सोमवार, 25 अगस्त 2014

पर्यावरण विनाश की ओर बढ़ते सरकार के कदम !

डॉ. महेश परिमल
नई सरकार को रातों-रात काम करने वाली सरकार बनना है, शायद वह यह सोच रही है कि जल्दबाजी में ऐसे काम किए जाएं, जिससे लोग महंगाई को भूल जाएं। वह अपनी छवि सुधारना चाहती है। इसमें कोई बुरा नहीं है। इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि जल्दबाजी में कुछ ऐसा हो जाए, जिससे जनता का ध्यान बंट जाए। हाल ही में सरकार ने नई पर्यावरण नीति की घोषणा की है। पर्यावरण और विकास दोनों ही साथ रहें, ऐसी सोच अब तक किसी सरकार में नहीं देखी गई। आमतौर पर सरकार ऐसी नीतियां बनाती हैं, जिससे पर्यावरण का संरक्षण तो कम पर विनाश अधिक होता है। कहा यह जाता है कि इन नीतियोंसे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ विकास होगा, पर ऐसा होता नहीं है, बल्कि विकास के नाम पर विनाश ही अधिक होता है। विकास के नाम पर मोदी सरकार ने पर्यावरण के कारण अटके प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाना चाहती है। इसलिए पहले इसकी समयसीमा 105 दिन थी, उसे घटाकर 60 दिन कर दिया गया है। सरकार की यह जल्दबाजी पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए हानिकारक है। देश की पर्यावरण नीति गलत दिशा में जा रही है। इसके लक्षण अभी से दिखाई दे रहे हैं।
कितने ही प्रोजेक्ट्स ऐसे होते हैं, जिन्हें पर्यावरणीय अनुमति की आवश्यकता होती है। अनुमति प्राप्त होने में कई बार देर हो जाती है। किसी प्रोजेक्ट से पर्यावरण को किस तरह से हानि हो सकती है, इसकी जानकारी रातों-रात पता नहीं चलती। उसके लिए पर्यावरणविदों की एक टीम अध्ययन करती है, शोध करती है, ताकि पता चल सके कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को किस तरह से हानि होगी। कई प्रोजेक्ट के खिलाफ पर्यावरणविद लामबंद भी होते हैं। इस पर सरकार उन पर यह आरोप लगाती है कि वे लोग विकास का विरोध कर रहे हैं। सरकार इन विरोधों को गंभीरता से नहीं लेती। कुछ ऐसा ही मोदी सरकार कर रही है। वह प्रोजेक्ट्स को धड़ाधड़ अनुमति देकर विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ना चाहती है।
पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पद संभालते ही यह संकेत दे दिया कि अब पर्यावरण संबंधित प्रोजेक्ट की अनुमति में विलम्ब नहीं होगा। अभी सरकार के पास एन्वायरमेंट क्लिरियंस के लिए आने वाले 358 प्रोजेक्ट विचाराधीन हैं। ये प्रोजेक्ट इसलिए विचाराधीन हैं, क्योंकि इस पर विचार-मंथन चल रहा है। मान लो किसी प्रोजेक्ट में प्राणी अभयारण्य आ रहा हो, तो प्रोजेक्ट स्थापित किए जाने के बाद वह वहां के प्राणी अभयारण्य को किस तरह से नुकसान पहुंचाएगा? वहां के प्राणियों का संरक्षण किस तरह से किया जाएगा?  प्राणी संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट किस तरह का कार्य करेगा आदि तथ्यों पर विचार किया जाता है। अधिकांश मामलों में यही होता है कि पूरा अध्ययन के बाद यह बात सामने आती है कि प्रोजेक्ट के स्थापित होने से पर्यावरण को नुकसान अधिक होगा, इसलिए उन प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल पाती। लेकिन अब सरकार जल्दबाजी में कई प्रोजेक्ट को मंजूरी देने वाली है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होगा, यह तय है। नई सरकार की इस तरह की पहल भविष्य में पर्यावरणीय नुकसान के लिए दोषी होगी। सरकार ने अब नीति बनाई है, जिसमें प्रोजेक्ट स्थापित करने के इच्छुक कंपनी ही यह तय करेगी कि उनके प्रोजेक्ट के असर का पर्यावरणीय अध्ययन कौन करेगा? यानी यदि ए नाम की कोई कंपनी जंगल के पास या पर्यावरण को हानि पहुंचाए, इस तरह से वह प्रोजेक्ट स्थापित करती है, तो उसे ही यह तय करना होगा कि वे कौन सी कंपनियां होंगी, जो यह इस बात की जांच करेंगी कि कंपनी द्वारा स्थापित प्रोजेक्ट से पर्यावरण को हानि पहुंचेगी या नहीं। यह तो वही बात हुई कि अपराधी से कहा जाए कि तुम निर्दोष हो, इसके लिए चार ऐसे इंसानों को सामने लाओ, जो तुम्हें निर्दोष बताए। तय है कि इसमें भ्रष्टाचार होगा ही। कंपनी उन्हीं संस्थाओं को जांच के लिए सामने लाएगी, जो उसके समर्थन में रिपोर्ट देंगी। इससे कंपनी भी स्थापित हो जाएगी और पर्यावरण को नुकसान होगा, सो अलग। पिछली सरकार प्रोजेक्ट की फाइल आने के बाद 105 दिनों के अंदर उसे पर्यावरणीय मंजूरी देनी है या नहीं, यह तय करने का नियम रखा था। यानी प्रोजेक्ट प्रस्तुत करने वाली कंपनी को कम से कम 105 दिन तक तो इंतजार करना ही होता था। इसके बाद भी यह इंतजार काफी लंबा हो जाता था, इसलिए प्रोजेक्ट ताक पर रख दिए जाते थे। यूपीए सरकार के समय आखिर-आखिर में जयंती नटराजन जब पर्यावरण मंत्री थीं, तब उन्होंने ऐसे बहाने बनाकर कई प्रोजेक्ट को दबा कर रख दिया था। परिणामस्वरूप काफी आलोचना हुइ। उन्हें मंत्रीपद छोड़ना पड़ा था।
नई सरकार ने 105 दिन की इस समय सीमा को 60 दिन कर दिया है। ये 60 दिन पूरी तरह से सख्त होकर अमल करने का है, यदि अमल में नहीं लाया जाता, तो संबंधित विभाग-अधिकारी को दंड दिया जाएगा, ऐसा प्रावधान भी किया गया है। यह काम सरलता से हो, इसके लिए कितने ही काम ऑनलाइन हो जाएं, इसकी सुविधा भी दी जाएगी। परंतु हकीकत यह है कि पर्यावरण के तमाम प्रोजेक्ट्स का अध्ययन 60 दिनों में संभव ही नहीं है। मान लो किसी पक्षी अभयारण्य के आसपास कोई प्रोजेक्ट स्थापित किया जाना है। कंपनी इसके लिए सरकार को ग्रीष्म ऋतु में फाइल देती है। इसके बाद 60 दिनों के नियम के अनुसार उस प्रोजेक्ट के लिए हां या ना कह दिया जाता है। किंतु पक्षी अभयारण्य में कितने ही अप्रवासी पक्षी केवल शीत ऋतु में ही आते हैं। इसे सरकार समझ नहीं पाएगी। शीत ऋतु में जब यायावर पक्षी वहां पहुंचेंगे, तब तो उन्हें पता चलेगा कि जहां उन्हें अंडे देने हैं, वहां तो फैक्टरी बन रही है। इस तरह से जल्दबाजी में यदि निर्णय ले लेती है, तो पक्षी अभयारण्य का क्या होगा? भूतकाल में नर्मदा बांध, कुंदनकुलम परमाणु संयंत्र, निरमा प्रोजेक्ट, नियमागिरी में पॉस्को स्टील कारखाना आदि का काफी विरोध हुआ। कितने ही विरोध सही होने के कारण प्रोजेक्ट बंद भी कर दिए गए। पर कई स्थानों पर गलत इरादे के कारण विरोध भी होता आया है। सरकार ने इस मुद्दे को भी ध्यान में रखा है। नए नियम के अनुसार प्रोजेक्ट की घोषणा होने के दो महीने बाद यदि किसी संगठन या व्यक्ति द्वारा विरोध नहीं किया जाता, तो यह मान लिया जाएगा कि इस प्रोजेक्ट से किसी को भी किसी तरह का नुकसान नहीं हो रहा है। पर्यावरणविद सरकार के कितने ही फैसलों को चुनौती दी है। जैसा कि प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए समयसीमा तय होनी चाहिए। मंजूरी के लिए प्रक्रिया ऑनलाइन भी होनी चाहिए। प्रोजेक्ट में किसी प्रकार का विलंब न हो, यह सरकार की मंशा है, इससे कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं नाराज भी हैं।
सरकार इतने पर भी खामोश नहीं है। भूतकाल में न जाने कितने रद्द हुए प्रोजेक्ट्स को सरकार पर्यावरणीय मंजूरी देना चाह रही है। यह भी पर्यावरण की दिशा में एक नुकसानदेह कदम साबित होगा। क्योंकि पर्यावरण का नुकसान हो रहा है, इसीलिए पॉस्को की योजना धराशायी हो गई, यदि इसे मंजूरी मिल गई होती, तो उड़ीसा में स्थापित होने वाला यह सबसे बड़ा स्टील प्लांट होता। गोवा में खनन कार्य बंद हो गया है। नई सरकार ये सब फिर से शुरू करना चाहती है। यदि यह सब होता रहा, तो किस तरह से पर्यावरण का संरक्षण हो पाएगा। वैसे भी भाजपा सरकार पर यह आरोप है कि वह उद्योगपतियों को संरक्षण देती है। ऐसे में वह अपनी दलगत नीति से अलग तो नहीं हो सकती। तब तो फिर पर्यावरण के संरक्षण की बात करना ही बेमानी है। इस समय सरकार के पास पर्यावरणीय मंजूरी के लिए जो पेंडिंग प्रोजेक्ट हैं, उसकी संख्या 358 है। इसमें औद्योगिक137, इंफ्रास्टक्चर 69, अन्य खानें 63, कोयले की खान 36, रीवर वेली 21,  नए निर्माण 17 और थर्मल प्रोजेक्ट के 14 प्रोजेक्ट पेंडिंग हैं।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 23 अगस्त 2014

ईश्वर! मेरे देश को ‘इबोला’ से बचाना

डॉ. महेश परिमल
इस समय पूरे विश्व में खतरनाक बीमारी ‘इबोला’ की चर्चा है। इस बीमारी ने अब तक हजारों लोगों की जान ले ली है। डॉक्टर पसोपेश में हैं, उनके पास इसका कोई इलाज ही नहीं है। कई देश इस बीमारी से इतने अधिक आक्रांत हैं कि इस बीमारी से ग्रस्त देशों से आने वाले लोगों को अपने देश में घुसने ही नहीं दे रहे हैं। यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि केवल 15-20 दिनों में ही इंसान मर जाता है। ‘इबोला’ एक ऐसा वाइरस है, जो तेजी से फैलता है। इंसान जब तक कुछ समझे, तब तक बहुत ही देर हो जाती है। इससे वह बच ही नहीं सकता। अब तो पूरे विश्व में करीब एक हजार लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठे हैं। यदि शीघ्र ही इस पर काबू न पाया जा सका, तो यह एक महामारी के रूप में पूरे विश्व में फैल सकता है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉनसन सरलीफ ने महामारी का रूप ले चुके एबोला विषाणु के संRमण से लड़ने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है।
पश्चिम अफ्रीकी देशों में एबोला के वाइरस ने काफी उत्पात मचाया है। लाईबेरिया, गुयाना, सिएरा लियोन में लोग इस बीमारी से ग्रस्त है। केवल गिनी में ही 200 से अधिक लोगों की मौत इससे हुई है। यह वाइरस इसलिए इतना खतरनाक है, क्योंकि यह संक्रामक है। जो कोई इस बीमारी के मरीज के सम्पर्क में आता है, वह भी इससे ग्रस्त हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरे विश्व को इससे सतर्क रहने की चेतावनी दी है। जहां इस वाइरस के होने की पुष्टि हुई है, वहां लोगों से न जाने की अपील की गई है। यदि उस देश से कोई आता भी है, तो उसकी पूरी जांच के आदेश दिए गए हैं। हाल ही में अहमदाबाद के एयरपोर्ट में अफ्रीका से आए लोगों की स्क्रिनिंग की गई। अब तो बात वीसा न देने की भी होने लगी है। ब्रिटेन में इस वाइरस को लेकर जबर्दस्त छटपटाहट है। इसका कारण यह है कि अफ्रीकी देश के कुछ लोग ब्रिटेन आए हुए हें। ब्रिटेन के विदेश सचिव फिलीप हमांडे ने लोगों को सावधान रहने की सलाह दी है। इस बीमारी से ग्रस्त 100 में से केवल 19 व्यक्ति को ही बचाया जा सका है। वह भी उस स्थिति में, जब ‘इबोला’  के प्रारंभिक लक्षण दिखाई दें। यदि इलाज में 4-5 दिन की देर हो जाए, तो मरीज का बचना मुश्किल है। इस बीमारी को एक देश से दूसरे देश पहुंचने में उतना ही वक्त लगता है, जितना एक विमान को दूसरे देश पहुंचने में लगता है। एक बार यदि यह वाइरस हमारे देश में घुस गया, तो उसे रोकना बहुत ही मुश्किल होगा। जब तक हम समझेंगे, तब तक हजारों जानें चली जाएंगी।,
इस वाइरस से फैलने वाली बीमारी के सिम्पटम्स ‘सर्दी’ की तरह हैं। हमें यह लगता है कि यह तो सामान्य सर्दी है, कुछ दिन में ठीक हो जाएगी। ऐसा ही ‘इबोला’  में भी होता है। गले में थोड़ी सी खराश हो, चमड़ी पर कुछ जलन जैसा महसूस हो रहा हो, हाथ-पांव में दर्द, दो दिनों में ही बुखार जोरदार बढ़ जाए, बुखार नियंत्रण में न रहे, इसके साथ ही उल्टी की शिकायत शुरू हो जाए, फिर डायरिया का डर पैदा हो जाए। तो यह सब ‘इबोला’  के लक्षण हैं। इन लक्षणों के साथ शरीर के सभी अंग इससे प्रभावित होने लगते हैं। सारे अंग निष्क्रिय हो जाते हैं, तो मरीज की मौत हो जाती है। लोगों को बर्ड फ्लू याद होगा। इस वाइरस ने कितनी दहशत फैलाई थी। लोग मुंह पर कपड़ा बांधकर घर से बाहर निकलते थे। अस्पतालों में उसके लिए विशेष वार्ड की व्यवस्था की गई थी। इस बीमारी से जिस व्यक्ति की मौत हो जाती थी, उस व्यक्ति की लाश घर ले जाने के लिए मना कर दिया जाता था। उसकी अंत्येष्टि में भी काफी परेशानी होती थी। ‘इबोला’  वाइरस बर्ल्ड फ्लू से भी अधिक खतरनाक है। इसलिए यदि इसका मरीज कहीं दिखाई दे गया, उस कल्पना से ही लोग कांपने लगते हैं। अभी तक यह वाइरस हमारे देश में नहीं आया है। पर कई भारतीय अफ्रीकी देशों में हैं, यदि वे स्वदेश लौटते हैं, तब काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार यदि सचेत होकर इस दिशा में सख्त कार्रवाई करे, तो संभव है इसके वाइरस को देश में प्रवेश पर रोका जा सकता है। वाइरस को कोई सीमा बांध नहीं सकती, पर सावधानी आवश्यक है। अब लाइबेरिया की ही बात ले लो, इस देश ने ‘इबोला’  से बचने के लिए देश में ही आयोजित फुटबॉल टूर्नामेंट ही स्थगित कर दिया। ऐसे स्थानों पर विशेष नजर रखी जा रही है, जहां कई लोग रोज ही इकट्ठे होते हों। सरकार ने यह ताकीद कर दी है कि यदि किसी को ‘इबोला’ के लक्षण दिखाई देते हैं और वह डर के कारण कहीं छिपा है, तो उसे तुरंत ही करीब के अस्पताल से सम्पर्क करना चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि यह वाइरस पशुओं से मानव में आया है। अभी तक तो यह वाइरस अफ्रीकी देशों तक ही सीमित है। पर एक मामला फिलीपींस में भी देखने में आया है। ब्रिटेन ने भी अपना डर व्यक्त किया है। इसके बाद यूरोप में भी काफी डर फैला हुआ है। ‘इबोला’ ने अफ्रीकी देशों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इस वाइरस के बारे में यह जानकारी है कि यह अफ्रीकी देशों से आगे बढ़कर एशिया तक पहुंच गया है। केन्या से हांगकांग आई एक महिला में ‘इबोला’ के वाइरस पाए जाने की पुष्टि हुई है। हांगकांग की एलिजाबेथ अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा है कि हम हालात पर नजर रखे हुए हैं। ब्रिटेन के बर्किंघम में भी एक व्यक्ति में ‘इबोला’ के लक्षण दिखाई दिए हैं। यह व्यक्ति नाइजीरिया से पेरिस, फ्रांस होते हुए ब्रिटेन आया था। ‘इबोला’ का पहला मरीज फरवरी में देखने को मिला था। गिनी के सुदूर गांवों में यह रोग शुरू हुआ था। उसके बाद गिनी से लाइबेरिया, सिएरा लियोन तक फैल गया है। धीरे-धीरे यह पूरी दुनिया में फैल जाएगा, ऐसी दहशत है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉनसन सरलीफ ने महामारी का रूप ले चुके एबोला विषाणु के संRमण से लड़ने के लिए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी है। यहां एबोला के खतरनाक वायरस ने तांडव मचाना शुरू कर दिया है। लाइबेरिया के सूचना मंत्री लेविस ब्राउन ने पुष्टि की है कि इस वायरस से पीड़ित लोगों को उनके परिजन घरों से घसीटते हुए लाकर सड़कों पर फेंक रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों को लगता है कि इबोला के इलाज के लिए बनाए गए स्पेशल वार्ड से आधे से ज्यादा लोग जिंदा वापस नहीं आते हैं और इसीलिए उनके परिजन रोगियों को सड़कों पर फेंक रहे हैं। हालांकि सरकारी अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि रोगियों को घरों में ही रखें, सरकार खुद रोगियों को घरों से ले जाएगी। यह रोग पसीने और लार से फैलता है। संक्रमित खून और मल के सीधे संपर्क में आने से भी यह फैलता है। इसके अतिरिक्त, यौन संबंध और एबोला से संक्रमित शव को ठीक तरह से व्यवस्थित न करने से भी यह रोग हो सकता है। यह संक्रामक रोग है। ये वायरस संक्रमित जानवर विशेष तौर में बंदर, चमगादड़ या उड़ने वाली लोमड़ी और सूअरों के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलता है। अब तक इस बीमारी का कोई विशेष उपचार नहीं है। फिर भी इससे ग्रस्त लोगों की मदद के लिए उन्हें ओरल रिहाईड्रेशन थैरेपी, जिसमें रोगी को मीठा और नमकीन पानी पीने के लिए दिया जाता है या नसों में तरल पदार्थ दे सकते हैं। इस रोग में मृत्यु दर काफी ऊंची है। लाइबेरिया की राष्ट्रपति ने विषाणु के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए देश के स्कूलों को बंद करने और अधिकतर सरकारी कर्मचारियों को घर में रहने के आदेश दिए हैं।
 डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

मेरी तीसरी किताब आ गई


मेरी तीसरी किताब छपकर आ गई है। पुस्‍तक प्रकाशन, शाहदरा दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस किताब की प्रस्‍तावना प्रसिद्ध आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह और फ्लैप प्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार गिरीश पंकज ने लिखी है।कवर पेज कुँवर रवींद्र ने तैयार किया है। छत्‍तीसगढ़ की माटी से कभी उऋण नहीं हो सकता, इसलिए इस बार बिलासपुर में अरपा के किनारे डेढ़ वर्ष तक रहने पर रात में अरपा की सिसकियॉं सुनी, उसी पर आधारित एक ललित निबंध को शीर्षक दिया है। इनमें से कई ललित निबंध भास्‍कर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हो चुके हैं। जिस-जिस ने इस किताब के प्रकाशन में मेरा सहयोग किया, उनका आभार।

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