गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला?

डॉ. महेश परिमल
ऐसा लगता है कि रेप के मामले में अब मुम्बई दिल्ली से स्पर्धा करने लगा है। वैसे देखा जाए, दुष्कृत्य देश के किसी भी कोने में हो, इससे लोगों को कोई बहुत अधिक फर्क पड़ता नहीं है। छोटे शहरों को तो और भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए यह तो आम अपराध की ही तरह है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस प्रकार की घटनाएं लगातार हो रही हैं, पर इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ताकि इस तरह के अपराधों में कमी आए। अपराधियों में किसी भी तरह से कानून का खौफ तो दिखाई ही नहीं दे रहा है। यदि समाज में एक भी दुष्कृत्य की घटना होती है, तो यह केवल पुलिस या नेताओं की चिंता का विषय नहीं है, यह मामला तो समाजशास्त्रियों के लिए एक चुनौती है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में नारियों की भूमिका में जो परिवर्तन आया है, उसका संबंध दुष्कृत्य की बढ़ती घटनाओं से है।
पहले ऐसा नहीं था। तब एक नारी, माँ, बहन, पत्नी और पुत्री की भूमिका में ही रहती थी। उसकी जवाबदारी संतानों के लालन-पालन और परिवार के पोषण तक ही सीमित थी। इस कर्तव्य के निर्वहन में यदि वह घर से बाहर निकलती थी, तो उनके साथ उनके परिवार का ही कोई विश्वस्त साथी हुआ करता था। किसी भी रूप में उन्हें अकेले घर से बाहर नहीं जाना पड़ता था। इन हालात में उनके साथ किसी प्रकार का र्दुव्‍यवहार नहीं होता था, ऐसी बात नहीं थी, पर जो कुछ भी उनके साथ होता था, वह मर्यादित होता था। व्यक्ति को समाज का भय रहता था। मुम्ब्ई और दिल्ली जैसे महानगरों में जो गेंगरेप की घटनाएं हुई हैं, उसमें अनजान लोगों की सहभागिता है। नारी के स्वतंत्र होने की इतनी बड़ी कीमत आज उसे चुकानी पड़ रही है। इसका मुख्य कारण है आज के प्रचार माध्यमों में नारी की जो छवि पेश की जा रही है,उसमें वह केवल एक भोग्या ही है। पुरुषों की वासना भड़क उठे, ऐसे विज्ञापन टीवी पर रोज ही दिखाई दे रहे हैं, फिल्में भी कुछ इसी तरह की बन रही हैं। इन सबमें नारी को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में उभारा जा रहा है। जब तक पुरुष प्रधान समाज में नारी को एक भोग्या के रूप में दिखाया जाता रहेगा, उसे भोग का साधन माना जा रहेगा, तब तक पुरुष की बीमार होती मानसिकता को सुधारा नहीं जा सकता। ऐसी ही घटनाएं समाज में होती रहेंगी।  आज की मांग यही है कि यदि नारी को स्वतंत्रता मिली है, तो उसका उपयोग भी उसे संभालकर करना होगा। पुरुषों की मानसिकता को बदलना इतना आसान नहीं है, उसके लिए कानून तो बहुत हैं, पर उसे अमल में लाने की नीयत किसी में नहीं है।
मुम्बई जिसे नारियों के लिए सुरक्षित माना जाता रहा है, वहां की महिलाएं देर रात लोकल ट्रेने में यात्रा कर सही सलामत अपने घर तक पहुंचने की गारंटी हुआ करती थी। अब वह गारंटी देने वाला कोई नहीं है। महालक्ष्मी उपनगर के कुछ असामाजिक तत्वों ने परेल की शक्ति मिल की तस्वीर लेने के लिए अपने साथी के साथ गई महिला फोटोग्राफर के साथ 5 नराधमों ने दुष्कृत्य किया। अब तक रेप की राजधानी दिल्ली थी, पर अब मुम्बई उससे स्पर्धा करने लगी है। इस दौड़ते-भागते महानगर में भी स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। छेड़छाड़ ही नहीं, बल्कि अब तो दुष्कर्म की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं। यहां की सुरक्षित नारियां अब स्वयं के असुरक्षित समझने लगी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए, तो 2011 और 2012 के बीच मुम्बई शहर नारियों को लेकर किए जा रहे अपराधों की संख्या में 11 प्रतिशत का इजाफा देखा गया है। 2011 में मुम्बई में नारी अत्याचार की 553 घटनाएं दर्ज की गई थीं। 2012 में यह आंकड़ा 614 ततक पहुंच गया। 2012 में मुम्बई में ही रेप की 234 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इसके मुकाबले दिल्ली में 585 घटनाएं दर्ज हुई। मुम्बई में रेप की जो 234 घटनाएं हुई, उसमें से 104 घटनाएं 14 से 18 वर्ष की उम्र के बीच की नारियों के साथ हुई थी। स्पष्ट है कि आजकल लोग महिलाओं पर कम किशोरी और युवतियों को ही अपना शिकार बनाते हैं।
मुम्बई में जब भी इस प्रकार की घटनाएं होती हैं, तो बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती हे, जो कुछ समय बाद भुला दी जाती हैं। कुछ समय तक लोग आंदोलित होते हैं, पर जैसे कि मुम्बई की तासीर है कि वह बड़ी से बड़ी घटनाओं को भी भुला देती है, उसी तरह रेप की कई घटनाएं मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दी हैं। 2011 की 20 अक्टूबर को मुम्बई के अंधेरी में एक पान की दुकान के पास कुछ युवक, युवतियों के साथ खड़े थे। ये सभी किसी की राह देख रहे थे, ताकि आगे जाया जा सके। इतने में वहां नशे में धुत्त चार युवक आए और उनसे अपशब्दों में बातचीत करने लगे। एक युवक तो एक युवती के ऊपर गिर ही पड़ा। इन युवतियों के साथ जो पुरुष थे, उन्होंने उन नशेड़ियों का विरोध किया। जमकर बहसबाजी हुई, तब वे सभी नशेड़ी चले गए। कुछ देर बाद वे अपने और साथियों के साथ हथियार लेकर वहां आए और युवतियों के पुरुष मित्रों पर छुरे से वार कर दिया। इस झूमा झटकी में दो पुरुष बुरी तरह जख्मी हो गए। बाद में दोनों की मौत हो गई। इस मामले ने पूरी मुम्बई को दहला दिया। नारी सुरक्षा को लेकर मुम्बई हाईकोर्ट ने भी इस पर चिंता व्यक्त की। बाद में इस मामले पर एक रिट पिटीशन दाखिल की गई, पर इसका कोई परिणाम आज तक सामने नहीं आया। अन्य बुरी घटनाओं की तरह मुम्बई ने इस घटना को भी भुला दिया।
पिछले वर्ष जुलाई में मुम्बई के करीब डोबिवली में छेड़छाड़ के मामले में एक युवक की हत्या कर दी गई। इस घटना में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि युवक की हत्या के आरोप में जिन 5 लोगों को गिरफ्तार किया, उसमें से चार नाबालिग थे, केवल एक की उम्र 19 वर्ष थी। बात ये थी कि संतोष विछीवोरा नामक युवक रात दस बजे अपनी दोस्त के साथ खड़ा था, इतने में वहां बस से 5 लोग उतरे, वे संतोष के साथ खड़ी युवती से छेड़छाड़ करने लगे। संतोष ने जब इसका विरोध किया, तो एक युवक ने छुरे से उस पर हमला कर दिया। बाकी के चार युवकों ने भी उसका साथ दिया। वे चारों भी संतोष पर टूट पड़े। जब नागरिकों ने संतोष को बचाने की कोशिश् की, तो उन पर भी हमला कर दिया गया। इधर घबराई युवती ने अपने अन्य साथियों को इसकी सूचना दी। संतोष को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पांचों आरोपियों में से केवल एक को जो 18 वर्ष का था, जेल भेज दिया गया, शेष चारों नाबालिगों को सुधार गृह में भेज दिया गया। बात आई-गई हो गई। इस घटना को भी मुम्बई ने अपनी छाती में दफ्न कर दिया। मुम्बई की छाती में ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं दफ्न हैं, जो अब घाव का रूप ले चुके हैं, इन्हें कुरेदने की कोशिश न हो, तो ही अच्छा है।
आज हमारे देश में दुष्कृत्य की शिकार युवतियों एवं महिलाओं की हालत ऐसी है कि घटना के बाद जो स्थितियां सामने आती हैं, उन्हें जिस तरह से समाज देखता है, पुलिस जांच करती है, तरह-तरह के सवाल करती है,उससे ऐसा लगता है कि उनके साथ एक बार और दुष्कृत्य हो जाए, वह सहन हो जाएगा, पर यह सहन नहीं होता। दोष किसी का और सजा किसी को। जब तक इस प्रवृत्ति का अंत नहीं होगा, तब तक समाज में नारियों की इज्जत सरे आम लूटती रहेंगी और हमेशा की तरह कानून कुछ नहीं कर पाएगा। मुम्बई की घटना के बाद एक दु:खी आदमी के मुंह से निकल गया ‘हे काय झाल, मांझा मुम्बई ला? ’
डॉ. महेश परिमल

2 टिप्‍पणियां:

  1. वर्तमान हालातों में तो लगता है कि कोई भी, कहीं भी सुरक्षित नहीं। शाम को जब सही सलामत घर लौट आए तो ही ठीक है।

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  2. धन्‍यवाद ललित भाई आपने मेरे विचार जाने और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। आभार

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