बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

खामोश मतदाता का बुलंद फैसला

डॉ. महेश परिमल
चुनाव के समय जनता खामोश हो, तो उसे उसकी सरलता न समझा जाए, बल्कि यह समझा जाए कि वह कुछ नया करने का सोच रही है। उसके पास परिवर्तन के लिए केवल एक ही शस्त्र है, जिसे वह अपना अधिकार समझती है। पर अपना कीमती वोट देते ही वह ठगी जाती है। लेकिन इस बार जनता ने अपने वोट की कीमत समझी और बहुत ही होशियारी से अपनी बात भी कह दी। अच्छे-अच्छे तीसमारखां भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर ये हुआ क्या? किसी ने भी इस परिणाम की कल्पना भी नहीं की थी। स्वयं अरविंद केजरीवाल ने भी नहीं। इसलिए खामोश जनता भी कुछ कहना चाहती है, खामोश की इस भाषा को आज हर नेता को समझने की आवश्यकता है। अब सभी विश्लेषण सामने आ रहे हैं कि अहंकार ही भाजपा को ले डूबा। यह अहंकार इतना घना था कि भाजपा को समाज दलित, पीड़ित वर्ग की पीड़ा दिखाई नहीं दी। भाजपा को अमीरों की पार्टी मानने वाले अब आश्वस्त हो चुके हैं कि यह आरोप गलत नहीं है। आप की जीत ने भाजपा को कई सबक दिए हैं। इसे यदि भाजपा अभी समझ लेती है, तो उसे अगले विधानसभा चुनावों में जीत का डंका बजाने में आसानी होगी। पर नहीं समझी, तो समझ लो, इस बार भी भाजपा बुरी तरह से औंधे मुंह गिरेगी। इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस के जिस घमंड ने भाजपा को जिताया, उसी घमंड ने भाजपा को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
केवल ढाई वर्ष पुरानी आम आदमी पार्टी ने बरसों पुरानी कांग्रेस-भाजपा को धूल चाटने को विवश कर दिया है। भाजपा ने 225 से अधिक रैलियां की, उसका उसे कोई फायदा नहीं हुआ। जो तीन सीटें भाजपा ने जीती हैं, वह केवल प्रत्याशियों ने अपने बल पर जीती है। इसमें पार्टी की कोई भूमिका नहीं है। आम आदमी पार्टी की जीत से अब दोनों प्रमुख दलों को किस तरह का बोधपाठ लेना चाहिए, यह सोचने की बात है। फिर भी कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जा सकती है:-
कांग्रेस-भाजपा के लिए सबसे बड़ा बोधपाठ यही है कि राजनीति में किसी का अभिमान अधिक समय तक नहीं टिकता। कांग्रेस को 15 साल तक शासन करने के बाद अभिमान आ गया था, वह यह समझने लगी थी कि दिल्ली में उसका कोई विकल्प नहीं है। प्रजा ने दिसम्बर 2013 में ही कांग्रेस के इस घमंड को तोड़कर रख दिया। लोकसभा चुनाव में भाजपा को दिल्ली विधानसभा की 70 में से 60 सीटों में लीड मिली थी, इससे उसे यह अभिमान हो गया था कि उसे कोई हरा नहीं सकता। इस तरह से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाले अरविंद केजरीवाल को भी यदि घमंड आ गया, तो दिल्ली की जनता उसे भी नहीं बख्शेगी।
चुनाव में सबसे अधिक शर्मनाक हार का सामना करने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह सबक है कि नेहरू-गांधी परिवार अब पार्टी को तार नहीं सकते। सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका गांधी की परछाई से बाहर आकर उन्हें नए नेता की तलाश करनी होगी।
दिल्ली में भाजपा सरकार बनाने का दावा सीना ठोंककर करने वाले अमित शाह के लिए यह सबक है कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा कर कभी भी कोई चुनाव जीता नहीं जा सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह सबक है कि प्रजा केवल लच्छेदार भाषण से ही खुश नहीं होती। आप उन्हें जो वचन देते हैं, उससे वह एक बार तो निश्चित रूप से भले ही भ्रम में रहकर अपना वोट तो देती है, पर बाद में वह उसका परिणाम भी जानना चाहती है। अपने 9 महीने के शासनकाल में प्रधानमंत्री ने केवल बातें ही बनाई है, कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया, जिसका परिणाम तुरंत मिला हो। अपनी किस्मत की बदौलत चलने वाली सरकार अधिक समय तक टिक नहीं सकती।
देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए यह बोधपाठ है कि प्रजा से कभी ऐसे वादे न किए जाएं, जिस पूरा करने की क्षमता न हो। लोकसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री ने 100 दिनों के अंदर काला धन वापस लाने का वादा किया था, पर वह पूरा नहीं हो पाया। गंगा नदी को शुद्ध करने का वचन दिया था, वह आज भी प्रदूषित ही है। देश से मांस का निर्यात बंद करने का वादा भी प्रधानमंत्री भूल गए। अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली की जनता से कई ऐसे वादे किए हैं, जो पूरे नहीं किए जा सकते। प्रजा ठोस कार्य चाहती है, झूठे आश्वासन नहीं।
भाजपा-कांग्रेस के लिए बोधपाठ यह है कि गरीबों, दलितों, किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं की उपेक्षा कर उसके हितों को नुकसान पहुंचे, ऐसे कदम उठाकर कोई अधिक समय तक सत्ता पर नहीं रह सकता। भाजपा की गरीबी विरोधी और उद्योग की तरफ झुकाव से गरीब और किसान नाराज हुए हैं। एनडीए सरकार ने जो उतावलापन जमीन संपादन के मामले में विधेयक लाकर किया है, उससे भी किसान भयभीत हैं। विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार के घर वापसी जैसे नारे से मुस्लिम नाराज हुए हैं। यदि केंद्र सरकार ने गरीब तबकों की खुशहाली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो सत्ता में रहना मुश्किल है।
प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष के लिए यह बोधपाठ है कि पार्टी से बरसों से अपनी सेवाएं देने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं और नेताओं की उपेक्षा कर किरण बेदी जैसे लोगों को पैराशूट प्रत्याशी बनाकर जनता पर थोप देने से विजयश्री प्राप्त नहीं की जा सकती।
भारत के चुनाव केवल मेनपॉवर, मनीपॉवर, कीचड़ उछाल और चारित्र्यहनन के आधार पर नहीं जीते जाते। भाजपा ने दिल्ली की गद्दी पाने के लिए सभी तरह के उपायों को आजमाया। भाजपा के पास कार्यकर्ताओं और नेताओं की कमी नहीं थी, बेशुमार दौलत भी लुटाई, केजरीवाल पर कीचड़ उछालने में कोई कसर बाकी न रखी। दूसरी ओर केजरीवाल ने यह जानने की कोशिश की कि दिल्ली की जनता आखिर चाहती क्या है। इसे सामने रखते हुए उन्होंने प्रचार किया। सकारात्मक अभिगम अपनाया। इसलिए उनकी विजय हुई।
भाजपा के खिलाफ जब सारे दल एक हो जाते हैं, तब वह मुश्किल में पड़ जाती है। अगले कुछ महीनों में ही बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां सफलता के परचम गाड़ना आवश्यक है। यदि दिल्ली चुनाव से मिलने वाले बोधपाठ को ध्यान में रखा जाएगा, तो सफलता मिल सकती है।
उपरोक्त बोधपाठ के अलावा अब ऐसे कई विश्लेषण सामने आ गए हैं, जो प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। चुनाव के पहले सभी दलों द्वारा विषवमन किया गया है, उसके बाद उन्हीं दलों से अच्छे से व्यवहार करना बहुत मुश्किल है। इसलिए ऐसा भी न बोलो कि बाद में अपना वही व्यवहार उन्हें आपत्तिजनक लगे। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि राजनीतिक दल अपने व्यवहार में कुछ बदलाव करेंगे, पर यह तो करना ही होगा कि अपनी सारी नीतियां, अपने विचारों में आम आदमी और उनकी समस्याओं को भी रखें। इससे मुसीबत के समय वही आम आदमी ही काम आएगा। यदि आम आदमी को हाशिए पर लाया गया, तो वही आम आदमी जब भी अपनी ताकत दिखाएगा, तो वह एक बुलंद फैसला ही होगा।
‎   डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिंदी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप

डॉ. महेश परिमल
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसके बिना एक समाज की कल्पना करना ही मुश्किल है। भाषा ही हमारे जीेवन को सँवारती है। भाषा हमें जीने का आधार देती है। हिंदी के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह इतनी सरल और सहज भाषा है कि थोड़े से प्रयास से इसे कोई भी अहिंदीभाषी भी सीख सकता है। आज यह करोड़ों लोगों की भाषा बनी हुई है। इसके पीछे यही है कि यह अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं करती। एक भाषा में यदि दूसरी भाषा के शब्दों का आगमन होता है, तो उससे भाषा समृद्ध होती है। जिन भाषाओं ने प्रगति की है, उन सभी भाषाओं ने दूसरी भाषा के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया है। हम अँगरेजी की बात करें, तो आज उस भाषा में हिंदी के करीब 2500 शब्दों का समावेश किया गया है। इसी तरह हिंदी में भी अन्य भाषाओें के शब्दों को लिया गया है, इसलिए यह भाषा इतनी सहज और सरल बन पाई है।
हम बरसाें से हिंदी भाषा का प्रयोग बातचीत और लेखन में कर रहे हैं। अब तो यह भाषा हममें रच-बस गई है। इस भाषा में जब हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हैं, तो हमें पता ही नहीं चलता कि इसमें न जाने कितने ही शब्द हिंदी के न होकर किसी अन्य भाषा के हैं। हम एक इमारत बनाते हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके लिए प्रयुक्त सारी सामग्री हमें उसी शहर में मिल जाए। कई बार कई चीजें हमें दूसरे शहर से लानी होती है। ठीक इसी तरह एक भाषा तभी सुदृढ़ बनती है, जब उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया जाए। इसलिए हम दावे से यह कह सकते हैं कि हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होने के कारण यह भाषा आज करोड़ों लोगों द्वारा व्यवहृत की जा रही है। हिंदी भाषा के लिए इसे आशीर्वाद ही माना जाएगा कि इसने बहुत ही सहजता के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है।
अब हम चर्चा करें उन शब्दों की, जो हिंदी के नहीं हैं, पर एक निरक्षर ग्रामीण भी उसका अर्थ समझता है। हम ‘कफ़न’ को ही ले लें, इसका अर्थ आज हर कोई समझता है। पर यदि हम इसके बजाए हिंदी का शब्द ‘मृतचैल’ कहेंगे, तो ग्रामीण ही नहीं, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी इसे नहीं समझ पाएगा। ‘पाव’ शब्द पुर्तगाली है, जो िहंदी में आसानी से घुल-मिल गया है। आज इससे पाव रोटी, पाव वड़ा, पाव भाजी जैसे शब्द बने। इसका प्रयोग हर कोई अपनी भाषा में कर रहा है। ‘चर्चा’ शब्द उर्दू का है, जिसे पुलिंग के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, हिंदी ने इस शब्द को स्त्रीलिंग के रूप में शामिल किया। भाषा जितनी अधिक लचीली होगी, उतनी ही समृद्ध भी। पानी के तेज बहाव में वही वनस्पति या पेड़ अधिक समय तक बने रहते हैं, जो झुकना जानते हैं। अकड़ हर किसी के लिए खतरनाक होती है। इसलिए भाषा के संबंध में भी यही कहा जाता है कि लचीली भाषा अधिक समय तक जीवित रहती है। इस मामले में अँगरेज़ी की मिसाल दी जाती है, जिसने दुनियाभर की भाषाओं से शब्द अपनाए हैं। दर्शन, अध्यात्म के मामले में उसने कई भारतीय शब्द लिए हैं। जैसे- गुरु, पंडित, योग, आँचल, जंगल आदि। जो चीजें विदेशी परिवेश से आई हैं, उनके लिए विदेशी शब्द ले लेना एकबारगी ठीक भी है, लेकिन सरल, सहज और प्रचलित हिंदी शब्दों की जगह अँगरेज़ी का इस्तेमाल गलत है। हिंदी ने भी फ़ारसी, अरबी, फ्रेंच, पुर्तगाली, रूसी, न जाने कितनी ही भाषाओं से शब्द लिए हैं। लेकिन यह लेन-देन स्वाभाविक और आवश्यक रहा है। हिंदी फिल्मों के नाम आज अँगरेज़ी शब्दों में लिखे जा रहे हैं-जैसे 'वेकअप सिड', 'जब वी मैट', 'वेलकम टू सज्जनपुर', 'थ्री इडिएट्स', 'गॉड तुसी ग्रेट हो' आदि। ये फिल्में खूब चली हैं और हिंदीभाषी जनता ने उन्हें खूब देखा भी है, तो इसका मतलब क्या लगाया जाए? यही कि जनता ने इसे, अपने आप सहज ही या मजबूरी में स्वीकार कर लिया है।

आज चिकित्सक के स्थान पर वैद्य लिखने के आग्रही हम नहीं हैं, क्योंकि हिन्दी परिवेश में वैद्य शब्द के साथ एक अलग व्यंजना जुड़ गई है मसलन देशी पद्धति से इलाज करनेवाला। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में डॉक्टर शब्द सर्वमान्य हो चुका है। अब इसे हिन्दी कोशों में जगह दी जानी चाहिए। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हर साल प्रचलन के आधार पर अँगरेज़ी में समाते जा रहे अन्य भाषाओं के शब्दों को अँगरेज़ी भाषा में स्वीकार्य शब्दों के तौर पर शामिल करती है। बैंक, सैलरी, फंड, टीवी, जींस, पेंट, टी-शर्ट, जैसे दर्जनों शब्दों को हिन्दी कोशों में स्वीकार्य शब्द के तौर पर स्थान दिया जाना चाहिए, तभी हम शुद्धतावादियों के दुराग्रह से भी बच पाएँगे। देश में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के चलते संस्कृतियों के बीच अंतर्संबंध बढ़ने लगा है। आज मुंबइया शैली की हिन्दी भी सामने आई है। इस शैली के अनेक शब्दों की व्यंजना निराली है। फंटूश, बिंदास, फंडा, फंडू, भिड़ू, बीड़ू जैसे शब्द भी इसी कतार में आते हैं।
मेरा मानना है कि हिंदी की समृद्धि के लिए हमें अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आखिर वे भी इसी मिट्टी की भाषाएँ हैं। इससे आपकी अभिव्यक्ति और अधिक निखरेगी। हम अपनी बात को पूरी शिद्दत के साथ रख पाएँगे। भाषाएँ जनता की सम्पत्ति है, उन्हें सुरक्षित रखना अनिवार्य है। हम अकेले व्यवस्था को नहीं बदल सकते, लेकिन हम अपने घर पर, दुकान पर, अपने समाज में, मित्रमंडली में अपनी भाषा और उसके अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग तो कर ही सकते हैं। हम घर पर अपने बच्चों को मातृभाषा तो सिखा ही सकते हैं। हम स्वयं अपनी भाषा को सुरक्षित तो रख ही सकते हैं। आज हम ढोकला, खाखरा, थेपला आदि गुजराती व्यंजन दक्षिण भारत में भी खा सकते हैं। इडली-डोसा भी देश के कोने-कोने में मिल जाता है। पंजाब के छोले-भटूरे, छोले-कुलचे भी आज हर जगह मिल जाते हैं। जब हम व्यंजन के मामले में इतने दुराग्रही नहीं हैं, तो फिर भाषा के मामले में क्यों होना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

धैर्य की सीमा

डॉ. महेश परिमल
लोग कहते हैं कि धैर्य की सीमा क्या होनी चाहिए? एक जिज्ञासु ने जब मुझसे यह प्रश्न किया, तो मैंने कहा-यदि धैर्य की सीमा जानना चाहते हो, तो पानी को बर्फ बनता देखो। पानी का बर्फ बनना यानी तापमान का लगातार गिरना। तापमान का गिरना यानी ठंड के थपेड़ों को सहना। अपनी आंखों के सामने एक-एक चीज का सिमटना। आँख का संकुचित होना। पानी काे एकटक देखना। निर्निमेष देखती आँखें और पानी का रूप परिवर्तन। ठीक वैसे ही, जैसे तेज हवाओं के आगे बुझते दीपक को जलाए रखने की मशक्कत करना। एक स्थिति ऐसी आती है, जब हमें स्वयं का भान नहीं होता। यही होती है ध्यान की अवस्था। इस दौरान जो कुछ होता है, वही है सच्चा ध्यान। इधर पानी बर्फ बनता है, उधर ध्यान पूरा होता है। एक नई चीज आपके सामने होती है। आपको लगता है कि आज मेरे सामने कुछ नया हुआ। यहां से शुरू होती है खुद को पहचानने की कला। इस कला को हर कोई नहीं समझ सकता। खुद को पहचानना यानी खुदा को पहचानना। इसलिए ईश्वर तक जाने का रास्ता खुद से निकलता है। ईश्वर को खोजने के लिए खुद को खोज लो, ईश्वर आपके सामने होंगे।
अब आप कहेंगे कि ये ईश्वर क्या होता है? जो हमें संबल दे, हमें चुनौतियों से लड़ना सिखाए, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, वह ईश्वर। यह काम यदि कोई इंसान भी करे, तो भी वह हमारे लिए ईश्वर ही है। ईश्वर स्वयं सभी जगह नहीं जा पाते, इसलिए वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं, जो उनकी तरह काम करते हैं। अब इस प्रतिनिधि को कौन पहचान पाता है? वही जिसे ईश्वर की तलाश है। इसलिए यदि हमारे आसपास कोई ऐसा इंसान है, जो ईश्वर की तरह काम करता है, तो उसे अपना आराध्य मान लो। यह किसी भी रूप में हो सकता है। कभी किसी बुजुर्ग के रूप में या फिर बच्चे के रूप में। प्रेयसी में यदि ईश्वर के दर्शन करना चाहते हैं, तो उसके लिए रामकृष्ण परमहंस बनना होगा। रामकृष्ण परमहंस यानी विवेकानंद के गुरु। इनकी सीमा तक पहुँचना हम साधारण इंसान के बस की बात नहीं है। हमें तो केवल पानी को बर्फ बनने की प्रक्रिया देखनी है। यही है धैर्य की सीमा।
डॉ. महेश परिमल

Post Labels