शुक्रवार, 28 जून 2013

दीपावली पर दिखेगा महंगाई का रौद्र रूप

डॉ. महेश परिमल
रुपया लगातार टूट रहा है, सरकार के माथे पर चिंता की रेखाएं गाढ़ी होती दिख रही हैं। रोजमर्रा के जीवन में लगातार टूटने वाला रुपया गंभीर असर दिखाएगा। टूटते रुपए को अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया है, पर जब यह आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने लगे, तब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि रुपया टूट रहा है, तो इसका असर आम लोगों पर क्या होगा और क्यों होगा? जब आम बजट आता है, तो उसमें बताया जाता है कि रुपया आता कहां से है और जाता कहां है। पर अभी जो रुपया है, वह लगातार घिस रहा है, इसका प्रभाव बहुत ही जल्द आम आदमी के जीवन में दिखाई देने लगेगा। रुपए का भाव गिरकर 62-63 तक पहुंच जाएगा। यह स्थिति दिसम्बर तक आएगी, तब चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। हालात यह होंगे कि सरकार के विरोध में मतदान होगा। सभी को याद है कि केवल प्याज के दाम बढ़ने से ही जनता दल सरकार गिर जाएगी। इसके पहले भी प्याज की बढ़ती कीमत ने दिल्ली सरकार बदल गई थी। दिसम्बर तक हालात ऐसे हो जाएंगे कि उस पर काबू करना मुश्किल होगा। तब तक संभवत: पेट्रोल-डीजल के भाव 10-15 रुपए तक बढ़ जाएं। निश्चित ही उस समय महंगाई का रौद्र रूप दिखाई देगा।
टूटता रुपया जितना वित्त मंत्रालय को प्रभावित करता है, उतना ही समाज कल्याण विभाग को भी प्रभावित करता है। यही नहीं इतना ही असर वह पेट्रोलियम मंत्रालय पर भी डालता है। जो कंपनियों विदेशी बैंकों से डॉलर लेती है, उन पर तो यह रुपया और अधिक असर दिखाएगा। एल्यूमिनियम जैसी धातु का आयात करने वाली कंपनियों का उत्पादन खर्च बढ़ेगा, फलस्वरूप टीवी, कार जैसी चीजों की कीमतों में बढ़ोत्तरी होगी। देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो यह सरकार के लिए भले ही परेशानी का कारण न हो, पर यदि उसका असर आम जीवन में पड़ता हो, तो यह निश्चित रूप से परेशानी का कारण है। एक तरफ प्रजा महंगाई से त्रस्त हो जाती है, तो दूसरी तरफ रुपया महंगाई का दबाव बढ़ाएगा। सरकार महंगाई पर काबू करने की कोशिश करेगी, निश्चित रूप से उसमें विफल भी साबित होगी,तो उसके खिलाफ विरोध शुरू हो जाएगा। सामने चुनाव होने के कारण सरकार कोई सख्त कदम भी नहीं उठा पाएगी, क्योंकि सहयोगी दल भी भावी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बनाएंगे,उसमें इस तरह के सख्त कदमों की आवश्यकता को ताक पर रख दिया जाएगा।
जो विद्यार्थी विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए मुसीबतों के दिन शुरू हो गए हैं। उनके लिए चारों तरफ से परेशानी ही परेशानी है। जो विदेशों में पढ़ाई की योजना बना रहे हैं, उनके लिए भी दिन अच्छे नहीं हैं। इन विद्यार्थियों को अब वीजा से लेकर कॉलेज फीस तक अध्किा चुकानी होगी। विदेश प्रवास से जुड़े एजेंट कहते हैं कि रुपए के टूटने से धंधे में मंदी आ गई है। यह सब तो उच्च वर्ग की बातें हैं, पर मध्यम और निम्न वर्ग के लिए रुपए का टूटना कमर तोड़ने जैसा है। सरकार किसी भी तरह से पेट्रो कंपनियों का घाटा सहन नहीं कर सकती। हम पेट्रोल की जितनी खपत करते हैं, उतना उत्पादन नहीं करते, इसलिए विदेशों से पेट्रोल मंगाना पड़ता है। रुपए की कीमत कम होने से अब वह भी महंगा हो गया है। इसलिए पेट्रोल महंगा होगा ही। यदि चुनाव को देखते हुए पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते, तो कंपनियों का घाटा बढ़ेगा, इस घाटे को सरकार उन्हें सबसिडी देकर कम करेगी। इसके बदले में सरकार न चाहते हुए भी प्रजा पर टैक्स का बोझ बढ़ाएगी। पेट्रोल-डीजल की कीमत पर निर्भर है, आवश्यक जिंसों की कीमत। निश्चित रूप से इनके भाव भी बढ़ेंगे। ऐसे में हवा सरकार के खिलाफ ही होगी। सरकार चाहे जितना भी दम लगा ले, महंगाई पर काबू नहीं पा सकती। प्रजा में सरकार का विरोध उनके द्वारा किए जाने वाले मतदान पर असर दिखाएगा।
महंगाई के बढ़ने के कारणों में से एक और कारण होगा, करंट एकाउंट डेफीशीट, यानी सीएडी, इसे भी समझना होगा। यह टर्म विदेशी चेक्स की आवक के साथ जुड़ी है। दूसरे शब्दों में इसे ट्रेड डेकीशीट कहा जा सकता है। यानी निर्यात की आवक और आयात की आवक के बीच का अंतर, इसमें एक्सपोर्ट सर्विस, नान रेसीडेंट भारतीय द्वारा भारत में भेजी गई राशि या फिर जो निवेश किया है आदि का समावेश होता है। सीएडी की ऊंची दर अर्थात आयात और निर्यात की आय में बढ़ने वाला अंतर। भारत में पिछले अक्टूबर-दिसम्बर के दौरान जीडीपी का 6.7 प्रतिशत सीएडी था। यूरोप और अमेरिका में भारतीया माल की मांग घटने से निर्यात भी घट गया। अब जब रुपया टूट रहा है, तब आयात महंगा साबित हो रहा है। विदेशी ब्रांड की चीजों का इस्तेमाल कम होगा, इसके साथ ही ई कामर्स में भी कटौती देखने को मिलेगी। टूटता रुपया अर्थतंत्र को भी तोड़ देगा, अभी तो मध्यम वर्ग कीमतों के बढ़ते ग्राफ को ही देख रहा है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपया टूटकर 62-63 तक पहुंच जाएगा। अभी डॉलर के मुकाबले रुपएा की कीमत 60.77  है। जब  यह 42-43 तक पहुंचेगा, तब पेट्रोल-डीजल  पर दस से 15 रुपए की वृद्धि होगी। सरकार का टेंशन यह है कि महंगाई अपना असर दिसम्बर के अंत तक दिखाएगी। तब चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे समय पर सरकार लाख कोशिश कर ले, महंगाई पर काबू नहीं पा सकती। तब सरकार के खिलाफ मतदान होगा। ऐसी स्थिति में सरकार का जाना तय है। जुलाई शुरू होने में अभी कुछ ही दिन शेष हैं। नवम्बर माह की पहली तारीख को धनतेरस है, अर्थात दिवाली में केवल चार महीने ही बाकी है। तब महंगाई लोगों की दिवाली बिगाड़ देगी। आर्थिक विश्लेषक कहते हैं कि यदि रुपया को नहीं थामा बया, तो हालात बेकाबू होते ही जाएंगे। अब सरकार को यह समझना है कि किस तरह से सख्त कदम उठाएं जाएं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 27 जून 2013

शुक्रवार, 21 जून 2013

आडवाणी के राजनैतिक सूर्य का अवसान

डॉ. महेश परिमल
भाजपा के सभी प्रमुख पदों से इस्तीफा देकर लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी बीमारी को सिद्ध कर दिया है। इससे यही संदेश जाता है कि वे अब किसी भी तरह से पार्टी से जुड़े नहीं रहना चाहते। वे अब पार्टी के संस्थापकों का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि अब पार्टी वैसी नहीं रही। इसलिए उन्हें पार्टी के सभी तीनों प्रमुख पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। ऐसा कहते हुए वे स्वयं को आरोपों से मुक्त नहीं कर सकते। क्या गोवा सम्मेलन के पहले पार्टी में सभी मूल्य सुरक्षित थे। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी, वे नहीं आए और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी के चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। यह उन्हें रास नहीं आया। इस उम्र में भी वे अपने भीतर प्रधानमंत्री बनने की लालसा को दबा नहीं पा रहे हैं। क्या इसे पद लोलुपता की संज्ञा नहीं दी जा सकती? अच्छा होता यदि वे स्वयं आगे बढ़कर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी करते, तो शायद मोदी और भी अधिक उदारवादी बन जाते। वे ही प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम आगे बढ़ाते। पर ऐसा हो नहीं पाया। आज आडवाणी की दृष्टि में पार्टी अब वैसी नहीं रही। इतने वर्षो तक प्रमुख पदों पर रहते हुए क्या वे पार्टी को अपनी तरह से नहीं बना पाए? आज जब उनके राजनैतिक जीवन का सूर्य अस्ताचल की ओर है, तब उन्हें सब कुछ याद आ रहा है। शायद उन्हें अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि विकास सदैव विनाश के रास्ते ही आता है। जब तक खंडहर को गिराया नहीं जाएगा, तब तक उस स्थान पर नई इमारत तैयार नहीं की जा सकती। गोवा में भाजपा को सिंह तो मिल गया, पर उसने अपना गढ़ खो दिया है।
अब तक भाजपा नेता यह दावा करते आए हैं कि भाजपा एक अलग ही तरह की राजनैतिक पार्टी है। गोवा में भाजपा के नेताओं ने मिलकर जो कुछ किया, उसे देखकर तो उनके दावे की पोल खुलती दिखाई दे रही है। गोवा में नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की घोषणा की गई। इसके पहले ही लालकृष्ण आडवाणी कोपभवन में जा बैठे। बीमार होने का बहाना बनाकर उन्होंने अपशकुन ही किया है। भाजपा के ही कई कार्यकर्ताओं ने उनके दिल्ली निवास पर प्रदर्शन किया। इस तरह का प्रदर्शन शायद ही कभी किसी के सामने हुआ हो। अपने ही लोग अपने ही नेता के खिलाफ खुलेआम नारे लगाएं। भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह आडवाणी को मनाने में पूरी तरह से विफल साबित हुए। कुछ अन्य नेता भी नाराज हो गए हैं, कुछ अवसर की ताक में हैं। कुछ लगातार अनवरत विरोध के लिए ही पैदा हुए हैं, इसलिए उनका विरोध जारी ही रहेगा। छह महीने पहले की ही बात है, जब भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तब पार्टी में घमासान शुरू हो गया था। चारों तरफ यही चर्चा थी कि अब गडकरी के बाद कौन? ऐसे में गडकरी को इस्तीफा देना पड़ा और कमान संभाली कुशल नेतृत्व के धनी राजनाथ सिंह ने। राजनाथ सिंह का मुख्य टारगेट है 2014 का लोकसभा चुनाव। लेकिन आज भी वे अपनी तमाम शक्ति मोदी और आडवाणी के बीच सामंजस्य बिठाने में लगाते रहे हैं। गोवा सम्मेलन से यह बात भी उभरकर आई कि राजनाथ ¨सह ने अपनी तटस्थता वाली छवि को अक्षुण्ण नहीं रख पाए।
कांग्रेस अब तक भाजपा पर यह कटाक्ष करती रही है कि भाजपा नेता जब अपनी ही पार्टी को अनुशासित नहीं रख पा रहे हैं, तो देश को किस तरह से अनुशासित रख सकते हैं। अब यह कटाक्ष सही साबित हो रहा है। गोवा में जो कुछ हुआ, उससे ही संदेश जा रहा है कि जो नेता अपनी पार्टी को मजबूत बनाने के लिए दिल्ली से गोवा की यात्रा नहीं कर सकते, वे किस तरह से कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैेले देश की व्यवस्था देख पाएंगे। भाजपा ने यह भूल की कि चुनाव से पहले देश के प्रधानमंत्री का नाम आगे बढ़ाने में जल्दबाजी। इसके पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। हां अटल जी को लेकर भाजपा ने चुनाव लड़ा था और जीतकर दिखाया भी था। तब अटल जी प्रधानमंत्री भी बने थे। इस बार इस तरह के हालात नहीं थे। भाजपा को प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के बजाए यदि कांग्रेस द्वारा किए गए घोटाले, देश की दुरावस्था, नेताओं द्वारा किए जा रहे आचरण, मुद्रास्फीति आदि को मुद़दा बनाया जाता, तो कांग्रेस से नाराज जनता भाजपा के और करीब आ जाती। पर प्रधानमंत्री पद के लिए प्रत्याशी के नाम पर पार्टी में जिस तरह से बवाल हुआ, उससे पार्टी की छबि ही धूमिल हुई। प्रधानमंत्री तब आवश्यक है,जब पार्टी बहुमत में हो। उसके पहले तो कई मुद्दे हैं, जिनसे चुनाव जीता जा सकता है। ब्रिटेन की लोकशाही में पार्टी प्रमुख होती है, जिस पार्टी को बहुमत मिलता है, उसके सांसद अपना प्रधानमंत्री चुनते हैं। वहां पार्टी प्रमुख होती है, व्यक्ति नहीं। पार्टी को ही जनता भी सर्वोपरि मानती है।
गोवा के भूमि नरेंद्र मोदी के लिए हमेशा लकी साबित हुई है। सन 2002 में जब पणजी में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी, तब नरेंद्र मोदी पर गोधरा कांड की कालिख लगाई गई थी, तब हालात यह थे कि भाजपा केकई वरिष्ठ नेताओं के अलावा अटल जी ने भी उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए दबाव बना रहे थे, तब आडवाणी दीवार बनकर सबके सामने आ गए थे। उन्हीं ने मोदी की वकालत की। मोदी की कुर्सी बच गई। 2013 में इतिहास का पुनरावर्तन हुआ है। इस समय आडवाणी, सुषमा स्वराज जैसे नेता नरेंद्र मोदी की प्रगति में अवरोधक बने थे। पर राजनाथ सिंह ने अरुण जेटली से मिलकर मोदी विरोधी छावनी को परास्त कर मोदी का राज्याभिषेक किया। आडवाणी के लिए गोवा की कार्यकारिणी की बैठक वाटरलू युद्ध की तरह बना रहेगा। जिस पार्टी को जिन्होंने जन्म दिया, पाला-पोसा, जिसके वे गॉडफादर बने, उसी पार्टी ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया। इसके लिए उनकी पदलोलुपता ही जिम्मेदार है। यदि उन्होंने समय को परखते हुए अपनी व्यूह रचना तैयार की होती, तो शायद उनका गौरव भंग नहीं हुआ होता। गोवा में आडवाणी के राजनैतिक जीवन का सूर्यास्त हुआ है और नरेंद्र मोदी का उदय। सभी जानते हैं कि ऊगते सूर्य को हर कोई प्रणाम करता है। जो नेता अब तक आडवाणी की स्तुति करते अघाते नहीं थे, वे ही अब नरेंद्र मोदी के गुणगान करने लगेंगे, यह तय है। अब नरेंद्र मोदी के आसपास चापलूसों की जमात इकट्ठी होने लगेगी, यह भी तय है। हालांकि अभी तक नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने लाने की घोषणा नहीं की गई है, फिर भी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्हें उस पद की दौड़ पर एक कदम आगे बढ़ा दिया गया है। अब यह तय माना जा रहा है कि आडवाणी के पराभव को पितामह के पराभव की संज्ञा दी जाए। भाजपा में अभी बहुत कुछ होना बाकी है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 17 जून 2013

जन्मभूमि से दूर होनी चाहिए कर्मभूमि

डॉ. महेश परिमल
माँ पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर पिता पर लिखना आसान नहीं। माँ भावना का दूसरा रूप होती हैं। पिता के पास आँसुओं को जज्ब करने की शक्ति होती है। पिता एक खामोश कविता की तरह होते हैं, जिसमें भावनाएँ नहीं, बल्कि आवरणयुक्त कठोरता होती है। संतानें इसी कठोरता से डरती हैं, पर जो इस कठोरता के उस पार आँसुओं के सैलाब को छिपाकर रखने वाले व्यक्ति को देख पाते हैं, वे पिता की महानता को स्वीकार कर लेते हैं। पिता में माँ की ममता होती है। इसे वे अच्छी तरह से समझते हैं, जो माँ के घने साये से महरुम हो जाते हैं। तब पिता ही अपना ममत्व उँड़ेलकर संतानों को सबल देते हैं। पिता एक निर्विकार मानव, जिसमें संवेदनाएँ तो कूट-कूट कर भरी होती हंै, पर उन संवेदनाओं को महसूस करना बहुत ही मुश्किल है। पिता का हृदय इतना विशाल होता है कि उसमें पूरा विश्व समा सकता है। खुले आकाश सा व्यक्तित्व छिपाए पिता सभी को स्वच्छंद विचरने की अनुमति देते हैं। जीवन की विषमताओं से सचेत करने वाले होते हैं पिता। पिता की खामोशी में सब कुछ समाहित होता है। पिता को रोते किसी ने नहीं देखा होगा। हर परिस्थिति में उन्हें अविचल होते हैं पिता। मैंने अपने बढ़ई पिता को हमेशा एक मजदूर के रूप में ही देखा। पर जीवन को बहुत गहरे तक जीया था उन्होंने। इसका अंदाजा तब हुआ, जब उन्होंने जीवन का फलसफा सरल शब्दों में समझाया।
पिता से जुड़ी एक घटना याद आ रही है। 36 वर्ष पहले वे जीवन के अंतिम दिनों की ओर थे। पीड़ा की एक अंतहीन यात्रा शुरू हो चुकी थी। उन्हें समझ में आ गया था कि वे अब इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर हैं। यहाँ आकर इंसान अपने अनुभवों के मोतियों को बाँटना चाहता है। पर उसे लेने के लिए लोग कितने आतुर होते हैं। उनकी वेदना उनके शब्दों में झलकती थी। अंतिम साँस लेने के पाँच दिन पहले की घटना है। उन्हें हाथ-पाँव में तेज दर्द था। रात में उनकी कराह सुनकर मैंने तेल में लहसुन डालकर गर्म किया और उस तेल से हाथ-पाँव की मालिश की। उन्हें कुछ राहत मिली। तब उन्होंने मुझे जिंदगी का फलसफा समझाया। मैं हतप्रभ था! उन्होंने कहा-जीवन में यदि सफल होना है, तो अपनी जन्मभूमि से दूर रहना। इंसान अपनी जन्मभूमि से जितना अधिक दूर होगा, उतना ही सफल होगा।
आज इतने वर्षो बाद पिता की इस बात पर सोचता हूँ तो उन्हें अक्षरश: सही पाता हॅँू। जन्मभूमि से कर्मभूमि हमेशा दूर होनी ही चाहिए। मेरे सामने अनेक ऐसे उदाहरण हंै। आप भी अपने आसपास सफल व्यक्तियों कों देख लें, सभी अपनी जन्मभूमि से दूर ही होंगे। इन सभी ने अपना मुकाम जन्मभूमि से दूर ही बनाया और सफलता के झंडे गाड़े। जन्मभूमि से दूर होकर इंसान अपनी अलग पहचान बनाता है। यहाँ उसके साथ केवल उसकी प्रतिभा होती है। जिसके बल पर वह नए शहर में नए लोगों के बीच नई चुनौतियों का सामना करता है। यहाँ न तो पिता का नाम काम आता है न खानदान का। सब कुछ अपने स्वभाव पर निर्भर होता है। रोज चुनौतियों का सवेरा होता है। कुछ ऐसा ही सफल हस्तियों के साथ भी हुआ। सोचो, पिता ने अपनी दूरदृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण बात कही थी। आज अपनी जन्मभूमि से 750 किलोमीटर दूर हूँ। जब भी पिता के फलसफे पर सोचता हूँ तो लगता है, आज जितना भी सफल हो पाया हूँ क्या अपनी जन्मभूमि में रहकर उतना सफल हो पाता? आज आप भी अपने भीतर उस खामोश पिता से पूछ ही लो कि उनकी खामोश कविता जीवन को किस तरह का संदेश देती है? घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध मिसाल यूं ही नहीं गढ़ी गई होगी? अनुभवों की आँच में तपे मुहावरों की नजर दूर तक देखती है?

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मैंने उन्हें जब भी देखा,
सरोवर-सा शांत देखा
मुश्किलों में भी वे
कभी उदास नहीं होते
खामोश कविता से लगते
सर पर प्यार भरा हाथ ही
हमें देता है हौसला
उनके साथ रहने से मिलती है ऊज्र
रोज चरणस्पर्श प्रणाम पर
आशीषों का सागर लहराया
पिता को याद करते हुए
भर आईं हैं आँखें
पिता होते हैं बरगद की छाँव
संघर्ष की तेज धूप का आश्रय
इस सत्य से अलग न होना
क्योंकि
पुत्र भी एक दिन
पिता बन कर
इसी सत्य को जिएगा

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बचपन में देखा है कई बार
जब भाई को घर आने में
हो जाती थी देर
काली रात में
पिता पैरों से नापते थे
समय की दूरी
माथे पर उभर आती थी
कुछ लकीरें
आक्रोश रहता था
चेहरे पर
जो बंद मुट्ठी में
कभी -कभी कैद हो जाता था
भाई के आते ही
ये सारी चीजें उड़ जाती थी
कपूर की तरह
और काँपते होंठों पर रहता था
केवल एक प्रश्न -
तू ठीक तो है ना ?
आज बुजुर्ग पिता लाचार हैं
बदलती जीवनशैली में
कुछ बोल नहीं सकते
पर बेटे से मुलाकात होते ही
अब भी आँखों में तैरता है प्रश्न
तू ठीक तो है ना ?

डॉ महेश परिमल

बुधवार, 12 जून 2013

सेलिब्रिटी के लिए क्रेजी बनते युवा

- डॉ. महेश परिमल
जो रिश्ता ईश्वर से अपने भक्तों का होता है, वही रिश्ता प्रख्यात लोगों का अपने प्रशंसकों से होता है। प्रशंसकों के बिना इन ख्यातिलब्ध व्यक्तियों की स्थिति का वर्णन करना मुश्किल होता है। यह सच है कि जो आज प्रख्यात है, वही कल गुमनामी के अंधेरे में गुम भी हो सकता है, पर जब तक वह चकाचौंध की दुनिया में है, तब तक उसके प्रशंसकों की संख्या में कमी नहीं हो सकती। प्रशंसक अपने चहेते को काफी हद तक प्यार करते हैं, उनकी एक झलक पाने के लिए वे न जाने क्या-क्या कर सकते हैं। इनके लिए तो लाख पहरे भी किसी काम के नहीं होते। कई बार वे सीमाओं को भी लाँघ देते हैं, तभी मुश्किलें खड़ी होती हैं। ऐसे क्रेजी युवाओं की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है। लोग तो अपने चहेते के लिए पागलपन की सीमाएँ भी लाँघने लगे हैं। ऐसा ही इन दिनों हो रहा है।
अब धोनी को ही देख लीजिए, अपने 'माही' को अपने पास पाने के लिए कलकक्ता के इडन गार्डन में एक युवती सुरक्षा घेरे को तोड़कर धोनी के पास पहुँचकर उससे लिपट गई। यही नहीं वह इतना बोलने में भी कामयाब हो गई कि मैं अपना पूरा जीवन धोनी को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ। इसे कहते हैं इंतहा। इसके शिकंजे में केवल धोनी ही नहीं, बल्कि सचिन, शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी आदि हैं। सबसे अधिक प्रशंसक फिल्म स्टॉर और क्रिकेटर के होते हैं। इनकी एक झलक पाने के लिए लोग टूट पड़ते हैं। हाल ही में ऐश्वर्या-अभिषेक की शादी के दौरान एक युवती ने यह दावा किया कि अभिषेक ने उसके साथ शादी का वादा किया है। उस युवती ने तो बाकायदा पत्रकार वार्ता में यह घोषणा भी की। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि वह मानसिक रोगी थी। एक व्यक्ति रोज सेलिना जेटली को कई नम्बरों से फोन करता। उससे बात करने का आग्रह करता। सेलिना ने परेशान होकर पुलिस में इसकी शिकायत की, तब जाकर उस सरफिरे ने फोन करना बंद किया।
यह तो कुछ भी नहीं, सुपर स्टॉर शाहरुख खान को न जाने कितनी ही युवतियों ने अपने खून से पत्र लिखा है। जब जूही चावला की फिल्में लगातार हिट हो रही थीं, तब चंडीगढ़ में रहने वाला उनका एक प्रशंसक उसे रोज रात को फोन करता और बातचीत का आग्रह करता। अगर जूही बात नहीं करना चाहती, तो वह उन्हें अपशब्द कहता। एक और मजेदार किस्सा। सुपरस्टॉर राजेश खन्ना ने जब डिम्पल कापड़िया से शादी की, तब एक युवती को मानो शॉक लग गया। वह बुरी तरह से आहत हो गई। अपनी व्यथा को छिपाने के लिए उसने एक कुतिया पाली। उसका नाम रखा 'डिम्पल'। वह युवती रोज उस कुतिया को मारती, मारते-मारते वह उसे बेदम कर देती। इस तरह से वह अपनी खीज उस मूक प्राणी पर उतारती। अपनी बेटी की इन हरकतों से परेशान होकर उस युवती के माता-पिता ने उस कुतिया को ऋषिकेश मुखर्जी को सौंप दिया। ऐसे ही एक प्रशंसक तो माधुरी दीक्षित के पीछे पड़ा था, वह तो शादी के बाद भी उसे परेशान करने का कोई मौका नहीं चूकता। हीरो तो ऐसे प्रशंसकों से निबट भी लेते हैं, पर हीरोइनें तो कुछ भी नहीं कर सकतीं। दूसरी ओर ऐसे भी प्रशंसक होते हैं, जिनका रुख सकारात्मक होता है। अमिताभ बच्चन के बीमार पड़ने पर कई लोगों ने उपवास रखे, मंदिरों-मस्जिदों और गिरजा घरों में विशेष प्रार्थनाएँ की गईं। ऐसे लोग अपने तक ही सीमित रहते हैं। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करना चाहते हैं। खामोशी से अपने देवता का स्मरण करते हैं और अपने काम में लग जाते हैं। पर कुछ लोग इसका प्रचार चाहते हैं, इसके पीछे उनकी यही भावना होती है कि उनकी बात किसी तरह उनके चहेते तक पहुँच जाए। ताकि उनसे मिलने का रास्ता साफ हो जाए। पर ऐसे लोग समय के साथ आक्रामक भी हो सकते हैं.
सेलिब्रिटी के नाम पर अब छोटे-बड़े फेन क्लब भी खुलने लगे हैं। इसमें सेलिब्रिटी की तस्वीरें, उनके हस्ताक्षर, परिवार के बारे में और उनके प्यार के तमाम किस्सों के बारे में जानकारियाँ होती हैं। अमिताभ बच्चन का तो कलकक्ता में मंदिर भी बनाया जा चुका है। दक्षिण में तो रजनीकांत को आज भी भगवान की तरह पूजा जाता है। उसके नाम पर दंगे भी हो जाते हैं। उन्हें यदि किसी भी तरह की परेशानी होती है, तो प्रशंसक अपने आप को मार डालने में भी पीछे नहीं हटते। ऐसे लोगों में अपने चहेते के लिए एक जुनून होता है। इन्हें हम 'क्रेजी' कह सकते हैं। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हर एक व्यक्ति में विविध मामलों मे थोड़ा-बहुत 'क्रेज' होता है। यह 'क्रेज' जब अपनी सीमाओं को पार कर जाता है, तब उन्हें कुछ भी नहीं सूझता कि वे क्या कर रहे हैं। इस स्थिति को जुनून कहते हैं। तब अनजाने में सेलिब्रिटी उनके सर पर सवार हो जाते हैं और जब यही सेलिब्रिटी उनके सामने आती है, तब प्रशंसक का गुबार बाहर आ जाता है। जो किसी भी रूप में हो सकता है। फिल्म 'डर' में शाहरुख खान ने इसी तरह के मानसिक रोगी की भूमिका निभाई थी।
एक बार टेनिस खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ के एक प्रशंसक ने मोनिका सेलेस को चाकू दिखाकर कहा कि वह स्टेफी को जीतने देगी, नहीं तो अंजाम बुरा होगा। हालीवुड के एक कलाकार माइकल डगलस को एक युवती पत्र लिखती और उसकी पत्नी होने का दावा करती। इससे डगलस की हीरोइन पत्नी केथरीन खूब परेशान रहती। उस युवती ने एक बार पत्र में लिखा कि हम दोनों मिलकर केथरीन के टुकड़े-टुकड़े कर कुक्तों को खिला देंगे। उक्त युवती की 2005 में धरपकड़ की गई और उसे जेल की सजा हुई। इस तरह के पागलपन लोग फिल्मों से ही सीखते हैं। फिल्म 'डर' के बाद तो गली-गली में शाहरुख खान पैदा हो गए थे। कई बार फिल्मों में ही दिखाया गया है कि नायक पूरी रात ठंड में नायिका के घर के सामने पड़ा रहा। इसे आज के युवा बहुत ही तेजी से अमल में लाते हैं। अब तो 'नि:शब्द' और 'चीनी कम' फिल्म के बाद लोग इससे प्रभावित होने लगे हैं। युवतियाँ अपने से काफी बड़ी उम्र के व्यक्ति के साथ और युवा कई महिलाओं के साथ संबंध कायम करने लगे हैं। यह एक बुरी स्थिति है, जिससे बचना मुश्किल है।
इसके अलावा इसका एक और पक्ष है, जिसमें सेलिब्रिटी ही अपने प्रशंसकों का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें काम की लालच देकर उन्हें घुमाते रहते हैं। टीवी पर दिखाए जाने वाले सतत सेलिब्रिटी शो युवाओं में सपने बोने का काम करते हैं। कई बार ऐसे लोग भी वहाँ तक पहुँचना चाहते हैं, जिनके पास प्रतिभा भी नहीं होती। कई लोग यदि अपनी प्रतिभा के बल पर पहुँच भी जाते हैं, तो उन्हें कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ता है। कुछ भी अंत में यही कहा जा सकता है कि 'फेन' यदि केवल 'फेन' रहें, तो उनसे ठंडी हवा मिल सकती है, पर यदि वे 'फैन' बनकर अपने चहेते को ही लपेटने लगे, तो समस्या खड़ी हो जाती है। जहाँ सीमाएँ टूटेंगी, वहाँ समस्याएँ तो आनी ही हैं।

उपभोक्ता समाज पर विज्ञापन का मायाजाल

 डॉ महेश परिमल
पिछले कुछ वर्षों में मीडिया का विस्तार इतनी तेजी से हुआ है कि संचार की दुनिया ही बदल गई है। मीडिया से जुड़े और भी कई माध्यम हैं जिनमें काफी परिष्कार और निखार आया है। जन सम्पर्क और विज्ञापन का माध्यम समाचार पत्रों के साथ-साथ बेहद प्रभावी व संप्रेषणशील स्रोत के रूप में उभरे हैं। यही नहीं बल्कि एक दूसरे पर परस्पर निर्भर भी हो गए हैं। सरकारों ने तो अनेक वर्षों से अपने-अपने जन सम्पर्क विभाग गठित कर रखे हैं जो उसके कार्य-कलापों को जनता तक पहुंचाते हैं। इसी प्रकार औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने भी जनसंपर्क को आर्थिक उदारवाद के इस दौर में काफी महत्व दिया है। आज का समाज उपभोक्तावादी समाज कहा जाता है अतएव अपने उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा बेचना औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए उच्च प्राथमिकता का विषय हो गया है। जीवन का कोई भी क्षेत्र अब विज्ञापन और जनसंपर्क की पहुंच से अछूता नहीं है। पिछले 50 वर्षों में भारतीय विज्ञापन विधा ने बहुत लंबी दूरी तय की है। उसका शिल्प इतना उन्नत हुआ है कि किसी भी विकसित देश से टक्कर ले सकता है। विज्ञापन और जन सम्पर्क एक प्रकार से जुड़वा विधाएं हैं। इन्होंने एक स्वतंत्र उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली है।
'प्राइम टाइम' जिस समय सबसे ज्यादा दर्शक टीवी देखते हैं, को भी विज्ञापनदाताओं ने खरीद रखा है। इस समय चंद बड़ी कंपनियों का एकाधिकार है और वे सतही मनोरंजन के साथ दर्शकों के आगे अपने उत्पादनों को भी सरका देती है। सवाल है कि क्या मुनाफाखोरी के लिए करोड़ों लोगों के हितों को ताक पर रख देना उचित है? फूहड़ किस्म के विज्ञापन भी बेदस्तूर जारी है जबकि पाठकों की अभिरुचियों का स्तर इस बीच काफी उठा है। ये विकृतियां अभी खत्म हो सकती है जब विज्ञापनों को लेकर स्पष्ट और सख्त नीति बनाई जाए तथा आवश्यक हो तो उसे कानूनी जामा पहनाया जाए। जनसम्पर्क कला एवं विज्ञापन के क्षेत्र में प्रबुद्ध रोजगार की विपुल संभावनाएं हैं। अतएव शासन, विश्वविद्यालयों, समाचार पत्र संगठनों व जनसम्पर्क प्रतिष्ठानों को आपस में विचार विमर्श कर एक ऐसा संयुक्त फोरम बनाना होगा ताकि इसे स्वतंत्र उद्योग स्वरूप देते हुए रोजगार के एक महती स्रोत के रूप में विकसित किया जा सके।

आज हमारे में चुपके-चुपके बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ रहा है। इसे हम अभी तो नहीं समझ पा रहे हैं, पर भविष्य में निश्चित रूप से यह हमारे सामने आएगा। इस बार इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमारी मानसिकता पर हमला करने के लिए मासूमों का सहारा लिया है। हमारे मासूम याने वे बच्चे, जिन पर हम अपना भविष्य दांव पर लगाते हैं और उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे हमारा सहारा बनें। सहारा बनने की बात तो दूर, अब तो बच्चे अपने माता-पिता को बेवकूफ समझने लगे हैं और उनसे बार-बार यह कहते पाए गए हैं कि पापा, छोड़ दो, आप इसे नहीं समझ पाएंगे। इस पर हम भले ही गर्व कर लें कि हमारा बच्चा आज हमसे भी अधिक समझदार हो गया है, पर बात ऐसी नहीं है, उसकी मासूमियत पर जो परोक्ष रूप से हमला हो रहा है, हम उसे नहीं समझ पा रहे हैं। आज घर में नाश्ता क्या बनेगा, इसे तय करते हैं आज के बच्चे। तीन वर्ष का बच्चा यदि मैगी खाने या पेप्सी पीने की जिद पकड़ता है तो हमें समझ लेना चाहिए कि यह अनजाने में उसके मस्तिष्क में विज्ञापनों ने हमला किया है। मतलब नाश्ता क्या बनेगा, यह माता-पिता नहीं, बल्कि कहीं बहुत दूर से बहुराष्ट्रीय कंपनियां तय कर रही हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां बहुत ही धीरे से चुपके-चुपके हमारे निजी जीवन में प्रवेश कर रही है, इस बार उन्होंने निशाना तो हमें ही बनाया है, पर इस बार उन्होंने कांधे के रूप में बच्चों को माध्यम बनाया है। यह उसने कैसे किया, आइए उसकी एक बानगी देखें- इन दिनों टीवी पर नई कार का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें एक बच्चा अपने पिता के साथ कार पर कहीं जा रहा है, थोड़ी देर बाद वह अपने गंतव्य पहुंचकर कार के सामने जाता है और अपने दोनों हाथ फैलाकर कहता है ''माय डैडीड बिग कार'' इस तरह से अपनी नई कार को बेचने के लिए बच्चों की आवश्यकता कंपनी को आखिर क्यों पड़ी? जानते हैं आप? शायद नहीं, शायद जानना भी नहीं चाहते। टीवी और प्रिंट मीडिया पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों में नारी देह के अधिक उपयोग या कह लें कि दुरुपयोग को देखते हुए कतिपय नारीवादी संस्थाओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। नारी देह अब पुरुषों को आकर्षित नहीं कर पा रही है, इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बच्चों का सहारा लिया है। अब यह स्थिति और भी भयावह होती जा रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब बच्चों में अपना बाजार देख रही हैं। आजकल टीवी पर आने वाले कई विज्ञापन ऐसे हैं, जिसमें उत्पाद तो बड़ों के लिए होते हैं, पर उसमें बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। घर में नया टीवी कौन सा होगा, किस कंपनी का होगा, या फिर वाशिंग मशीन, मिक्सी किस कंपनी की होगी, यह बच्चे की जिद से तय होता है। सवाल यह उठता है कि जब बच्चों की जिद के आधार पर घर में चीजें आने लगें, तो फिर माता-पिता की आवश्यकता ही क्या है? जिस तरह से हॉलीवुड की फिल्में हिट करने में दस से पंद्रह वर्ष के बच्चों की भूमिका अहम् होती है, ठीक उसी तरह आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां बच्चों के माध्यम से अपने उत्पाद बेचने की कोशिश में लगी हुई हैं। क्या आप जानते हैं कि इन मल्टीनेशनल कंपनियों ने इन बच्चों को ही ध्यान में रखते हुए 74 करोड़ अमेरिकन डॉलर का बाजार खड़ा किया है। यह बाजार भी बच्चों के शरीर की तरह तेजी से बढ़ रहा है। इस बारे में मार्केटिंग गुरूओं का कहना है कि किसी भी वस्तु को खरीदनें में आज के माता-पिता अपने पुराने ब्रांडों से अपना लगाव नहीं तोड़ पाते हैं। दूसरी ओर बच्चे, जो अभी अपरिपक्व हैं, उन्हें अपनी ओर मोड़ने में इन कंपनियों को आसानी होती है। नई ब्रांड को बच्चे बहुत तेजी से अपनाते हैं। इसीलिए उन्हें सामने रखकर विज्ञापन बनाए जाने लगे हैं, आश्चर्य की बात यह है कि इसके तात्कालिक परिणाम भी सामने आए हैं। याने यह मासूमों पर एक ऐसा प्रहार है, जिसे हम अपनी आंखों से उन पर होता देख तो रहे हैं, पर कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि आज हम टीवी के गुलाम जो हो गए हैं। आज टीवी हमारा नहीं, बल्कि हम टीवी के हो गए हैं।
हाल ही में एक किताब आई है, ''ब्रांड चाइल्ड''। इसमें यह बताया गया है कि 6 महीने का बच्चा कंपनियों का ''लोगो'' पहचान सकता है, 3 साल का बच्चा ब्रांड को उसके नाम से जान सकता है और 11 वर्ष का बालक किसी निश्चित ब्रांड पर अपने विचार रख सकता है। यही कारण है कि विज्ञापनों के निर्माता ''केच देम यंग'' का सूत्र अपनाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के बच्चे सोमवार से शुक्रवार तक रोज आमतौर पर 3 घंटे और शनिवार और रविवार को औसतन 3-7 घंटे टीवी देखते हैं। अब तो कोई भी कार्यक्रम देख लो, हर 5 मिनट में कॉमर्शियल ब्रेक आता ही है और इस दौरान कम से कम 5 विज्ञापन तो आते ही हैं। इस पर यदि क्रिकेट मैच या फिर कोई लोकप्रिय कार्यक्रम चल रहा हो, तो विज्ञापनों की संख्या बहुत ही अधिक बढ़ जाती है। इस तरह से बच्चा रोज करीब 300 विज्ञापन तो देख ही लेता है, यही विज्ञापन ही तय करते हैं कि उसकी लाइफ स्टाइल कैसी होगी। इस तरह से टीवी से मिलने वाले इस आकाशीय मनोरंजन की हमें बड़ी कीमत चुकानी होगी, इसके लिए हमें अभी से तैयार होना ही पड़ेगा।
समय बदल रहा है, हमें भी बदलना होगा। इसका आशय यह तो कतई नहीं हो जाता कि हम अपने जीवन मूल्यों को ही पीछे छोड़ दें। पहले जब तक बच्चा 18 वर्ष का नहीं हो पाता था, तब तक वह अपने हस्ताक्षर से बैंक से धन नहीं निकाल पाता था। लेकिन अब तो कई ऐसी निजी बैंक सामने आ गई हैं, जिसमें 10 वर्ष के बच्चे के लिए के्रडिट कार्ड की योजना शुृरू की है। इसके अनुसार कोई भी बच्चा एटीएम जाकर अधिक से अधिक एक हजार रुपए निकालकर मनपसंद वस्तु खरीद सकता है। सभ्रांत घरों के बच्चों का पॉकेट खर्च आजकल दस हजार रुपए महीने हो गया है। इतनी रकम तो मध्यम वर्ग का एक परिवार का गुजारा हो जाता है। सभ्रांत परिवार के बच्चे क्या खर्च करेंगे, यह तय करते हैं, वे विज्ञापन, जिसे वे दिन में न जाने कितनी बार देखते हैं। चलो, आपने समझदारी दिखाते हुए घर में चलने वाले बुध्दू बक्से पर नियंत्रण रखा। बच्चों ने टीवी देखना कम कर दिया। पर क्या आपने कभी उसकी स्कूल की गतिविधियों पर नजर डाली? नहीं न...। यहीं गच्चा खा गए आप, क्योंकि आजकल स्कूलों के माध्यम से भी बच्चों की मानसिकता पर प्रहार किया जा रहा है। आजकल तो स्कूलें भी हाईफाई होने लगी हैं। इन स्कूलों में बच्चों को भेजना किसी जोखिम से कम नहीं है।
अब यह प्रश् उठता है कि क्या आजकल स्कूलें बच्चों का ब्रेन वॉश करने वाली संस्थाएं बनकर रह गई हैं? बच्चे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ग्राहक बनकर अनजाने में ही पश्चिमी संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनाने लगे हैं। यह चिंता का विषय है। पहले सादा जीवन उच्च विचार को प्राथमिकता दी जाती थी, पर अब यह हो गया है कि जो जितना अधिक मूल्यवान चीजों को उपयोग में लाता है वही आधुनिक है। वही सुखी और सम्पन्न है। ऐसे में माता-पिता यदि बच्चों से यह कहें कि आधुनिक बनने के चक्कर में वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं, तो बच्चों का यही उत्तर होगा कि आप लोग देहाती ही रहे, आप क्या जानते हैं इसके बारे में। ऐसे में इन तथाकथित आधुनिक बच्चों से यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करेंगे?

बेमानी है किसी क्रांति की उम्मीद करना

डॉ. महेश परिमल
लादेन के मारे जाने के बाद अब लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कुछ ऐसी ही अपेक्षा रख रहे हैं कि उन्हें भी दाऊद इब्राहिम और अजहर मसूद जैसे आतंकवादियों के लिए ओबामा जैसा रास्ता अख्तियार करना चाहिए। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना संभव नहीं दिखता, क्योंकि कोई भी चीज अचानक नहीं होती। उसके पीछे एक लंबी और गहरी सोच होती है। वही सोच मनुष्य, समाज और देश को आगे बढ़ाती है। हमारी लोकता¨त्रक व्यवस्था अचानक कुछ हो जाने पर विश्वास नहीं करती। भले ही हमारे सेनाध्यक्ष यह कहते रहें कि हम भी दाऊद को उसी तरह से पकड़् सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें कभी इजाजत नहीं मिलेगी, यह तय है।
चीन आज कई मामलों में हमसे आगे है। इसके पीछे उसकी सोच है। आगे बढ़ने की प्रवृत्ति है। इसी प्रवृत्ति के अंतर्गत ही उसने आज से डेढ़ हजार साल ऐसी दीवार बनाई, जिससे चंद्रमा से भी देखा जा सकता है। निश्चित रूप से तीन हजार वर्ष पूर्व भी वहाँ ऐसा कुछ हुआ होगा, जिससे उस समय की पीढ़ी ने कुछ सीखा होगा, संकल्प लिया होगा। सब कुछ अचानक नहीं हो जाता। एक व्यक्ति यदि बलवान है, तो उसके पीछे उसकी बरसों की मेहनत और कसरत है। अचानक हासिल होने वाली चीज से कुछ नया होने का सोचा भी नहीं जा सकता। सब कुछ एक ठोस धरातल पर एक विचार की तरह ऊगता है। पुष्पित और पल्लवित होता है। तब कहीं जाकर वह एक विचारवान पेड़ बनता है।
दूसरी ओर हमारे देश ने लोकतांत्रिकता का कम्बल भी ओढ़ रखा है। लोकतंत्र में अपराध तो तेजी से बढ़ सकते हैं, पर उस पर अंकुश धीरे-धीरे ही लगाया जा सकता है। लोकतंत्र कड़े कानून की चाह नहीं रखता। सत्ताधीश इस लोकतंत्र को अपने तरीके से चलाते हैं। जब भी सत्ता बदल होता है, तब संविधान में संशोधन की प्रक्रिया लागू की जाती है। संशोधन होते ही इसलिए हैं कि जनप्रतिनिधियों को अधिक से अधिक कानून के दायरे से बाहर रखा जाए। अभी तक देश में जितने भी भ्रष्टाचार हुए हैं, सबमें जनप्रतिनिधियों का हाथ रहा है, पर आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि को कुछ नहीं हुआ। भारतीय पाठक यह शायद ही कभी पढ़ पाएगा कि भ्रष्टाचार के मामले में अमुक मंत्री की सम्पत्ति राजसात हुई। यह संभव ही नहीं है। एक तरह से सरकार ही इस प्रवृत्ति को संरक्षण दे रही है।
ऐसी बात नहीं है कि हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे रेखांकित किया जा सके। महाराणा प्रताप, शिवाजी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, लोकमान्य तिलक, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस आदि ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने तेवर से देश के नौजवानों के लिए एक इबारत लिखी। उनके वचनों में ओज था, जोश था। आज ऐसी ओजस्वी वाणी सुनने को ही नहीं मिलती। अन्ना हजारे जैसी वाणी यदि सुनने को मिल जाए, तो उसे दबाने के लिए कई शक्तियाँ एक साथ काम करने लगती हैं। ईमानदार हर जगह मारा ही जाता है। फजीहत हमेशा आम आदमी की ही होती है। इसे आम आदमी को ध्यान में रखकर चुनाव के समीकरण तैयार होते हैं। चुनाव के बाद यही आम आदमी सत्ताधीशों से दूर हो जाता है। सत्ताधीशों को आम आदमी की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं होता। हाँ सत्ता प्राप्त करने के लिए इसी आम आदमी की जी-हुजूरी उन्हें पसंद है। क्योंकि यह एक नाटक होता है, उनका वोट पाने के लिए। उसके बाद तो आम आदमी को न पहचानना उनकी विवशता बन जाती है। सत्ता का नशा बहुत ही मादक होता है। इसे छोड़ना मुश्किल है। इसीलिए सत्ताधीश कभी रिटायर नहीं होते। हाँ वे यह अवश्य तय करते हैं कि सरकारी कर्मचारी को कितने वर्ष में रिटायर होना चाहिए। खुद 70-80 के हैं, रिटायर होना नहीं चाहते, पर सरकारी कर्मचारी के लिए कानून बनाएँगे कि वे कितने साल में रिटायर हों। ये तो हमारे देश का हाल है। इन हालात में किसी बड़ी क्रांति की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। सब कुछ अपनी चाल से चलता रहता है।
इस देश में जब तक आम आदमी का प्रतिनिधि वीआईपी है, तब तक देश की दशा और दिशा सुधरने वाली नहीं है। बरसों से छला जा रहा है यह आम आदमी। सरकार इन प्रतिनिधियों पर करोड़ों खर्च करती है, तब कहीं जाकर आम आदमी के लिए हजारों बच पाते हैं। इसी आम आदमी में यह ताकत है कि वह अपने किसी साथी को खास बनाए। साथी तो खास बन जाता है, पर आम हमेशा आम ही रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि खास कभी आम नहीं होना चाहता। खास बने रहने के लिए वह ऐसे तमाम उपक्रम करता है, जिससे उसकी छवि बिगड़ती है। पर उसे इसकी परवाह नहीं रहती। ऐसे लोगों की संतान भी अपने को खास मानती है। उनसे भी किसी नई क्रांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। आज देश में आम आदमी के लिए बनने वाली योजनाएँ उन खास लोगों की सुविधाओं से कहीं छोटी होती हैं। खास लोगों की सुरक्षा में हर वर्ष जितना खर्च होता है, उतना तो आम लोगों की कई योजनाओं को भरपूर धन मिल जाए। इन खास लोगों की हरकतें बताती हैं कि राजनीति में लोग सेवा करने नहीं, बल्कि सरकार से सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए आते हैं। आम और खास के बीच की इस खाई को जब तक नहीं पाटा जाएगा, तब तक देश में यह ताकत नहीं आएगी कि वह अमेरिका जैसी पहल कर सके।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 11 जून 2013

अतीत का मोह

डॉ. महेश परिमल
इंसान हमेशा अपने अतीत से कहीं न कहीं जुड़े ही रहना चाहता है। अतीय का यह मोह उसे हमेशा बांधे रखता है। कई बार तो यह हमें बोझ भी लगता है, पर कई बार उसके मोह में पड़कर कई यादें ताजा हो जाती हैं। कुछ इसी तरह से मैं भी अतीत के मोह से जुड़ता चला गया। हुआ यूं कि घर में पुताई का काम चल रहा था, बहुत से चीजें बेकार जानकर फेंकी जा रही थी। सचमुच कई बार हमें लगता है कि इस चीज की अब कतई आवश्यकता नहीं, फिर भी न जाने हम इसे क्यों इतने लंबे समय से संभालकर रखे हुए थे। इस समय घर का बेकार कचरा बाहर निकल ही जाता है। ऐसे में प्लास्टिक के लाफिंग बुद्धा को लेकर पत्नी मेर सामने आई, कहने लगी, इसे फेंक दूं। मैंेने कहा, तुम्हें मालूम है, यह हमें किस तरह से प्राप्त हुआ था। पत्नी ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की। तब मैंने उसे याद दिलाया कि यह हमारे बच्चे को तीसरी कक्षा में इनाम के रूप में मिला था। जब इसे लेकर वह घर आया, तब शायद तुमने उसके चेहरे की चमक नहीं देखी थी। खुशी से उसका चेहरा चमक रहा था। तुम्हें याद नहीं। पत्नी ने कहा-उससे क्या फर्क पड़ता है, यह चीज पुरानी हो चुकी, उसके बाद घर में कितने ही लाफिंग बुद्धा आ गए हैं। अब इसकी क्या जरुरत? सचमुच उसका महत्व अब घर में नहीं था। जवान हो गए बेटे से पूछा तो उसने भी यही कहा कि मुझे इसकी क्या जरुरत? मुझे नहीं चाहिए, आप उसे फेंक सकते हैं। मैं ठहरा भावना से भरा हुआ। उस लाफिंग बुद्धा को देखते ही मुझे बच्चे के चेहरे की चमक याद आती है।  वैसी चमक फिर कभी नहीं देखी, मैंने बच्चे के चेहरे पर। अब उसे फेंके बिना कोई चारा नहीं।
समझ में नहीं आता कि लोग अपनी उपलब्धियों को इस तरह से क्यों भूलना चाहते हैं। अपने पहले वेतन से आपने जो कुछ भी खरीदा हो, क्या उसे हमेशा के लिए संजोकर नहीं रखना चाहेंगे आप? जिस तरह से पहला प्यार नहीं भुलाया जा सकता, ठीक उसी तरह से कई चीजें हैं, जिसे भुलाना मुश्किल है। जिस साइकिल पर पिता ने माँ को बिठाकर कई बार घुमाया हो, उसी साइकिल को बेटा यदि कबाड़ी को बेच दे, कितना दु:ख होता होगा मां को? इसे आखिर कौन समझेगा? उस साइकिल से कई यादें जुड़ी होती हैं, अपनों की। आज भले ही पिता न हों, पर वह साइकिल हमेशा उनकी याद दिलाती है। पर उसे अपनी आंखों के सामने कबाड़ी ले जाए, तो माँ की हालत क्या होती होगी? इसे न तो कबाड़ी वाला समझ सकता है और न ही उसका बेटा। अपनी खामोश भावनाओं से वह किसे समझाए कि साइकिल बेचना ठीक नहीं है। ठीक है, यदि हर चीज के साथ इसी तरह से भावनाएं जुड़ी रहीं, तो पूरा घर ही भर जाएगा, पुरानी चीजों से। पर ऐसा भी नहीं है। कुछ चीजें तो फेंकने वाली होती ही हैं। जब तक पुरानी चीजें बाहर नहीं जाएंगी, तब तक नई चीजें भी नहीं आ सकतीं। क्योंकि जगह सीमित है और सामान है अधिक। ऐसे में आखिर ऐसा क्या किया जाए, जिससे अतीत की यादें भी जुड़ी रहें, और कबाड़ बाहर भी जाता रहे? अतीत से जुड़ी कई चीजें कई बार उस समय काम आती हैं, जब घर के किसी सदस्य की याददाश्त चली जाए, तो उसे अतीत की याद दिलाने के लिए उसी तरह की चीजें उसके सामने लाई जाली हैं, जिससे वह अपनी यादों को टटोल सके। पर ऐसा आजकल कहां हो पाता है। अब तो लोग अपने अतीत को याद ही नहीं करना चाहते। यदि अतीत सुखद है, तो उससे कुछ लोग निकल ही नहीं पाते हैं, पर यदि दुखद है, तो उसे याद करना भी नहीं चाहते। अतीत के इस भूल-भुलैए में भटककर हम किन कंदराओं से होकर गुजरते हैं, इसे तो वही बताएंगे, जिन्होंने अतीत को अपने भीतर छिपाए रखा है। आखिर लोग एलबम क्यों बनाते हैं। घर के बुजुर्ग की तस्वीर को फ्रेम मे मढ़कर आखिर क्यों रखा जाता है? अतीत वहीं तक अच्छा है, जब तक वह दुखी नहीं करता। दुखी करने वाले अतीत को कोई भी याद नहीं रखना चाहता। पर यदि दुखद अतीत को याद रखा जाए, तो जिंदगी में कितनी भी चुनौतियां सामने आए, इंसान उसका मुकाबला पूरी शिद्दत से कर लेता है। क्योंकि कोई भी नई चुनौती अतीत की चुनौती से बड़ी नहीं होती।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 6 जून 2013

गोवा में मापा जाएगा मोदी का राजनैतिक कद

डॉ. महेश परिमल
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची में सबसे ऊपर माने जाते हैं। भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी मोदी का समर्थन कई बार किया है। यही कारण है कि हाल ही में हुए चुनाव में नरेंद्र मोदी को वक्ता के रूप में कई राज्यों में भेजा गया। मोदी की लोकप्रियता से भाजपा के ही कई दिग्गज नेता भीतर ही भीतर आहत हैं। उनका सोचना है कि वे बरसों से राष्ट्रीय राजनीति में हैं, लेकिन अब क्षेत्रीय नेता नरेंद्र मोदी को आगे करके पार्टी उनके साथ अन्याय कर रही है। आहत नेताओं में सबसे ऊपर लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज हैं। ये लोग नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में लाना नहीं चाहते। पर हालात ऐसे बन रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को सामने लाए बिना भाजपा की नैया पार नहीं हो सकती। अब 8 और 9 जून को गोवा के पणजी में होने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी का राजनैतिक कद मापा जाएगा। बैठक कई मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पर इतना तो तय है कि इस बार नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रचार अभियान की कमान सौंपी जा सकती है। एक ओर जहां इस बैठक में नक्सली हिंसा, भ्रष्टाचार घोटालों और महंगाई के मुद्दे पर केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को नए सिरे से घेरने की रणनीति बनाने की तैयारी चल रही है, वहीं वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने श्री मोदी और श्री चौहान की तुलना करके नई बहस छेड़ दी है ।
 इस बैठक में इसी साल होने वाले छह विधानसभा चुनावों के अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी पर भी निर्णायक बहस होगी। जब लोकसभा चुनावों की रणनीति पर चर्चा होगी तो लाजिमी है कि प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार कौन हो यह सवाल जरुर उठेंगे। ऐसे में श्री आडवाणी ने श्री मोदी के साथ तुलना करते हुए श्री चौहान की तारीफों के जो पुल बांधे हैं, उससे इस पर पार्टी में मतभिन्नता खुलकर सामने आ सकती है। श्री आडवाणी ने दोनों मुख्यमंत्रियों की तुलना करते हुए यहां तक कहा है कि गुजरात तो पहले से स्वस्थ था और श्री मोदी ने उत्कृष्ट बना दिया लेकिन श्री चौहान की उपलब्धि इस मायने में सराहनीय है कि उन्होंने मध्यप्रदेश जैसे बीमारु राज्य को विकसित राज्यों की कतार में ला दिया। यही नहीं श्री चौहान द्वारा शुरु की गई जनकल्याण योजनाओं का अब दूसरे राज्य अनुसरण कर रहे हैं। श्री आडवाणी का कद भाजपा में इतना बड़ा है कि उनकी कथनी और करनी को फिलहाल चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। मोदी बनाम शिवराज की नई बहस की शुरुआत श्री आडवाणी के बयान से शुरु हुई है और पार्टी में हर कोई इस पर दो टूक राय देने से हिचकिचा रहा है। श्री चौहान की कार्यशैली लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी बहुत पसंद करती हैं और राज्य में विदिशा लोकसभा सीट से भारी मतों से पिछली बार चुनाव जीतने के बाद से मध्यप्रदेश उनका पसंदीदा राज्य बन गया है। बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में श्रीमती स्वराज ने श्री मोदी के वहां पर प्रचार करने की जरुरत नहीं बताई थी और इसके बाद दोनों नेताओं के बीच छिड़ा शीत युद्ध अभी तक थमा नहीं है। श्री आडवाणी के ताजा बयान ने श्री मोदी के साथ श्री चौहान को राजनाथ सिंह, श्रीमती सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी रेस में आगे कर दिया है। खुद भाजपा के कई नेताओं का मानना है कि श्री चौहान के नाम पर कोई विवाद नहीं है। एक नेता ने तो यहां तक कह दिया कि श्री चौहान लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकते हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में बहुमत नहीं मिलने की स्थिति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बाकी सहयोगी श्री मोदी के बजाय श्री चौहान के नाम पर आसानी से राजी हो सकते हैं।  मोदी बनाम शिवराज का मुद्दा कहीं गोवा बैठक के बाकी मुद्दों पर ग्रहण न लगा दे । भजपा के लिए यही बेहतर होगा कि इस मुद्दे पर जितनी जल्दी हो सके, विराम लगा दे।
 जमीनी स्तर पर जो हालात है, उसमें गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी को लेकर जनता में अच्छा रिस्पांस है। यह बात न केवल सवेंक्षण कह रहे हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास जमीनी कार्यकर्ताओं की राय भी यही आ रही है। भाजपा में गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी के प्रधानमंत्री  के तौर पर प्रोजेक्शन को लेकर उत्साह है जबकि आडवाणी की लाबी के नेता मुस्लिम पोलराइजेशन का डर बताकर मोदी के आगमन को रोक रहे हैं। मोदी ने दिल्ली आने की पहली सीढ़ी तो संसदीय बोर्ड में आकर पार कर ली है, लेकिन दूसरी सीढ़ी यह है कि लोकसभा चुनाव की कैम्पेन कमेटी की कमान हाथ में आए। लालकृष्ण आडवाणी ने यह सलाह दी कि अभी लोकसभा चुनाव तो दूर है इसलिए चार राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कैम्पेन कमेटी बना दी जाए जिसके लिए उन्होंने पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी का नाम सुझाया लेकिन यह फामरूला नहीं चला। गोवा बैठक से पहले पदाधिकारियों की बैठक होने वाली है, जिसमें एजेंडे पर चर्चा होगी। भाजपा चुनाव के लिए दो कैम्पेन कमेटी बनाने के बजाय एक कमेटी से काम चलाएगी और यही कमेटी लोकसभा और विधानसभा दोनों का कामकाज देखेगी। इस कमेटी की कमान गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र  मोदी को सौंपने की पूरी तैयारी हो गई है। भाजपा में इस बात का तर्क दिया जा रहा है कि कैम्पेन कमेटी में नरेंद्र  मोदी को ही रखा जाएगा क्योंकि यही कमेटी फिर लोकसभा चुनाव का संचालन भी देखेगी। कैम्पेन कमेटी भाजपा में एक तरीके से पूरे चुनाव का संचालन करती है और चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव प्रबंधन तक को देखती है। गोवा बैठक में मोदी को चुनाव प्रबंधन की कमान मिलने में रुकावट डालने की कोशिश जरूर हो रही है, लेकिन पार्टी का मन बन चुका है कि अब मोदी को आगे बढ़ाना है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 5 जून 2013

अपनी देह पर फिल्म को ऊगता महसूस करने वाले रितुपर्णो

डॉ. महेश परिमल
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत ही अधिक क्रियाशील होते हैं। अपने काम में महारत हासिल करते हैं। पर कुछ बयानों एवं पहनावे के कारण इतने अधिक चर्चित हो जाते हैं कि उनकी क्रियाशीलता दिखाई नहीं देती। ऐसे लोगों का नाम लेते ही जेहन पर पहले उनके बयान आदि सामने आते हैं, उसके बाद उनकी क्रियाशीलता। कई बार उनकी क्रियाशीलता इतने पीछे हो जाती है कि लोग उन्हें उनकी क्रियाशीलता से पहचानना ही बंद कर देते हैं। कुछ यही हाल तेजस्वी फिल्मकार रितुपर्णो घोष के साथ भी हुआ। उन्होंने कई फिल्मों में अपनी क्रियाशीलता का परिचय दिया। उनकी क्रियाशीलता के कारण उनकी देश-विदेश में पहचान बनी। जिसकी झोली में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार हों, उसे हम भारतीय सिनेमा का वरदान ही मानेंगे। यह सच है कि कलात्मक फिल् ों का सर्जक आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपनी फिल्मों को लेकर वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे और प्रेरित करते रहेंगे। रितुपर्णो उन लोगों में से थे, जो फिल्मों को अपने भीतर महसूस करते थे। फिल्में उनके भीतर उगती थी, जिसे वे पूरी शिद्दत के साथ महसूस करते और परदे पर उतारते थे। सिनेमा से इतने गहरे तक जुड़ा कलाकार आज अपना स्थान खाली छोड़ गया है। जिसे भरना मुश्किल है। एक हद तक उन्होंने सत्यजीत राय की कमी को पूरा करने की कोशिश की, पर अब उनकी कमी को कौन पूरी करेगा, यह प्रश्न स्वाभाविक है।
कर्द लोग हमेशा पुरानी चीजों को ही अच्छा बताते हैं। नई चीजों की ओर वे देखना ही नहीं चाहते। वे तो अभी तक यही मान रहे थे कि सत्यजीत राय के बाद उन जैसा निर्देशक भारत की भूमि पर आया ही नहीं। उनकी नजर रितुपर्णो की तरफ गई ही नहीं। आज जब वे हमारे बीच नहीं है, तब लग रहा है कि सचमुच उन्होंने सत्यजीत राय की जगह संभाल ली थी। पर अब क्या होता है यह कहने से। समय रहते ही उन्हें पहचान लिया होता, तो शायद वे कुछ और फिल्में हमें दे जाते। अपने बीस वर्ष के कैरियर में उन्होंने करीब 20 फिल्में बनाई। श्रेष्ठ निर्देशन के लिए 8 पुरस्कार और श्रेष्ठ दिग्दर्शन के लिए 3 और श्रेष्ठ कथा के लिए एक पुरस्कार उन्हें मिला। बंगला-हिंदी सिनेमा को उन्होंने नया आयाम दिया। दृश्यावलि की रचना से लेकर कैमरे के फ्रेम के किसी कोने में कहीं दूर नल से टपकते पानी की आवाज को वे एक पात्र की तरह अपनी फिल्मों में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने बंगला में जो फिल्में बनाई हैं, वे भाषा के कारण हम तक नहीं पहुंच पाई हो, पर इतना तो तय है कि चोखेर बाली और रेनकोट को हम सबने देखा और सराहा। इन दो फिल्मों का एक-एक दृश्य आज भी हमें भावनाओं से भर देते हैं। कई जगह तो ऐसा लगा कि वे फिल्म नहीं बल्कि कविता पढ़ रहे हों। अजय देवगन ने स्वीकारा कि मुझसे इतना बढ़िया अभिनय केवल रितुपर्णो घोष ही करवा सकते थे। रेनकोट देखकर तो मुझे भी ताज्जुब होता है।
रितुपर्णो पुरुष थे या नारी? नाम तो नारी का लगता है। उनका पहनावा भी आम महिलाओं जैसा ही रहता था। सच क्या है? इन सबका जवाब आज की पीढ़ी को देने की कतई आवश्यकता नहीं है। उनके लिए तो यही कहा जा सकता है कि रितुपर्णो ारतीय सिनेमा को मिले किसी वरदान से कम नहीं थे। रितुपर्णो यूं तो अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे। पर भीतर का कवि उन्हें कभी चैन से बैठने नहीं देता। दिल को हिला देने वाली कविताएं पढ़कर यही लगता है कि यदि उन्होंने केवल कविताएं ही लिखी होती, तो वे साहित्य के क्षेत्र में बहुत ही आगे होते। कविता की तरह फिल्मों से उनका गहरा लगाव था। अपने प्रारंभिक दिनों में उन्होंने कॉलेज में पढ़ते हुए एक फिल्म बनाई। जब फिल्म का प्रदर्शन कॉलेज में हुआ, तो वहां असम के कवि और संगीतकार भूपेन हजारिका मु य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। फिल्म खतम हुई, तो उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर से मिलने की इच्छा जताई। इसके बाद उनकेसामने जो व्यक्ति आया, उसे देखकर भूपेन दा हतप्रभ रह गए। वे निर्निमेष उन्हें देखते रहे। आनंद बाजार पत्रिका के सित बर 2008 के अंक में रितुपर्णो ने अपने इस अनुभव के बारे में लिखा है कि हालांकि उस ममय भी मैं उतना ही बोल्ड था, पर तब तक मैंने महिलाओं का पहनावा छोड़ा नहीं था।
भूपेन दा से हुई अपनी इस मुलाकात के बाद रितुपर्णो के भावविश्व को फिल्मों की उड़ान मिली। भूपेन दा के कहने पर उन्होंने महिला निर्देशक कल्पना लाजमी की वर्कशॉप में कुछ समय तक काम किया। एक बार आधी रात को रितुपर्णो ने कल्पना लाजमी को फोन किया और कहा-‘ए फिल्म राहजिंग विदीन’ यानी मेरे भीतर एक फिल्म ऊग रही है। मेरे भीतर एक आंधी चल रही है। ऐसा लग रहा है, जैसे मेरे भीतर एक फिल्म का उदय हो रहा है, जिसे मैं महसूस कर रहा हूं। एक सच्चे कलाकार के साथ ऐसा ही होता है, जब वह अपनी फिल्म के लिए पूरी तरह से डूब जाता है। वह फिल्म की धड़कन को अपने भीतर महसूस करता है। उसके रोम-रोम में फिल्म बस गई थी। कल्पना लाजमी को लग गया था कि यह आदमी अब फिल्म बनाए बिना कुछ नहीं करेगा। फिल्म तो वह बनाएगा ही। पर कैसे? यह प्रश्न विचारणीय था। तब भूपेन दा और कल्पना लाजमी ने कुछ आíथक सहायता की। फिल्म बनी, जिसका नाम था हीरेर आंग्टि यानी हीरे की अंगूठी। अपनी इस पहली ही फिल्म में उन्होंने कैमरा वर्क से लेकर निर्देशन में अपनी मौलिक भाषा का स्पर्श दिया। उनका यह विचार था कि मेरी फिल्म में पात्र कम बोलें, पर बैकग्राउंड स्कोर अवश्य अधिक हों। इसलिए उनकी फिल्मों में बैकग्राउंड की ध्वनि भी कुछ न कुछ कहती दिखाई देती है। आंगिक अभिनय उनकी फिल्मों की विशेषता रही है। जब रितुपर्णो ने कल्पना जी को फोन किया, तो उनके भीतर दो फिल्में उमड़-घुमड़ रही थी। जिस फिल्म पर वे ज्यादा जोर दे रहे थे, उसका विषय बहुत ही गुम्फित था। इसलिए पहली फिल्म करने के बाद दूसरी फिल्म में रितुपर्णो ने अपने कुछ हाथ आजमाए। दूसरी फिल्म उनके मनपसंद विषय पर थी। इस फिल्म का विषय था कला के प्रति गहरे लगावा के कारण पारिवारिक जिंदगी के साथ तालमेल न कर पाने वाली एक अकेली नारी और उसका अकेलापन। बेटी के साथ संघर्ष और कला के प्रति अपार समर्पण। इस तरह के विषय के साथ यदि वे बॉलीवुड में आते, तो उन्हें तुरंत ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता। उनकी मनपसंद विषय पर यह फिल्म थी-19 अप्रैल। एकदम ही मौलिक फिल्म। इसी ने रितुपर्णो को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया। इससे उनकी पहचान भी कायम हुई।
रितुपर्णो की हर फिल्म में विषयों का अद्भुत वैविध्य रहा है। तीसरी फिल्म दहन सड़क पर हुए एक हादसे पर एक महिला के संघर्ष पर केंद्रित है। चौथी फिल्म शादी के दूसरे ही दिन पति को खोने वाली महिला के संघर्ष को लेकर है। पांचवीं फिल्म बेटी की कमाई पर जीते एक संवेदनशील कलाकार पर केंद्रित है। ये सभी फिल्में रितुपर्णो को राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाती रहीं। आज क्षेत्रीय फिल्मों की जो स्थिति है, उससे ऐसा नहीं लगता कि कोई ऐसी फिल्में बनाए और लगातार राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करता रहे। फिल्मों से गहरा जुड़ाव और उनकी सूझबूझ ही उनकी फिल्मों की विशेषता रही है। जो उन्हें अव्वल दर्जे का निर्देशक साबित करती है। उनकी फिल्मों में मानवीय संवेदना विशेषकर नारी पात्र को बहुत ही कलात्मक और सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। फिर बारीवाली की किरण खेर हो या अबोहमन की ममता शंकर हो, चोखेरबाली एवं रेनकोट की ऐश्वर्या राय हो, सभी में नारी पात्र सरल एवं संवेदनशील के अलावा आक्रामक रूप से हमारे सामने आती हैं। कला सौंदर्य से लेकर संवेदनशील कलम से रितुपर्णो ने नारी पात्र को इतने सहज ढंग से प्रस्तुत किया है कि एक एक पात्र का एक-एक आलेख के रूप में वर्णन किया जा सकता है। उनकी फिल्मों में नारी का प्रचुर मानवीय भाव हमेशा छलकता रहा है।
ओ. हेनरी की लोकप्रिय कहानी गिफ्ट ऑफ मेगी पर आधारित हिंदी फिल्म रेनकोट में अजय देवगन और ऐश्वर्या राय से रितुपर्णो ने जो अभिनय कराया है, उससे उनके अभिनय करा ले जाने की क्षमता का पता चलता है। दोनों का अभिनय देखकर लोग वाह-वाह कर उठे। यह सच है कि रेनकोट की कहानी से हर कोई वाकिफ था। अब क्या होगा, यह सभी को पता था। पर घटना किस तरह से घटित होगी, यह उत्कंठा आखिर तक बनी रही। एक-एक दृश्य के बाद यही लगता है कि अगला दृश्य कितना संवेदनशील होगा। सभी दृश्य हृदयस्पर्शी हैं। एक एक फ्रेम कसी हुई। संवेदनाओं से भरपूर। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि घटना की जानकारी सभी को है, पर घटना किस तरह से घटित होगी, यह जिज्ञासा ही दर्शकों को बांधे रखती है।
समलैंगिकता पर अपने विचार के कारण चर्चित रितुपर्णो इतने अधिक राष्ट्रीय पुरस्कारों को प्राप्त करने के बाद लोकप्रियता के जिस मुकाम पर उन्हें होना था, वहां तक नहीं पहुंच पाए। उनकी कदर उतनी नहीं हो पाई, जिसके वे वास्तव में हकदार थे। अभी उनकी उम्र की क्या थी। मात्र 49 वर्ष। यह भी भला कोई उम्र होती है बिदा लेने की। पर क्या करें, वे चले गए अपनी कुछ फिल्मों को छोड़कर। एक कलाकार को जो पहचान अपनी फिल्मों से मिलती है, वैसी ही फिल्मों को हमारे बीच छोड़कर वे चिरंजीवी हो गए। आप जब भी उनकी फिल्मों को देखेंगे, तो ऐसा नहीं लगेगा कि वे हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि उनकी फिल्में हमसे बात करती रहेंगी।  उन्हें समझने के लिए उनकी फिल्में देखना और उसे समझने के अलावा उसमें डूबना होगा, तभी हम समझ पाएंगे कि रितुपर्णो कैसे निर्देशक थे, उनके विचार किस तरह से कलाकारों के भीतर से आते थे। जो अपनी देह पर फिल्म को ऊगता महसूस करे, उससे बड़ा कलाकार और कौन हो सकता है भला?
  डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 3 जून 2013

हमारे पास श्रीलंका जैसी इच्छाशक्ति का संपूर्ण अभाव

डॉ. महेश परिमल
आजकल मीडिया में भारत निर्माण के बड़े-बड़े विज्ञापन आ रहे हैं। इन विज्ञापनों को देखकर यही लगता है कि भारत ने अभी-अभी ही प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ना शुरू किया है। भारत निर्माण के लिए यदि यूपीए सरकार को श्रेय जाता है, तो नक्सल निर्माण का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए? कोई बता सकता है? यह देश की विडम्बना है कि एक तरफ आईपीएल में करोड़ों का सट्टा खेला जा रहा है, तो दूसरी तरफ उन आदिवासियों का जीवन है, जो एकदम नारकीय हो गया है। उन्हें अपनी ही माटी से दूर जाना पड़ रहा है। ठीक कश्मीरी ब्राह्मणों की तरह! देश की इन दो तस्वीरों से ही स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश की नीतियां ही ऐसी नहीं है कि वह आतंकवाद का मुकाबला डटकर कर सके। कब आएगी हममें, श्रीलंका सरकार जैसी इच्छा शक्ति? जिसने लिट्टे को खत्म करने में कोई कसर बाकी न रखी। अब कोई राज्य ऐसा नहीं बचा, जो नक्सलवाद से अछूता हो। नक्सलवाद अब पूरे देश की समस्या बन गया है, पर इस पर काबू पाने में अभी भी देश की नीतियां कमजोर साबित हो रही हैं।
सुकमा में गत 25 मई कों हुई नक्सलवादी घटना से पूरा देश आहत है। इस घटना ने यूपीए सरकार के भारत निर्माण का असली चेहरा सामने ला दिया है। देश में आजादी के साढ़े 6 दशक के बाद देश का एक वर्ग इतना अधिक नाराज है कि उसने अपने हाथ में शस्त्र उठा लिए हैं। नक्सलवाद कोई एकदम से आई समस्या नहीं है, यह समस्या 1960 से शुरू हो गई थी। अभी तक सैकड़ों पुलिसकर्मियों एंव अधिकारियों ने अपनी आहुति दी है। पर सत्ता पर बैठे नेताओं ने इस समस्या को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया। अब जब यह नक्सलवाद से कुछ नेताओं का बलिदान हुआ है, तो उन्हें यह समझ में आ रहा है कि इस समस्या का समाधान होना ही चाहिए। जब भी नक्सलवाद के खिलफ कड़े कदम उठाए गए है, तो उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ा है। देश का एक वर्ग ऐसा भी है, जो नक्सलवाद का समर्थन करता है। यह वर्ग स्वयं को अतिबुद्धिवादी मानता है। नक्सलवाद ने जब भी पुलिसकर्मियों की हत्या की, तब तक राजनीतिक दल केवल बयानबाजी करके रह जाते थे। अब जब वे नेताओं की हत्या करने लगे, तो उन्हें यह समस्या विकट दिखने लगी है।
बस्तर जिले की घटना ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या अब आम आदमी के बाद देश में नेता भी सुरक्षित नहीं है? पिछले एक दशक में जिस तरह से देश में नेताओं की छबि बिगड़ी है, उतनी किसी की नहीं। देश आज यदि बरबादी के कगार पर है, तो लोग इसके लिए देश के नेताओं को ही दोषी मानते हैं। इसके लिए आम आदमी को अपने गिरेबां में झांककर देखना चाहिए, आखिर ऐसे नेताओं को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजा किसने? कुछ लोग केवल इसलिए ही वोट नहीं देते कि जब सांपनाथ और नागनाथ में से एक को चुनना ही है, तो किसी को वोट न दिया जाए, इसी गफलत में ऐसे नेता जीत जाते हैं, जिनके जीतने की थोड़ी भी गुंजाइश नहीं होती। अगर देश का आम आदमी सजग होकर अपने वोट का सही इस्तेमाल करे, तो देश की जो स्थिति आज है, वह कदापि न होती। नक्सलियों द्वारा नेताओं को मारे जाने की घटना के बाद कई तरह के बयान सामने आए, पर किसी कांग्रेसी नेता ने यह नहीं कहा कि नक्सलवाद को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देना चाहिए। नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया कोई दल नहीं चाहता। क्योंकि हर दल का स्वार्थ किसी न किसी तरह से नक्सलवाद से जुड़ा है। यह सच है कि यदि नक्सलियों को नेताओं, व्यापारियों, उद्योगपतियों का समर्थन न मिले, तो इनका विस्तार हो ही नहीं सकता। व्यापारी नक्सलियों को केवल इसलिए आर्थिक सहायता करते हैं कि वे उन्हें पुलिस के प्रकोप से बचाएंगे। उद्योगपति उन्हें इसलिए धन देते हैं कि वे आसानी से अपना उद्योग चला सके। उनके संस्थान में किसी तरह का अवरोध न आने पाए, मजदूरों की हड़ताल आदि से उन्हें मुक्ति मिल जाए। नेता उनका समर्थन केवल और केवल वोट के लिए ही करते हैं।
सामान्य प्रजा यह मानती है कि जो व्यवहार नक्सली आम आदमी के साथ कर रहे हैं, वही व्यवहार उनके साथ भी किया जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सरकार के पास दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। जिस तरह से लिट्टे के खात्मे के लिए श्रीलंका सरकार ने कमर कसकर उससे लोहा लिया और उसे नेस्तनाबूद कर दिया, ठीक वैसा ही केंद्र और राज्य सरकार मिलकर करें, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। पर केंद्र इसे राज्य का मामला बताता हे और राज्य सरकारें कहती हैं कि बिना केंद्रीय सहायता के इस समस्या से मुक्ति नहीं मिल सकती। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बरसों से जारी है। अब जब नक्सलियों ने जिस तरह से नरसंहार किया है और नेताओं को निशाना बनाया है, उससे यह लगता है कि इस बात पर केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कुछ करेंगे। नक्सलवाद पर नकेल कसने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, पर सबमें कहीं न कहीं राजनीति आ जाती है, इसलिए मामला आगे नहीं बढ़ पाता है। कई बार ऐसा होता है कि नक्सलवाद के खात्मे के लिए निकले पुलिस और सेना के जवान आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। इससे आदिवासियों का क्रांधित होना लाजिमी है। वैसे भी किसी देश के लिए नक्सलवादियों से निपटना ऐसा ही है, जैसे गृहयुद्ध हो। भारतीयों द्वारा ही भारतीयों की हत्या। एक तरफ मानवाधिकार वाले बार-बार पुलिस की बर्बरता पर सवाल उठाते रहते हैं, पर जब नक्सली उससे भी अधिक बर्बरता बरतते हैं, तब वे खामोश हो जाते हैं। श्रीलंका में तमिल उग्रवादियों के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी गई, उसमें एक सोची-समझी नीति के तहत लिट्टे का खात्मा किया गया। पहले तो उसके अड्डे को चारों तरफ से घेर लिया गया। फिर क्या था, पहले तो लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण का खात्मा किया, उसके बाद उनके साथियों का। इस काम में श्रीलंका ने किसी की परवाह नहीं की। उसने अपने सामने देश को रखा, वहां के नेताओं ने भी नेशन फस्र्ट थ्योरी का भरपूर समर्थन किया। मानवाधिकार वाले चिल्लाते रहे, पर सरकार ने उनकी नहीं सुनी। उसी समय भारत में तमिलनाड़ु में डीएमके अध्यक्ष करुणानिधि ने तमिलों पर अत्याचार का राग अलापा था, पर लोग समझ गए कि यह वोट बटोरने की राजनीति है, इसलिए उनके बयानों पर ध्यान ही नहीं दिया गया।
सवाल यह उठता है कि जब श्रीलंका सरकार ऐसा कर सकती है, तो भारत सरकार क्यों नहीं कर सकती? भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि कदम-कदम पर राजनीति आड़े आती है। यदि सरकार नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो आदिवासी वोट उनके हाथ से चले जाएंगे, यही धारणा सरकार को विवश कर देती है कुछ न करने के लिए। इधर सरकार को अपने वोट की पड़ी है, उधर निर्दोष मारे जा रहे हैं। सरकार की स्थिति बड़ी विचित्र है। एक तरफ धन की वर्षा करने वाला आईपीएल का तमाशा है, तो दूसरी तरफ नक्सलवादी नेताओं को उड़ा देने की योजना बना रहे हैं। एक तरफ की दुनिया चकाचौंध भरी, दूसरी तरफ की दुनिया एकदम अंधकारमय। भारत निर्माण का सारा श्रेय यूपीए सरकार ले रही है, पर यह कोई बता सकता है कि नक्सलवाद को जन्म किसने दिया, किसकी शह पर ये फले-फूले, किसने इन्हें चलना और गोली चलाना सिखाया? बिना राजनैतिक संरक्षण के इतना बड़ा संगठन कभी इस देश में खड़ा होकर चल भी सकता है, इसका उत्तर किसके पास है?
  डॉ. महेश परिमल

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