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12:03 pm




                               दैनिक हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख


आतंक की यह पतंग कटनी ही चाहिए
डॉ. महेश परिमल
पेशावर की आर्मी स्कूल फिर से शुरू हो गई है। यह इस बात का सुबूत है कि आतंक के खिलाफ अब बच्चों में भी जोश है। कहते हैं कि बच्चों मंे खुदा होता है और आतंकियों ने खुदा को ही मार डाला। 16 दिसम्बर को जब यह घटना हुई थी, तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि अब आतंक के खिलाफ पाकिस्तान पूरी ताकत से लड़ेगा। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान ने अभी तक इस दिशा में केवल 10 आतंकियों को फांसी दी है और आर्मी स्कूल की दीवार को कुछ ऊंचा किया है। इस समय पतंग का माहौल है, हर कोई यही पूछ रहा है कि पिछले कुछ समय से पेशावर, पोरबंदर और पेरिस में आतंक का जो रूप दिखाई दिया, तो इस तरह के आतंकवाद की पतंग को आखिर कौन काटेगा? पेरिस में आतंंक के खिलाफ एक साथ दस लाख लोग सड़कों पर उतर आए। ऐसा नजारा हमारे देश में कभी देखने में नहीं आया। न मुम्बई धमाके के समय, न ही संसद पर हमले के समय। हर बार यदि कुछ होने को होता है, तो राजनीति ही आड़े आ जाती है। हम भारतीय कभी किसी घटना को राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आदत कब डालेंगे?
इस समय पूरे विश्व में आतंकवाद की पतंग खुलकर उड़ रही है। अब तो वह कभी भी किसी भी देश में घुसकर मौत का नंगा नाच भी करने लगी है। सभी चाहते हैं कि आतंकवाद का सफाया हो, पर बयानबाजी से आगे बात बढ़ ही नहीं पाती। पाकिस्तान हमेशा अड़ंगा लगाता ही आया है। वास्तव में वह भारत से शांति चाहता ही नहीं है। वह आतंकवाद को पनाह देने में विश्वास रखता है। यदि वह सचमुच आतंकवाद के खिलाफ होता, तो दाऊद को वह कब का भारत को सौंप चुका होता। उसके भीतर वैमनस्य की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। इससे वह कभी अलग हो ही नहीं सकता।
पेशावर, पोरबंदर और पेरिस की ये तीन घटनाएँ मानव संहार से जुड़ी हुई हैं। इन घटनाओं के पीछे यही उद्देश्य है कि कोई अपना ध्यान सबसे हटाकर अपनी ओर करना चाहता है। पोरबंदर में जिस बोट से कुछ आतंकी आ रहे थे, समय रहते भारत को जानकारी मिल गई, इसलिए बोट में सवार सभी लोगों ने बोट पर आग लगा दी और अपने जीवन की आहुति दे दी। पेशावर की घटना तो दिल दहला देने वाली थी। इसमें आतंकियों ने 140 मासूमों को गोलियांे से उड़ा दिया। यह घटना निंदनीय है। शाला की शिक्षिका को सबके सामने जलाकर मार डालना कहां की मर्दानगी है? इस तरह के दृश्य देखकर कई मासूमों की बोलती ही बंद हो गई। इसके पहले मासूमों ने आतंक और आतंकवादियों की बातें सुनी थी, पर जो मंजर उन्होंने अपनी आंखों के सामने देखा, तो उन बच्चोें की बोलती ही बंद हो गई। पेशावर की वह शाला अब फिर से खुल गई है। कई पालकों ने अपने बच्चों को इस बार भी स्कूल नहीं भेजा था, क्योंकि वे डर गए हैं। पेरिस की घटना ने तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो हमला बोला है, उसकी निंदा पूरे विश्व में हो रही है। यह आतंकियों का समृद्ध समाज पर सीधा हमला था। पेरिस में उदारमना लोग रहते हैं। इसलिए अब वहां की सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी नीति में बदलाव किया है। पेशावर, पोरबंदर और पेरिस इन तीनों घटनाओं में नरसंहार की योजना थी।
यह देश का दुर्भाग्य है कि पोरबंदर की घटना के मामले में राजनैतिक दलों ने अपनी रोटियां सेंकनी शुरू कर दिया। जिस तरह से अन्य दलों के बयान आए, उससे आतंकवाद को प्रोत्साहन ही दिया गया। दूसरी तरफ पेरिस की घटना को लेकर लाखों लोग एक स्थान पर आकर विरोध प्रकट करने लगे। हमारे देश में इसके पहले भी कई बार आतंकी हमले हुए, पर एक बार भी इसका विरोध करने के लिए आम जनता लाखों की संख्या में एक स्थान पर जमा नहीं हुई। इससे कहा जा सकता है कि हमारे देश में जागृति का अभाव है। सरकार आतंकवाद को कुचलने के लिए कोई भी कदम उठाती है, तो विरोधी दल यह आरोप लगाता है कि यह अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर हमला है। सरकार चाहे तो आतंकवाद के खिलाफ सीधे न सही,पर छद्म रूप से लड़ाई लड़ सकती है। सरकार के कुछ सख्त कदम ही आतंकवादियों की हालत खराब कर सकते हैं। आतंकवादी जब चाहे तब एयरपोर्ट उड़ाने, विमान उड़ा देने, नेताओं की हत्या करने आदि तरह की धमकियां देते रहते हैं।
इस तरह की आतंकवादी घटनाएं कई बार सुरक्षा की पोल खोलकर रख देती हैं। पेशावर की आर्मी स्कूल में आतंकी बिना किसी रोक-टोक के घुस गए। पोरबंदर की बोट भी भारतीय सीमा में घुस गई थी। पेरिस में तो आतंकियों का लक्ष्य ही था, अखबार वालों की हत्या करना। पेरिस ने इस घटना से सबक लिया। भारत की समुद्री शक्ति भी अब चौकस हो गई है। पर पाकिस्तान ने कोई सबक सीखा, ऐसा लगता नहीं। स्कूल पर हमले के एक महीने बाद भी पाकिस्तान अब तक केवल दस आतंकियों को ही फांसी दे पाया है। वास्तव में देखा जाए, तो पेशावर, पोरबंदर और पेरिस की घटनाओं में आतंकवाद की पतंग हवा में है। हम सभी चाहते हैं कि यह पतंग कट जाए, पर इसके लिए कोई तैयार ही नहीं हो रहा है। शायद आतंकवाद की पतंग को काटने वाली कोई डोर तैयार ही नहीं हुई है। उस डोर पर हम सभी को अपने गुस्से का मांजा लगाना होगा। तभी वह धारदार होगा। यह काम सामूहिक प्रयास से ही होगा। पर सवाल यही है कि करे कौन?
‎ डॉ. महेश परिमल
 
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