शनिवार, 31 अगस्त 2013

हमारे प्रधानमंत्री की लाचारी

डॉ. महेश परिमल
जब पानी सर से गुजर गया, तब हमारे प्रधानमंत्री को ध्यान आया  कि हां देश की आर्थिक हालत खराब हो गई है। समझ में नहीं आता कि हमारे प्रधानमंत्री को यह सब इतनी देर से कैसे समझ में आया? क्या उन तक सूचनाएं नहीं पहुंच पाती? क्या उन्हें कोई खबर नहीं करता? क्या वे अखबार नहीं पढ़ते, क्या वे टीवी नहीं देखते? जो बात देश का बच्च-बच्च जानता है, जिसे वह समझ भी रहा है, उसे हमारे प्रधानमंत्री अब जाकर समझ पाए हैं। क्या उनका सूचना तंत्र इतना कमजोर है? वे देश के प्रधानमंत्री ही नहीं, इसके पहले वे सच्चे अर्थशास्त्री भी हैं, रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं, यही नहीं देश के वित्त मंत्री के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं। इसके अलावा हमें उन पर गर्व करना चाहिए कि वे विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं। लेकिन क्या यह सचमुच गर्व करने की बात है?
देश की अर्थ व्यवस्था सचमुच खराब है। इसके लिए उन्होने लाल किले की प्राचीर से यह आश्वासन भी दिया कि इसे मजबूत करने के लिए हम पुरजोर प्रयास करेंगे। उनके कहने की देर थी कि अर्थव्यवस्था पर मानों बिजली ही गर गई। डॉलर के मुकाबले हमारा रुपया कभी ऊंचा जाता है, कभी नीचे चला जाता है। यही हाल सोने का भी है। व्यापारी अब दोहरी चाल चल रहे हैं। आज सोने का जो भाव है, उस पर वे सोना नहीं खरीद रहे हैं। उस सोने को वे खरीदे गए भाव से ही खरीदने को तैयार हैं। सरकार के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे हैं। निवेशकों का विश्वास टूट रहा है। सरकार दिशाहीन है। सरकार की इसी स्थिति पर उद्योगपति रतन टाटा का कहना सही है कि हमारे पास ठोस नीतियों का अभाव है। उसके लिए काम नहीं हो पा रहा है। पर यह कैसे संभव है कि अमेरिका की आर्थिक हालत खराब होती है, तो हमारी हालत भी खराब होती है। पर जब वह मजबूत होता है, तो भी हमारी हालत खराब होती है। ऐसा कैसे हो जाता है? आज एक साधारण मतदाता यही समझना चाहता है। क्या हमारे अभूतपूर्व वित्तमंत्री बताएंगे? पूरे अर्थि तंत्र पर आज अविश्वास के बादल छाए हुए हैं। अच्छे-अच्छे जानकार भी हैरत में हैं कि आखिर ऐसा कैसे हो रहा है। एक दौर ऐसा भी था कि मंदी के दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत थी। फिर अभी ऐसा क्या हो गया कि सब कुछ बिखर रहा है? यह सच है कि आज पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। केवल रुपया ही नहीं, पूरे एशिया की मुद्राओं का यही हाल है। भारत की अर्थव्यवस्था इसी का एक अंग है। वह भला मंदी से किस तरह से अप्रभावित रह सकती है। पर इतना तो कोई भी सोच सकता है कि जब वास्तव में मंदी थी, तब हम मजबूत थे, पर आज हम मजबूत क्यों नहीं हो पा रहे हैं, जबकि हमारे पास एक कुशल अर्थशास्त्री हैं। अब तो हमारे वित्त मंत्री भी यही कह रहे हैं कि घबराने की आवश्यकता नहीं है, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। पर जब उनसे ही यह जवाब मांगा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की इस हालत के लिए आखिर कौन-कौन सी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, यह बताया जाए।
जब से देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई, तभी से हमारे प्रधानमंत्री यही कहते आए हैं कि इसे सुधारने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। अब वैसा ही राग वित्त मंत्री अलाप रहे हैं। वे भले ही यह दावा करें कि धबराने की आवश्यकता नहीं है, पर वास्तव में वे स्वयं ही घबरा रहे हैं। अच्छा होगा कि अब इसे गंभीरता से समझने की कोशिश की जाए। आश्वासनों से कुछ नही होने वाला। कुछ ठोस कदम अपरिहार्य हैं। इसके पहले जो कदम उठाए गए थे, उसका उल्टा ही असर हुआ है। जब सोना सस्ता था, तब यह कहा जा रहा था कि अभी न खरीदें, सोना और भी सस्ता हो सकता है। लोगों ने विश्वास कर लिया, आज वही सोना 22 हजार से बढ़कर 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम हो गया है। अभी भारतीय व्यापारियों में घबराहट नहीं फैली है। किंतु वे भय की ओर अग्रसर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वास भले ही टूट रहा हो, पर अब भारत में पूंजी निवेश करने के लिए विदेशी घबरा रहे हैं। यह सब राजनैतिक अस्थिरता के कारण हो रहा है,यह मानने के लिए शायद कोई तैयार नहीं है। सभी विश्व में छाई मंदी को दोष दे रहे हैं। हालात कोमा की तरह हो गए हैं। सरकार यही कह रही है कि यह वक्त वक्त की बात है। इसके लिए विश्व की अर्थव्यवस्था दोषी है। हम कतई नहीं। जब चिदम्बरम ने वित्त मंत्री का पद संभाला था, तब यह कहा जा रहा था कि अब रुपया मजबूत होगा। ऊर्जा का बिल घटाया जाएगा। औद्योगिक उत्पादन को नई ऊर्जा मिलेगी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मुद्रास्फीति की दर बढ़ गई। प्याज के दाम कहां से कहां पहुंच गए। सरकार की बहानेबाजी से गरीब वर्ग परेशान हो गया है। आज सब्जियों के दाम आम आदमी की पहुंच से दूर हो गए हैं। 2005 में उसी लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री में घोषणा की थी कि दस वर्ष बाद गरीबी खत्म हो जाएगी। इस बार उन्होंने यह स्वीकार किया कि गरीबी खत्म नहीं हुई है, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पिछले पांच वर्ष की विफलता का साफ असर इस बार दिखाई दे रहा था।
यह कहा जा रहा है कि आज के हालात 1991 जैसे हैं। तब हमने विदेशी विनिमय के लए अपने सोने की राष्ट्रीय अनामत को लंदन भेज दिया था। यदि हम सावधान नहीं रहे, तो हालात 1963 जैसे हो सकते हैं। तब वित्त मंत्री मोरारजी देसाई थे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विदेशी विनिमय को बचाने के लिए सोने के आयात पर रोक लगा दी थी। इसके बाद भी वे लोगों में सोने की भूख को कम नहीं कर पाए। 1960 में सोने की तस्करी की जाने लगी। तभी हाजी मस्तान, दाऊद इब्राहीम, करीम लाला आदि का जन्म हुआ। भारत को इस आतंकवाद की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। आज देश का आत्मविश्वास घट रहा है, तो विदेशी इसका लाभ उठा रहे हैं। आतंरिक अस्थिरता के कारण समाज में भय का माहौल है। 1960 के बाद चीन और पाकिस्तान ने हमें सैन्य रूप से परखा। अब सीमा पर हलचल बढ़ गई है। पाकिस्तान हमारे जवानों को मार रहा है। चीन की हरकतें भी बढ़ गई हैं। ऐसे में भारत भले ही सैन्य दृष्टि से ताककवर बन गया हो, पर खतरा अभी भी मंडरा रहा है। आज सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनोती अब चुनाव न होकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। सभी कहते हैं कि किसी के पास जादुई छड़ी नहीं है, पर जादुई छड़ी का आशय वे योजनाएं हैं, जिससे अर्थव्यवस्था सुधर सकती है। कुछ तो ऐसा करना ही होगा, जिससे यह संदेश जाए कि हां कुछ तो हो रहा है। उसका असर भी दिखाई दे रहा है। व्यापारी भयमुक्त होकर व्यापार करें, लोग महंगाई से मुक्ति पाएं, यही कोशिश होनी चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला?

डॉ. महेश परिमल
ऐसा लगता है कि रेप के मामले में अब मुम्बई दिल्ली से स्पर्धा करने लगा है। वैसे देखा जाए, दुष्कृत्य देश के किसी भी कोने में हो, इससे लोगों को कोई बहुत अधिक फर्क पड़ता नहीं है। छोटे शहरों को तो और भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए यह तो आम अपराध की ही तरह है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस प्रकार की घटनाएं लगातार हो रही हैं, पर इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ताकि इस तरह के अपराधों में कमी आए। अपराधियों में किसी भी तरह से कानून का खौफ तो दिखाई ही नहीं दे रहा है। यदि समाज में एक भी दुष्कृत्य की घटना होती है, तो यह केवल पुलिस या नेताओं की चिंता का विषय नहीं है, यह मामला तो समाजशास्त्रियों के लिए एक चुनौती है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में नारियों की भूमिका में जो परिवर्तन आया है, उसका संबंध दुष्कृत्य की बढ़ती घटनाओं से है।
पहले ऐसा नहीं था। तब एक नारी, माँ, बहन, पत्नी और पुत्री की भूमिका में ही रहती थी। उसकी जवाबदारी संतानों के लालन-पालन और परिवार के पोषण तक ही सीमित थी। इस कर्तव्य के निर्वहन में यदि वह घर से बाहर निकलती थी, तो उनके साथ उनके परिवार का ही कोई विश्वस्त साथी हुआ करता था। किसी भी रूप में उन्हें अकेले घर से बाहर नहीं जाना पड़ता था। इन हालात में उनके साथ किसी प्रकार का र्दुव्‍यवहार नहीं होता था, ऐसी बात नहीं थी, पर जो कुछ भी उनके साथ होता था, वह मर्यादित होता था। व्यक्ति को समाज का भय रहता था। मुम्ब्ई और दिल्ली जैसे महानगरों में जो गेंगरेप की घटनाएं हुई हैं, उसमें अनजान लोगों की सहभागिता है। नारी के स्वतंत्र होने की इतनी बड़ी कीमत आज उसे चुकानी पड़ रही है। इसका मुख्य कारण है आज के प्रचार माध्यमों में नारी की जो छवि पेश की जा रही है,उसमें वह केवल एक भोग्या ही है। पुरुषों की वासना भड़क उठे, ऐसे विज्ञापन टीवी पर रोज ही दिखाई दे रहे हैं, फिल्में भी कुछ इसी तरह की बन रही हैं। इन सबमें नारी को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में उभारा जा रहा है। जब तक पुरुष प्रधान समाज में नारी को एक भोग्या के रूप में दिखाया जाता रहेगा, उसे भोग का साधन माना जा रहेगा, तब तक पुरुष की बीमार होती मानसिकता को सुधारा नहीं जा सकता। ऐसी ही घटनाएं समाज में होती रहेंगी।  आज की मांग यही है कि यदि नारी को स्वतंत्रता मिली है, तो उसका उपयोग भी उसे संभालकर करना होगा। पुरुषों की मानसिकता को बदलना इतना आसान नहीं है, उसके लिए कानून तो बहुत हैं, पर उसे अमल में लाने की नीयत किसी में नहीं है।
मुम्बई जिसे नारियों के लिए सुरक्षित माना जाता रहा है, वहां की महिलाएं देर रात लोकल ट्रेने में यात्रा कर सही सलामत अपने घर तक पहुंचने की गारंटी हुआ करती थी। अब वह गारंटी देने वाला कोई नहीं है। महालक्ष्मी उपनगर के कुछ असामाजिक तत्वों ने परेल की शक्ति मिल की तस्वीर लेने के लिए अपने साथी के साथ गई महिला फोटोग्राफर के साथ 5 नराधमों ने दुष्कृत्य किया। अब तक रेप की राजधानी दिल्ली थी, पर अब मुम्बई उससे स्पर्धा करने लगी है। इस दौड़ते-भागते महानगर में भी स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। छेड़छाड़ ही नहीं, बल्कि अब तो दुष्कर्म की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं। यहां की सुरक्षित नारियां अब स्वयं के असुरक्षित समझने लगी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए, तो 2011 और 2012 के बीच मुम्बई शहर नारियों को लेकर किए जा रहे अपराधों की संख्या में 11 प्रतिशत का इजाफा देखा गया है। 2011 में मुम्बई में नारी अत्याचार की 553 घटनाएं दर्ज की गई थीं। 2012 में यह आंकड़ा 614 ततक पहुंच गया। 2012 में मुम्बई में ही रेप की 234 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इसके मुकाबले दिल्ली में 585 घटनाएं दर्ज हुई। मुम्बई में रेप की जो 234 घटनाएं हुई, उसमें से 104 घटनाएं 14 से 18 वर्ष की उम्र के बीच की नारियों के साथ हुई थी। स्पष्ट है कि आजकल लोग महिलाओं पर कम किशोरी और युवतियों को ही अपना शिकार बनाते हैं।
मुम्बई में जब भी इस प्रकार की घटनाएं होती हैं, तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती हे, जो कुछ समय बाद भुला दी जाती हैं। कुछ समय तक लोग आंदोलित होते हैं, पर जैसे कि मुम्बई की तासीर है कि वह बड़ी से बड़ी घटनाओं को भी भुला देती है, उसी तरह रेप की कई घटनाएं मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दी हैं। 2011 की 20 अक्टूबर को मुम्बई के अंधेरी में एक पान की दुकान के पास कुछ युवक, युवतियों के साथ खड़े थे। ये सभी किसी की राह देख रहे थे, ताकि आगे जाया जा सके। इतने में वहां नशे में धुत्त चार युवक आए और उनसे अपशब्दों में बातचीत करने लगे। एक युवक तो एक युवती के ऊपर गिर ही पड़ा। इन युवतियों के साथ जो पुरुष थे, उन्होंने उन नशेड़ियों का विरोध किया। जमकर बहसबाजी हुई, तब वे सभी नशेड़ी चले गए। कुछ देर बाद वे अपने और साथियों के साथ हथियार लेकर वहां आए और युवतियों के पुरुष मित्रों पर छुरे से वार कर दिया। इस झूमा झटकी में दो पुरुष बुरी तरह जख्मी हो गए। बाद में दोनों की मौत हो गई। इस मामले ने पूरी मुम्बई को दहला दिया। नारी सुरक्षा को लेकर मुम्बई हाईकोर्ट ने भी इस पर चिंता व्यक्त की। बाद में इस मामले पर एक रिट पिटीशन दाखिल की गई, पर इसका कोई परिणाम आज तक सामने नहीं आया। अन्य बुरी घटनाओं की तरह मुम्बई ने इस घटना को भी भुला दिया।
पिछले वर्ष जुलाई में मुम्बई के करीब डोबिवली में छेड़छाड़ के मामले में एक युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि युवक की हत्या के आरोप में जिन 5 लोगों को गिरफ्तार किया, उसमें से चार नाबालिग थे, केवल एक की उम्र 19 वर्ष थी। बात ये थी कि संतोष विछीवोरा नामक युवक रात दस बजे अपनी दोस्त के साथ खड़ा था, इतने में वहां बस से 5 लोग उतरे, वे संतोष के साथ खड़ी युवती से छेड़छाड़ करने लगे। संतोष ने जब इसका विरोध किया, तो एक युवक ने छुरे से उस पर हमला कर दिया। बाकी के चार युवकों ने भी उसका साथ दिया। वे चारों भी संतोष पर टूट पड़े। जब नागरिकों ने संतोष को बचाने की कोशिश् की, तो उन पर भी हमला कर दिया गया। इधर घबराई युवती ने अपने अन्य साथियों को इसकी सूचना दी। संतोष को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पांचों आरोपियों में से केवल एक को जो 18 वर्ष का था, जेल भेज दिया गया, शेष चारों नाबालिगों को सुधार गृह में भेज दिया गया। बात आई-गई हो गई। इस घटना को भी मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दिया। मुम्बई की छाती में ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं दफ्न हैं, जो अब घाव का रूप ले चुके हैं, इन्हें कुरेदने की कोशिश न हो, तो ही अच्छा है।
आज हमारे देश में दुष्कृत्य की शिकार युवतियों एवं महिलाओं की हालत ऐसी है कि घटना के बाद जो स्थितियां सामने आती हैं, उन्हें जिस तरह से समाज देखता है, पुलिस जांच करती है, तरह-तरह के सवाल करती है,उससे ऐसा लगता है कि उनके साथ एक बार और दुष्कृत्य हो जाए, वह सहन हो जाएगा, पर यह सहन नहीं होता। दोष किसी का और सजा किसी को। जब तक इस प्रवृत्ति का अंत नहीं होगा, तब तक समाज में नारियों की इज्जत सरे आम लूटती रहेंगी और हमेशा की तरह कानून कुछ नहीं कर पाएगा। मुम्बई की घटना के बाद एक दु:खी आदमी के मुंह से निकल गया ‘हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला? ’
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 26 अगस्त 2013

नाकाम सरकार की नाकामियां

डॉ. महेश परिमल
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है। इसी के साथ ही गिर रही है संसद की गरिमा, नेताओं का चरित्र। अब तक कोई भी सरकार  इतनी लाचार कभी नजर नहीं आई कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल में लाएं। कहां तो यह तय होने वाला था कि अब दागी सांसद चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, और अब यह तय हो रहा है कि दोषी करार दिए गए सांसद चुनाव लड़ने के लिए अपात्र नहीं माने जाएंगे, यही नहीं वे जेल से भी चुनाव लड़ सकेंगे। क्या कोई सरकार स्वयं को बचाए रखने के लिए इतने आगे तक जा सकती है? इस तरह के मामले में सभी दल एक हो भी जाते हैं। बाकी मामलों में भले ही संसद न चल पाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
रुपए के मामले में इतना ही कहा जा सकता है कि हमारे नीति नियंताओं को यह सूझ ही नहीं रहा है कि रुपए को किस तरह से संभाला जाए। शायद वे इसके लिए तैयार ही नहीं थे। चिंता इस बात की है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं, बल्कि वे एक सिद्धहस्त अर्थशास्त्री भी हैं। वे रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं। पर इस समय वे इतने अधिक विवश हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि रुपया की कीमत लगातार गिर रही है, इसे रोकना आवश्यक है। यदि रुपए की ेगिरती कीमत पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो हालात बहुत ही खराब हो जाएंगे। विदेशी निवेशकों का विश्वास टूटता जा रहा है। निश्चित रूप से कुछ दिनों बाद ही पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी होगी। महंगाई बढ़ेगी, सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगेगा। इसका पूरा लाभ विपक्ष उठाएगा। यानी सरकार की सभी मोर्चो पर नाकामयाबी का ढिंढोरा पीटा जाएगा। नाकाम सरकार की नाकामयाबियों का जोरदार प्रचार-प्रसार होगा।
इस स्थिति से बचने के लिए सरकार यदि शीघ्र ही आम चुनाव की घोषणा कर दे, तो कुछ इज्जत बची रह सकती है। क्योंकि संसद का मानसून सत्र पूरा चल पाएगा, इसमें शक है। देश का समय और धन बेकार जाए, इससे अच्छा यही है कि चुनाव की घोषणा हो ही जाए। ताकि भविष्य की नाकामयाबियों से सरकार अपना पल्ला झाड़ सके। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर सरकार की खोटी नीयत सामने आ ही गई। यदि सरकार को गरीबों की इतनी ही चिंता है, तो पूरे 9 साल तक क्यों सोती रही, ठीक चुनाव के पहले इसे लागू कराने का मतलब साफ है कि यह वोट की राजनीति के कारण किया जा रहा है। इसके अलावा यह बात है कि अब तक सरकारी राशन दुकानों के माध्यम से गरीबों को जो अनाज बांटा जा रहा है, उस पर 90 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, इसके बाद भी पूरा राशन कालाबाजारी मे जा रहा है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। यदि विधेयक लागू हो जाता है, तो इस पर सवा लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। अब तक कुपोषण पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका, तो इसकी क्या गारंटी है कि 35 हजार करोड़ रुपए और खर्च करकेगरीबों को भोजन दिला पाने में यह सरकार सक्षम हो पाएगी? सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि सारी समस्याओं का समाधान खाद्य सुरक्षा विधेयक ही है। सरकार समझती है कि इससे ही देश की तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी, बल्कि इससे समस्याएं और अधिक विकराल हो जाएंगी, यह सरकार समझ नहीं पा रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि देश के हालात के बारे में आज जो एक साधारण मानव जानता है, एक आम आदमी जानता है, उतना हमारे प्रधानमंत्री नहीं जानते। उन्हें शायद कुछ भी नहीं पता। या फिर पता न होने का बहाना कर रहे हैं। संभव है वे देश पर आसन्न संकट को समझ चुके हों, पर न समझ पाने की विवशता उनके साथ हो।
हर दिन सामने आ रही रुपये की रिकार्ड तोड़ गिरावट और कई उपायों के बावजूद उसे संभालने में मिल रही नाकामी से यही स्पष्ट हो रहा है कि हमारे नीति-नियंताओं को कुछ सूझ नहीं रहा है। चिंता की बात यह है कि वे अन्य आर्थिक समस्याओं के समाधान में भी नाकाम दिख रहे हैं। इसके कहीं कोई आसार नहीं दिख रहे कि केंद्र सरकार निवेशकों का भरोसा जीत पाने में सफल होगी। जिस तरह विदेशी के साथ देशी निवेशक भी सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं उसे देखते हुए तो यही लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याएं और गंभीर रूप लेने वाली हैं। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार अपना और साथ ही देश का समय बर्बाद करने के बजाय शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में सोचे। शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में इसलिए भी विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि संसद के मोर्चे पर भी सरकार नाकामी का ही सामना कर रही है। संसद का मानसून सत्र जिस तरह आगे बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह लगभग तय है कि एक और सत्र अनुत्पादक साबित होने जा रहा है। अब इस सत्र में सरकार किसी तरह खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित कराने में सफल भी हो जाती है तो इससे देश के भले की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि यह शुद्ध चुनावी पहल है और यह किसी से छिपा नहीं कि मौजूदा स्थिति में खाद्य सुरक्षा कानून अर्थव्यवस्था की समस्याओं को और बढ़ाएगा ही। नाकामयाबियों के बोझ तले दबी सरकार कुछ नहीं कर सकती। उसकी विश्वसनीयता लगातार घट रही है। रोज नए घोटालों ने सरकार की कलई खोल दी है। अब कोयला आवंटन से संबंधित फाइलों का मामला सामने आ गया है। वे फाइलें कहां गई, किसने उसे पार कर दिया, किसी को नहीं मालूम। प्रधानमंत्री कार्यालय को भी नहीं, क्योंकि फाइलें वहीं से गुम हो गई हैं। इस पर प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी स्थिति स्पष्ट होगी, यह नहीं कहा जा सकता। सरकार लगातार अवश्विसनीय होते जा रही है। आम जनता के कई सवालों के जवाब उसके पास नहीं है। अब तो लोग प्रधानमंत्री को भी कई मामलों में दोषी मान रहे हैं। उनके ईमानदार होने के कितने भी दावे किए जाएं, पर लोगों को भरोसा ही नहीं हो पा रहा है कि वे पूर्णत: ईमानदार हैं।
इतनी विवश, लाचार और पंगु सरकार अब तक किसी ने देखी और न ही इस पर किसी ने सोचा। विशेषज्ञ कहते हैं कि महंगाई पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। हालात अभी और भी बेकाबू होंगे। ऐसे में सरकार यदि हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे, तो उस सरकार से क्या अपेक्षा की जाए? ऐसी सरकार का चले जाना ही बेहतर। अब सरकार के सामने आम चुनाव ही सबसे बेहतर विकल्प है। इसके सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं है। सरकार की इस नीयत को बनाए रखने में हमारे सांसद में किसी से कम नहीं हैं। संसद की गरिमा को ताक पर रखकर वे भले ही आचार संहिता की बात करते रहे, पर एक सांसद का कर्तव्य किसी को याद नहीं है। हां अधिकार के लिए हर कोई लड़ता नजर आ रहा है। ऐसे में किसी से भी कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती। आज आम आदमी के साथ साथ मध्यम वर्ग भी बेबस नजर आ रहा है। ऐसे में सरकार यदि अपने लिए वोट मांगे, तो वह किस मुंह से वोट मांगेगी, क्या उपलब्धि बताकर वोट मांगेगी। विपक्ष के पास सरकार की नाकामयाबियों का खुला चिट्ठा है। आखिर सरकार सच से कब तक भागेगी?
  डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 24 अगस्त 2013

अपने आसपास के टॉप 50 की सूची बनाएं

डॉ. महेश परिमल
अक्सर मीडिया में हम विश्व के टॉप धनिक लोगों की सूची सुनते-देखते रहते हैं। जब भी इसमें किसी भारतीय का नाम आता है, तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। कई ऐसे भी होते हैं, जिन्होंने अपने बल पर उक्त सूची में स्थान प्राप्त किया है। ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत होते हैं। ऐसे लोग समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं। कई बार हमें वे विदेशी भी आकर्षित करते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी दौलत कड़ी मेहनत से प्राप्त की होती है। इनकी सफलता की कहानी हमें मुंहजबानी याद रहती है। पर हम इनसे कभी प्रेरणा नहीं लेते। सभी यही कहते हैं कि धीरु भाई अंबानी कभी पेट्रोल पंप में काम करते थे, पर उन्होंने किस तरह से अनथक संघर्ष कर अपना अलग व्यापार शुरू किया और सफलता के कीर्तिमान रचे, इसे जानने की आवश्यकता हम नहीं समझते। यदि हम उनके संघर्षो को याद करें, तो हमें हमारे संघर्ष निश्चित रूप से छोटे लगेंगे।
यह तो हुई बड़े लोगों की बड़ी बातें। पर कभी आपने सोचा कि हमारे ही आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें हम टॉप 50 की सूची में शामिल कर सकते हैं। हमारे ही बीच कई लोग ऐसे होंगे, जिन्हें हम विभिन्न श्रेणियों में रख सकते हैं। कोई बहुत अधिक पढ़ा-लिखा होगा, कोई लेखक होगा, कोई पत्रकार होगा, कोई बहुत ही ज्यादा संवेदनशील होगा, कोई खडूस होगा, कोई धनवान होगा, तो कोई कंजूस होगा, कोई बहुत पकाने वाला होगा, कोई चिकना होगा, कोई गुस्सैल होगा आदि। क्या आपने कभी ऐसे लोगों की सूची बनाई हैे?
हमारी सोसायटी में ही कोई रुतबेदार होगा, तो कोई धनवान। धनवान हम उसे कह सकते हैं, जिनके पास सबसे अधिक वाहन हैं। या फिर जिनके घर में बहुत से ए.सी. हैं। किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में वे धन से अधिक से अधिक योगदान देता हो। ऐसों को हम अमीरों की श्रेणी में रख सकते हैं। ध्यान से देखा जाए, तो यह सब ऊपरी अवलोकन ही हैं। वैसे भी हमारे यहां आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही हमेशा चर्चा में होता है। कुछ लोग हमारे बीच के ऐसे होते हैं, जो दिखावा करते हैं, हमेशा स्वयं को व्यस्त बताते हुए किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में भले ही शामिल न हों, पर चंदा देने में सबसे आगे होते हैं। पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, तो हर तरह से उन्हें आप अपने साथ पाते हैं, ये दिखावा नहीं करते। अपने काम से कम रखते हैं। वास्त में ऐसे लोग ही समृद्धशाली होते हैं। इन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। धनवान होना और समृद्ध होना दोनों ही अलग-टलग बात है। कई धनपति ऐसे होते हैं, जो अपनी आवक का एक निश्चित भाग दान में देते हैं। कई लोग गुप्तदान में विश्वास रखते हैं। कई कंपनियाँ एक निश्चित राशि कुछ धर्माध संस्था हो हर महीने देती हैं। कई लोग इस तरह की सेवा के प्रतिफल की इच्छा रखते हैं। ताकि उनका नाम हो। धनपति बनने के लिए कई बार कई कड़वे संस्मरणों से गुजरना होता है। ऐसे लोग जीवन में कई तरह के समझौते करते हैं। कई लोग धनपति बनने के बाद अपने मूल पहचान को खो देते हैं, या कहें अपनी औकात ही भूल जाते हैं। ऐसे लोग हमेशा समस्याग्रस्त रहते हैं।
कई लोग अपने पिता-दादा की विरासत संभालते हैं। अपने धंधे को स्थापित करने के लिए उन्हें बहुत पसीना नहीं बहाना पड़ता। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्होंने अपने खून-पसीने से अपने धंधे को ऊंचाई तक पहुंचाया है। ऐसे लोगों को कदम-कदम पर सबक सीखने को मिलते हैं। इन सबक से वे तेजी से आगे बढ़ते हैं। ऐसे लोग दूसरों के लिए प्रेरणा होते हैं। फोब्र्स द्वारा हर वर्ष विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची जारी करती है। इस बार उनकी सूची में सोनिया गांधी का नाम है। लोगों को यह कुछ अस्वाभाविक लग सकता है। पर जो सच है, वह हमारे सामने है। तो फोब्र्स जो सूची तैयार करता है, उस पर हम अविश्वास करके यदि अपने आसपास के अच्छे लोगों की सूची तैयार कर उसे सार्वजनिक करें, देखो कितने सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। इससे हमें उन सभी को समझने का अवसर मिलेगा। आपकी सूची लोगों में चर्चा का विषय बन सकती है। कुछ लोगों में सुधार भी ला सकती है। दूसरी ओर निश्चित रूप से आपको आलोचना का भी शिकार होना पड़ेगा। पर इससे न घबरा कर आप केवल अपना काम करें, निश्चित रूप से आपके काम को सराहना मिलेगी।
ऐसी सूची सम्पत्ति के आधार पर ही बनती है। विश्व के टॉप 50 में चीन का एक भी अरबपति व्यापारी शामिल नहीं है। इस सूची में अमेरिका के 21 लोग शामिल हैं। टॉप 50 में एकमात्र भारतीय मुकेश अम्बानी का समावेश हुआ है। अपनी 22.9 अरब डॉलर की सम्पत्ति के साथ वे 28 नम्बर पर हैं। इस सूची में 6 महिलाएं भी हें। इस सूची में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो 90 वर्ष के हो चुके हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व के टॉप 100 अरबपतियों की कुल सम्पत्ति दो ट्रिलियन डॉलर है। डॉलर की कीमत में घटती-बढ़ती के कारण इस सम्पत्ति में भी उतार-चढ़ाव आता रहता है। केवल जुकरबर्ग ही ऐसे अरबपति हैं, जो 20 से 29 वर्ष की आयु के बीच हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 19 अगस्त 2013

उद्योगपतियों के सामने नतमस्तक ममता

डॉ. महेश परिमल
कुछ सप्ताह पहले ममता बनर्जी मुम्बई में थीं, वहां उनकी आवाज कुछ बदली हुई सी थी। तेवर भी आक्रामक नहीं थे। ममता दीदी के इस रूप से सभी को आश्चर्य मे डाल दिया। आश्चर्य इसलिए कि उन्होंने वहां मिथुन चक्रवर्ती और भप्पी लहरी को साथ लेकर उद्योगपतियों को संबोधित किया। स्वयं तो सफेद साड़ी और स्लिपर में थीं, पर उद्योगपतियों को अपने राज्य में बुलाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दे रही थीं। उनके वादे सुनकर उद्योगपति हैरत में हैं कि ये वही ममता बनर्जी हैं, जिसने सिंगूर से टाटा का नेनो प्रोजेक्ट हटवाया था। वही प्रोजेक्ट गुजरात जाकर उसे समृद्ध कर गया। आज वही ममता उद्योगपतियों को इस बात का विश्वास दिला रही हैं कि उन्हें हर तरह की सुविधाएं दी जाएंगी। उद्योगपति इस आशा से उनकी बात सुन रहे थे कि क्या पता 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाए। इसलिए आज उनकी बात सुनना लाजिमी है।
ममता बनर्जी का यह रूप लोगों को भले ही न भाये, पर उद्योगपति हतप्रभ थे। वे ममता की इस छवि को एकदम से गले से उतारने के लिए भीतर से तैयार नहीं हैं। ममता भी यह अच्छी तरह से समझ गई हैं कि यदि राज्य का विकास करना है, तो राज्य में उद्योगों का होना आवश्यक है। सिंगूर के बाद वहां कोई उद्योगपति जाने को तैयार ही नहीं है। ऐसे में ममता अब इस कोशिश में है कि कैसे भी हो, उद्योगपतियों को अपने राज्य में बुलाना ही है। इसलिए आज  कापरेरेट लैग्वेज में बात कर रही हैं। अपनी आक्रामक छवि को चोला उन्होंने मुम्बई में उतार दिया है। गुस्सा तो उन्हें अब छू भी नहीं पा रहा है। उद्योगपतियों ने ममता बनर्जी को एक शांत और सौम्य मुख्यमंत्री के रूप में देखा। हिंदी औरा बंगला भाषा के मिश्रण से बोले गए उनके संवादों ने लोगों को रिझाया। अपनी जानी-पहचानी कार्यशैली में ममता ने कहा कि मेरी मित्रता अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के साथ है, लता मंगेशकर के साथ भी कभी-कभी बातचीत कर लेती हूं। मैं चाहती हूं कि बॉलीवुड और बंगला फिल्में मिलकर हॉलीवुड बनाएं।
सभी राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्य में उद्योग लगाने के लिए लाल जाजम बिछाते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्वभाव बहुत ही रफ-टफ हैं, स्वयं तो बहुत ही सादगी से रहती हैं, पर सूट-बूट वाले उद्योगपतियों के सामने उनकी छवि एकदम ही अलग थी। उद्योगपतियों ने ममता का जोरदार स्वागत किया। मुकेश अंबानी, आदी गोदरेज, देवेश्वर राव, गोयनका सहित करीब 24 कंपनियों के चेयरमेन ममता को सुनने के लिए आए थे। यही नहीं एनटीपीसी, स्टेट बैंक, सेल, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर भी उनसे मिलने आए थे। राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में उद्योगों की स्थापना हो या न हो, पर उद्योगपति ममता से अच्छे संबंध बनाए रखने के पक्ष में थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी संभवत: किंगमेकर के रूप में उभरकर आए, ऐसा माना जा रहा है। वैसे तो ममता ने अपने मुम्बई प्रवास को पूरी तरह से गैरराजनीतिक ही रखा था, पर पत्रकार कहां मानने वाले थे, वे अपने प्रश्नों से बार-बार राजनीतिक बयान उगलवाने के प्रयास में रहे। यह सभी जानते हैं कि ममता बनर्जी ने पहली बार पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़ फेंका, उसके बाद पंचायत चुनाव में भी अपना परचम फैलाया। अपनी इस सफलता के बाद वे यह समझा रही हैं कि भविष्य में लोकसभा चुनाव में उनकी भूमिका किंग मेकर की रहेगी। लोगों को न तो कांग्रेस रास आ रही है और न ही भाजपा, इसलिए एक तीसरा मोर्चा बनेगा और और वर्चस्व स्थापित करेगा। पत्रकारों से इतना कहने के बाद वे यह कहने लगी कि मुझसे राजनीति की बातें मत कीजिए, मैं तो उद्योगपतियों से मिलने के लिए आई हूं। राजनीति की बातें पूछकर मेरा ध्यान डायवर्ट न करें।
लोग अभी तक यह नहीं भूले हैं कि टाटा के नेनो प्रोजेक्ट के लिए ममता के नेतृत्व में सिंगूर में फैक्टरी बंद करवा दी थी। उस समय वे विपक्ष में थीं। इसलिए उन्होंने अपनी आक्रामक पहचान बना ली। टाटा का यही प्रोजेक्ट बाद में गुजरात चला गया, जहां उसने उसकी सूरत ही बदल दी। वही ममता बनर्जी उद्यागपतियो से यह कह रही थीं कि आप लोग मेरे राज्य में उद्योग लगाएं, आपको हर तरह की सुविधाएं दी जाएगी। मैं वादा करती हूं कि किसी भी उद्योगपति को कोई मुश्किल नहीं होगी। विपक्ष में रहकर एक पूरे कारखाने को हटा देना और सत्ता में रहकर उद्योगपतियों को राज्य में उद्योग लगाने के लिए लुभाना अलग बात है। यह बात ममता के व्यवहार से पता चली। इस सम्मेलन में ममता उद्योगपतियों से मिलने की पूरी तैयारी के साथ आई थीं। उन्होंने कई प्रलोभनों के पैकेज जारी किए। उन्होंने कहा कि किसी भी उद्योगपति को लैंड एक्जीविजन की आवश्यकता ही नही होगी, क्योंकि दस हजार एकड़ जमीन पर ‘लैंड हब’ बनाया गया है। उद्योगों को चाहे जितनी बिजली मिलेगी। उद्योगपतियों द्वारा पूछे गए सभी सवालों का जवाब भी ममता के पास था। हां राजनीति से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देने में वे कतरा रही थीं। अपने साथ वे दादा मिथुन चक्रवर्ती और गहनों की चलती-फिरती दुकान बप्पी लहरी को भी लेकर आई थीं। ताकि कुछ लोग इन्हीं से ही अपना मनोरंजन कर सकें।
जिस तरह से हमारे देश के वित्त मंत्री विदेशों में पूंजीनिवेशकों के लिए रोड शो का आयोजन करते हैं, उसी तरह देश के मुख्यमंत्री भी उद्योगपतियों के लिए लाल जाजम बिछाते हैं। कोई खुलेआम उद्योगपतियों को आमंत्रित करते हैं, तो कोई निजी तौर पर बैठकें आयोजित करते हैं। सभी जानते हैं कि उद्योग रोजी-रोटी खींचकर लाते हैं। एक तरफ यही मुख्यमंत्री सामान्य प्रजा के हितों की अनदेखी करते हैं, तो दूसरी तरफ उद्योगपतियों के आगे पूरी तरह से झुक जाते हैं। सामान्य रूप में उद्योगपति भरोसे और ट्रेंड पर चलते हैं। पश्चिम बंगाल से टाटा नेनो को हटा देने वाली ममता बनर्जी आज जिस तरह से उद्योगों को आमंत्रित करने के लिए प्रयासरत हैं, उससे सभी को आश्चर्य है। वे उद्योगपतियों पर किस तरह से विश्वास दिला पाएंगी, यह देखना है। लोग इसी ताक पर हैं कि वे ऐसा कैसे करेंगी, यह आज चर्चा का भी विषय है। इधर उद्योगपतियों ने भी अपनी पब्लिक रिलेशंस की टीम को मैदान में उतार दिया हे, ताकि पश्चिम बंगाल में सस्ती जमीन, सस्ता रॉ मटेरियल और अन्य सुविधाओं का पता लगाया जा सके। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राजनैतिक स्थिरता। यही स्थिति ही उद्योगों को लम्बे समय तक चलने की गारंटी देती है। उधर पश्चिम बंगाल के वामपंथी भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं, उन्हें भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसे उद्योगपति बखूबी समझते हैं। देखना यह है कि ममता इन उद्योगपतियों को कहां तक लुभा पाती हैं और कहां तक उन्हें सुविधाओं का आश्वासन देकर उन्हें अपने राज्य में उद्योग लगाने के लिए विवश कर सकती हैं।
    डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

हम गुलाम हमारा देश गुलाम

डॉ. महेश परिमल
स्वतंत्रता दिवस करीब है। देश में आजादी के तराने बजने लगे हैं। हमें यह बताया जाएगा कि हमें आजाद हुए 66 वर्ष हो गए हैं। इस आजादी को पाने के लिए हमारे देश के अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। बहूत ही मुश्किलों से हमें यह आजादी मिली है। इस तरह के तमाम नारों से हमें यह समझाने की कोशिश की जाएगी कि यह आजादी हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि हमें गुलाम बनाने के लिए अंग्रेजों ने जिस तरह के कानूनों का सहारा लिया था, वह आज भी कायम हैं। यानी 66 वषों में हमने उन कानूनों को बदलने की कोशिश भी नहीं की, जिसके आधार पर हमें गुलाम बनाया गया था। वास्तव में यही सबसे बड़ी गुलामी है कि हम आज तक वे कानून ही नहीं बना पाए, जिसने हमें गुलाम बनाया। इसे हम अपनी काहिली ही कहेंगे। अब तो यह साफ हो गया है कि हमारी वर्तमान सरकार पूरी तरह से पंगु हो गई है। वह अपनों को तो भ्रष्टाचार की पूरी छूट दे रही है, दूसरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात भी करती है। न तो वह स्वयं को भ्रष्टाचार से दूर रख पा रही है और न ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम ही उठा पा रही है।
इस बार स्वतंत्रता दिवस पर एक बार फिर लालकिले की प्राचीर से हमारे कर्मठ प्रधानमंत्री अपनी चिर-परिचित शैली में पाकिस्तान को चेताएंगे कि वह अपनी हरकतों से बाज आए, अन्यथा उसे इसके भयानक दुष्परिणाम भोगने होंगे। इसके अलावा वे देशवासियों को देश की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिेए भी कहेंगे। वे हमारी स्वतंत्रता का अर्थ समझाएंगे। अंत में अपनी शुभकामनाओं के साथ देशवासियों को इस दिन की बधाई देंगे। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद आप स्वयं एक बार यह सोचने की कोशिश करेंगे कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं। जब हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था, तब उसने प्रजा को कुचलने और शासक का विरोध करने वालों क अधिकार छीन लेने के लिए एक कानून बनाए थे। इन कानूनों में से एक कानून था प्रिवेंटिव डिटेंशन, इस कानून के अनुसार सरकार केवल शंका के आधार पर किसी भी नागरिक को गिरफ्तार कर सकती है। यदि सरकार को पता चल जाए कि इससे देश की शांति को खतरा है, तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसा पुलिस को अधिकार था। जब देश आजाद हुआ, तो इस कानून को बनाए रखने की कतई आवश्यकता नहेीं थी, लेकिन आज भी वह कानून बदस्तूर कायम है। आज भी सरकार को लगता है कि उसे अमुक व्यक्ति से देश की शांति को खतरा है, तो उसे गिरफ्तार कर सकती है। यह काननू नागरिकों की स्वतंत्रता पर किसी आघात से कम नहीं है। समाज सेवक अन्ना हजारे की गिरफ्तारी इसी कानून के तहत की गई थी।
देश जब गुलाम था, तब गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए इस कानून देश में कहीं भी यदि नमक तैयार किया जाता हो, तो सरकार को उसे टैक्स देना होगा। अन्यथा नमक तैयार करने वाले सजा होती थी। सरकार यह मानती थी कि जिस जमीन पर नमक तैयार किया जा रहा है, वह सरकारी है। आजादी के बाद इस कानून में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया, पर उपरोक्त कानून की तरह यह कानून आज भी कायम है। सरकार आज भी नमक पर कर ले रही है। अंग्रेजों ने मंदिरों एवं धर्म से जुड़ी संस्थाओं पर अंकुश रखने के लिए पब्लिक ट्रस्ट से जुड़े कानून बनाए थे। भारत आजाद हुआ, तब भारतीय दंड संहिता 25 और 26 के माध्यम से नागरिकों के धार्मिक स्वातं˜य को मूलभूत अधिकार के रूप में माना गया था। इसके बाद भी 1950 में सरकार ने बाम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट नामक कानून बनाकर नागरिकों से एक झटके में ही धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। इस कानून के खिलाफ अनेक ट्रस्ट सुप्रीमकोर्ट तक गए, पर देश की सर्वोच्च अदालत से उन्हें न्याय नहीं मिला। आज भी यह कानून अमल में लाया जा रहा है।  हमारी अदालतों ने प्रशासनिक मदद से प्रजा की स्वतंत्रता पर किस तरह से वार करती है, इसका उदाहरण यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश दिया कि देश की तमाम मोटर कार के कांच पर काले रंग की फिल्म निकाल ली जाए। इसके पहले आरटीओ की अनुमति लेकर यह फिल्म लगाई गई थी। किंतु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से वाहनों से यह फिल्म निकाली जाने लगी। अदालत ने यह आदेश भी दिया कि यदि इसमें ढिलाई बरती गई, तो उसके सामने अदालत के अपमान की कार्रवाई की जाएगी। जिस देश के नागरिक कड़ी धूप से बचने के लिए अपने वाहन पर फिल्म तक नहीं लगा सकते, उन्हें हम किस तरह से स्वतंत्र कह सकते हैं। आज आतंकवाद जोर पकड़ रहा है, इसे हमारे देश के नेताओं ने ही संरक्षण दिया है। लेकिन आज इसी आतंकवाद के नाम पर सरकार नागरिकों पर विभिन्न तरीके अत्याचार कर रही है। 
अंग्रेज यह मानते थे कि इस देश में जितनी जमीन है, उतने ही जंगल है और वे ही इनके मालिक हैं। इस कारण उन्होंने जंगल अधिनियम ओर जमीन अधिग्रहण धारा जैसे कानून बनाए, इस कानून से प्रजा की जमीन की मालिकी उनसे छीन ली गई। स्वतंत्र भारत की सरकार ने इस कानून को रद्द करने के बजाए इसे जारी रखा। इस कानून के मुताबिक आज भी गरीब किसानों की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल कर ली जाती है। इसी तरह अंग्रेजों के शासन में 1894 में एक कानून बनाया गया था, जिसके अनुसार निजी जमीन छीनने के लिए जमीन संपादन की धारा तैयार की गई, जो आज भी अमल में लाई जाती है। इन कानूनों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि आज हम भले ही आजाद हो गए हैं, पर देखा जाए, तो हम पूरी तरह से गुलाम ही हैं। कई मामलों में हमें यह आजादी अखरती है। कई बार तो सरकार ने अंग्रेजों से अधिक अत्याचार किए हैं।
आज हम भले ही स्वयं को स्वतंत्र मानें, पर देखा जाए तो हमारी सरकार भी स्वतंत्र नहीं है। वह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों का खिलौना बनकर रह गई है। हमारी सरकार अमेरिका जैसी महासत्ता की गुलाम है। हमारे प्रधानमंत्री रिटेल में विदेशी कंपनियों को देश में घुसने न देने की घोषणा करें, तो अमेरिका हम पर यह दबाव बनाता है। उसके लिए अनुमति दिलवाता है। यदि हम आज ईरान के साथ व्यापार करना चाहें, तो नहीं कर सकते, क्योंकि ईरान अमेरिका का दुश्मन है, इसलिए अमेरिका हम पर यह दबाव बनाता है कि ईरान से किसी भी तरह का व्यापार समझौता न किया जाए। वर्ल्ड बैंक, वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन और यूनेस्को जैसी संस्थाएं ग्लोबोलाइजेशन के नाम पर  हमारी सरकार की स्वतंत्रता छीन रही है। यदि हम ऐसा सोचते हैं कि हमारी आजादी केवल वायवीय या आभासी है, तो हमें अपनी सच्ची आजादी के लिए फिर से लड़ाई शुरू करनी होगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

चिंतित सरकार की दुविधा: बिल कैसे पास हों?


डॉ. महेश परिमल
सीमा पर पाक की नापाक हरकतें जारी हैं। ऐसे में हमारे रक्षा मंत्री ऐसा बयान दे रहे हैं, जिससे पाकिस्तान को शह मिलती है। जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है, तब पाकिस्तान ने हमारी तमाम कमजोरियों को जानते-समझते हुए हमें यह चुनौती दी है कि जो कुछ करना चाहो, कर लो। हम हैं कि केवल बयानबाजी ही कर रहे हैं। एक तरह से यह कोशिश भी की जा रही है कि पाकिस्तान के साथ सचिव स्तर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री स्तर की भी चर्चा होती रहनी चाहिए। अब हालात बदल गए हैं, जब से नवाज शरीफ ने सत्ता संभाली है, तब से सीमा पर गतिविधियां बढ़ गई है। सरकार की यही चिंता काफी नहीं है, मानसून सत्र 15 दिनों का है, 5 दिन गुजर चुके हैं, अब केवल दस दिन ही बचे हैं, ऐसे में बहुत से महत्वपूर्ण विधेयक हैं, जिन्हें पारित कराना है। पर यह हो नहीं पा रहा है। सरकार को इस बात की खुशी है कि सचिन तेंदुलकर ने पहली बार संसद की कार्यवाही में भाग लिया, पर इस बात की चिंता नहीं है कि देश की जनता के हित में जो महत्वपूर्ण बिल हैं, उसे किस तरह से पारित कराया जाए।
पाकिस्तान की हरकतों से एंटी इंकमबंसी में वृद्धि हुई है। यह सच है, पर यह भी सच है कि सरकार अब लोकसभा में अल्पसंख्यक हो गई है। सपा-बसपा की बैसाखी पर टिकी यह सरकार अब उसके ही निर्णयों पर ऊंगली उठा रही है। ये दोनों दल अब सरकार की नाक दबाने का ही काम कर रहे हैं। इन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार को समर्थन देने के कारण ये दोनों दल अपना ही उल्लू सीधा करने में लगे हैं। जनता के हितों से इनका कोई वास्ता नहीं रहा। मुलायम के जो कठोर तेवर इस बार देखने को मिले, उसके आगे सरकार झुकती ही नजर आ रही है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किस तरह से 114 बिल इस सत्र में पारित कराएं जाएं? इतने कम दिनों में इतने बिल किसी भी स्थिति में पारित नहीं कराए जा सकते। जब मानसून सत्र शुरू हुआ था, उसके पहले संसदीय मंत्री ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की थी। मामला यह था कि संसद के सत्र को चलने देने के लिए शालीनतापूर्वक काम किया जाए। अनावश्यक बाधाएं खड़ी न की जाए। कुल मिलाकर संसद की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश की जाए। पर विपक्ष द्वारा दागे गए कई सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं है। जैसे खाद्य सुरक्षा बिल पर जो विवाद है, उसे खत्म करने के लिए सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा था। अब सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दोनों स्वार्थी दलो में से एक उसका विरोध कर रहा है। उधर तेलंगाना नाम भी उसके गले में फंस गया है। सरकार इसे न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है। इस पर सरकार की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही है।
इस मानसून सत्र में सरकार कितने विधेयक पारित करवा सकती है, इस पर सबकी नजर है। इन विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष के समर्थन की आवश्यकता होगी। या फिर सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होना चाहिए। अभी तो सरकार इन दोनों से ही वंचित है। उसे  न तो विपक्ष का सहयोग मिल रहा है, न ही समर्थन देने वाले दल से उसके संबंध अच्छे हैं। 2012 में सरकार ने 32 बिल पास कराए थे। 2013 में अब तक केवल 13 बिल ही पास हो पाए हैं। इसके मुकाबले 2005 में 56 और 2006 में 64 किल पास हुए थे। यूपीए केंद्र सरकार महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल संसद में पास कराने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। लोकसभा में सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा-बसपा पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं। ये दल समर्थन की कीमत भी वसूलते हैं। सरकार को इस बात का डर हमेशा सताता है कि यदि किसी विधेयक पर मतदान की नौबत आ जाए, तो सबसे पहले सपा ही इस अवसर का पूरा लाभ उठाएगी। जो महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल हैं, उसमें से लैंड एक्जीविजनऔर रि-सेटलमेंट बिल का भी समावेश होता है। यदि यह बिल पारित हो जाता है, तो गांवों में किसानों को उनकी जमीन का अधिक मुआवजा मिलेगा। किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में लैड एक्जीविजन करने की बात आती है, तो किसानों को अधिक से अधिक मुआवजा मिले, ऐसी सुविधाएं देने वाला यह विधेयक है। पर सरकार इस बात का प्रचार नहीं कर पाई और न ही विपक्ष को यह समझा पाई कि इससे किसानों का ही भला होगा। पर विपक्ष भी यह बखूबी जानता है कि यह बिल अभी इसीलिए लाया गया है कि आगामी चुनावों में इसका लाभ उठाया जाए। यही हाल सरकार की महत्वाकांक्षी विधेयक खाद्य सुरक्षा बिल का है। सरकार की नीयत यही है कि इसका लाभ चुनावों में लिया जा सके। इस विधेयक पर विपक्ष को कई आपत्ति है, पर सरकार के पास उसका कोई जवाब नहीं है। इस विधेयक के पीछे यही उद्देश्य है कि देश के किसी भी भाग को अब कोई भी भूखा नहीं सोएगा। पर सरकार को इस बिल को अभी लाने की क्या आवश्यकता थी। यह तो सरकार बनते ही आ जाना था। पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए विपक्ष इसका भरपूर फायदा उठा रहा है।
इस समय आईएसआई दुर्गा शक्ति का मामला सुर्खियों में है। इसमें माइनिंग सिस्टम जवाबदार है। उत्तर प्रदेश सरकार  द्वारा दुर्गा शक्ति को सस्पेंड करने के पीछे रेत की हेराफेरी ही है। रेत माफिया के आगे अखिलेश सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। इसलिए दुर्गा शक्ेित को आगे करके उसे सस्पेंड कर दिया गया। माइंस एंड मिनरल्स बिल-2011 को सरकार पारित करवाना चाहती है। यदि यह बिल पारित हो गया, तो कोलगेट जैसे घोटाले भविष्य में नहीं होंगे, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। पेंशन फंड एंड रेग्युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथारिटी बिल पेंशन पाने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। नई पेंशन प्रणाली के लिए यह उपयोगी है। नेशनल कंपनी लो ट्रिब्यूनल खड़े करने के लिए दरवाजा खोल देने वाले बिल की कापरेरेट कंपनियां आतुरता से राह देख रही हैं। 1956 में लॉ बिल बना था, आज 6 लाख 50 हजार कंपनियां पंजीकृत हैं। इन कंपनियों के लिए ये बिल महत्वपूर्ण है। इसके अलावा व्हीसल ब्लोअर प्रोटेक्शन बिल की आज विशेष रूप से आवश्यकता है। लोग यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं,तो उनका संरक्षण होना चाहिए, यह बिल उन्हीं के संरक्षण के लिए है। भ्रष्टाचार का विरोध करने वाली सरकार और विपक्ष दोनों ही चाहते हैं कि यह बिल पारित हो जाए, पर यह पारित क्यों नहीं हो पा रहा है, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
मानसून सत्र के अब कुछ ही दिन शेष हैं। सरकार के सामने यह सारे विधेयक एक चुनौती के समान हैं। सरकार इस सत्र में सप्लीमेंट्री ग्रांट्स पास करवाएगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर जारी अध्यादेश पर सरकार मंजूरी प्राप्त कर लेगी, इसमें शक है। सरकार तो क्या, यह किसी के लिए भी संभव ही नहीं है। सरकार यदि यह समझ रही है कि सपा-बसपा उन्हें सही समय पर साथ देंगे, तो यह उसकी भूल है। उन्हें अपने समर्थन की कीमत वसूलना अच्छी तरह से आता है। इसलिए उन पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार के फ्लोर मैनेजर 116 में से 63 विधेयक पारित कराने के लिए कृतसंकल्प है। इससे यूपीए सरकार की छवि सुधरेगी, ऐसा माना जा रहा है, ताकि 2014 के चुनाव में अपनी छवि के अनुकूल वोट हासिल कर सके। सरकार यदि यह मानती है कि यह विधेयक वास्तव में जनहितकारी हैं, तो इन पर पहले ही चर्चा करवा लेनी थी, विपक्ष का विश्वास प्राप्त कर लेना था, पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए वह बार-बार विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पाती है और कमजोर साबित होती है। सरकार की इसी कमजोरी का लाभ सपा-बसपा और विपक्ष उठा रहा है। केंद्र की चिंतित सरकार के सामने आज सबसे बड़ी दुविधा यही है कि ये बिल कैसे पास हों?
    डॉ. महेश परिमल

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