गुरुवार, 31 जनवरी 2013

कुंभ मेले के बहाने नारी और नदी की सुरक्षा पर चिंता

डॉ. महेश परिमल
हमारे देश में कुंभ मेले की परंपरा बरसों से चली आ रही है। 12 साल बाद कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में हा रहा है। इससे देश की आध्यात्मिक शक्ति को जानने का अवसर मिलता है। इसे समझने के लिए हजारों की संख्या में विदेशी भी शामिल होते हैं और स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं। उत्तरायण यानी मकर संक्रांति से यह मेला शुरू हुआ है। प्रयाग इन दिनों श्रद्धा और आस्था की नगरी बन गई है। देश-विदेश से साधुओं का आगमन हुआ है। सभी गंगा नदी में स्नान कर पुण्य कमा रहे हैं। कुंभ में साधुओं की जो शाही सवारी निकलती है, उसे देखकर लोग दांतों तले ऊंगली दबा देते हैं। मशीनों से पुष्पवर्षा और आधुनिक बेंड बाजों की धमक से कुंभ की सवारी शोभित होती है। वैदिक मंत्रों के जाप आदि से पूरा शहर गुंजायमान हो रहा है। इस बार विभिन्न अखाड़ों से एक ओर देश की नारी की रक्षा पर चिंता की गई है, तो कुछ अखाड़ों से देश की नदियों पर भी चिंता व्यक्त की गई है। कुल 55 दिनों तक चलने वाले इस मेले में इस बार जो अनोखा हुआ है, वह यह कि अखाड़ा परिषद के बीच चलने वाला विवाद समाप्त हो गया है। मेले में लोगों की सुरक्षा के लिए  हेलीकाप्टर की व्यवस्था की गई है। मुफ्त इलाज और 24 घंटे तक रिवर्स एम्बुलेंस की सुविधा भी इस बार देखी गई है। कुंभ मेले में देश-विदेश से आए साधु-संत आकर्षण का केंद्र हैं। भारतीय संतों और योग गुरुओं के साथ विदेशी संत और महात्माओं का प्रवचन जारी है। इन प्रवचन सुनने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। जो साधु विदेशी हैं, उन्होंने अपना भारतीय नाम धारण कर लिया है। इनमें से हेरिस नाम के साधु भी हैं, जो महर्षि महेश योगी के शिष्य हैं, उन्होंने अपना नाम कृष्णराम-गोपाल रखा है। सतुबा बाबा के शिष्य राबर्ट ने हरिहरानंद नाम धारण किया है।
प्राचीन काल में सप्तपुरी में एक नगरी प्रयाग के नाम से पहचानी जाती थी। प्रयाग का बहुत ही महत्व है। सभी तीर्थो में प्रयाग की गणना सर्वश्रेष्ठ तीर्थो में की जाती है। ब्रह्माजी ने यहीं अनेक यज्ञ किए हैं। यही त्रिवेणी स्नान होता है। यही अक्षय बड़ अतिप्राचीन है। प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। जब देव दानवों ने समुद्र मंथन किया, तब अंत में अमृतकुंभ प्राप्त होता है। कुंभ को विराट स्वरूप मानकर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। अमृत कुंभ में 12 आदित्य,  12 राशियां, एकादश रुद्र, दस इंद्रियां, 12 महीने और वामन-वसु उसके अंदर निवास करते हैं। इंद्र का पुत्र जयंत जब इस कुंभ को लेकर भागा, तो देवता उसके पीछे भागे। अंत में वह पकड़ा गया, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर प्रकट हुए और असुरों को दिग्भ्रमित कर अमृत कुंभ को देवताओं के बीच बांट दिया। इस खींचतान में कुंभ चार स्थानों पर गिर गया। इन्हीं चार स्थानों पर आज कुंभ मेला लगता है। यही चारों स्थान हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन है। जहां हर बारह वर्षो में चैत्र में हरिद्वार, उसके बाद तीन वर्ष प्रयाग में माघ महीने में अर्ध कुंभ का आयोजन होता है। इस दौरान गुरु वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में होता है। कुंभ मेला भरने का एक निश्चित समय भारतीय ग्रह गणित के आधार पर रखा जाता है। जिसमें सूर्य,चंद्र और गुरु का स्थान महत्व का है। जिस तरह से पृथ्वी के लिए सूर्य का स्थान महत्वपूर्ण है, पृथ्वी को सूर्य का परिभ्रमण करने में एक वर्ष यानी 365 दिन लगते हैं, उसी तरह गुरु को सूर्य का परिभ्रमण करने में 12 वर्ष लगते हैं। गुरु और सूर्य उपरोक्त नियमानुसार कुछ राशियों में होते हैं, तब कुंभ मेले का आयोजन होता है। कुंभ मेला विश्व में सबसे बड़ा मेला माना जाता है। इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एक करोड़ श्रद्धालु स्नान करते हैं।
महाकुंभ मेले का अध्ययन
हार्वर्ड युनिवर्सिटी महाकुंभ मेले का अध्ययन करेगी। ऐसा माना जाता है कि इस मेले में दुनिया भर में सबसे ज्यादा भीड़ जुटती है। विभिन्न फैकल्टी और छात्रों का एक दल इलाहाबाद जाकर इस मेले के संचालन तंत्र और इसके अर्थशास्त्र के बारे में अध्ययन करेगा। इस धार्मिक आयोजन के दौरान जमा होने वाली भीड़ को भी अध्ययन की विषय-वस्तु बनाया जाएगा। हार्वर्ड के फैकल्टी ऑफ आटर्स एंड साइंसेज, स्कूल ऑफ डिजाइन, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड डिवाइनिटी स्कूल और हार्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट के फैकल्टी और छात्र मैपिंग इंडियाज कुंभ मेला प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए इलाहाबाद जाएंगे। वे कुंभ मेले को लेकर विभिन्न शोध करेंगे, जिसमें प्रत्येक 12 वर्ष बाद विश्व भर से लाखों तीर्थयात्री आते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया है कि कुंभ मेले के लिए अस्थाई रूप से पॉप-अप मेगा सिटी का निर्माण किया गया है। करीब एक महीने तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन के दौरान तीर्थयात्री और पर्यटक यहां रुकेंगे। हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के सहायक निदेशक मीना हेवेट ने कहा, ऐसा पहली बार है जब हार्वर्ड इस प्रकार का अध्ययन कर रहा है। फैकल्टी और छात्र इस पर मिलकर काम करेंगे। कुंभ मेले के अध्ययन के लिए आने वाली टीम के संभावित सदस्य लोगन प्लास्टर ने कहा है कि हार्वर्ड की टीम इस बात का जवाब ढ़ूंढने का प्रयास करेगी कि इतना बड़ा आयोजन किस प्रकार संभव है। महाकुंभ में पौष पूर्णिमा पर 27 जनवरी को होने वाले शाही स्नान का शंकराचार्यों ने बहिष्कार किया था, पर अब उनमें ही विवाद गहराता जा रहा है। शंकराचार्यों ने गंगा के निर्मलीकरण के सवाल पर बहिष्कार किया था।   दोनों का कहना है कि सरकार ने महाकुंभ में गंगा की शुद्धता बनाए रखने का वादा किया था, लेकिन गंगा आज भी पहले जैसी ही मैली है। 
कुंभ मेले में इस बार नदियों की सुरक्षा ओर प्रदूषण से बचाने पर विशेष रूप से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां नदियों को माँ का स्थान दिया गया है। नदी को मां का स्थान देने की इस विचारधारा से प्रभावित होकर इटली, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, मलेशिया और चेक गणराज्य तथा दक्षिण अफ्रीका से बड़ी संख्या में युवाओं का आगमन सैलानियों के रूप में हुआ है। पिछले साल नवम्बर माह में आस्ट्रेलिया से एण्ड्रूज परिवार समेत भारत आए हैं। इलाहाबाद में रहकर एण्ड्रूज ने भारत की संस्कृति को अच्छी तरह से समझते हुए हिंदी भाषा सीखना शुरू किया। अब वे अच्छी तरह से हिंदी में लोगों से वार्तालाप कर रहे हैं। अब वह अपने दोस्तों और परिवारजनों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। एण्ड्रूज ने अपने साथियों के साथ एक ऐसी नाव तैयार की है, जिसमें वे लोगोंे को मुफ्त में गंगा नदी की सैर करवाते हैं। इसके साथ ही भारत की नदियों में फैले प्रदूषण के प्रति भी बहुत चिंतित हैं। आस्ट्रेलिया से आए ढिल्लन नामक पर्यावरणविद कहते हैं कि जिस तरह से गंगा नदी के तट सूख रहे हैं, उसी तरह से इस नदी में प्रदूषण बढ़ रहा है। इसके लिए भारतीय प्रजा को अब जागरूक होना होगा। नदी मानवजाति की धरोहर है, इसे बचाना हर नागरिक का कर्तव्य है। विदेशियों की इस गुहार को यदि भारतीय समझ जाएं, तो प्रयाग संगम में शुरू हुए इस कुंभ मेले में भारतीय संस्कृति-श्रद्धा और समस्याओं की समझ के लिए त्रिवेणी का संगम साबित होगा, ऐसा समझा जा सकता है।
  डॉ. महेश परिमल



मंगलवार, 29 जनवरी 2013

मनमोहन सिंह फिर प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनना चाहते?

डॉ. महेश परिमल
पिछले कुछ समय से सभी दल देश के भावी प्रधानमंत्री के बारे में अपनी-अपनी राय दे रहे हैं। कोई नरेंद्र मोदी का नाम ले रहा है, कोई आडवाणी का, कोई चिदम्बरम का, कोई राहुल गांधी का। पर शायद कोई नहीं चाहता कि दो बार प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले डॉ. मनमोहन सिंह तीसरी बार प्रधानमंत्री बनें। आखिर ऐसी क्या बात है उनमें कि लोग उन्हें इस पद पर एक बार और नहीं देख सकते। देखा जाए तो डॉ. मनमोहन सिंह एक कुशल राजनीतिज्ञ नहीं हैं। सबसे पहले तो वे कुशल अर्थशास्त्री हैं, उनकी दूसरी विशेषता यह है कि वे रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं। एक और बात यह है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं कि वे विश्व के सभी प्रधानमंत्रियों से अधिक पढ़े-लिखे हैं। इतनी विशेषताओं के बाद भी उन्हें अब कोई प्रधानमंत्री के रूप में देखना नहीं चाहता। आखिर बात क्या है?
दरअसल बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री अपने पद पर रहते हुए वह सब कुछ नहीं कर पाए, जो वे करना चाहते थे, नहीं कर पाए। एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें जो प्रतिष्ठा मिलनी थी, वह नहीं मिल पाई। एक तरह से उनकी छवि पिछलग्गू की तरह ही सामने आई। उन पर खुशवंत सिंह जैसे स्तंभकार ने भी जोक्स बनाए। वास्तव में वे अपने प्रधानमंत्रित्व काल में न तो बेहतर प्रधानमंत्री रहे, न कुशल अर्थशास्त्री और न ही अच्छे वक्ता। बोलते समय उनकी वाणी बहुत ही संयमित रहती। उन्हें सुनकर किसी तरह का जोश आने या राष्ट्रभक्ति में डूब जाने की इच्छा नहीं होती है। आज कांग्रेस में प्रखर वक्ता, कुशल प्रशासक, अपने भाषणों से भीड़ खींचने वाले नेताओं की भारी कमी है। ऐसे में डौ. मनमोहन सिंह को लोग अब उतनी गंभीरता के साथ नहीं लेते। राजनीति ने एक कुशाग्र बुद्धि का अर्थशास्त्री हमसे छीन लिया। अपने सीधेपन के कारण लोगों को वे नहीं भाते। प्रधानमंत्री के रूप में जो छवि उभरनी चाहिए, वह डॉ. सिंह को देखकर नहीं उभरती। उनके ही कार्यकाल में कई घोटाले सामने आए। जो उनके ही साथियों ने किए। कुछ जेल गए, कुछ पर अभी तक केवल आरोप ही हैं। लोगों को आश्चर्य इस बात का होता है कि जिस बात को देश का बच्च-बच्च जानता समझता है, वह बात हमारे प्रधानमंत्री को पता नहीं होती। सभी जानते हैं कि उनके कार्यकाल में हुए घोटालों में वे कतई शामिल नहीं हैं, पर सच यह भी है कि जब घोटाले हो रहे थे, तब वे क्या कर रहे थे? कई बार गलत लोगों का साथ सही व्यक्ति को भी गलत साबित कर देता है। डॉ. मनमोहन सिंह के साथ भी यही हो रहा है।
विभिन्न अवसरों पर हम सबने टीवी पर प्रधानमंत्री को बोलते सुना। उनके अंग्रेजी और  हिंदी भाषण सुनकर ऐसा नहीं लगा कि ये हमारे देश के अग्रणी नेता बोल रहे हैं। आवाज में ओज नहीं, बाडी लैग्वेज भी आकर्षित न करने वाली और न ही भाषण में रोचकता। वे जो कुछ भी कहते रहे, वह सब कुछ पहले ही अखबारों में आ चुका होता है। किसी तरह की नई बात या फिर नई घोषणा उनसे नहीं सुनी। चाहे वे विदेश में अपनी ओजस्वी वाणी के कारण पहचाने जाते हों, पर सच तो यह है कि देश ने अब तक उनके जैसा दूसरा कोई लाचार प्रधानमंत्री नहीं देखा। देश ऐसे बेबस प्रधानमंत्री को देखना भी नहीं चाहता, इसलिए उनका नाम इस पद के लिए सामने नहीं आ रहा है। देश का कोई नेता ही नहीं, बल्कि आम जनता भी नहीं चाहती कि वे अगली बार भी प्रधानमंत्री के पद को सुशोभित करें। नेता अपनी वाणी या वाकपटुता से पहचाने जाते हैं। हम अपने प्रधानमंत्री को किस रूप में पहचानें? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं। उन्होंने जब भी कोई बयान दिया, तो अपने मंत्रियों को बचाने के लिए ही दिया। आखिर भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने की उनकी क्या विवशता थी, यह देश की जनता जानना चाहती है, पर जनता का इसका जवाब शायद ही मिले।
देश की जनता एक ऐसा प्रधानमंत्री चाहती है, जो जब बोलने के लिए तैयार हो, तो लोग शांत होकर उसकी बात सुनें। वह गरजे, तो पड़ोसी देश में हड़कम्प मच जाए। उसके प्रधानमंत्री बनते ही दूसरे देश अपनी विदेश नीतियों में परिवर्तन करने लगे। एक ऐसा सख्त किंतु सबका खयाल रखने वाला प्रधानमंत्री जो आम आदमी के बीच उतना ही लोकप्रिय हो, जितना विदेशों में अपने भाषण को लेकर चर्चित हो। उसकी गरज भरी आवाज से देश में उत्साह का संचार हो। उनकी एक आवाज पर लोग सड़कों पर उतर आएं और आतंकवादियों का बेनकाब करने लगें। उनकी एक धमकी से जमाखोरों की बन आए। अपराध करने के पहले अपराधी एक बार यह अवश्य सोचे कि हमारे प्रधानमंत्री बहुत ही सख्त हैं, यदि पकड़े गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। इस भाव से वह अपराध करना ही छोड़ दे। इसी तरह घोटाले करने वाले मंत्रियों को भी ऐसा लगे कि हमारे प्रधानमंत्री की सख्ती के कारण हम कुछ गलत नहीं कर पा रहे हैं। देश में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति सबसे अधिक सुखी हो, यह संदेश जाना चाहिए। डॉ. सिंह ने जब भी टीवी पर आम नागरिकों को संबोधित किया, उससे ऐसा लगा कि वे गठबंधन की विवशता पर अधिक जोर दे रहे हैं। मानो सरकार के सहयोगी दलों को घोटाले करने की पूरी छूट मिली हुई है। यह सच है कि गठबंधन की राजनीति की विवशताएं हो सकती हैं, पर इसके लिए देश की प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगा देना कहां तक उचित है? घोटालों के कारण देश की प्रतिष्ठा पर आंच आई है, देश का विकास प्रभावित हुआ है। यहां तक कि विदेशों में भी काफी किरकिरी हुई है। इनके कार्यकाल में मंत्रियों का यह रवैया रहा कि घोटाले करते जाओ, कोई रोकने वाला नहीं है। इनके शासनकाल में जितने घोटाले उजागर हुए, उतने घोटाले किसी अन्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल में नहीं हुए। इसलिए डॉ. सिंह की छवि उतनी उज्जवल नहीं कही जा सकती, जिस पर गर्व किया जा सके।
डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बात सामने आई कि जो सक्षम हैं, वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं, जबकि जनता के प्रति उनकी जवाबदेही है और जिन्हें करना चाहिए वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं, जबकि जनता के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। बात इशारों मे ंकही गई है, पर सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री रंगमंच पर हैं, पर उन्हें संचालित किया जा रहा है। वे किन हाथों से संचालित हो रहे हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। पर सच यही है कि हमारे प्रधानमंत्री और सक्षम हो सकते थे, पर विवशताओं ने उन्हें वह नहीं करने दिया, जैसा वह चाहते थे। इसीलिए कोई उन्हें तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता। इस दौरान न तो उनकी विद्वता काम आई, न ही उनका अर्थशास्त्री का पक्ष सामने आया। एक निरीह और लाचार प्रधानमंत्री देश अब फिर नहीं देखना चाहता।
 डॉ. महेश परिमल

रविवार, 27 जनवरी 2013

जहर भी बेसअर है कांगे्रस पर


 http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2013-01-27&pageno=7
दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख


चिंतन और चिंता में दूरी ही कितनी?
डॉ. महेश परिमल
जयपुर में कांग्रेस का चिंतन शिविर समाप्त हो गया। आगामी चुनाव के लिए दिशा खोजने की जद्दोजहद में कांग्रेस स्वयं ही दिशाहीन दिखाई दे रही है। राजनीति को जहर मानने वाली कांग्रेस इतने साल से सत्ता में रहने के बाद भी यह समझ नहीं पाई है कि आम आदमी से दूर होकर पार्टी कभी भी सबल नही हो सकती। पिछले 9 वर्षो में आम आदमी को स्वयं से दूर रखने वाली कांग्रेस आज आम आदमी की बातें कर रही है। यह शर्मनाक है। आम आदमी हमेशा ही हाशिए पर होता है। यह बात अच्छी रही कि कांग्रेस ने इस शिविर में अपनी गलतियों को माना। केवल मान लेने से कुछ नहीं होता, यदि वही गलतियां दोहराई जाएं, तो फिर गलती मानने को कोई अर्थ ही नहीं। वास्तव में कांग्रेस को अब अपनी चिंता होने लगी है, इसलिए चिंतन शिविर का आयोजन करना पड़ा। वैसे चिंतन और चिंता में अधिक अंतर नहीं है। ¨चता के बाद ही चिंतन शुरू होता है। ¨चता का आशय यही है कि आपने भूलें की हैं, चिंतन में उन भूलों पर पछतावा किया जा सकता है। पर भूल तो भूल है, उसे यदि दोहराया न जाए, तो चिंतन का अर्थ है, अन्यथा बेकार। हर मोर्चे पर विफल सरकार अब यदि आम आदमी की चिंता कर रही है, तो उसे सबसे पहले महंगाई पर काबू पाना होगा, आम आदमी को करीब लाने का यह सबसे अमोघ शस्त्र है। आम आदमी को खुश करने का दूसरा तरीका यह है कि उसे अपने ईमानदार काम के लिए रिश्वत न देनी पड़े। पर क्या आज यह संभव है। राहुल गांधी के पिता यह कहते रहे कि एक रुपए में से गरीब आदमी तक 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि ऐसा नहीं होगा, अब 99 पैसे गरीब आदमी तक पहुंचेंगे। यहां भी उन्होंने एक पैसा बेईमानों को देने के लिए राजी हो गए। वैसे यह भी एक वादा ही है और वादे तो केवल तोड़ने के लिए ही होते हैं। फिर वादे करना और उसे भूल जाना तो नेताओं का जन्म सिद्ध अधिकार है। इसलिए राहुल के बयान को गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। केवल उनके कह देने से कुछ भी संभव नहीं है। वैसे भी उन्होंने ही हाल के चुनाव के पूर्व कई वादे किए थे, जरा उन वादों पर गौर कर लें, यही काफी होगा।
अधिवेशन के पहले दिन सोनिया गांधी ने युवा मतदाताओं को आकषिर्त करने पर जोर डाला। उन्होंने सोशल मीडिया की सक्रियता पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। वास्तविकता यह है कि आज सोशल मीडिया पर करोड़ों भारतीय अपने-अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।  फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग आदि से लोग रोज ही अपने विचारों को शब्द देने लगे हैं। विभिन्न नेता भी आज अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल करने लगे हैं। लेकिन आज सोशल मीडिया से जुड़े रहना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। अन्ना और सिविल सोसायटी इसके ताजा उदाहरण हैं। एक समय ऐसा भी था जब टीम अन्ना को सोशल मीडिया में ही भारी समर्थन मिल रहा था। उसके बाद लोगों की उनमें दिलचस्पी कम होती गई। सोशल मीडिया से अपनी आवाज को बुलंद तो किया जा सकता है, पर उस आवाज में लोगों की दिलचस्पी, समझ और अभिव्यक्ति का अनुशासन होना आवश्यक है। जो इस समय देखने में नहीं आ रही है। सोनिया गांधी ने जब कांग्रेसियों से सोशल मीडिया के महत्व को समझने का आह्वान किया,  परंतु वे यह भूल गई कि कांग्रेसियों की सबसे बड़ी आवश्यकता आज जनता से सीधे संवाद की है। वह युवाओं की ताकत और प्रभाव को तो पहचानती हैं, साथ ही सोशल मीडिया के प्रभुत्व को भी स्वीकारती हैं। इस स्तर पर सबसे बड़ी बात यह है कि आज जिसे आम कांग्रेसी भविष्य के नेता के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, वही राहुल गांधी सोशल मीडिया में कहीं नहीं दिखाई देते। उनकी तुलना में नरेंद्र मोदी, अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला, नीतिश कुमार, जगमोहन रेड्डी, ममता बनर्जी आदि ने न जाने कब से फेसबुक और ट्विटर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
अब वे दिन लद गए, जब प्रेस वार्ता में अपनी बात कहकर श्रेय लूट लिया जाता था। अब तो यह हाल है कि घटना होते ही नेताओं को तुरंत अपनी राय देनी होती है। मीडिया उसके लिए हमेशा तत्पर रहता है। आज नेताओं के लिए फेसबुक, ट्विटर जैसे माध्यम एक चुनौती के रूप में हैं। अपनी छबि बनाने का एक जरिया भी हैं। कई नेता यह समझ चुके हैं, इसलिए कोई घटना होते ही तुरंत इन माध्यमों से अपने विचारों का प्रचार-प्रसार कर देते हैं। दिल्ली गेंगरेप का मामला हो या फिर विदेशी बैंकों में काला धन का मामला, इसके पहले जनलोकपाल जैसे मुद्दे पर सोशल मीडिया पर समग्र देश गर्मा-गर्म चर्चा हुई। इसमें सभी ने अपने विचार दिए। दूसरी ओर युवा होने के बाद भी राहुल गांधी इस मुद्दे पर मौन ही रहे। सोनिया गांधी ने स्वीकारा कि हमें युवाओं के बढ़ते आक्रोश को समझना होगा। आज के युवा त्वरित प्रतिक्रिया करते हैं, तब हमें उसे धर्य के साथ सुननी चाहिए। पर इन सूफियानी वाक्यों को वास्तव में समझने के लिए कांग्रेस की तैयारी कैसी है, यह तो उसकी वेबसाइट देखकर ही पता चल जाता है। जो न जाने कब से अपडेट ही नहीं हुई है। आज भी उसमें पुरानी जानकारियां ही भरी पड़ी हैं। जब हम युवाओं को जोड़ने की बात करते हैं, तो सबसे पहले स्वयं को अपडेट करना होगा। वेबसाइट ही कांग्रेस के अपडेट की पोल खोलती है।
लोकसभा चुनाव में मुख्य रूप से दो लोगों को सामने रखकर लड़ा जाएगा, यह तय है। इसमें एक हैं नरेंद्र मोदी और दूसरे हैं राहुल गांधी। इन दोनों में से सोशल मीडिया में आज भी नरेंद्र मोदी का डंका बजता है। वे अपनी हर बात अपने सोशल मीडिया के साथ शेयर करते हैं। मोदी की कार्यशैली की जितनी भी आलोचना की जाए, पर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उसका प्रचार अभियान हमेशा ही लोगों को आकर्षित करता है। प्रचार-प्रसार के लिए वे हर तरह की उपयोगी टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करने में नहीं चूकते। दूसरी ओर राहुल गांधी अभी फेसबुक में ही पूरी तरह से अपडेट नहीं हैं। यही बात कांग्रेस को दिशाहीन बनाती है। सोनिया जी कहती हैं कि केंद्र सरकार की कितनी ही हितकारी योजनाओं की जानकारी आम आदमी को नहीं है। केंद्र की योजनाओं की जानकारी जब कांग्रेस के नेताओं को ही नहीं मालूम, तो फिर आम जनता को किस तरह से पता चलेंगी। कितने कांग्रेसी ऐसे हैं, जिनका जनता से सीधा संवाद है? क्या इस सवाल का जवाब सोनिया गांधी समेत किसी नेता के पास है? गले पर कांग्रेसी होने का पट्टा लगाकर अपना प्रचार करने का जमाना अब नहीं है। गुजरात में भाजपा, बिहार में जनता दल, कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, बंगाल में तृणमूल, महाराष्ट्र में मनसे के कार्यकर्ताओं से कांग्रेस को प्रेरणा लेनी चाहिए। ताकि वह यह समझ सके कि किस तरह से जमीन से जुउ़ा जाता है। इन प्रांतों में सभी कार्यकर्ताओं के लिए ट्विटर या फेसबुक की सदस्यता अनिवार्य कर दी गई है। ताकि पार्टी की नीति का प्रचार किया जा सके। उसमें सभी कार्यकर्ता यह बताते हैं कि पिछले सप्ताह उन्होंने पार्टी के लिए क्या किया। अगले पखवाड़े क्या करना है।
ये लोग हमेशा फेसबुक पर अपडेट रहते हैं। नागरिकों के सवालों का जवाब देने, साप्ताहिक बैठकों में अपनी सक्रियता बतानी होती है। यही नहीं इसके अलावा किस मुद्दे पर आक्रामक होना है, किस पर शांति से बात करना है और किस मुद्दे पर पतली गली से निकल जाना है, यह सब कार्यकर्ता आपस में तय कर लेते हैं। नए कार्यकर्ताओं को बाकायदा इसका प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यकर्ता अभी भी शान से खुली जीप में रोज कार्यालय का चक्कर लगाते हैं, ताकि खुद के सक्रिय होने का प्रमाण पत्र प्राप्त किया जा सके। गांव ही नहीं, अपने क्षेत्र में इन्हें कितने लोग जानते हैं, यह पूछो तो वे बगलें झांकने लगते हैं। कांग्रेस का कोई कार्यकर्ता जमीन से नहीं जुड़ा है। उनकी बातें हवा हवाई ही होती हैं।
एक समय ऐसा भी था, जब लोग अपने घर की दीवारों पर संदेश लिखते थे, अब इन दीवारों का रूप बदल गया है। अब ये दीवारें फेसबुक की वाल के रूप में हमारे सामने हैं, जिस पर अपने विचार ही व्यक्त करना नहीं, बल्कि दूसरों के विचारों को जानना आवश्यक है। लोग किस विषय पर क्या विचार रखते हैं, यह फेसबुक से ही जाना जाता है। राहुल गांधी पहले स्वयं फेसबुक पर अपडेट होना सीखें। सर पर कांटों का ताज पहन लिया है। अब चुनौतियां उनका इंतजार कर रही हैं। जब वे सच्चई जानते हैं कि विधायक थोपा जाता है, बाहरी आदमी को अधिक प्राथमिकता मिलती है, जिला संगठक को कोई नहीं पूछता, दूसरी पार्टी से आए लोगों को हाथों-हाथ लिया जाता है, तो ये बुराइयां दूर होंगी, तभी कार्यकर्ता स्वयं को महत्वपूर्ण मानेंगे। राशन दुकानों से गरीबों को सही समय पर सही अनाज मिल रहा है या नहीं, शासन की हितकारी योजनाएं सुदूर गावों में कहीं दम तो नहीं तोड़ रही हैं। इस तरह की बहुत सी चुनौतियां राहुल गांधी के सामने हैं, पर इन्हें प्राथमिकता के साथ हल करना उनका कर्तव्य है। यदि सत्ता जहर है, तो करीब 50 साल तक को कांग्रेस ने इसका स्वाद चखा ही है, इस तरह से देखा जाए तो अब कांग्रेस नीलकंउ हो गई है। इस पर जहर का कोई असर नहीं होता। पर देश के नागरिकों को महंगाई का असर तुरंत होता है। महंगाई और भ्रष्टाचार पर काबू पाना आज देश की सबसे बड़ी जरुरत है। जो भी दल इस पर लगाम लगा सकता है, वही दल अगले चुनाव में अपने पैरों पर खड़ा होकर सत्ता प्राप्त कर सकता है। इन दो मुद्दों को जिसने भी अनदेखा किया, उसे जनता कभी नहीं छोड़ेगी, यह निकट भविष्य में होने वाले चुनाव परिणाम ही बताएंगे।
डॉ. महेश परिमल


गुरुवार, 24 जनवरी 2013

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

उजड़ी बस्‍ती के लोग

डॉ. महेश परिमल
घर की गैलरी में चिड़ियों और कबूतरों का अक्सर आना लगा रहता है। उन्हें दाने देना रोज का काम है। कभी वे अपना घरौंदा भी बना लेते। कुछ समय बाद घोसले में चूजा दिखाई देता। दोनों चूजे को खूब लाड़-दुलार करते। उन्हें चूहे के साथ देखना बहुत अच्छा लगता। उसके पहले वे जिस तरह से अपना घरौंदा बनाते, उसमें उनकी कारीगरी देखने के काबिल होती। किस तरह से वे एक-एक तिनका चोंेच में दबाए आते, घोसले पर रखते और उसे बड़ी खूबसूरती के साथ जमाते। उनकी सहभागिता देखते ही बनती थी। इस समय चिड़ियों का कम किंतु कबूतरों का आना अधिक हो गया है। वे आते, काफी आवाज करते। कई बार झगड़ते भी। पर प्यार से रहना उन्हें आता है, इसलिए प्यार से रहते भी थे। इसके बाद भी वे अपना घरौंदा बनाना नहीं भूलते। पर इस बार उनकी हरकतों से मुझे आश्चर्य हुआ। अब वे तिनके नहीं, पर जंग लगे हुए छोटे-छोटे तार के टुकड़े लाने लगे। मैं हतप्रभ! क्या शहर में अब तिनकों की कमी हो गई। ये परिंदे अब जंग लगे तार क्यों ला रहे हैं, अपना घरौंदा बनाने के लिए?
तिनको के स्थान पर तार। यह एक चेतावनी हो सकती है, परिंदों द्वारा मनुष्यों को। हम तो तार के घर में रह लेंगे, पर क्या आप रह पाएंगे? कांक्रीट के इस जंगल में अब तिनके भी नहीं मिल रहे हैं। हद हो गई। मैंने उन जंग लगे तारों को फेंक दिया। किसी ने कहा-आखिर कुछ सोचकर वे ऐसा कर रहे हैं, वे रह लेंगे, तारों से बने घरौंदे में। ये ता ेउनकी बात, पर क्या जंग लगे तारों के बीच वे अपने चूजे के साथ रह पाएंगे? जंग लगे तार से हुई चोट खतरनाक होती है। अगर चूजे को तार कहीं चुभ गया, तो क्या होगा? तारों को फेंक देने के बाद परिंदों का आना कम हो गया। मैं दु:खी, आखिर क्यों? वे अपने खतरनाक घरौंदे में रहें, यह मैं नहीं चाहता था। शायद मेरी यही सोच ने आज मुझे परिंदों से कुछ दूर कर दिया। परिंदे अभी भी आते हैं कभी-कभी, मुझे शिकायत भरी दृटि से देखते हैं। कभी उलाहना देते हुए से लगते हैं। मैं क्या कर सकता हूं? मेरी चिंता यह है कि क्या मेरे शहर में घरौंदे बनाने के लिए तिनकों का अकाल हो गया? तिनके नहीं हैं, इसका मतलब यही हुआ कि दाने भी नहीं होंगे, जब दाने नहीं होंगे, तो फिर परिंदें क्या चुगेंगे? अगर कुछ नहीं चुगेंगे, तो फिर जीवित कैसे रहेंगे? कैसा होगा बिना परिंदों का हमारा जीवन? न चिड़ियों की चहचहाट, न कबूतरों की गुटर गूं, न कलरव और न ही आकाश में मुक्त विचरते पक्षी वंृद। वीरान हो जाएगी दुनिया, वीरान हो जाएगा हमारे भीतर का कोई कोना।
ये एक चेतावनी है हम सबके लिए। हम तो अपने स्वार्थो के बीच जी लेंगे, पर ये खामोश परिंदे कैसे जी पाएंगे, कैसे बनाएंगे अपना घरौंदा? अगर तारों से ये अपना घरौंदा बना भी लें, तो कितनी असुरक्षित होगी उनकी दुनिया? उन उस असुरक्षित दुनिया के बीच क्या हम सुरक्षित रह पाएंगे? आज उन्होंने हमारी देहरी पर जंग लगे तार बिछाए हैं, कल कुछ और भी ला सकते हैं। इसके पहले तिनके लाकर कभी चिंगारी नहीं लाए वे, पर इस बार उनके इरादे कुछ खतरनाक दिखाई दे रहे हैं। वे हमें बार-बार चेतावनी दे रहे हैं, हम गाफिल हैं अपनी ही दुनिया में। हम यह भूल गए हैं कि जो प्रकृृति के जितना करीब है, उतना ही रचनात्मक है। प्रकृति से दूर जाएंगे तो ऊसर हो जाएंगे, फिर हममें रचना के सारे स्रोत सूख जाएंगे। फिर जो रचनात्मक नहीं है, उसमें सामाजिकता की भी उतनी ही कमी होगी। आज के जीवन में जितने संकट हैं, उनका सबसे बड़ा कारण प्रकृति का निरादर ही है। हम न केवल प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार बहुत बर्बर किस्म का है। हमें न नदियों की चिंता है, न पहाड़ों की, न जंगल-हरियाली की और न पशु-पक्षियों की। क्या इसके बाद भी हम स्वयं को मानव कह पाएंगे? डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी तो बचा नहीं, क्या अब डूबते को तिनके का सहारा भी नहीं मिलेगा? बोलो, कुछ तो बोलो?
  डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 19 जनवरी 2013

राजनीति की एक और स्‍याह तस्‍वीर

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख 

राजनीति की एक और स्‍याह तस्‍वीर
महेश परिमल 
कबीर ने कहा है कि यदि आपके सामने गुरु और ईश्वर दोनों ही हों तो पहले गुरु को प्रणाम करें, क्योंकि गुरु की शिक्षा के कारण ही ईश्वर के दर्शन हुए हैं। अब चार बार मुख्यमंत्री रह चुके 78 वर्षीय ओम प्रकाश चौटाला को दिल्ली की एक कोर्ट ने हरियाणा में तीन हजार से अधिक शिक्षकों की अवैधानिक तरीके से भर्ती में दोषी पाया है। उनके साथ उनके पुत्र अजय चौटाला और अन्य 53 लोगों को इस आरोप में जेल भेजा गया है। इसमें प्राथमिक शिक्षा निदेशक संजीव कुमार, चौटाला के भूतपूर्व विशेष अधिकारी एवं अन्य राजकीय सलाहकार भी शामिल हैं। आश्चर्य की बात यह है कि दोषी ठहराए गए लोगों में 16 महिलाएं भी हैं। यही नहीं, पिछले 12 सालों में इस मामले से संबंधित छह लोगों का देहांत भी हो चुका है। सरकार और गुरुओं की मिलीभगत से हुए इस गोरखधंधे को एक नया आयाम मिला है। चूंकि मामला पूर्व मुख्यमंत्री से जुड़ा है, इसलिए इसका फैसला इतनी देर से आया। इस तरह से नेताओं पर न जाने कितने आरोप होंगे, कितने ही मामले अदालत में चल भी रहे होंगे, उन सब पर एक नजर डाली जाए तो स्पष्ट होगा कि कई मामले जान-बूझकर लटकाए जा रहे हैं। इस मामले में नैतिकता के अध:पतन की पराकाष्ठा को ही पार कर लिया गया। नई पीढ़ी का भविष्य तैयार करने के लिए ऐसे लोगों का चयन किया गया, जिनका वर्तमान ही भ्रष्टाचार में पूरी तरह से डूबा हुआ है। जो लायक थे, उन्हें मौका नहीं मिला। जिन्होंने रिश्वत दी, वे सभी पिछले 12 सालों से नौकरी कर रहे हैं। यह मामला 1999 का है, जब चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। एक वर्ष के कार्यकाल में तीन हजार से अधिक जूनियर बेसिक टीचर्स की भर्ती की गई थी। बताया जा रहा है कि इसमें से हरेक प्रत्याशी से तीन से चार लाख रुपये की रिश्वत ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 में इस घोटाले की जांच के आदेश दिए थे। सीबीआइ ने 2008 में आरोप पत्र दाखिल किए। इस घोटाले के दौरान शिक्षा विभाग चौटाला के पास ही था। चौटाला ने शिक्षा निदेशक से कहा था कि वे साक्षात्कार की बोगस सूची तैयार करें और जिन्होंने रिश्वत दी है, उन्हें 20 में से 17 या 19 अंक दें। यह मामला तब बाहर आया, जब तत्कालीन प्राथमिक शिक्षा निदेशक संजीव कुमार एक आवेदन के साथ अदालत में पहुंचे और उन्होंने साक्षात्कार की मूल सूची प्रस्तुत की। सवाल यह उठता है कि संजीव कुमार जब स्वयं ही इस घोटाले में लिप्त हैं तो वह कोर्ट में क्यों गए? इस संबंध में एक अधिकारी ने यह खुलासा किया है कि संजीव कुमार को आशंका थी कि रिश्वत से मिलने वाली राशि का बंटवारा समान रूप से नहीं हुआ है। शिक्षकों की भर्ती में जिनका चयन नहीं हुआ है, वे भी संजीव कुमार को अपना समर्थन देंगे। ओमप्रकाश चौटाला उन्हीं देवीलाल के पुत्र हैं, जिनका नाम लेते ही हजारों वृद्ध और युवा झूम उठते हैं। वे भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता, किसानों के मसीहा और हरियाणा के जननायक थे। भारतीय राजनीति के सामने उन्होंने अपना चरित्र प्रकट किया। वे अब भी प्रासंगिक हैं। वे दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री और एक बार देश के उप-प्रधानमंत्री भी रहे। प्रधानमंत्री का पद उन्होंने यह कहकर त्याग दिया था कि देश के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुजरता है। सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि जनसेवा के लिए होती है। उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला पिता की विरासत एवं उनके गुणधर्मो को संभाल नहीं पाए। उनकी हरकतों को देखकर देवीलाल हमेशा उन्हें खुलेआम अनदेखा करते रहे। ओमप्रकाश चौटाला सोने की घडि़यों की तस्करी और भेंट में सोने की ईट स्वीकारने को लेकर विवाद में रहे। उन पर यह भी आरोप है कि रुचिका मामले में चौटाला ने हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी एसपीएस राठौड़ को बचाया था। चौटाला राजग और संप्रग सरकार में रह चुके हैं। अब वे कांग्रेस-भाजपा को सांपनाथ-नागनाथ कहते हैं। अब अगर देवीलाल के पौत्रों की बात करें तो सीबीआइ ने वर्ष 2006 में अजय-अभय के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मुकदमा दाखिल किया है। आरोप यह है कि दोनों ने चौटाला शासन के दौरान आय से अधिक 1467 करोड़ रुपये की संपत्ति हासिल की। दूसरी ओर अभय चौटाला के जबर्दस्ती इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने से काफी विवाद हुआ था। इसी तरह अजय चौटाला वर्ष 2000 में टेबल-टेनिस फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बन बैठे। यह सब पिता के मुख्यमंत्रित्व काल में ही उनके लाडलों ने किया। ऐसा भी नहीं है कि पिता-पुत्र ने मिलकर केवल यही एक घोटाला किया है। उन्होंने न जाने कितने घोटाले किए होंगे, जो अभी तक प्रकाश में नहीं आए हैं। इस समय देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग सड़कों पर आ रहे हैं। अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, बाबा रामदेव आदि किसी न किसी रूप में लोगों की अगुवाई कर रहे हैं। राष्ट्रव्यापी आंदोलन हो रहे हैं। ऐसे में यह कहना मुनासिब होगा कि अन्ना हजारे के आंदोलन में ओम प्रकाश चौटाला भी शामिल हुए थे। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना परचम लहराया था। अब वही 12 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में तिहाड़ जेल के मेहमान बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं, जो आम जीवन में भ्रष्टाचार का खुले रूप विरोध करते हैं, पर भ्रष्टाचार के दलदल में पूरी तरह से सने हुए होते हैं। यह मामला इतनी देर से सामने आया, इससे यह कहा जा सकता है कि सरकार स्वयं इस तरह के मामलों को लटकाए रखने में दिलचस्पी लेती है। देश के भ्रष्ट नेता और नौकरशाह साठगांठ कर जिस तरह का खेल कर रहे हैं, वह देश के लिए कितना घातक है, यह इस मामले से स्पष्ट हो जाता है। सरकार इस मामले में गंभीर है, ऐसा नहीं लगता। सरकार पर पहले भी यह आरोप लग चुका है कि वह सीबीआइ का इस्तेमाल अपने हित में करती है। यह मामला 12 साल तक आखिर क्यों अटका रहा, इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं होगा। निश्चित रूप से ऐसे कई मामले होंगे, जो भ्रष्टाचार को ढंकने का काम कर रहे होंगे। भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ समय रहते फैसला नहीं आता तो यही समझना होगा कि सरकार उन्हें संरक्षण दे रही है। देर से आया फैसला किसी अन्याय से कम नहीं है। घोटालेबाज नेताओं के कामकाज में किसी प्रकार का फर्क अभी तक नहीं आया है। यह इस मामले ने बता दिया। अल्पमत वाली सरकार से भला ऐसी उम्मीद कैसे की जा सकती है? भयभीत सरकार, डरी-सहमी सरकार, अपनों से ही घिरी और अपनों में ही उलझी सरकार से किसी अच्छे की उम्मीद करना ही बेकार है।
 (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

हर मोर्चे पर शिकस्त का दौर जारी

डॉ. महेश परिमल
इन दिनों देश कुछ ऐसी घटनाओं से होकर गुजर रहा है, जिसे देख सुनकर मानवता भी रो पड़ती है। एक तरफ दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हें, तो दूसरी तरफ सीमा पर नृशंस हत्या का दौर जारी है। यही नहीं अब देश के भीतर भी इस तरह की नृशंस हत्याएं हो रही हैं कि मानवता शर्मसार हो जाए। हाल में नक्सलियों ने जिस तरह से सीआरपीएफ के जवान को मारकर उसके भीतर विस्फोटक भर दिया, उससे यही स्पष्ट होता है कि सीमा के उस पार देश के दुश्मनों और देश के भीतर के दुश्मनों में कोई फर्क नहीं है। केंद्र सरकार न पाकिस्तान को कोई कड़ा संदेश दे पा रही है और न ही राज्य सरकारें नक्सलियों के खिलाफ किसी तरह की ठोस कार्रवाई कर रही है। सुस्ती दोनों ओर से है, यह चिंता का विषय है। आखिर हमारे जवान कब तक मरते रहेंगे और हम कब तक मौत की गिनती गिनते रहेंगे? उधर पाकिस्तानी सेना की हरकतें बढ़ती जा रही हैं। वह देश जानता है कि भारत कभी कुछ नहीं कर पाएगा। इसलिए हमें अपनी हरकतें जारी रखनी हैं। इधर नक्सली जो अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए माने जाते हैं, उनकी इस तरह की हरकतें यही बताती है कि वे अब अपनी दिशा से भटक रहे हैं। अत्याचार के विरोध में उठाया गया उनका परचम अब ध्वस्त हो चुका है। अब वे भी अत्याचारी की पंक्ति में खड़े हो गए हैं। उनकी इस हरकत से उनके समर्थक भी उनकी मुखालिफत करने लगे हैं। पूरे घटनाक्रम में सरकार और राज्य की ढिलाई और सुस्ती सामने आ गई है। भारत से सर से बिखरे हुए रुस का वरदहस्त अब काम नहीं आ रहा है। इसलिए अमेरिकी दादागिरी को सहना देश की विवशता है। रुस मजबूत होता, तो आज हालात दूसरे ही होते। सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह के जोशीले बयान कुछ आशा बंधाते हैं, पर वे भी कहीं न कहीं किसी के प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए कहा नहीं जा सकता कि उनकी फडु़कती भुजाएं कुछ विशेष कर पाएंगी। जब हमारे रक्षा मंत्री सख्त नहीं हुए, तो सेनाध्यक्ष के सख्त होने से क्या होगा? ढीले-ढाले, सुस्त बयान से किसी को हिम्मत तो कभी नही आ सकती, अलबत्ता बढ़ी हुई हिम्मत  कम अवश्य हो सकती है। जब सेना के जवानों का खून खौल रहा था, तब दिल्ली से सुस्त बयान आ रहे थे। आखिर सेना के जवानों की हिम्मत जवाब दे गई।
उधर पाकिस्तान की नापाक हरकतों से पूरा देश बौखला रहा है। युवाओं का खून खौल रहा है। पर हम अब भी लाचार हैं। हर कोई यही सोच रहा है कि आखिर हम इतने लाचार क्यों हैं? कहा गया है कि कमजोरी एक बुराई है। इसे ताकत समझना भूल होगी। पाकिस्तान की अक्षम्य हरकत के खिलाफ हमने केवल बहुत ही नम्रता से अपनी बात कही है। स्पष्ट है कि उसे हमारी कोई चिंता नहीं है। सब कुछ अमेरिका पर ही निर्भर है। अब हमारा जमीर खौलने लगा है। पर हम लाचार हैं कुछ नहीं कर सकते। हमारी इसी लाचारगी का फायदा उठा रहा है पाकिस्तान। भारत आखिर क्यों कुछ नहीं कर पा रहा है, यह जानने को सभी बेताब हैं। बात यह है कि सन 2001 में जब हमारी संसद पर हमला हुआ था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि इसका करारा जवाब दिया जाएगा। इसके लिए वे तैयार भी थे कि अमेरिका से एक फोन आया। फिर वाजपेजी कुछ नहीं कर पाए। कुछ  इसी तरह का फोन अभी आया होगा, इसलिए भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाने की घोषणा नहीं की है। पाकिस्तानी हरकतों का कई देशों ने विरोध किया है। पर अमेरिका ने जिस तरह से अपना बयान दिया है, उससे लगता है कि वह इस हरकत के लिए पाकिस्तान को डरा भी नहीं सकता। अमेरिका का इस दिशा में बहुत ही कोमल व्यवहार यही दर्शाता है कि उसने भारत को भी इस दिशा में कुछ न करने के लिए कहा होगा। अब यह तय हो गया है कि पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध न करना हमारी मजबूरी है।
जर्मनी के चिंतक नीत्शे ने कहीं कहा है-विकलिंग इज एविल यानी कमजोरी एक तरह की बुराई है। यह बात हमारे नेताओं पर अच्छी तरह से लागू होती है। अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर जाकर समझौता कर आए और उसके बाद हमारे नेताओं ने यह तय कर लिया कि किसी भी हालत में हमारे संबंध पाकिस्तान से खराब नहीं होने चाहिए। पाकिस्तान एक के बाद एक हमारी पीठ पर खंजर घोंपता रहे, हम उससे माफी मांगते रहे। पाकिस्तान का दु:साहस इसी का परिणाम है। वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ भाईचारे की जो नीति शुरू की थी, उसे ही आगे बढ़ा रहे हैं हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह। इस नीति पर सन 2008 में एक छोटा सा विचलन आया था, पर अमेरिकी दबाव के कारण वह फिर मैत्री संबंध में बदल गई। दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ से सीमा पर तमाम समझौतों का उल्लंघन जारी है। पिछले एक महीने में पाकिस्तान सैनिकों द्वारा करीब एक दर्जन बार नियंत्रण रेखा पार की गई है। हर बार हम कमजोर साबित हुए, इसीलिए इस बार उसने भारतीय सैनिकों का गला ही काट दिया। एक सैनिक का माथा ही ले गए। अब वह हम पर आरोप लगा रहा है कि हमारे सैनिकों ने एक पाकिस्तानी सैनिक की हत्या की है। भारतीय सैनिकों की हत्या कर इस बार पाकिस्तानी सैनिकों ने सीमा पर जश्न मनाते हमारे सैनिकों ने देखा। सोचो, क्या गुजरी होगी हमारे सैनिकों के दिलों पर? हमारी कमजोरी इतनी अधिक कमजोर हो गई है कि हम विरोध करना ही भूल गए हैं। ये हमारे सैनिकों की कमजोरी नहीं, बल्कि लगातार  दूसरों पर आश्रित होने के कारण हमारे नेताओं की कमजोरी है, जो बार-बार सामने आ रही है।
आखिर भारत के प्रति पाकिस्तान इतना अधिक आक्रामक क्यों है? इसके दो कारण हैं, पहला तो यही कि अब अमेरिका पाकिस्तान को फिर से सैन्य सहायता दे रहा है, अमेरिकी सैनिकों के बल पर ही पाकिस्तान इतना इतरा रहा है। वास्तविकता यह है कि अब अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिक लौटने लगे हैं। उसे भारतीय उपमहाद्वीप पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिए पाकिस्तान की विशेष आवश्यकता है। इसीलिए अमेरिका ने हाल ही में पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर की सैन्य सहायता की है। दूसरा कारण यह है कि अमेरिका के शस्त्रों के सौदागर पाकिस्तान द्वारा भारतीय सीमा पर बार-बार घुसपैठ की जा रही है, इस कारण दोनों देशों के बीच तनाव कायम है। इस तनाव के कारण भारत को अमेरिका जैसे देशों से अरबों डॉलर के शस्त्र खरीदने पड़ रहे हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव हमेशा कायम रहें, यह अमेरिका चाहता है। उसकी मंशा यह है कि दोनों छोटी-छोटी बातों पर उलझते रहें, पर कभी युद्ध न करें। यदि दोनों के बीच युद्ध छिड़ जाए, तो दोनों देशों में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का धंधा ही चौपट हो जाएगा। जब भी भारत पाकिस्तानी हरकतों को देखते हुए सख्ती की, अमेरिका ने भारत का कान उमेंठा। हमारे नेता भी अमेरिका के सामने इतने अधिक दबे हुए हैं कि उसकी तमाम आज्ञाओं को शिरोधार्य करते हैं। पाकिस्तान बार-बार सीमाओं का उल्लंघन करता रहा है, हम शांति वार्ता से, क्रिकेट से, कलाकारों को परस्पर भेजने आदि से माहौल को खुशगवार बनाने की कोशिश करते रहे। हमारी इन कोशिशों को पाकिस्तान ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। आतंकवाद को पीछे धकेलकर हम शांति वार्ता करते रहे, यही हमारी सबसे बड़ी भूल थी। दूसरी भूल यह थी कि पाकिस्तान को आतंकवाद का दर्जा दिलाने के लिए हमारी कोई कोशिश कामयाब नहीं हो पाई, तीसरी भूल पाकिस्तान के साथ क्रिकेट जारी रखना थी, चौथी भूल दोनों देशों के बीच वीजा नियमों को हलका करना थी। ये सभी राहतें पाकिस्तान को हमने बिना मांगे दी। इससे वह यह मान बैठा कि भारत को गरज है, इसलिए वह ऐसा कर रहा है। रजनीति का यह नियम है कि शत्रु देश जब कमजोरी का प्रदर्शन करे, तब उसे दबाया जाए। बस पाकिस्तान यही कर रहा है।
अब समय है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध छेड़ देना चाहिए। हालांकि इसकी कोई हिमायत नहीं कर रहा है। युद्ध किए बिना ही ऐसे कई दबाव हैं, जिससे बढ़ाया जा सकता है। भारत ने यह सब न करते हुए इस मामले पर पाकिस्तानी राजदूत को बुलाकर अपना विरोध ही चुपचाप दर्ज करवा दिया। ऐसा विरोध क्या काम का? इसे बांझ विरोध कहा जा सकता है। हमारा विरोध इतना अधिक प्रचंड होना था कि दुश्मन देश को माफी मांगने की नौबत आ जाए। पर हुआ इसके विपरीत। वह तो अब और गरियाने लगा है। हमारी लाचारगी यही बताती है कि भारत एक स्वतंत्र देश नहीं, बल्कि अमेरिका का एक खंडित राज्य है। भारत की विदेश नीति दिल्ली में नहीं, बल्कि वाशिंगटन में तय होती है। भारत-पाकिस्तान अमेरिका की कठपुतलियां हैं। भारत के नेता तो अमेरिका से पूछे बिना पानी तक नहीं पीते। इस हालात में भारत के बहादुर सैनिकों के पास अपमान का घूंट भरकर रह जाने के सिवाय और कोई चारा ही नहीं है। सैनिक तो मरने के लिए ही होते हैं, पर उनकी दर्दनाक मौत किसी को भी सहन नहीं होती।
    डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 14 जनवरी 2013

अनुशासन सिखाती पतंग


http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2013-01-14&pageno=9#

अनुशासन सिखाती पतंग
डॉ महेश परिमल
 सूर्य उत्तरायण हो गया है। गुजरात और राजस्थान में लोगों के अगले कुछ दिन घर की छत पर ही गुजरेंगे। लोगों में एक उत्साह, जोश, उमंग और स्फूर्ति होती है इन दिनों में। वैज्ञानिक कहते हैं, इस समय वातावरण में कुछ ऐसी ऊर्जा होती है जो आंखों को राहत पहंुचाती है। इसलिए लोग पतंग के बहाने आकाश को निहारते हैं। तब आंखों को ठंडक पहुंचती है। रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर हर किसी का मन ललचाता है। इस पतंग से हम अनुशासन का सबक सीख सकते हैं। पतंग के हर दांव-पेच का हमारे जीवन पर असर हो सकता है। पतंग को अनुशासन से जोड़कर देखें तो सब-कुछ समझ में आ जाएगा। अनुशासन कई लोगों को एकबारगी बंधन लगता है, पर सच यह है कि यह अपने आप में एक मुक्त व्यवस्था है जो जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए अत्यावश्यक है। बरसों बाद जब मां अपने बेटे से मिलती है तब उसे वह कसकर अपनी बाहों में भींच लेती है। क्या थोड़े ही पलों का वह बंधन सचमुच बंधन है? क्या आप बार-बार इस बंधन में नहीं बंधना चाहेंगे? यहां यह कहा जा सकता है कि बंधन में भी सुख है। यही अनुशासन है। अनुशासन को यदि दूसरे ढंग से समझना हो तो हमारे सामने पतंग का उदाहरण है। पतंग काफी ऊपर होती है। डोर ही होती है जो उसे संभालती है। बच्चा यदि पिता से कहे कि यह पतंग तो डोर से बंधी है, तब यह कैसे मुक्त आकाश में विचर सकती है? तब यदि पिता उस डोर को ही काट दे तो बच्चा कुछ ही देर में पतंग को जमीन पर पाता है। बच्चा जिस डोर को पतंग के लिए बंधन समझ रहा था, वह बंधन ही था, जो पतंग को ऊपर उड़ा रहा था। वही बंधन अनुशासन है। अनुशासन ही होते हैं, जिससे मानव आधार प्राप्त करता है। क्या आपने पतंग को आकाश में कभी मुक्त उड़ते देखा है? क्या कभी सोचा है कि इससे जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है? गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उड़ाने की परंपरा है। लोग पूरे दिन पतंग उड़ाते हैं। पतंग का यह त्योहार अपनी संस्कृति की विशेषता ही नहीं दिखलाता, बल्कि आदर्श व्यक्तित्व का संदेश भी देता है। पतंग का आशय है अपार संतुलन, नियमबद्ध नियंत्रण, सफल होने का आक्रामक जोश और परिस्थितियों के अनुकूल होने का अद्भुत समन्वय। वास्तव में देखा जाए तो गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में पतंग जैसा व्यक्तित्व उपयोगी बन सकता है। पतंग का ही दूसरा नाम है, मुक्त आकाश में विचरने की मानव की सुषुप्त इच्छाओं का प्रतीक। इसके साथ ही पतंग आक्रामक एवं जोशीले व्यक्तित्व की भी प्रतीक है। उसका कन्ना संतुलन की कला सिखाते हैं। कन्ना बांधने में थोड़ी-सी भी लापरवाही होने पर पतंग यहां-वहां डोलती है। यानी सही संतुलन नहीं रह पाता। इसी तरह हमारे व्यक्तित्व में भी संतुलन न होने पर जीवन गोते खाने लगता है। इसलिए व्यक्तित्व में संतुलन होना बेहद जरूरी है। आज के इस तेजी से बदलते आधुनिक परिवेश में प्रगति करनी है तो काम के प्रति समर्पण भावना भी उतनी ही आवश्यक है। साथ ही परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना और उसे निभाना भी जरूरी है। इन परिस्थितियों में नौकरी, व्यवसाय और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन रखना अतिआवश्यक हो जाता है, इसमें हुई थोड़ी-सी लापरवाही जिंदगी की पतंग को असंतुलित कर देती है। पतंग से सीखने लायक दूसरा गुण है नियंत्रण। खुले आकाश में उड़ने वाली पतंग को देखकर लगता है कि वह अपने-आप ही उड़ रही है, लेकिन उसका नियंत्रण डोर के माध्यम से उड़ाने वाले के हाथ में होता है। डोर का नियंत्रण ही पतंग को भटकने से रोकता है। हमारे व्यक्तित्व के लिए भी एक ऐसी ही लगाम की आवश्यकता होती है। निश्चित लक्ष्य से दूर ले जाने वाले अनेक प्रलोभनरूपी व्यवधान हमारे सामने आते हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्व नियंत्रण और अनुशासन ही हमारे जीवन की पतंग को निरंकुश बनने से रोक सकता है। पतंग की उड़ान भी तभी सफल होती है, जब प्रतिस्पद्र्धा में दूसरी पतंग के साथ उसके पेच लड़ाए जाते हैं। पतंग के पेच में हार-जीत की जो भावना देखने में आती है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिले। पतंग किसी की भी कटे, खुशी दोनों को ही होती है। जिसकी पतंग कटती है वह भी अपनी पतंग कटने का गम भूलकर दूसरी पतंग का कन्ना बांधने में लग जाता है। यही व्यावहारिकता जीवन में भी होनी चाहिए। अपना गम भूलकर दूसरों की खुशियों में शामिल होना और एक नए संकल्प के साथ जीवन की राहों पर चल निकलना ही इंसानियत है। पतंग का आकार भी उसे एक अलग ही महत्व देता है। हवा को तिरछा काटने वाली पतंग हवा के रुख के अनुसार खुद को संभालती है। आकाश में अपनी उड़ान को कायम रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहने वाली पतंग हवा की गति के साथ मुड़ने में जरा भी देर नहीं करती। हवा की दिशा बदलते ही वह भी अपनी दिशा तुरंत बदल देती है। इसी तरह मनुष्य को परिस्थितियों के अनुसार ढलना आना चाहिए। जो लोग खुद को समय और हालात के अनुसार नहीं ढाल पाते वे आउट डेटेड बन जाते हैं और हमेशा गतिशील रहने वाले एवरग्रीन होते हैं। यह सीख हमें पतंग से ही मिलती है। पतंग उड़ाने में सिद्धहस्त व्यक्ति यदि जीवन को भी उसी अंदाज में ले तो वह जीवन की राहों में सदैव अग्रसर होता चला जाएगा। बस थोड़ा-सा संभलने की बात है। जीवन की डोर यदि थोड़ी भी कमजोर हुई तो जीवन ही जोखिम में पड़ जाता है। इसीलिए पतंग उड़ाने वाले हमेशा खराब मांजे को अलग कर देते हैं, जिसका उपयोग कन्ना बांधने में किया जाता है। उस धागे से पेच नहीं लड़ाए जा सकते। ठीक उसी तरह जीवन में भी उसी पर विश्वास किया जा सकता है, जो सबल हो, जिस पर जीवन के अनुभवों का मांजा लगा हो, वही व्यक्ति हमारे काम आ सकता है। उसके अनुभवों से हमें सीखने को मिलता है। धागों में कहीं भी अवरोध या गांठ का होना पतंगबाजों को शोभा नहीं देता, क्योंकि यदि पेच लड़ाते समय प्रतिद्वंद्वी का धागा उस गांठ के पास आकर अटक गया तो समझो कट गई पतंग। पतंग का धागा वहीं रगड़ खाएगा और डोर काट देगा। जीवन भी यही कहता है। जीवन में मोहरूपी अवरोध आते ही रहते हैं, लेकिन सही इंसान इस मोह के पड़ाव पर नहीं ठहरता, वह सदैव मंजिल की ओर ही बढ़ता रहता है। चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी यही मूलवाक्य होना चाहिए। 25 या 50 पैसे से शुरू होकर पतंग हजारों रुपयों की भी मिलती है। इसी तरह जीवन के अनुभव भी हमें कहीं भी किसी भी रूप में मिल सकते हैं। छोटे से बच्चे भी प्रेरणा के स्त्रोत बन सकते हैं, तो झुर्रीदार चेहरा भी हमें अनुभवों के मोती बांटता मिलेगा। हमें इनसे कैसे और कब ये अनुभव लेने हैं, इस पर नजर रखनी होगी। वैसे ही जैसे आकाश में उड़ती पंतगों पर नजर रखते हैं कि कब और कौनसी पतंग से पेच लड़ाने हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह से अनुभवों के मोतियों को समेटते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

रविवार, 13 जनवरी 2013

बलात्‍कार- कानून के रास्‍ते में कई अवरोध कायम





बलात्‍कार- कानून के रास्‍ते में कई अवरोध कायम 
दिल्ली की घटना के बाद बलात्कार कानून को कड.ा बनाने की मांग उठने लगी है. यह जरूरी भी है, क्योंकि कानून के लचीलेपन से अपराधियों में डर नहीं है. लेकिन कानून कडे. कर देने से ही बात नहीं बनने वाली. हाइकोर्ट के वकीलों के अनुसार, बलात्कार पीड.िता के बयान की पुष्टि, मेडिकल जांच और घटनास्थल के सबूतों के आधार पर होती है. यदि सबूत के तौर पर मिले प्रमाणों को प्रस्तुत किया जाये, तो युवती का केस मजबूत हो जाता है. पर विडंबना है कि अधिकांश मामलों में ये प्रमाण रफा-दफा कर दिये जाते हैं. इससे जांच की दिशा बदल जाती है. महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो जाने पर केस मजबूत नहीं रह पाता. भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अनुसार युवती की इच्छा के विरु द्ध उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया जाना ही बलात्कार है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है- ‘युवती की सहमति’. इस शब्द के फेर में कई बार युवती के सारे आरोप झुठला दिये जाते हैं और अपराधी निर्दोष बरी हो जाता है. शारीरिक संबंध दोनों की मंजूरी से स्थापित किया गया, इसके सबूत के लिए अदालत में युवक-युवती के बीच एसएमएस का लेन-देन या फिर मोबाइल पर की गयी बातचीत को उनके बीच गाढ.ी मित्रता के तौर पर दिखाया जाता है. ऐसे सबूतों पर वकील यह दलील देते हैं कि गाढ.ी मित्रता का होना इस बात का प्रतीक नहीं है कि संबंधित युवक को युवती से जबरदस्ती करने की छूट मिल जाती है.

हमारे देश में बलात्कार को लेकर कानून में बहुत से सुधार किये गये हैं. पहले चरण में कानून पीड.िता के साथ होता है. आइपीसी की धारा 376 में 1983 में संशोधन किया गया. इसमें यह आग्रह रखा गया कि बलात्कारी को कम से कम सात वर्ष की कैद की सजा होनी चाहिए. धारा 114-ए में भी यह बताया गया है कि यदि बलात्कार की पीड.िता यह कह दे कि उसके साथ शारीरिक संबंध उसकी सहमति के बिना स्थापित किया गया है, तो कोर्ट को उसकी बात मान लेनी चाहिए. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार समाज एवं लोक लाज के भय से कई मामलों की एफआइआर दर्ज नहीं होती. यही वजह है कि 70 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं हो पाते.

महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था की स्वयंसेविकाओं का कहना है कि अधिकांश मामलों में पुलिस मुस्तैदी से जांच नहीं करती. यदि पीड.िता आदिवासी या पिछडे. समाज की है, तो इसके प्रति पुलिस का रवैया पूर्वाग्रह ग्रस्त होता है. दूसरी ओर चिकित्सकों के अनुसार किसी युवती का बलात्कार किया गया है, इसे सिद्ध करने के लिए घटना के 48 घंटे के अंदर पीड.िता की मेडिकल जांच हो जानी चाहिए. ऐसा न होने पर फोरेंसिक लेबोरेटरी सही रिपोर्ट नहीं दे सकती. डॉक्टर कहते हैं कि यदि ताकत के बल पर बलात्कार का शिकार बननेवाली युवती वास्तव में कुंवारी है और उसके अंगों में चोट के निशान मिलते हैं, तो उस पर बलात्कार होना सिद्ध होता है. परंतु यदि युवती विवाहिता है, तो उसके साथ बलात्कार को सिद्ध करना संभव नहीं है.

एक बार कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर बिल 2008 का सुधरा हुआ रूप अमल में आ जाये, तो बलात्कार का शिकार बनी महिलाओं को राहत मिलेगी. इस विधेयक में यह है कि बलात्कार के मामले की सुनवाई दो महीने के भीतर की जाये. इसके लिए केवल महिला जज की ही नियुक्ति की जाये. साथ ही पीड.ित युवती का बयान उसके माता-पिता या समाज सेवक के सामने ही लिया जाये. महिला संगठनों का कहना है कि बचाव पक्ष के वकील पीड.िता से उसके निजी जीवन पर कई ऐसे प्रश्न पूछते हैं, जिसका जवाब अदालत में देना संभव नहीं है. यदि इस तरह के मामलों की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हो, तो पीड.िता को बार-बार अदालत के चक्कर नहीं काटने पडे.ंगे. यदि युवती से पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची वकील पहले ही जज को दे दे, ताकि जज ही तय कर ले कि कौन-कौन से सवाल इसमें है, तो युवती को उसका जवाब देने में आसानी होगी. उल्लेखनीय है कि निचली अदालतों में बलात्कार मामले में बलात्कार का विरोध किये जाने पर शरीर पर के निशान को सबूत माना जाता है. जबकि उच्च अदालत में ऐसी निशानी को सबूत नहीं माना जाता. कई मामलों में बलात्कार की शिकार युवती की शादी हो जाती है और उसका परिवार बस जाता है. इसके बाद यदि उस पर हुए अत्याचार का मामला सुलझता है, तो उसके लिए बच्चों को जवाब देना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में यदि फैसला उसके खिलाफ हो जाये, तो उसका बसा-बसाया परिवार ही उजड. जायेगा. इस संवेदनशील पहलू की तरफ भी सोचा जाना चाहिए, ताकि पीड.िता को न्याय मिल सके. देर से मिला न्याय किसी अन्याय से कम नहीं.

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

प्रजा के मिजाज के सामने सरकार लाचार

डॉ. महेश परिमल
वास्तव में देखा जाए, तो 2013 का प्रारंभ यूपीए सरकार के लिए फ्लॉप शो साबित हुआ। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार का मामला सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। एक तरफ बिना किसी नेतृत्व के जमा हुए आक्रोशित युवा थे, दूसरी तरफ बंधे हाथों में सरकार थी। सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी। सरकार भले ही विरोधियों के खिलाफ खुलकर सामने न पाई हो, फिर भी उसने कड़े निर्णय लेने के लिए कदम उठाया है। सरकार ने मेट्रो स्टेशन बंद करने और मीडिया को समझाने के प्रयास में सफलता पाई। प्रदर्शनकारियों को अधिक हाइलाइट न करने के लिए सरकार के मौखिक निर्देश को मीडिया ने मान भी लिया्र।
आज सरकार की हालत बहुत ही खराब है। चारों तरफ उसकी निंदा हो रही है। पिछले 15 दिनों से खासकर पिछले चार-पांच दिनों से दिल्ली में हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन से सरकार पसोपेश में है। युवाओं का गुस्सा आसमान पर है। सरकार युवाओं की बात तो मान रही थी, उनके प्रदर्शन को भी सही बता रही थी, फिर भी कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही है। इस दौरान सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे प्रदर्शनकारी युवाओं को किसी तरह का संतोष हो। सरकार तो संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए भी राजी नहीं हो पाई है। एक तरफ तो यही सरकार फांसी न देने वाले देशों का समर्थन कर रही है। दूसरी तरफ कसाब को फांसी देने में जल्दबाजी करती है। और जब बलात्कारियों को फांसी देने के लिए कहा जाता है, तो उससे बचने की कोशिश करती है। सरकार दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को भी बदलने के लिए तैयार नहीं है। सरकार इतनी अधिक भयभीत है कि वह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी थोड़ी सी झिड़की भी नहीं दे पा रही है। पुलिस कमिश्नर संदीप दीक्षित की बदली का संकेत देकर भी वह ऐसा नहीं कर पाई। यह सरकार की विवशता है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी बलात्कारियों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग कर रहे हैं, पर सरकार इतनी भयभीत कि न तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर पा रही है और न ही कोई ऐसा निर्णय ले पा रही है, जिससे प्रदर्शनकारी संतुष्ट हो पाएं। यह सरकार का दुर्भाग्य है कि उसने जो भी काम किए, वह प्रजा की दृष्टि में पारदर्शक नहीं रहे। सरकार में इतनी हिम्मत भी नहीं है कि अपने द्वारा किए गए कार्यो को सही भी बता पाए। उसका कोई भी खुलासा जनता को रास नहीं आ रहा है। सरकार तो कसाब की फांसी में की गई जल्दबाजी में उठे सवालों का जवाब भी देने को तैयार नहीं है। केवल गुजरात चुनाव के मद्देनजर उसने वोट बटोरने के लिए यह किया, यह वह बताना नहीं चाहती, पर जनता अच्छी तरह से समझती है। इसलिए गुजरात चुनाव में उसने किस तरह से मुंह की खाई है, वह सभी जानते हैं। लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कसाब की मौत तो डेंग्यू से ही हो गई थी, फांसी तो उसके मृत शरीर को दी गई है। सरकार पसोपेश में तो थी ही, पर सभी चाहते थे कि कसाब को फांसी पर लटकाया जाए, इसलिए यह मामला ठंडा पड़ गया। विवाद अधिक लम्बा नहीं चल पाया।
इसी तरह गेंगरेप की शिकार युवती की हालत तो दिल्ली में ही खराब हो गई थी, उसके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, उसके बाद भी उसे सिंगापुर ले जाया गया। सरकार यह अच्छे से जानती थी कि यदि पीड़ता की मौत भारत में होती है, तो प्रदर्शनकारियों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए उसे देर रात सिंगापुर ले जाया गया। सिंगापुर से भी पीड़िता के स्वास्थ्य के बारे में कई जानकारियां मिलती रहीं, पर उसका भी अधिक खुलासा नहीं किया गया। उसकी मौत की खबर तब सामने आई, जब लोग अहमदाबाद में हुए पाकिस्तान के खिलाफ टी-20 में भारत की जीत की खुशी में लोग झूम रहे थे। सरकार की चालाकी काम आ गई। सरकार को यह विश्वास था कि प्रदर्शनकारी अब तक ठंडे पड़ चुके होंगे, इसलिए पीड़िता की मौत की घोषणा देर रात की गई। मौत की खबर सुनते ही इंडिया गेट और जंतर-मंतर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। रविवार को दस मेट्रो स्टेशन बद होने के बाद भी लोग उमड़ पड़े। ये सभी अपनी भीगी आंखों से दामिनी या फिर निर्भया को अपनी भावभीनी श्रद्धाजंलि देने के लिए आए थे।
पिछले 15 दिनों में देश भर में बलात्कार की कई घटनाएं सामने आई। लेकिन सभी दिल्ली के गेंगरेप के मामले में फीके साबित हुए। देश में जब भी महिला सशक्तिकरण की बात भाषणों और आलेखों के माध्यम से आती है, तब लोगों का भरोसा सरकार से उठने लगता है। देश भर में एक तरह से हिस्टीरिया जैसी स्थिति थी। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी शांत थे। पर इंडिया गेट पर थोड़े उग्र। पीड़िता की पीड़ा से लोग देश में ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार विदेशों में भी भारतीय लोग आहत थे। मलाला ने अपना बयान देकर सरकार को मुश्किल में डाल दिया। वह कहती रहीं कि बलात्कारियों ने पीड़िता को सड़क पर फेंका और सरकार ने उसे सिंगापुर में फेंका, दोनों में क्या फर्क रहा? भयभीत सरकार आखिर तक भयभीत ही बनी रही। वह न तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर पा रही थी और न ही कोई ऐसी घोषणा कर पा रही थी, जिससे लोगों का गुस्सा थोड़ा शांत हो। देश की राजनीति ही उलझन में थी। राजनेता संज्ञाशून्य। वे क्या कहते। हालात ऐसे हैं कि वे जो भी कहते, उसका अर्थ उल्टा ही निकल सकता था। भारत को हमेशा उदारवादी ही माना गया है। पर जनता ने सड़क पर आकर यह बता दिया कि अब उदारवादी बनने का समय नहीं है। कानून का ही सहारा लेकर लोग बलात्कार करके बच निकलते हैं। वे न्याय प्रक्रिया की धीमी गति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। सरकार की ढिलाई भी इस काम में अनजाने में ही मदद भी करती है। जो सरकार स्वयं महिला आरक्षण विधेयक को बरसों तक लटकाए रख सकती है, उससे यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वह महिलाओं के लिए कुछ ऐसा करेगी, जो महिलाओं के लिए हितकारी हो। इस बार जनता इतनी अधिक नाराज है कि वह बलात्कारियों को सरे आम फांसी देने की मांग कर रही है। पर क्या इस ढीली सरकार से यह अपेक्षा की जा सकी है? जनता से भयभीत होने वाली सरकार कभी सफल नहीं हो सकती, यह सच है। सरकार अपनी करतूतों के कारण भयभीत है। वह जनता के सवालों का जवाब देना नहीं चाहती। जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इसलिए कुछ नहीं कर सकती कि वे कतई गलत नहीं हैं। इसलिए सरकार ने प्रदर्शनकारियों के गुस्से को जायज ठहराया।
इतना बड़ा कांड हो गया, पर सरकार अभी तक उलझन से बाहर नहीं आ पाई है। हां यह बात ठीक हुई कि इस बार नए वर्ष को उल्लास और खुशी के साथ आने देने में आगे रही। लोग उतने उत्साह से नए साल का स्वागत नहीं कर पाए। पर इसके पीछे जनता की भावना ही थी। कई लोगों ने स्वयं ही यह फैसला ले लिया कि वे नए वर्ष पर खुशी नहीं मनाएंगे। बॉलीवुड भी पूरी तरह से शांत रहा। यह सरकार के लिए सोचने का समय है कि वह कुछ ऐसा करे, जिससे लोग सरकार की प्रशंसा करे, सरकार के कार्यों को सराहें। यदि पहला कदम वह यही उठाए कि जो भी बलात्कार के आरोपी सांसद हैं, उन्हें बर्खास्त करे, यह पहला कदम ही उसे जनता के करीब ला सकता है। पर अल्पमत वाली सरकार से भला ऐसी उम्मीद कैसे की जा सकती है? भयभीत सरकार, डरी-सहमी सरकार, अपनों से ही घिरी और अपनों में ही उलझी सरकार से किसी अच्छे की उम्मीद करना ही बेकार है।
  डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मजबूत हों संस्कारों के तटबंध


http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2013-01-07&pageno=9

मजबूत हों संस्कारों के तटबंध
 डॉ. महेश परिमल
 देश में कोई घटना हो या दुर्घटना, बयानवीर नेताओं को तो बोलना ही है। वह भी बेहूदा तरीके से, ताकि बयान सुर्खियां बन जाएं। मानव की सोच उसके विचार से स्पष्ट होती है और सोच तैयार होती है संस्कार से। आज की पीढ़ी इतनी संस्कारवान तो है कि अपनी प्रेमिका की जान बचाने के लिए जूझ सकती है। पीठ दिखाकर भागने वाली पीढ़ी नहीं है यह। पर यह तो सोचिए कि क्या मोमबत्ती जलाने से सोच बदली जा सकती है? सोच बदलने के लिए अच्छे संस्कार होने चाहिए। एक मां अपनी कोख से बेटे को जन्म देती है और बेटी को भी। आगे चलकर बेटे को स्वतंत्रता और बेटी को जंजीरें मिलती हैं। आखिर इसका क्या कारण है? संस्कार की गलत शुरुआत तो यहीं से हो रही है। आज सोचने का वक्त पालकों का है। हमारे देश के नेताओं को ऐसे संस्कार मिले ही नहीं, यह तो उनके बयानों से ही स्पष्ट हो जाता है। नेता हमेशा यही कहते हैं कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया। किसी विवादास्पद बयान के बाद हर नेता यही कहता है कि उनके पूरे बयान पर ध्यान नहीं दिया गया। दुष्कर्म जैसी घटना नृशंस है, अमानवीय है और दुष्कर्मी कड़ी से कड़ी सजा का पात्र है। दुष्कर्म क्यों होते हैं, यह सभी जानते हैं। पर इसे रोकने के लिए क्या करना चाहिए, इस पर विचार नहीं किया जा रहा है। ये बयानवीर नेता दुष्कर्म के लिए केवल महिला को ही दोषी मान रहे हैं। क्या इसके लिए केवल और केवल महिला ही दोषी है? ये नेता भूल जाते हैं कि दुष्कर्म के आरोपी सांसद-विधायक भी हैं, जो उनके साथ संसद और विधानसभा में आजतक बैठ रहे हैं। नेताओं के बयान खाप पंचायतों के मनसबदारों की तरह हैं, जो आज भी पुरातत्वकालीन युग में जी रहे हैं। दुष्कर्म को लेकर आज जो भी बयान सामने आ रहे हैं, वे सभी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। सोच बदलने की बात कोई नहीं कर रहा है। पहले नेताओं के बारे में यह कहा जाता था कि वे जब भी जो कुछ कहते हैं, पूरी तरह से नाप-तौलकर बोलते हैं। पर अब ऐसा नहीं है। अब तो बड़े-बड़े महारथी नेताओं की जुबान फिसलने लगी है। उन्हें खुद ही पता नहीं होता कि वे क्या कह रहे हैं। बाद में पछताते हैं और अपने बयान वापस लेने का ढोंग करते हैं। शायद उन्हें नही मालूम की बंदूक से निकली गोली और जबान से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते। आज सबसे अधिक जरूरत यह है कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को किस तरह से रोका जाए। ऐसे में हमारे बयानवीर नेता अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। विचार मंथन के समय ऐसी हरकतों शोभा नहीं देती। इन नेताओं को शायद इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर भीड़ कम होने का ही इंतजार था। भीड़ घटी और नेता फट पड़े। मध्य प्रदेश के उद्योग मंत्री कैलास विजयवर्गीय ने कहा कि यदि नारी लक्ष्मण रेखा पार करेंगी तो रावण ही मिलेगा। यदि वे इसे दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म से जोड़कर कह रहे हैं तो सवाल यह उठता है कि दामिनी ने कौन-सी लक्ष्मण रेखा पार की थी, जो उसे छह-छह रावण मिले? आज नारी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है और समाज को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है। ऐसे में इस तरह का बयान मूर्खतापूर्ण है। यदि सीता ने लक्ष्मण रेखा पार की थी तो क्या उसे पूजा नहीं जाना चाहिए। आखिर उनकी पूजा क्यों हो रही है? सीता के बजाय रावण की हरकतों पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्या रावण के लिए लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? नारी पर हर तरह से बंदिशें लगाई जा रही हैं, पर पुरुष आज तक अपनी मनमानी कर रहा है। देश में दुष्कर्म की घटना एक सामाजिक रोग है। इसे भौगोलिक सीमा में नहीं बांधना चाहिए। इसे पाश्चात्य संस्कृति से भी जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नारी अत्याचार को लेकर पहले अपनी सोच बदलनी होगी। इसे संस्कार से जोड़कर देखा जाना चाहिए। राम बनने के लिए कौशल्या जैसी मां और दशरथ जैसे पिता का होना जरूरी है। आज जवान बेटे की हरकतों से डरने वाले माता-पिता बेटे को अनजाने में किस तरह का संस्कार दे रहे हैं, किसी से छिपा नहीं है। बेटे को मिली छूट को ही देखकर बेटी भी यदि बगावत करे तो उस पर तुरंत ही पाबंदी लगा दी जाती है। नारी पहले से ही अपनी सीमाओं में है, पर पहले पुरुष तो अपनी सीमा तय करे। संस्कारों के तटबंध मजबूत होंगे, तभी सीमाएं सुरक्षित रह पाएंगी। अन्यथा, आज जो कुछ हो रहा है, हालात उससे भी बदतर हो सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2013-01-07&pageno=9

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

टीवी के भ्रामक विज्ञापनों से सावधान!

डॉ. महेश परिमल
हाल ही में स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली और झूठे दावे कर अपना माल बेचने वाली 38 कंपनियों पर कानूनी कार्रवाई की गई है। ये कंपनियां टीवी पर झूठा दावा कर अपने उत्पाद का विज्ञापन करती थीं। आज हमारे मनोरंजन का एक सहारा टेलीविजन ही है। पर इस माध्यम पर आजकल विज्ञापन हावी होने लगे हैं। टीवी पर इतने अधिक विज्ञापन आते हैं कि बच्चे अब यह तय करने लगे हैं कि घर में कोई नई चीज आएगी, तो वह किस तरह की होगी। वह किस कंपनी की होगी। उसका क्या मॉडल होगा। इस तरह से कंपनियां झूठे वादे कर उपभोक्ताओं को भ्रमित करती हैं। इसके सबसे अधिक शिकार होते हैं बच्चे। क्योंकि बच्चों का काफी समय टीवी के सामने ही गुजरता है। विज्ञापनों का जाल अब शालाओं तक पहुंचने लगा है। कंपनियां स्कूलों में जाकर अपने उत्पाद का विज्ञापन करती हैं। टूथपेस्ट बेचने वाली कंपनियां तो बरसों से स्कूलों में जाकर छोटी साइज का पेस्ट और ब्रश बांटती हैं। इस तरह से अनजाने में बच्चे भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फंस रहे हैं।
कोई व्यापारी यदि अपना माल झूठ बोलकर बेचे तो इस ठगी माना जाता है। इस पर धारा 420 के तहत कानूनी कार्रवाई होती है। पर टीवी पर झूठे दावे करने वाली कंपनियां अपना उत्पाद वर्षो से बेच रही हैं, पर आज तक किसी भी कंपनी पर कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है। इसकी वजह साफ है, वह यह कि हमारे देश को कई मामलों में प्रयोगशाला समझा जाता है। कई दवाओं ही नहीं, बल्कि कई उत्पादों को प्रयोग के बतौर हमारे देश में ही बेचा जाता है। टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों को देखकर यह नहीं लगता है कि हमारे देश में सरकार ने फूड सेप्टी एंड स्टेंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया नाम एक कानूनी संस्था भी बनाई है। यह जानकारी न तो टीवी के दर्शकों को है और न ही सामान्य नागरिकों को। इस संस्था का काम है कि लोगों को भ्रामक विज्ञापनों से बचाना, उससे दूर रहने की सलाह देना और ऐसे विज्ञापनों पर नियंत्रण रखना। तय है कि यह संस्था अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा के साथ नहीं निभा रही है, इसीलिए आज टीवी पर बेतहाशा भ्रामक विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं। संस्था सक्रिय होती तो कई विज्ञापन बंद हो जाते। पर वे आज भी दिखाए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी कोई क्रीम हो ही नहीं सकती, जिससे काली चमड़ी गोरी हो जाती हो। इसके बाद भी टीवी पर कई क्रीम के विज्ञापन दिखाए जाते हैं, जो काली चमड़ी को गोरी बनाने का दावा करते हैं। दूसरी तरफ डॉक्टर भी कहते हैं कि एक निश्चित उम्र के बाद किसी इंसान की लंबाई नहीं बढ़ती। इसके बाद भी ऊंचाई बढ़ाने वाली कई कंपनियों के विज्ञापन टीवी पर दिखाए जा रहे हैं। इस तरह के भ्रामक विज्ञापन दिखाकर ये कंपनियां अरबों रुपए का व्यापार कर लेती हैं और हमारी सरकार को इसका पता भी नहीं चलता। बरसों से इन कंपनियों का गोरखधंधा चल रहा है। हाल ही देश की फूड सेप्टी एंड स्टेंडर्ड अथारिटी ने प्रचार माघ्यमों से झूठा दावा करने वाली 38 कंपनियों पर कानूनी कार्रवाई की है। टीवी के दर्शकों को इन चीजों की सूची को टीवी सेट  पर चस्पा कर देना चाहिए। इस सूची को देखें, तो स्पष्ट होगा कि कंपनियां हमें किस तरह से मूर्ख बनाकर करोड़ों रुपए कमा चुकी हैं। उदाहरण के लिए कोम्प्लान कंपनी के विज्ञापन में यह दावा किया जाता है कि जो बच्चे इस कंपनी का टॉनिक लेते हैं, वे दूसरे बच्चोंे की अपेक्षा तेजी से बढ़ते हैं। यह दावा प्राथमिक दृष्टि से ही गलत साबित होता है। कंपनी ने इस दावे की पुष्टि करने के लिए कोई शोध नहीं किया है। इसके अलावा एक अन्य कंपनी यह दावा करती है कि उसके उत्पाद के सेवन से याददाश्त बढ़ती है। इसके लिए कंपनी केवल दावा करती है, कोई प्रमाण नहीं देती। इसे देखते हुए इन कंपनियों पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा हॉर्लिक्स और बूस्ट का उत्पादन करने वाली ग्लेक्सो स्मिथक्लिन कंपनी का यह दावा भी झूठा साबित हुआ कि उसके उत्पाद बच्चों को मजबूत बनाते हैं।
बच्चों को यदि सचमुच मजबूत बनाना है तो उसके लिए बाजार से महंगे टॉनिक खरीदने के बजाए उन्हें गाय का दूध पिलाया जाए। गाय के दूध से बने घी से रोज सुबह नाश्ते में हलुआ खिलाया जाए, ठंड में उड़द दाल और बाजरे का इस्तेमाल करते हुए उन्हें इसके व्यंजन खाने के लिए दिए जाएं, तो बच्चों में स्फूर्ति आती है, वे बलवान बनते हैं। उड़द दाल से बनी चीजें और चिक्की खाने से बच्चे हमेशा तरोताजा रहते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इन चीजों के विज्ञापन टीवी पर नहीं दिखाए जाते। जिसके विज्ञापन दिखाए जाते हैं, उनमें से अधिकांश हमारे लिए बेकार होती हैं। हमारे देश में लोग बरसों से नाश्ते में रोटी, पोहा, खाखरा,पूड़ी, जलेबी खाते आए हैं। इससे वे निरोगी भी रहते आए हैं। अब विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों को फ्लेक्स का चस्का लगाया जा रहा है। इसके लिए विदेशी कंपनी केलॉग्स कंपनी खूब परिश्रम कर रही है। उसके लेबल पर बहुत से फलों के चित्र दिखाए गए हैं। वास्तव में इसमे कोई फल होता ही नहीं। इस कंपनी को भी नोटिस दिया गया है।
टीवी पर ऐसी कई उत्पादों के विज्ञापन दिखाए जाते हैं, जिसमें पोषण, स्वास्थ्य एवं बुद्धि बढ़ाने का दावा किया जाता है। उनके दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। इसे प्रयोगों द्वारा साबित भी नहीं किया जाता। इसके बाद भी कंपनियां झूठे दावे कर भ्रामक विज्ञापन के सहारे अपने उत्पाद बेचती रहती हैं। हमारे सामने टीवी पर ऐसे कई विज्ञापन दिखाए जाते हैं, जिसमें प्रमुख हैं- इमामी, सोयाबीन तेल, सफोला का तेल, न्यूट्री चार्ज मेन, एंजिन सरसों तेल, केलॉग्स के स्पेशल के. ब्रिटानिया के न्यूट्री च्वाइस बिस्किट्स, टुडे प्रीमियम टी, न्यूट्री लाइट, रियल एक्टिव फाइबर, किसान क्रीम स्प्रेड, राजधानी बेसन, ब्रिटानिया विटा मारी मेगी और पेडियास्योर डिरंकस । ये सभी उत्पाद बनाने वाली कंपनियों पर झूठे और भ्रामक विज्ञापन प्रदर्शित करने के आरोप में नोटिस दिया गया है।
फूड सेप्टी एंड स्टैंडड़र्स अथारिटी ने हाल में अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत कर कई चौंकाने वाली हकीकतों का खुलासा किया है। कई समाजसेवा संस्थाओं ने अथारिटी पर यह आरोप लगाया वह झूठे और भ्रामक विज्ञापन कि दिखाने वाली कंपनियों के साथ मिल गई है, इसलिए अपना का पूरी मुस्तेदी के साथ नहीं कर पा रही है। भारतीय संविधान कहता है कि जो कंपनी झूठे और भ्रामक विज्ञापन जारी करती है, उसे दस लाख रुपए का दंड दिया जाएगा। पर उक्त 38 कंपनियों में से अभी तक किसी को भी दंड नहीं दिया गया है। अथारिटी उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह से नाकाम रही है। अभी तक केवल 19 कंपनियों को नोटिस दिया गया है और शेष 19 कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आश्चर्य इस बात का है कि इसके बाद भी टीवी पर झूठे और भ्रामक विज्ञापन पूरे जोर-शोर के साथ दिखाए जा रहे हैं।
 डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 2 जनवरी 2013

2012 यानी भ्रष्टाचार और बलात्कार का वर्ष

डॉ. महेश परिमल
वर्ष 2012 विदा हो चुका है। 2013 अपनी पूरी मस्ती के साथ आ चुका है। यह साल कैसा होगा, यह अभी तो नहीं कहा जा सकता? पर इतना तय है कि पिछले वर्ष का अंत जिस तरह से हमारे सामने आया, उससे यही लगता है कि यह साल हम सबके लिए चुनौतीपूर्ण है?  क्योंकि देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। केंद्रीय सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हो रही है। भ्रष्टाचार  बेलगाम है, अब बलात्कार की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से तेजी आ गई है। महंगाई अपना खेल खेल रही है। डीजल के दाम बढ़ने वाले हैं। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि 2013 कोई खुश खबरी लेकर नहीं आ रहा है। उसे तो आना ही है, वह आएगा भी। पर क्या हम उसका स्वागत उतनी शिद्दत से कर पाएंगे? नया वर्ष हमेशा नई चुनौतियां लेकर आता है। पर इस बार नया वर्ष पुरानी चुनौतियों को स्वीकार न करने के कारण दोगुनी चुनौतियों के साथ आएगा। निश्चित रूप से सरकार के लिए यह वर्ष काफी मुश्किलो से भरा होगा।
भारतीय प्रजा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। लोग सड़कों पर उतर आए थे। पर सरकर ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके। भ्रष्टाचार आज राजनीति में ही अधिक है, इसलिए अन्य क्षेत्रों में यह पसर रहा है। सरकार यहां भी नाकाम रही। वह अपने ही मंत्रियों को नहीं रोक पाई। दिसम्बर माह ने जाते-जाते देश के माथे पर बलात्कार का कलंक लगा दिया है। इस मोर्चे पर सरकार की नींद तब उड़ी, जब लोग सड़कों पर उतर आए। आठ दिन बाद तो प्रधानमंत्री ने अपनी सुस्त और मरियल आवाज में देश को संबोधित किया। उनके संबोधन से कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि वे देश के लिए थोड़े से भी चिंतित हैं। उनके संबोधन को दूरदर्शन ने भी गंभीरता से नहीं लिया, यह भी पता चल ही गया है। इस सरकार के बारे में यह कहा जाता है कि जो ेजानकारी देश के बच्चे-बच्चे के पास होती है, वह जानकारी सरकार को बहुत देर से मिलती है। आने वाले वर्ष में अब लोगों के पास चर्चा के लिए दो ही सबसे उपयुक्त विषय होंगे। पहला भ्रष्टाचार और दूसरा बलात्कार। भ्रष्टाचार के मामले में देश के युवा अन्ना हजारे के नेतृत्व में सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन बलात्कार के मामले पर देश के युवा स्व-प्रेरित होकर सड़कों पर उतर आए हैं। देश के लिए यह शर्मिदगी की बात है कि आंदोलन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा पानी की बौछारों, अश्रुगैस एवं लाठी का इस्तेमाल किया गया। इसमें दिल्ली पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध है। हर मामले में राजनीति की रोटी सेंकने वाले हमारे नेताओं ने इन युवाओं अपना समर्थन देना भी उचित नहीं समझा। जबकि चुनाव के वक्त यही नेता युवाओं को आगे बढ़कर देश की राजनीति की दिशा को मोड़ने वाली शक्ति के रूप में परिभाषित करते हैं। युवाओं के वोट की अपेक्षा रखने वाले यही नेता युवाओं को भगवान भरोसे छोड़कर अपनी कंदराओं में बैठे रहे। पुलिस दमन करती रही, नेता आराम फरमाते रहे। इस तरह से सरकार अपनी ही रक्षा कर रही थी। यह उसकी विवशता ही थी, क्योंकि युवाओं के सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं था। वह न तो बलात्कारियों को फांसी देने के पक्ष में थी और न ही कड़े दंड देने के पक्ष में। सरकार हमेशा की तरह इस मामले में बचाव की मुद्रा में ही दिखाई दी।
सरकार की ढिलाई इसी बात से सामने आती है कि पुलिस रिफार्म का मुद़दा पिछले 15 साल से सरकारी फाइलों में कैद है, वह आज तक बाहर नहीं आ पाया है। ऐसे अनेक फैसले फाइलों मे कैद हैं, जिन्हें बाहर आने का इंतजार है, पर सरकार इन्हें बाहर लाने की एक छोटी सी कोशिश भी नहीं कर पा रही है। पिछले साल अरबों रुपए भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गए, इस कारण महंगाई बढ़ गई। पर सरकार कुछ नहीं कर पाई। मामला चाहे 2 जी का हो,राष्ट्रमंडल खेलों का हो, या फिर कोयला खनन का हो। सरकार की विवशता ही सामने आई। सरकार का रुख हर मामले मे ंनरम ही रहा है। इसलिए अफसरों ने भी अपनी मनमानी शुरू कर दी है। मंत्री निरंकुश हो गए, तो अफसरों की मनमानी चलने लगी। सरकार का खौफ किसी को नहीं है। इसी तरह कानून तोड़ने वाले भी बेखौफ हैं। वे पुलिस कार्रवाई और धीमी चलने वाली देश की न्याय प्रक्रिया से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। इसलिए वे अपराध करने से पहले इसका अंजाम सोच लेते हैं। कई रसूखदार तो कानून को अपनी जेब में लेकर चलते हैं। कानून भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यही आम धारणा लोगों को अपराध करने के लिए प्रेरित करती है। गुजरात में भाजपा की शानदार जीत सरकर के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। वह अभी इसे पचा भी नहीं पाई थी कि दिल्ली में गेंगरेप हो गया। इस मामले में सरकार निर्णय लेने में कितनी सुस्त रही, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
हम भले ही 2012 को भ्रष्टाचार टू बलात्कार का वर्ष कहें, वास्तव में यह वर्ष सरकार की नाकामी का वर्ष साबित हुआ है। सरकार की व्यवस्था के खिलाफ रहा है। सरकार के तीनों स्तंभों के खिलाफ प्रजा के आक्रोश का रहा है। पुराने कानून-कायदों के निर्णयों में होने वाली देर और आतंकवादियों को फांसी देने में हीलहवाला के कारण प्रजा को बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ा है। दिल्ली गेंगरेप की शिकार युवती अभी सिंगापुर में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। इस बीच यदि उसे कुछ हो गया, तो सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। पहले भी वह जवाब नहीं  दे पा रही थी, उसके बाद भी जवाब नहीं दे पाएगी। इस मामले में कई विवाद सरकार की राह देख रहे हैं। अभी दिल्ली के ये हाल हैं कि वह युवा आक्रोश से उबल रही है। पिछले कुछ समय से खाड़ी देशों में भी युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन किया था। शासक के खिलाफ जो जो खाड़ी के देशों में है,वह जोश अभी हमारे देश के युवाओं में देखने में नहीं आया है। पर हालात यही रहे, तो तय है कि यही युवा आक्रोश देश को नई दिशा देगा।
   डॉ. महेश परिमल

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