मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

खामोशी में दबी सिंहों की अकाल मौतें!

डॉ. महेश परिमल
पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह दु:खभरी खबर है कि ट्रेन के पहियों के नीचे आकर दो गर्भवती सिंहनी की मौत हो गई। खबर अखबार की सुर्खियां बनकर खामोश हो गई। इससे एक बार फिर यह मुद्दा जीवित हो उठा कि गीर के जंगलों में जो सिंह जीवित हैं, उन्हें जिंदा रखने के लिए आखिर क्या उपाय किए जा रहे हैं? सरकार इस बात पर खुश हो जाती है कि गीर  के जंगलों में सिंहों की संख्या लगातार बढ़ रही है, पर सिंहों की बढ़ती संख्या के साथ क्या गीर  के जंगलों का विस्तार हो पाया? विस्तार नहीं होने के कारण ही इस समय ¨सह जंगल से बाहर आकर अपना साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं और मौत के शिकार हो रहे हैं।
देश में जब पहली बार ट्रेन चलनी शुरू हुई, तो काले इंजन से लोग खौफ खाते थे। वह लोगों को दानव की तरह दिखाई देता था। इंजनरूपी यह काला राक्षस किसी को कुचल न दे, इसका अहसास सभी को होता था। जब इंसान उस काले राक्षस से डरता था, तो फिर जानवरों की क्या बिसात? उस समय गीर  के जंगलों से होकर रेल की पांते तो बिछ गई थी, पर ट्रेन चलनी शुरू नहीं हुई थी। पटरी पर प्रेक्टिस के लिए केवल इंजन ही दौड़ता था। ऐसे ही एक बार इंजन के ड्राईवर ने देखा कि एक सिंहनी पटरी पार कर रही है। उसने सिंहनी को बचाने की लाख कोशिशें की, पर सिंहनी आखिर इंजन के पहियों के नीचे आ ही गई। यह उस समय की पहली घटना थी, जब किसी इंजन से किसी सिंहनी की मौत हुई हो। फिर तो ऐसा हुआ कि इन जानवरों को भी वह इंजन अपने बच्चों का हत्यारा लगता। इंजन के पास आने पर वे उसके साथ दौड़ती, कई बार तो इंजन पर चढ़ने की भी कोशिश करती। कुछ दिनों पहले ही राजुला के पास दो गर्भवती सिंहनी रेल की पांतों के नीचे आकर मौत का शिकार हो गई। इससे एक बार फिर सिंहों की सुरक्षा के लिए सरकार चौकस हो गई। दस दुर्घटना के लिए रेल्वे को किसी भी रूप में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वह तो अपनी ही सीमा पर पटरी से होकर ही गुजर रही थी। सिंहनी ही उसके रास्ते पर आ गई। गीर  के ेजंगलों में सिंहों की संख्या लगातार बढ़ रही है, उसके एवज में जंगल का विस्तार नहीं हो पा रहा है। इसलिए सिंह अब इंसानों की बस्ती में आकर रहने लगे हैं। जंगल उन्हें छोटा पड़ने लगा है। एक तरह से सिंह अपनी लक्ष्मण रेखा पार कर रहे हैं। सिंहों को जंगल से बाहर आने से रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है, इस पर स्वयं सरकार ही खामोश है।
गीर  का जंगल एशियाई सिंहों के लिए एकमात्र सुरक्षित स्थान माना जाता है। केवल गीर  के जंगल ही नहीं, बल्कि पूरा सौराष्ट्र ही सिंहों की भूमि है। आशय यही है कि सिंह केवल गीर  के डेढ़ हजार वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल को छोड़कर अब दूसरे स्थानों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने लगे हैं। गीर  के जंगल का इलाका उनके लिए कम पड़ने लगा है। वास्तव में देखा जाए तो सिंह मैदानी इलाकों में रहने वाले प्राणी है। अपनी खुराक के लिए सिंह भटकते रहते हैं। उन्हें जहां अनुकूल स्थान दिखाई देता है, वे वहीं बसना शुरू कर देते हैं। भले ही वह बस्ती इंसानों की ही क्यों न हो? सौराष्ट्र के करीब 1500 गांव हैं। ये गांव गीर  से बाहर होने के बाद भी यहां सिंहों के दीदार होते ही रहते हैं। सिंह यही आकर अपना शिकार करते हैं। 1990 में यहां सिंहों की संख्या 284 थी, जो अब बढ़कर 425 हो गई है। यह भले ही गर्व की बात हो, पर इस हिसाब से जंगल का विस्तार नहीं हुआ हे, यह शर्मनाक है। सरकार ने सिंहों की बस्ती बढ़ने से जितनी उत्साहित है, उतनी उसके क्षेत्र के विस्तार को लेकर नहीं है। गीर  में जितने सिंहों की संख्या बताई जा रही है, उसमें से करीब 150 सिंह जंगल से बाहर ही रह रहे हैं। सुप्रीमकोर्ट ने गीर  से सिंहों को मध्यप्रदेश भेजने का आदेश दिया है। तब से गुजरात सरकार थोड़ी सी सक्रिय दिखाई दे रही है। अब उसका कहना है कि जो सिंह गीर  की सीमा से बाहर चले गए हैं, उनके लिए वैकल्पिक आवास की व्यवस्था की जाएगी। सरकार की यह घोषणा मात्र एक आश्वासन बनकर रह गई। अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं हो पाया है। सिंह भी सरकारी सुविधाओं के मोहताज नहीं है, उन्होंने भी सरकार के आदेश को अनदेखा कर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए अन्य स्थानों को तलाशना शुरू कर दिया है। पर उनकी यह हरकत उनके लिए तो खतरनाक है ही, पर इंसानों के लिए किम खतरनाक नहीं है।
गीर  नेशनल पार्क(राष्ट्रीय उद्यान) 258 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। गीर  अभयारण्य 1412 वर्ग किलोमीटर का है। 411 सिंहों के लिए इतनी जगह बहुत ही कम है। इतनी जगह में केवल 300 सिंह ही रह सकते हैं। इसीलिए शेष सिंह इंसानी बस्ती की ओर रुख करने लगे हैं। सिंहों और इंसानों के बीच संघर्ष के पीछे भी यही कारण है। डार्विन का विकासवाद कहता है, जो जिस स्थान पर अपनी गुजर कर लेता है, वह उस स्थान को अपना ही समझने लगता है। इस दृष्टि से ¨सहों को जंगल से बाहर का वातावरण अच्छा लगने लगा और वे वहीं बसने लगे। यहां आकर वे अपना साम्राज्य स्थापित करने लगे। गीर  के सिंहों से उनका अब कोई वास्ता ही नहीं है। नया स्थान उनके अनुकूल होने के कारण अब उनकी बस्ती भी बढ़ने लगी है। सिंहों की बस्ती बढ़ने से गुजरात सरकार गर्व महसूस कर रही है  और सुप्रीमकोर्ट से तारीख पर तारीख मांग रही है। सरकार यदि वास्तव में सिंहों को बचाना चाहती है, तो उसे स्थान की समस्या को प्राथमिकता के साथ हल करना होगा। जो सिंह जंगल से बाहर हैं, उन क्षेत्रों को भी जंगल की सीमा में ले आए। जहां केवल ¨सह ही रहे, मानव बस्ती को वहां से हटा दिया जाए। यदि अभी इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया, तो संभव है सिंह इंसानी बस्ती में सीधे घुसकर लोगों का शिकार करना शुरू कर दे। अभी इसलिए आवश्यक हे क्योंकि बढ़ते औद्योगिकरण के कारण यह क्षेत्र कहीं उद्योग की चपेट में न आ जाए। सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मान लेना चाहिए। यदि वह कह रही है कि गिर के ¨सहों को मध्यप्रदेश भेज दिया जाए, तो शेरों को मध्यप्रदेश भेज दिया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश जाकर शेरों की वंशवृद्धि ही होगी। इसके लिए श्रेय गुजरात को ही दिया जाएगा। सिंह या शेर या कह लें, बाघ केवल गुजरात की सम्पत्ति नहीं है। उस पर पूरे देश का अधिकार है। भूतकाल में भी गुजरात से सिंह दूसरे राज्यों में भेजे गए हैं। अन्य क्षेत्रों में सिंह नहीं बस पाए, लेकिन गुजरात के गीर में सिंह बस गए और उनकी बस्ती बढ़ने लगी। अब यदि ये दूसरे राज्यों में जाकर अपने लायक माहौल तैयार करें और बस जाएं, तो इसका बुरा क्या है? एक सच्चे पर्यावरणविद की दृष्टि से देखें तो गीर में सिंहों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़े, इसके पहले उन्हें दूसरे राज्यों में भेज देना चाहिए। यदि हम सचमुच ¨सहों को बचाना चाहते हैं, तो सिंह कहां रहकर बच सकते हैं, इससे बड़ा सवाल यह है कि सिंह बचे रहें। इसके लिए उन्हें दूसरे राज्यों में भेजा जाना आवश्यक है। सभी ¨सह तो गीर से बाहर नहीं जा रहे हैं, केवल पांच-सात सिंह मध्यप्रदेश या किसी और राज्य में भेज दिए जाएं, तो इसमें पर्यावरण का ही लाभ होगा। यदि मध्यप्रदेश से एलर्जी है, तो गुजरात में ही ऐसे स्थानों को विकसित किया जाए, जहां ¨सह रह सकते हों। मूल बात सिंहों के बस्ती के विस्तार की है, यदि वह दूसरे राज्यों में भेजकर हो सकती है, तो भेजा जाना कतई बुरा नहीं है। सिंहों को बचाए रखने का इससे बड़ा दूसरा कोई उपाय नहीं है। गुजरात सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। तभी पर्यावरण की रक्षा हो पाएगी।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

शक की सूई धोनी की तरफ

  डॉ महेश परिमल
आईपीएल के लिए खिलाड़ियों की बोली लगना शुरू हो गई है। खिलाड़ी सरेआम बिक रहे। कुछ की बोलियां लगती हैं, कुछ चुपचाप बिक जाते हैं। इसका पता पहले तो नहीं, पर बाद में चल ही जाता है। जब सच्चई सामने आने लगती है, तब पता चलता है कि कौन कितने पानी में है। यह सच है कि आज जिस तरह से क्रिकेट का राजनीतिकरण हो गया है, उसमें कोई भी दूध का धुला नहीं है। मयप्पन की गिरफ्तारी के बाद अब ऊंगलियां भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तरफ उठ रही है। इस मामले में वे भले ही स्वयं को बेदाग बताएं, पर यह भी सच है कि अपराध को छिपाना भी एक अपराध ही है। उन पर आरोप है कि उन्होंने श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन को केवल एक क्रिकेट प्रेमी बताया था। यही नहीं चेन्नई सुपरकिंग की कप्तानी के दौरान राजस्थान रॉयल से हुई मैच को फिक्स करने की जानकारी भी धोनी को थी। इसके बाद भी उन्होंने इसका खुलासा नही किया।
न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला टेस्ट मैच हारकर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्रसिंह धोनी पर एक बड़ी आफत आ पड़ी है। सुप्रीमकोर्ट द्वारा बनाई गई जस्टिस मुकुल मुद्गल समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन  स्पॉट फिक्सिंग के लिए जवाबदार हैं। रिपोर्ट में शंका की सूई महेंद्र सिंह धोनी की तरफ भी है। यदि यह साबित हो ेजाए कि धोनी मैच फिक्सिंग में शामिल थे, तो उनके क्रिकेट कैरियर पर बहुत बड़ा धब्बा लग सकता है। यही नहीं, उनका क्रिकेट जीवन ही खत्म हो जाने का खतरा भी है। कानून के अनुसार चोरी करना अपराध है, पर चोर का साथ देना भी एक अपराध ही है। जस्टिस मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार गुरुनाथ मयप्पन ने झूठ कहा था कि वे चेन्नई सुपर किंग की टीम के मालिक नहीं हैं। इस झूठ में उनका साथ दिया था श्रीनिवासन और महेंद्र सिंह धोनी ने। इन्होंने मयप्पन का बचाव भी किया था।सन 2011 में एक आर्थिक अखबार को दिए गए साक्षात्कार में मयप्पन ने स्वीकार किया था कि हर मैच के शुरू में टीम में खिलाड़ियों के चयन के मामले पर धोनी से उनकी चर्चा होती थी। मयप्पन को धोनी से चेन्नई सुपरकिंग की टीम की रणनीति के बारे में पूरी जानकारी मिलती थी। इस जानकारी का उपयोग वह बिद्दू दारासिंह के माध्यम से सट्टा खेलने के लिए करता था। इससे खूब कमाई भी करता था। सुप्रीमकोर्ट द्वारा रची गई जस्टिस मुद्गल कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में यह चौंकाने वाली जानकारी दी है कि भारतीय टीम में खेलने वाले 6 खिलाड़ी भी स्पॉट फिक्सिंग में शामिल होने की संभावना है। इसमें से एक खिलाड़ी अभी भी टीम में खेल रहा है। यह खिलाड़ी धोनी है, इसकी पूरी संभावना है। मुद्गल कमिटी ने इन खिलाड़ियों की मिलीभगत की गहराई से जांच करने की सिफारिश भी की है। दिल्ली की क्राइम ब्रांच के एसपी संपथ कुमार ने मुद्गल कमेटी को एक चौकाने वाली जानकारी दी है। इस जानकारी के अनुसार सन् 2013 में जब वे एक नकली पासपोर्ट मामले की जांच कर रहे थे, तब कई सट्टेबाजों के सम्पर्क में आए। इनमें से किट्टी नामक एक सट्टेबाज ने उन्हें बताया था कि महेंद्रसिंह धोनी और सुरेश रैना भी उनसे जुड़े हुए हैं। इस सट्टेबाज ने यह भी दावा किया था कि स्पॉट फिक्सिंग घोटाले की जांच कर रहे दिल्ली के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या दाऊद इब्राहिम के भाई अनीस ने करवाई थी।
स्पॉट फिक्सिंग घोटाले में जब मयप्पन के शामिल होने की जानकारी बाहर आई, तब यह भी पता चला कि मयप्पन की विद्दू के साथ पहचान धोनी के मित्र और बिजनेस पार्टनर अरुण पांडे ने करवाई थी। विद्दू और धोनी के बीच भी संबंध धनिष्ठ थे। इसी कारण धोनी की पत्नी साक्षी वीआईपी स्टेंड में विद्दू के साथ बैठकर चेन्नई सुपरकिंग का मैच देखते हुए तस्वीर अखबारों में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह मामला दबा दिया गया था। मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट आने के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 12 मई सन् 2013 को राजस्थान रॉयल और चेन्नई सुपरकिंग के बीच जयपुर में खेले गए मैच का विशेष रूप से विश्लेषण किया गया। जिसमें धोनी की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। जब यह मैच चल रहा था, उस दौरान मयप्पन ने विद्दू से यह गारंटी दी थी कि चेन्नई टीम करीब 130-140 रन बनाएगी। मयप्पन ने इसके अनुसार राजस्थान की जीत पर दांव लगाया था। 12 वे ओवर के शुरू में चेन्नई सुपर किंग का स्कोर एक विकेट पर 85 रन था। इस समय धोनी और रैना क्रिज पर थे। सामान्य रूप यह माना जाता हे कि आईपीएल में 12 वें ओवर के अंत में जो स्कोर होता है, 20वें ओवर तक रन दोगुने हो ेजाते हैं। इस हिसाब से चेन्नई सुपरकिंग का स्कोर 170 होना था। यह देखकर विद्दू चिंता में पड़ गया। उसे मयप्पन से कहा कि ये क्या हो रहा है? मयप्पन ने उसे आश्वासन दिया  कि चिंता मत करो, चेन्नई सुपरकिंग उतने ही रन बनाएगी, जितने मैंने तुम्हें बताएं हैं। आखिर मयप्पन को यह आत्मविश्वास किसने दिलवाया। यह जांच का विषय है। 12 वे ओवर में धोनी और रैना आसान कैच देकर आऊट हो गए। उनका स्कोर धीमा हो गया। इधर मयप्पन दांव जीत गया। इससे यह शंका जाती है कि मयप्पन ने धोनी और रैना का उपयोग कर 12 मई का मैच फिक्स कर दिया था।
मुद्गल कमिटी की रिपोर्ट में दिल्ली के ज्योतिनगर पुलिस स्टेशन में 1 नवम्बर 1913 को फाइल किए गए एक एफआईआर का उल्लेख किया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि 12 मई का मैच चेन्नई सुपरकिंग के खिलाड़ियों की मदद से फिक्स किया गया था। क्रिकेट को अच्छी तरह से जानने वाला हर कोई कहता है कि टीम के केप्टन या सीनियर खिलाड़ी की मिलीभगत के बिना मैच फिक्स हो ही नहीं सकता। धोनी ने न्यूजीलैंड रवाना होने के लिए मुद्गल कमेटी को दिए गए बयान में कहा था कि मयप्पन केवल एक क्रिकेट प्रेमी है। उसका चेन्नई टीम के साथ कोई लेना-देना नहीं है। धोनेी का यह बयान झूठा था। ऐसा मुद्गल कमेटी का कहना है। धोनी के इस झूठ के पीछे क्या स्वार्थ है? इसके लिए हमें 7 मार्च तक इंतजार करना होगा। इतना तो तय है कि आईपीएल शुरू से ही विवादों में रहा है। खिलाड़ियों की बोली लगने से लेकर मैच फिक्सिंग तक सारे कामों में घोटाला ही घोटाला है। दु:ख तब होता है, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं, वे ही इस घोटाले में शामिल होते दिखाई देते हैं। ऐसे में लोग क्रिकेट को शक की निगाहों से देखना शुरू कर दें, इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
  डॉ महेश परिमल

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

सत्या ने बढ़ाया अमेरिका में भारतीयों का गौरव

डॉ महेश परिमल
सत्या कक्षा 6 से 8 तक मेरा विद्यार्थी था। बहुत ही शिष्ट अैर तेज दिमाग का। दूसरी-तीसरी कतार में ही हमेशा बैठता। पढ़ते वक्त हमेशा लीन। घंटों लायब्रेरी में रहता। उसे केवल तीन विषय ही पसंद थे- गणित गणित और गणित। मैंने उसे कभी शैतानी करते नहीं देखा। क्रिकेट का जबर्दस्त शौक था। बाकी बच्चे बताते थे कि बड़े होकर क्या बनेंगे। पर उसने ऐसा कभी नहीं बताया। हम टीचर्स उसकी लगन को देखकर अंदाजा लगा सकते थे कि वह मन ही मन कुछ बड़ा करने की सोच रहा था। पर इतना बड़ा-इसका अंदाज नहीं था। आज मुझे मेरे शिष्य पर गर्व है। यह शब्द हैं प्रोफेसर जी. जयानंद के, जिन्होंने माइक्रोसाफ्ट के नए सीईओ को बचपन में पढ़ाया था। अब हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि सत्या नदेला हमारे बीच की वह हस्ती हैं, जिन्होंने अमेरिका में भारतीयों का गौरव बढ़ाया है। यही नहीं सत्या को देश के आई टी क्षेत्र ने विश्वफलक पर अपलोड किया है। अपनी नियुक्ति के बाद उन्होंने माइक्रोसाफ्ट को अपना जो पहला मंत्र दिया, वह इस प्रकार है:- लोग परंपराओं का नहीं, अविष्कारों का सम्मान करते हैं। अब सत्या नदेला के सामने चुनौतियों की विंडो खुल गई हैं, पर हम सभी का विश्वास है कि वे इन चुनौतियों का साहसपूर्वक सामना कर सकते हैं, इसलिए उन्हें इतने बड़े पद से नवाजा गया है।
भारत में जब क्रिकेट के चेम्पियन सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न सम्मान दिया जा रहा था, तब विश्व की सर्वोच्च साफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट ने भारतीय मूल के सत्या नदेला को कंपनी के  ‘रत्न’ के रूप में चयन कर उन्हें सीईओ के पद से नवाजा। क्रिकेट में सचिन चेम्पियन हैं, तो सत्या भी क्रिकेट के जबर्दस्त फैन हैं। सत्या की नियुक्ति से भारत के आईटी क्षेत्र का नाम विश्व में ऊंचा हुआ है। हैदराबाद में जन्म लेने वाले और मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियर हुए सत्या नदेला 1992 अमेरिका गए थे। यहां उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। जिन्हें पुस्तकें खरीदने का बहुत शौक है, पर उसे पूरा पढ़ने का समय नहीं है,जो ऑनलाइन कोर्स का फार्म भरते हैं, पर समय के अभाव में कोर्स पूरा नहीं कर पाते, ऐसे सत्या नदेला के पास अब समय की अत्यधिक कमी होगी, यह तय है। अब उनके हाथ में विश्व की सर्वोच्च कंपनी की बागडोर है। वैसे तो वे पिछले 23 वर्षो से ही इस कंपनी से जुड़े हैं, पर कंपनी की कमान अब उनके हाथों में पूरी तरह से अब आई है। पूर्व में भी वे इसी कंपनी के विभिन्न पदों को सुशोभित कर चुके हैं। उनकी क्षमताओं को देखकर ही उन्हें यह पद सौंपा गया है।
सत्या नदेला ने भारत को गौरव प्रदान किया है। 1990 तक माइक्रोसाफ्ट में कोई भी भारतीय मूल का साफ्टवेयर इंजीनियर सीनियर लेबल पर नहीं था, आज आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के साफ्टवेयर क्षेत्र में ट्वीटर पर सत्या नदेला का अभिनंदन किया जा रहा है। नदेला पूरी तरह से योग्य हैं, इसलिए कंपनी के लिए कुछ नया अवश्य करेंगे, ऐसी आशा की जा सकती है। आज कंप्यूटर के क्षेत्र में क्रांति आ गई है। अब पर्सनल कंप्यूटर को लोग भूलने लगे हैं। उसके स्थान पर टेब्लेट और स्मार्टफोन छा गए हैं। इस स्थिति में माइक्रोसाफ्ट को अनेक चुनौतियों का सामना करना है। अमेरिकी आईटी कंपनियों में भारतीयों को देखा जा सकता है। इसके अलावा भारतीय सेप, ओरेकल, गूगल, लींकडीन आदि में भी देखे जा सकते हैं। अमेरिका की सात और केनेडा की चार कंपनियों में मूल भारतीय सीईओ हैं। हैदराबाद में 1967 में जन्मे सत्या नदेला के परिवार में पत्नी और तीन संताने हैं। 22 वर्ष पहले उनकी शादी हुई। माइक्रोसाफ्ट के 39 वर्ष के इतिहास में ऐसा तीसरी बार हुआ है कि सीईओ का चयन स्टाफ में से किया गया हो। पिछले 30 जून तक उनका वेतन 7.67 मिलीयन डॉलर था, सीईओ होने के बाद उनका वेतन भारतीय मुद्रा में 112 करोड़ रुपए होगा।
अमेरिका में भारत के लिए यह कहा जाता है कि भारत के युवा ऊंची डिग्री के साथ इंजीनियर बन सकते हैं, पर मैनेजर बनने की क्षमता उनमें नहीं है। यदि मैनेजर नहीं बन सकते, तो सीईओ बनना तो कदापि संभव नहीं है। पर सत्या ने इस धारणा को झुठलाकर दिखा दिया कि भारतीय चाहें, तो कुछ भी कर सकते हैं। भारतीय की इसी काबिलियत को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार कहा था कि अमेरिकियों काम करो, अन्यथा भारतीय तुम्हें खा जाएंगे। सत्या की नियुक्ति से यह संदेश गया है कि अमेरिका की सर्वोच्च कंपनी भी सीईओ जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए भारतीयों पर विश्वास करती है। अमेरिका में बसने वाले भारतीयों के लिए भी यह गर्व की बात है। आज उसी अमेरिका में अमेरिकी भारतीय आपस में जो ई मेल कर रहे हैं, उसमें यही लिखा जा रहा है कि ‘भारतीय होने का गौरव करो’। एक अंदाज के मुताबिक अमेरिका में 38 प्रतिशत डॉक्टर भारतीय हैं। नासा में 36 प्रतिश्त भारतीय हैं। अमेरिका में बसने वाले भारतीय तीन गुणों को विकसित करने में विश्वास करते हैं, वे गुण हैं भावना, असुरक्षा और उत्तेजना पर काबू करना सीखो। साफ्टवेयर मार्केट में अब भारत का डंका बजने लगा है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि सिलीकॉन वेली में 2005 में विदेशों में जन्म लेने वाले 25 प्रतिशत कंपनियों में बॉस के रूप में नियुक्त थे। 2012 में यह प्रतिशत 33 पार कर चुका था।
विश्व की सर्वोच्च कंपनी का संचालन एक भारतीय करे, इसे माइक्रोसाफ्ट ने कर दिखाया है। यह समाचार पढ़कर भारत में छोटी-छोटी बातों पर मतभेद पैदा करने वाले राजनीतिज्ञों को सुधर जाना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति ने चार साल पहले जो कहा था, वह सच साबित हो रहा है। आज यदि कंप्यूटर की भाषा में कहा जाए, तो माइक्रोसाफ्ट ने सत्या नदेला को सीईओ के रूप अपलोड किया है। उसके साथ ही विश्व फलक पर भारत का आईटी क्षेत्र भी अपलोड हुआ है।
    डॉ महेश परिमल

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

राजनीति के दो अराजक चेहरे

डॉ. महेश परिमल
अराजक कहीं भी किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। जिन्हें अराजक कहा जाता है, उन्हें देश के दुश्मन के रूप में देखा जाता है। पर इस समय देश की राजनीति में दो अराजक चेहरे उभर रहे हैं। पहला चेहरा है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दूसरे हैं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सब कुछ राज ठाकरे। अरविंद केजरीवाल अपने बड़बोलेपन और आम आदमी की छबि को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। आगे बढ़ने के इस रास्ते में जो अवरोध आते हैं, उसका विरोध हर हालत में करते हैं। यह उन्हें न्यायोचित लगता है। कई बार वे संविधान के खिलाफ भी बोलने लगते हैं। दूसरी ओर बाल ठाकरे की छबि से अलग होकर अपना अलग ही चेहरा बनाने वाले राज ठाकरे अपने भाषण में बहुत ही ज्यादा आक्रामक दिखाई देते हैं। झूठे को झूठा कहने में वे कभी संकोच नहीं करते, इस कारण उनका समर्थक वर्ग तेजी से बढ़ रहा है। दोनों ही अराजक चेहरे कानून तोड़ने में संकोच नहीं करते। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार मुक्त देश के नारे के साथ आम आदमी पार्टी तैयार की। देखते ही देखते इस पार्टी ने दिल्ली पर अपना शासन जमा लिया। यही नहीं, इसके बाद सरकारी तंत्र के खिलाफ अपना ही आंदोलन शुरू कर दिया।
राज ठाकरे के पास किसी राज्य में सत्ता नहीं है, पर महाराष्ट्र में उनके पास ऐसे आक्रामक कार्यकर्ता हैं, जो अन्य किसी के पास नहीं है। राज ठाकरे ने जब टोल टैक्स का भुगतान न करने की हुंकार भरी, तब तुरंत ही उनके कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाल लिया। तोड़फोड़ शुरू कर दी। राजनीति में उनकी आक्रामक छवि अन्य दलों के लिए एक चुनौती बन गई। अभी तक कांग्रेस-भाजपा जिन मुद्दों को छूने से भी डरती थी, उन विषयों पर राज ठाकरे खुले आम बोलते थे। उधर आम आदमी पार्टी को शपथ लिए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है कि उनके ही एक साथी विनोद कुमार बिन्नी ने बगावत कर दी। जंतर-मंतर पर उन्होंने अपना धरना कुछ ही घंटों में खत्म भी कर दिया। पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है। उनका मानना है कि ‘आप’ पार्टी बकवास है, जो लोगों को मूर्ख बना रही है। आज पार्टी अपने ही कानून मंत्री सोमनाथ भारती को लेकर कठघरे में आ गई है। मुख्यमंत्री उनका जितना अधिक बचाव कर रहे हैं, वे उतने ही फंसते जा रहे हैं। भारती पर इस्तीफे का दबाव बढ़ता जा रहा है। सोमनाथ भारती के मामले में यह साबित होता है कि एक मंत्री वह भी कानून मंत्री को कानून तोड़ने में किसी तरह का कोई गुरेज नहीं है। वे इस मामले में पुलिस वालों को दोषी बता रहे हैं। शायद उन्हें कानून की सीमा की जानकारी नहीं है।
केजरीवाल और राज ठाकरे दोनों ही आक्रामक हैं। पर ठाकरे केजरीवाल से कहीं अधिक मंजे हुए हैं। अरविंद केजरीवाल राजनीति में नए नवेले हैं, कब क्या कह जाते हैं, इसका उन्हें भान नहीं रहता। उनके कई झूठ सामने आ चुके हैं। अपने वादे पर मुकरते भी लोगों ने उन्हें देखा है। उधर मनसे के कार्यकर्ताओं ने टोल टैक्स नाके पर जिस तरह से तोड़फोड़ की है, उससे राज ठाकरे मुश्किल में पड़ सकते हैं। ठाकरे-केजरीवाल दोनों ही युवा हैं। देश को नई दिशा देने में वे सक्षम हैं। परंतु दोनों ही रॉकेट पालिटिक्स के शिकार हुए हैं। दोनों ही तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं। देश के कानून को तोड़ना उनके लिए एक खेल हो गया है। दोनों ही राजनीति में एक तरह का खेल ही खेल रहे हैं। उद्धव ठाकरे और संजय निरुपम ने जब से सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया है, तब से राज ठाकरे ीाी आक्रामक मूड में दिखने लगे हैं। दिल्ली में बेरीकेट्स तोड़ते हुए केजरीवाल के समर्थक और टोल बूथ तोड़ने वालों में काफी समानता है। ये प्रदर्शनकारी अपने नेता से वरदहस्त पाकर ही इस तरह की आक्रामक हरकतें करते हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के सामने धरना देकर अराजकता पैदा की। ऐसे उग्र आंदोलन के बाद भी उप राज्यपाल उनकी मांगों पर विचार करते हुए आधी मांगें मान ली और धरना खत्म हो गया। आम आदमी पार्टी के बारे में जानेमाने लेखक चेतन भगत ने उन्हें आइटम गर्ल कहकर ‘आप’ की आलोचना की थी। उधर इससे एक कदम आगे बढ़कर शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने अरविंद केजरीवाल की तुलना राखी सावंत से की। अभी गणतंत्र समारोह में जब लोगों ने अरविंद केजरीवाल को वीआईपी सुरक्षा में देखा, तो उसकी भी काफी आलोचना की गई।
राज ठाकरे ने अपनी सीमा तय कर रखी है, वे केवल महराष्ट्र तक ही सीमित हैं। अरविंद केजरीवाल देशभर में फैले हुए हैं। आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती है। अरविंद के खिलाफ विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। आज उनके सामने विनोद कुमार बिन्नी हैं, कल संभव है सोमनाथ भारती की गिरफ्तारी हो, इससे हालात और भी बेकाबू हो जाएंगे। जब से आम आदमी ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाया है, तब से वह अग्निपथ पर ही चल रही है। जिन्होंने ‘आप’ को अपना कीमती वोट दिया है, वह पसोपेश में हैं। अराजकता फैलाने से प्रजा नाराज होती है, इसकी जानकारी इन दोनों नेताओं को नहीं है। प्रजा को आक्रामक नेता अच्छे लगते हें, परंतु उसका अतिरेक किसी को भी पसंद नहीं है। यह उन दोनों को समझ लेना चाहिए कि जब भी कोई नेता कानून अपने हाथ में लेता है, तो उसका राजनीतिक कद छोटा हो जाता है, उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाती है। दोनों की राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रबल है, पर उसे काबू करना नहीं आता। ऐसे में कई बार उन्हें समर्थक मिल जाते हैं,पर कई बार यही समर्थक ही अतिउत्साह में उनके लिए मुश्किलें पैदा कर देते हैं। इतना तो तय है कि ‘आप’ ने एक ओर सादगी की राजनीति का पाठ पढ़ाने की कोशिश की है, वहीं राज ठाकरे यह सीख देते नजर आते हैं कि आक्रामक होकर ही हम अपने अधिकारों को पा सकते हैं। ऐसी बेात नहेीं है कि आक्रामक हुए बिना कुछ भी नहीं मिलेगा, वहीं शाही सादगी दिखाकर भी कोई पहाड़ नहीं तोड़ लेता। लोगों ने पहले अरविंद केजरीवाल की सादगी को सराहा, अब वे उसी सादगी से दूर होते दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर राज ठाकरे यह मानते हैं कि आक्रामक होने से ही सब कुछ पाया जा सकता है। दोनों ही अपनी जगह पर सही हो सकते हैं, पर सही साबित करने के लिए उन्होंने ऐसा कोई उपाय ही नहीं किया। इसलिए जनता उन्हें एक सिरे से ही अमान्य कर देती है।
डॉ. महेश परिमल

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