनाव प्रचार कर रही है। चुनावी पोस्टरों में विवेकानंद दिखाई दे रहे हैं, पर अब भाजपा के चुनावी पोस्टर से गडकरी को हटाया जा रहा है। आखिर गडकरी कब तक भाजपा पर बोझ बने रहेंगे?
 (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

भारतीय बाजारों में कहां है महंगाई

डॉ. महेश परिमल
अब तक पूरे देश में महँगाई का बोलबाला था। इस समय जब हम बाजार की ओर देखते हैं, तो लगता है कि इस देश में महंगाई नाम की कोई चीज है ही नहीं। आज बाजार अटे पड़े हैं, विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से। दिवाली को लेकर लोगों में उत्साह है। चीनी उत्पादों से बाजार पूरी तरह से सुसज्जित हो गए हैं। जैसे जैसे लोगों को बोनस मिल रहा है, बाजारों में भीड़ बढ़ती जा रही है। यह समझ से परे है कि लोग आखिर समय पर ही खरीददारी क्यों करते हैं? पुष्य नक्षत्र में सोने की जोरदार खरीदी हुई। अब धनतेरस को होगी। सभी क्षेत्रों के बाजार गुलजार हैं। सेल और डिस्काउंट के माध्यम से प्रलोभनों के स्लोगनों से मीडिया भी गुलजार है। इस समय कोई विदेशी यदि भारत आ जाए, तो वह देश को अन्य देशों की तुलना में बहुत ही ऐश्वर्यशाली मानेगा। इस समय देश में गरीबी नाम की किसी चीज के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
इस समय बाजार में इलेक्ट्रानिक्स चीजों की खरीदी जोरों पर है। इलेक्ट्रानिक्स गेजेट का बाजार खूब जोरों पर है। इस समय घर में नई चीजों को लाकर उसे घर में सजाया जाता है। इसमें सेल और डिस्काउंट की खास भूमिका है। यह परंपरा हमें केवल दिवाली ही नहीं, बल्कि अन्य त्योहारों में भी नजर आती है। इन दिनों दुकानों पर सेल या डिस्काउंट का जो बोर्ड दिखाई दे रहा है, वह ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी जरुरतों को बढ़ाने वाला है। ग्राहक दुकान की सीढ़ियां ही चढ़ पाता है, बाकी काम तो सेल्समेन कर देते हैं। इनसे प्रभावित होकर ग्राहक उन चीजों को भी खरीद लेता है, जिसकी उसे कतई आवश्यकता नहीं होती। इस समय तो साधारण फेरी वाले के भी वारे-न्यारे हो जाते हैं। ग्राहक जो खरीदना चाहता है, उसे व्यापारी बेचना चाहता है। दोनों के बीच ये सेल या डिस्काउंट का बोर्ड सेतु का काम करता है। सभी दुकानों या फिर मॉल में इस तरह के आकर्षित करने वाले बोर्ड मिल ही जाएंगे।
चीनी उत्पाद से बाजार भर गए हैं। भारत की आवश्यकता को देखते हुए जिस तरह से चीन अपने उत्पादों को हमारे देश में खपा रहा है,उससे भारतीय बाजार निश्चित रूप से प्रभावित हो रहा है। चीन से भारत आकर में उसके उत्पाद भारतीय उत्पाद से सस्ते क्यों हैं, यह शोध का विषय हो सकता है। भारत के सभी त्योहारों पर चीनी उत्पाद दिखाई दे ही जाते हैं। फिर चाहे वह पतंग हो, धागे हों, इलेक्ट्रानिक्स आइटम हो,सजावटी सामान हो, सभी उत्पादों पर उसकी पकड़ मजबूत दिखाई देती है। इस समय वे सड़कें भी जनसैलाब से पूरम्पूर दिखाई देती हैं, जहां पहले इक्का-दुक्का लोग आते थे। पिछने दो-तीन दिनों से जिस बाजारों में जनसैलाब उमड़ रहा है, उससे यही लगता है कि लोगों के पास धन की कोई कमी नहीं है। बेकार का रोना रोते हैं लोग, महंगाई के नाम पर। लोगों का मानना यह है कि दिवाली के समय व्यापारी अपना स्टॉक खत्म करना चाहता है, इसलिए सेल या डिस्काउंट के नाम पर अपनी चीजें बेच रहा है। वास्तव में यहां व्यापारियों का सिंडीकेट काम कर रहा है। इसे ग्राहक नहीं समझता। तैयार कपड़े, मिठाई, बरतन, चप्पल-जूते आदि सामानों से लोगों को लुभाने का सिलसिला जारी है। कंप्यूटर या फिर ई कामर्स साइट पर भी इस समय सेल का नजारा देखने को मिल रहा है। अब तो कई कंपनियों बिना क्रेडिट कार्ड पर अपना उत्पाद बेचने को तैयार हैं। ऑर्डर देकर आप घर पहुंचे, तब तक माल आपके घर पहुंच चुका होता है। इटरनेट के माध्यम से लोग अपने परिचितों को गिफ्ट भेजने लगे हैं। फिर वह वस्तु शहर की कोई प्रसिद्ध मिठाई हो, या फिर अपने हाथों से बनाई गई कोई बानगी। इंटरनेट के माध्यम से वह दूसरे देशों तक पहुंचने लगी है। इसमें एक बात ध्यान देने की है, वह है इनकी सर्विस। हम सबने महसूस किया होगा कि आजकल उत्पाद से महत्वपूर्ण है, उसकी सर्विस। लोग सर्विस से ही अपनी पहचान कायम करने लगे हैं।
दिवाली के त्योहार के पहले यह माना जा रहा था कि इस बार इस त्योहार पर महंगाई का असर दिखाई देगा। व्यापारी भी चिंतित थे। पर पिछले दो-तीन दिनों की जबर्दस्त खरीदी ने इस धारणा को झुठला दिया। अभी दिवाली को कुछ दिन शेष हैं, पर इस शनिवार-रविवार को बाजारों में पाँव रखने की जगह भी नहीं मिलेगी, यह तय है। लोग अपने लिए अपनी संतानों के लिए अपने परिजनों के लिए कुछ न कुछ खरीदना ही चाहते हैं।
त्योहारी सेंटीमेंट का फायदा उठाने के लिए अधिकतर बैंक Rेडिट कार्ड पर कैश-बैक ऑफर करते हैं। इस तरह के ऑफर कुछ खास ब्रांड, डिपार्टमेंट स्टोर, अपैरल या रेस्तरां के साथ ही ऑफर किए जाते हैं। बैंक/Rेडिट कार्ड कंपनियां अपनी वेबसाइट पर विस्तृत सूची जारी करती हैं। ऐसे में, आप अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी मचेर्ंडाइज पर Rेडिट कार्ड इस्तेमाल कर कैश-बैक ऑफर का मजा नहीं ले सकते हैं। फिर, इस ऑफर का आनंद उठाने के लिए आपको एक निश्चित सीमा तक खर्च करना पड़ता है। यह सीमा बैंक दर बैंक अलग-अलग हो सकती है। हालांकि, यह 1,000 रुपए से लेकर 3,000 रुपए के बीच हो सकती है। बैंक यह कह सकता है कि आपको सभी खचोर्ं पर 10 फीसदी का कैश-बैक मिलेगा, लेकिन इसकी अधिकतम सीमा 1,000 रुपए होगी। तब आप 30,000 रुपए खर्च करके भी सिर्फ 1,000 रुपए का कैश-बैक पाएंगे, न कि 3,000 रुपए। सभी बैंकों की कैश बैक पर सब-लिमिट होती है। ज्यादातर बैंकों के Rेडिट कार्ड पर कैश बैक की मंथली लिमिट होती है। मिसाल के तौर पर कोई बैंक प्रति कार्ड पर कैश बैक की सुविधा 2,500 रुपए तक तय कर सकता है। दूसरा बैंक, हर सेगमेंट के खर्च में 500 रुपए की सीमा तय कर सकता है। ऐसे में कार्ड लेने से पहले इसका पता लगाना जरूरी है। आपको यह भी चेक करना पड़ेगा कि कैश बैक के तहत बैंक डीटीएच या ब्रॉडबैंड सविर्सेज का बिल ऑफर करते हैं या नहीं। ये सेवाएं नई हैं, इसलिए मुमकिन है कि बैंकों ने इसे यूटिलिटी सविर्सेज के दायरे में न रखा हो।
दिवाली का त्योहार है ही खर्च करने के लिए। कहीं से कोई चीज उधार मिल रही है, तो जल्दबाजी कदापि न करें। आप यह समझ लें कि अभी देने वाला आप पर मेहरबान है, पर हमेशा नहीं रहेगा। उसे चीज बेचनी है, इसलिए वह नरम है, जब उसे चीज के दाम लेने होंगे, तो वह कठोर हो जाएगा। तब आप कहेंगे कि चीज देते समय जितने नरम थे, अब उतने नरम क्यों नहीं हैं? पर यह बात वह नहीं समझेगा, वह कठोरता से ही अपना धन लेना चाहेगा। इसलिए अपनी जरुरत और अपनी सीमा को ध्यान में रखकर ही खरीददारी करें। चीज ली है,तो उसका भुगतान करना ही होगा। कोई भी अपनी चीज मुफ्त में देने के लिए नहीं बैठा है। लेते समय हमें तकलीफ नहीं होती, पर देर से उसका भुगतान करने में बहुत ही पीड़ा होती है। इसलिए इसे समझकर ही अपनी समझदारी का परिचय चीजें खरीदते समय दें।
    डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 7 नवंबर 2012

ननद-भाभी की पदयात्रा से कांग्रेस की नींद हराम

डॉ. महेश परिमल
दो महिलाएं, रिश्ते में दोनों हैं ननद-भाभी। जब ये दोनों अपने ऐश्वर्यशाली जीवन को छोड़कर पदयात्रा पर निकलती हैं, तो जनसैलाब उमड़ पड़ता है, इन्हें देखने के लिए। इनमें से एक हैं, जगन रेड्डी की पत्नी और दूसरी महिला हैं जगन की बहन। जगन रेड्डी इस समय जेल में हैं। पति और भाई की छवि को चमकदार बनाने के लिए इन महिलाओं द्वारा की जा रही पदयात्रा कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाली है। पद यात्रा ने मिलने वाले जन समर्थन ने कांग्रेस की नींद उड़ा दी है। वैसे भी कर्नाटक और आंध्र में कांग्रेस की हालत पतली है। वह अपनी छवि को साफ बनाने के लिए प्रयास करती रहती है। हाल में एस.एम. कृष्णा को विदेश मंत्री पद से हटाकर उन्हें पार्टी के लिए काम करने का आदेश दिया गया है। इससे कांग्रेस की स्थिति में कहां तक सुधार आ पाएगा, कहना मुश्किल है।
आंध्र प्रदेश के चेहरों को नए मंत्रिमंडल में लेकर और पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को कर्नाटक में पार्टी को मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस ने एक कोशिश की है। आंध्र में जगन रेड्डी की बगावत ने कांग्रेस को हिलाकर रख दिया है। उधर कर्नाटक में येद्दियुरप्पा की बगावत में कांग्रेस अपना हित खोज रही है। आंध्र में जगन के परिवार वालों ने ही कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं। जिस तरह से कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश को महत्व दिया है, उससे यही लगता है कि आंध्र में डूबती नैया को बचाने के लिए कांग्रेस हाथ-पैर मार रही है। कर्नाटक में कांग्रेस बहुत कुछ खो चुकी है। इसीलिए कृष्णा को भेजकर वह उसकी क्षतिपूर्ति करना चाहती है। उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार का कारण कमजोर संगठन माना गया है। इसे स्वयं राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया है। इसीलिए अब वह अपना पूरा जोर कर्नाटक पर लगा रही है, ताकि साख बची रहे। जब से येद्दियुरप्पा ने भाजपा से नाता तोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा की है, तब से कांग्रेस वहाँ अपनी सक्रियता दिखाने लगी है। पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा भी  पुत्र कुमार स्वामी के साथ कांग्रेस को तोड़ने में पूरी ताकत लगा दी है।
एक वह समय भी था, जब राजशेखर रेड्डी मुख्यमंत्री थे, तब कांग्रेस के नेता उनकी इजाजत के बिना पानी भी नहीं पीते थे। रेड्डी की यह पूरी कोशिश होती कि केंद्रीय स्तर पर भी आंध्र के किसी चेहरे को प्राथमिकता न दी जाए। वे मानते थे कि आंध्र में उनसे बड़ा कोई नेता है ही नहीं। इस बार मंत्रिमंडल फेरबदल में जयपाल रेड्डी से पेट्रोलियम मंत्रालय छीन लिया गया। राजशेखर होते, तो ऐसा कदापि न होता। उनकी अनुपस्थिति में जयपाल रेड्डी को कांग्रेस ने फालतू मान लिया है। वैसे जयपाल रेड्डी को शायद दबाव के चलते हटाया गया है। उनकी ईमानदारी शायद कांग्रेस को खटक रही थी। कांग्रेस की इसी नीति के कारण राजशेखर रेड्डी के वफादार कांग्रेस के प्रति कम और जगन रेड्डी के लिए अधिक वफादार माने जा रहे हैं। जगन रेड्डी की बहन शर्मिष्ठा और पत्नी भारती ने इस समय अपने ऐश्वर्यशाली जीवन को छोड़कर पदयात्रा शुरू की है। जिसके पति और भाई जेल में हो, उन्हें देखने के लिए लोग उमड़ रहे हैं। कई बार जनसैलाब को संभालना मुश्किल हो रहा है। जगन के प्रशंसकों की भीड़ ने कांग्रेस की नींद हराम कर दी है। राजशेखर रेड्डी ने भी इसी तरह पदयात्रा कर सत्ता प्राप्त की थी। आज इतिहास दोहराया जा रहा है।
आंध्र की सुलगती समस्या तेलंगाना आंदोलन है। कांग्रेस इससे जितना दूर भागने की कोशिश करती है, यह समस्या और भी विकराल होती जा रही है। हालात यही रहे, तो यहां से कांग्रेस का पत्ता कभी भी कट सकता है। राजशेखर की मौत के बाद ही सत्यम कंप्यूटर घोटाला सामने आया। अरबों रुपए की हेराफेरी इस घोटाले में हुई। अभी दो सप्ताह पहले ही सत्यम के डायरेक्टरों की एफडी सील की गई है। कांग्रेस की कमजोरी को देखते हुए भाजपा ने कर्नाटक से अपनी एंट्री ली। वहां वह सत्ता पर भी काबिज हो गई। भाजपा को भी इससे आश्चर्य हुआ। किंतु येद्दियुरप्पा द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से भाजपा की बड़ी बदनामी हुई। वैसे भाजपा ने पूरी कोशिश की, कि किसी भी तरह से येदि को बचा लिया जाए। पर पार्टी के लिए येदि काफी महंगे साबित हुए। अंतत: उन्हें भाजपा से निकाल दिया गया। अब भाजपा को कर्नाटक में अपना भविष्य साफ नजर नहीं आ रहा है। कृष्णा के आने के बाद हालात बदलेंगे, ऐसा कांग्रेस सोचती है। पर कृष्णा के मन में विदेश मंत्रालय छिन जाने का गम है, लेकिन गांधी परिवार से उनकी नजदीकियों के चलते वे इस गम को भुलाकर पार्टी के लिए बेहतर काम करेंगे, ऐसा माना जा सकता है। मंत्रिमंडल में फेरबदल कर कांग्रेस ने आंध्र और कर्नाटक पर ध्यान केंद्रित किया है। यह एक चुनौतीपूर्ण समय है। 2014 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस चाहती है कि वहां से अधिक से अधिक सीटें मिलें। आंध्र में लोकसभा की 42 और कर्नाटक में 28 सीटें हैं। दोनों मिलाकर 70 सीटें होती हैं। इसमें से कांग्रेस कितना हथिया सकती है, यही देखना है। एक समय ऐसा भी था, जब इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत थी। कांग्रेस ने कृष्णा को आंध्र और कर्नाटक में काम करने के लिए कहकर एक सराहनीय काम किया है। विदेश मंत्री रहने के दौरान उनके कार्य उतने सराहनीय नहीं रहे। परंतु गांधी परिवार के करीबी होने के कारण उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। अब देखना है कि कृष्ण की बांसुरी बजती है या नहीं। बांसुरी के बजने से सीटें अधिक से अधिक मिल जाएं, तो कांग्रेस का भला ही होगा। कृष्णा भी अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे। इसके लिए चुनाव की प्रतीक्षा करनी होगी।
  डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

सेंडी के साए में होंगे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव

डॉ. महेश परिमल
पूरे विश्व की नजरें इस समय अमेरिका पर लगी हैं। वहां राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 6 नवम्बर को है। इस बीच समुद्री तूफान सेंडी ने पूरे अमेरिका में तबाही का मंजर बिछा दिया है। इस दौरान पूरा अमेरिका ही तहस-नहस हो गया। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका जितना भयभीत नहीं हुआ था, उससे अधिक भयभीत तो वह सेंडी से हो गया। समुद्री किनारों में अब तक कहर बनकर टूटने वाला सेंडी सबसे भयानक था। उत्तर अटलांटिक महासागर में हर वर्ष जून से लेकर नवम्बर तक कई छोटे-मोटे समुद्री तूफान आते रहते हैं। 2005 में अमेरिका के पश्चिम किनारे जो कहर बरपाया था, उसने अमेरिका को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया था। 2010 में कनाडा में भी समुद्री तूफान ने कहर बरपाया था। इसकी ताकत सेंडी से भी अधिक थी। राष्ट्रपति चुनाव में अभी पलड़ा भले ही ओबामा का भारी हो, पर रोमनी उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं, इसमें कोई दो मत नहीं। दोनों में हुई बहस में कई बार तो रोमनी ओबामा पर भारी पड़ते दिखाई दिए। अब चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। हालांकि पूरा देश दु:ख के सागर में हिलोरें ले रहा है। पर यह भी तय है कि इस बार चुनाव में सेंडी का साया अवश्य मंडराएगा। इस बीच परिणाम भी चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं।
अमेरिका के मौसम विज्ञानी प्रोफेसर केरी इमेंन्युअल लिखते हैं कि ग्लोबल वार्मिग के लिए मुख्य रूप से अमेरिका ही जिम्मेदार है, अब वह उसकी सजा भुगत रहा है। समुद्र में तूफान किस तरह से आते हैं, इसके लिए हमें थोड़ा-बहुत मौसम विज्ञान को समझना होगा। समुद्र की सतह का तापमान जब बढ़ता है, तब पानी के करीब रहने वाली हवा संतृप्त होकर ऊपर चढ़ने लगती है। यह संतृप्त हवा ऊपर की हवा में रहने वाले पानी की भाप को सघन बनाकर उसका पानी में रुपांतरण करती है। इसलिए बारिश होती है। जिस स्थान से संतृप्त हवा ऊपर जाती है, वहां हलके दबाव का घेरा बन जाने से आसपास की हवा आ जाती है। इसके कारण चक्रवात पैदा होता है। यह चक्रवात जब तक समुद्र में रहता है, तब तक कम विनाशक होता है। पर जैसे ही जमीन पर आता है, उसका रूप आक्रामक हो जाता है। किसी भी समुृद्र का चक्रवात कितना भयानक है, इसे हम उसके कद से पहचान सकते हैं। चक्रवात का कद मापने के लिए उसके केंद्र के सबसे बाहरी भाग के बीच का अंतर मापा जाता है। चक्रवात का कद यदि 222 किलोमीटर से कम है, तो उसे कम विनाशक माना जाता है। यदि चक्रवात का कद 333 से 666 के बीच है, तो उसे मध्यम विनाशक कहा जाएगा। यदि उसका कद 888 किलोमीटर से भी अधिक है, तो उसे महाविनाशनक माना जाएगा। हाल ही में अमेरिका में जो समुद्री तूफान आया था, उसका कद 6500 किलोमीटर था। आप समझ सकते हैं कि वह कितना महाविनाशक होगा। सचमुच उसने अमेरिका को जिस तरह से हिलाकर रख दिया है, उससे उबरने में उसे काफी समय लगेगा।
उत्तर अटलांटिक महासागर में आने वाले समुद्री तूफानों को मौसम वैज्ञानिक अलग-अलग नाम देते हैं। ये नाम पहले से ही तय कर लिए जाते हैं। एक नाम का उपयोग एक ही बार किया जाता है। जापान में समुद्री तूफानों को नाम के बदले नम्बर से जाना जाता है। सन् 2005 के अगस्त में अमेरिका के न्यू ओलियंस और लुइसियाना प्रांतों में समुद्री तूफान ने आतंक मचाया था। इस चक्रवात में 1833 लोगों की मौत हुई थी। यही नहीं 108 अरब डॉलर का नुकसान भी हुआ था। कई इलाकों में कई दिनों तक बिजली गुल हो गई थी। लोग लूटपाट पर उतारू हो गए थे। इस समुद्री तूफान ने अमेरिकी प्रशासन की सारी व्यवस्था को चौपट कर दिया था। अमेरिका की सुरक्षा की सारी पोल इस तूफान ने खोल कर रख दी। तब तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश बुरी तरह से बौखला गए थे।
अभी अमेरिका में जिस सेंडी ने कहर बरपाया, वह इस मौसम का दसवां हरिकेन था। उसका जन्म 22 अक्टूबर को केरेबियन समुद्र में हुआ था। उस समय उसे नाम नहीं दिया गया था। जन्म के 6 घंटे बाद ही उसने विकराल रूप धारण कर लिया था। 24 अक्टूबर को वह जमैका पर टूट पड़ा था। 28 अक्टूबर को उसके रूप को देखते हुए उसका नामकरण किया गया। 25 को वह क्यूबा पर कहर बनकर टूटा। उसके बाद 26 को वह बहामा पहुंचा, तब वह कमजोर हो गया था। लेकिन 27 अक्टूबर को उसने अपनी ताकत फिर बटोरी और उत्तर-पश्चिम होता हुआ अमेरिका की ओर बढ़ गया। उसकी गति देखकर अमेरिका का रक्तचाप बढ़ने लगा था। यह समुद्री तूफान अमेरिका पहुंचने के पहले ही 64 लोगों की जान ले चुका था। अमेरिका ने इससे बचने के तमाम उपाय कर रखे थे, फिर भी भी उसने सारी सुरक्षा व्यवस्थाओं को धता बताते हुए कहर बरपा ही दिया। जब समुद्री तूफान अमेरिका पहुंचा, तब बराक ओबामा राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में लगे थे। पर जैसे ही सूचना मिली, उन्होंने अपने सारे कार्यक्रम स्थगित करते हुए समुद्री तूफान से बचने की व्यवस्थाओं में लग गए। इसमें उनका स्वार्थ भी था। उन्हें यह अच्छी तरह से पता है कि यदि चुनाव के समय उनका प्रशासन कमजोर साबित हुआ, तो वे जीती हुई बाजी हार सकते हैं। विश्व पर जिस तरह से अकाल, भूकंप, सुनामी, हरिकेन आदि प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रहीं हैं, वह मानव जाति के लिए चुनौती है। एक तरह से इसे वेक-अप कॉल भी कह सकते हैं। यदि मानव अब भी इस चेतावनी को अनदेखा करता है और पर्यावरण को बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखता, तो पूरे मानव जाति खतरे में पड़ जाएगी, यह तय है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

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